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जब भी मैं मुन्नी के बारे में सोचता हूँ तो अपने बचपन के दिनों की यादें मेरे ज़ेहन में दोबारा ताज़ी हो जाती हैं। गाँव में मुन्नी को पड़ोसी तरह-तरह के नामों से पुकारते थे। कोई उसे मुन्ना कहता था। कोई उसे मुन्नी कहता था। कोई उसे टुन्ना, तो कोई उसे टुन्नी कहता था। कोई उसे फूकना कहता था, तो कोई उसे फूकनी कहता था। कोई उसे बीच वाला, तो कोई उसे बीच वाली कहता था। कोई उसे किन्नरी, तो कोई उसे छक्का कहता था। ठीक इसी तरह से बचपन में मुझे भी मेरे पड़ोसी ढेर सारे नामों से पुकारते थे।

बचपन में लोग मेरे दुबला-पतला शरीर पर ढेर सारे चुटकुले और मज़ाक बनाते थे। हज़ार मुँह, हज़ार बातें। लोगों को चमड़े के मुँह हैं, हम उन्हें रोक नहीं सकते हैं। मुन्नी को भी ठीक मेरी तरह ही अच्छे पड़ोसी नसीब नहीं हो सके। मेरी तरह ही मुन्नी को ज़िंदगी भर इस बात का अफ़सोस रहेगा। मेरे और मुन्नी के बचपन में कुछ बुनियादी फ़र्कें हैं। लोग मेरा दुबला-पतला शरीर, मेरे फटे हुए कपड़े, बचपन की घोर ग़रीबी और मेरे फटेहाल पर हँसते थे, लेकिन मुन्नी के साथ बिल्कुल दूसरी ही बात थी। मेरे और मुन्नी के दिल की संवेदना ज़रूर एक दूसरे से मेल खाती है, मगर मुन्नी के बचपन की कहानी मेरे बचपन की कहानी से काफी अलग है। 

मुन्नी हम लोगों की तरह आम बच्ची नहीं थी। जब वह माँ के गर्भ में थी, तो पहले उसके शरीर में पुरुष गुप्तांग विकसित होने लगा। कुछ समय बाद पुरुष गुप्तांग का विकास ठप हो गया और फ़ौरन ही स्त्री जननांग का विकास होने लगा। इस तरह से किसी जैविक कारण से और क्रोमोसोमल डिसऑर्डर की वजह से उसके शरीर में किसी एक लिंग की तरक्की नहीं हो सकी। जब उसका जन्म हुआ तो कुछ महीने तक उसके माँ-बाप ने इस बात को छुपाते रहे कि हक़ीक़त में उसके घर में क्या पैदा हुआ है। मुन्नी की पैदाइश बारह बजे रात को हुई थी।

उस समय गाँव के सारे लोग गहरी नींद में खर्राटे ले रहे थे। सुबह होते ही पड़ोसी ने पूछा, “ओय मोहिनी! लड़का है या लड़की। भगवान ने तेरे घर किसको भेजा है?“ यह सुनकर कुछ देर के लिए लिए मोहिनी दुविधा में पड़ गयी। “क्या बताऊँ? लड़का कहूँ या फिर लड़की। इसके तो स्त्री और पुरुष दोनों के गुप्तांग हैं।“ मोहिनी सुबह तड़के मुन्नी के जननांग का बड़ा ही गौर से मुआयना किया। उसके समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो गया। उसके जीवन में यह आफ़त कहाँ से आ गयी। चूँकि मुन्नी का गुप्तांग स्त्री के जननांग से थोड़ा नज़दीक था, इसीलिए उसने लड़की बताना ही वाजिब समझा। उस समय उसने बड़े ही प्यार से राधिका नाम रखा। जन्म लेने कुछ दिन बाद ही उसके माँ-बाप काफ़ी परेशान थे, “हे प्रभु! आपने यह क्या कर दिया? मेरी कोख़ में एक छक्का को भेज दिया। आख़िर हमसे से क्या ग़लती हो गयी? हे पिता परमेश्वर, अब मैं क्या करूँ? यह बच्चा मेरे किस काम का? इससे तो लाख गुना अच्छा होता कि आप मेरी कोख़ में एक लड़की को ही भेज देते। लड़की पैदा होती तो दहेज के लिए किसी ना किसी तरीक़े से पैसे का इंतज़ाम कर ही लेते। कम से कम इस समाज के ताने और हँसी-मज़ाक को नहीं सुनना पड़ता।” यह उनके लिए सबसे बड़ी बेइज़्ज़ती थी। अगर लोग जान जाते कि उनके घर में हिजड़ा पैदा हुआ है तो गाँव का हर शख्स उन पर थूकता, हँसता, उनकी तरफ़ हैरतअंगेज़ निगाह से देखता। मुन्नी के माता-पिता बमुशिकल पाँच महीने तक ही इस राज को अपने पड़ोसियों से छुपा सके। एक दिन पड़ोसी ने इत्तेफ़ाक़ से मुन्नी का नंगा बदन देख ही लिया। बस क्या था, पूरे गाँव में जंगल की दहकती आग की तरह यह बात फैल गयी।

नोएडा के पास के इस गाँव में एक हिजड़ा का जन्म लेना किसी चमत्कार और विचित्र घटना से कम नहीं था। गाँव के लोग किसी ना किसी बहाने से मोहिनी के घर के आसपास मंडराने लगे। मोहिनी के लिए गाँव के लोगों का मुँह चुप करना किसी भी तरह से आसान काम नहीं था। अब लोग मोहिनी और उसके संतान मुन्नी को हिक़ारत और मज़ाक की निगाह से देखने लगे। मुन्नी को जो लार-प्यार अपने गाँव, इस समाज और पड़ोसियों से मिलना चाहिए था, वह उसे कभी भी नहीं मिल सका। मुन्नी को इस बात का मलाल पूरे जीवन भर रहेगा।

छः साल गुज़रते-गुज़रते तो मोहिनी काफ़ी परेशान हो गयी। पड़ोसी अलग से उसके कान भरते रहते थे। आख़िर किसकी बात सुनें। गाँव के बड़े-बुजुर्गों ने ढेर सारे सलाह-मशविरा दिये। किसी ने कहा, “इसे हिजड़े के किसी गुरु के हवाले कर दो। वहाँ गुरु इसके पालन-पोषण करेंगे। बड़े होकर गुरु की मंडली में नाच-गाकर अपना गुज़र-बसर कर लेगी। इस समाज में इसके लिए कोई जगह नहीं है। यहाँ इसका दम घुटता रहेगा। वहाँ इसके जात के लोग रहते हैं। वहाँ मुन्नी बहुत ख़ुश रहेगी। यहाँ तो ना ही इसका घर आबाद हो सकेगा और ना ही वह सम्मान मिल सकेगा, जो इसे हिजड़े के समाज में मिल सकता है। ऊपर से तेरे दूसरे संतान की भी शादी नहीं हो सकेगी। कोई तेरे बेटे को लड़की नहीं देंगे।“

किसी ने मोहिनी और उसके पति देवव्रत को सलाह दी, “इसे किसी नाच-मंडली के हवाले कर दो।“ आख़िर मोहिनी और देवव्रत किसकी बात सुने। इतनी छोटी सी मासूम मुन्नी को कहाँ भेजें, ताकि समाज की बेइज़्ज़्ती से बच सके। मोहिनी जब अकेला होती तो अक्सर सोचती रहती, “मेरी कोख़ में दो बेटे को भेजकर भगवान ने बहुत अच्छा किया। आज दो बेटे नहीं होते तो इस हिजड़नी से मुझे कोई फ़ायदा नहीं होता। इससे तो अच्छा होता कि भगवान मेरी कोख़ में किसी बाँझ लड़की को भेज देते। कम से कम आज हमारे माथे पर सिरदर्दी नहीं होती। समाज में हमारा अपमान नहीं होता। पड़ोसी बात-बात पर मुझे ज़लील नहीं करते।“ 

 इधर छः साल की मासूम मुन्नी ख़ुद में खोयी रहती थी। उसे अपने माता-पिता से वह प्यार नहीं मिल सका, जो प्यार उसके भाई सोनू और मोनू को मिलता था। उसके माँ-बाप दोनों भाइयों को कितना प्यार से चूमते हैं। उन दोनों के लिए नये-नये कपड़े और खिलौने ख़रीदते हैं। दूसरी तरफ़, मुन्नी दोनों भाइयों के फटे-चिथड़े कपड़े पहनकर ही काम चलाती है। वह दोनों भाइयों का बचा हुआ भोजन खाती है। वे दोनों स्कूल जाने लगे हैं और मुन्नी को अभी तक अक्षर का ज्ञान भी नहीं है। 

 अभी तक तो वह इससे भी अनजान थी कि हक़ीक़त में वह इस दुनिया में किस मक़सद से आयी है। बात-बात पर माता-पिता की दुतकार को बर्दाश्त करना पड़ता था। कभी भी दोनों भाई सोनू और मोनू उसे पीट भी देते थे तो माँ-बाप कभी भी उन दोनों को ऐसा करने से नहीं रोकते थे। इसके अलावा, यह समाज भी उसे नीच दृष्टि से देखता था। उसके लिए यह किसी विपत्ति से कम नहीं है। दूसरे लफ़्ज़ों में कह सकते हैं कि यह तो उसके लिए विपत्ति से भी बढ़कर है। 

 एक दिन बुलंदशहर से पड़ोसी के यहाँ कोई मेहमान आया था। मेहमान ने मोहिनी को बताया, “बुलंदशहर में भी मेरे जान-पहचान में एक छक्का है। वह ट्रेन और सड़कों, बाज़ारों में भीख माँगकर पूरे परिवार के पेट पालता है। किन्नर पैदा ही लेते हैं ट्रेन, बसों, सड़क और चौक-चौराहे पर भीख माँगने के लिए।“ ये सुनकर मोहिनी की ज़िंदगी में उम्मीद की नयी किरण जगमगाने लगी। “क्यों न राधिका (मुन्नी) को भीख माँगने के काम में लगा दूँ। आजकल देवव्रत भी मज़दूरी करके पेट पालने के लिए भी पैसे कमा नहीं पा रहा है। इससे कम से कम कमाई का दूसरा रास्ता तो खुल जायेगा।“ 

 उसी बीच कोई गुरु उसके घर आ गया। गाँव के लोग कहते हैं कि शुरू में मोहिनी मुन्नी को देने से इनकार किया, लेकिन बाद में गुरु से कुछ पैसे पर उसकी सौदेबाज़ी हो गयी।“ गुरु मोहिनी को लेकर गाज़ियाबाद आ गया। यहाँ तो मुन्नी के ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। हिजड़े के गुरु की वेशभूषा में बहुरूपिये मुन्नी के माँ-बाप को चकमा देकर मुन्नी को ले आये। यह दिल्ली-एन.सी.आर. में बच्चों से भीख मंगवाने वाला एक गैंग था। 

 मुन्नी सात साल की हो चुकी थी। यह वह उम्र है, जब बच्चे को अपने माँ-बाप से ढेर सारे लार-प्यार और देख-रेख कि ज़रूरत होती है। अब वह गर्मी की चिलचिलाती धूप में भीख माँगने लगी। गाज़ियाबाद की सड़क पर भूखे-प्यासे बेबसी के आलम में किसी आवारा जानवर की तरह भीख माँगती रहती थी। हर शाम को बहरूपिया ठग यानी गुरु भीख से इकट्ठे हुए सारे पैसे अपने जेब में रख लेते थे। इतने ही सालों में कई बार उसका यौन शोषण भी हो चुका था। अब वह समझने लगी थी कि मैं सचमुच में आम बच्चों से और अपने भाइयों से बिलकुल अलग हूँ। ऐसी हालत में उसे अपने दोनों भाइयों की याद आ जाती थी। “काश! मैं आज आम बच्चों की तरह पैदा लेती तो आज मैं इस सड़क पर नहीं माँग रही होती। आज दोनों भाइयों की तरह ही मैं भी स्कूल जाती। पढ़-लिखकर बड़ा होकर अच्छी नौकरी करती और अपने भाइयों और माता-पिता की मदद भी करती। समाज में मुझे भी आम लोगों की तरह इज़्ज़त मिलती। इस समाज में मेरे माता-पिता का सम्मान भी बढ़ता। उन्हें मेरी सफलता पर गर्व होता। आज भीख मंगवाने वाले गैंग में फंसकर मेरे सारे सपने, सारी लालसाएँ धराशायी हो गयीं।“ जब सड़क पर स्कूल बसों में बच्चों को स्कूल जाते हुए देखती थी, तो उसका मन तड़पने लगता था। “काश! इन्हीं बच्चों के जैसे मुझे भी स्कूल जाने का सुनहरा अवसर नसीब होता तो कितना अच्छा होता।“ कई बार तो उसने सोचा कि यहाँ से भागकर कहीं दूर चला जाऊँ। किंतु बेचारी यहाँ से भागकर जाये भी कहाँ। जब भागने का ख्याल उसके ज़ेहन में आता तो आगे की दुनिया धुंधली और अंधकारमय दिखायी देने लगती थी। “यहाँ से भाग जाऊँ तो रहने के लिए कहाँ जगह मिलेगी। मैं कहाँ सोऊँगी? क्या खाऊँगी? इस दुनिया में कौन किसकी मदद करता है? यह दुनिया कितनी निर्दयी है। यह दुनिया अपनी बड़ी-बड़ी काली निर्दयी आँखों से मेरी तरफ़ झाँक रही है।“ इसी तरह के ढेर सारे अजीबोगरीब ख्यालात उसके ज़ेहन में दस्तक देते रहते थे।

 जून महीने की चिलचिलाती धूप में एक दोपहर को वह गाज़ियाबाद के राजमार्ग के किनारे भीख माँग रही थी। एक कार में एक दंपति बैठा हुआ था। कार रेड लाइट के पास आकर खड़ी हो गयी। मुन्नी उस कार की तरफ दौड़ी। कार अब रेड लाइट के पास एक किनारे पर आकर रुक गयी। मुन्नी हाथ जोड़कर विनती करने लगी, “बाबूजी, दे दो दस रुपये। भगवान आपका भला करेगा।“ तपती धूप में धूल और पसीने से मुन्नी का चेहरा काला रंग में तबदील होकर सूख रहा था। उसके चेहरे पर बेबसी साफ़-साफ़ झलक रही थी। इसे देखकर महिला का हृदय करुणामय हो गया।“ 

 “आओ नज़दीक आओ। इतनी कम उम्र में तेरे माता-पिता ने जन्म देकर तुझे सड़क पर भीख माँगने के लिए भेज दिया है। बेटी, अभी तो स्कूल जाने का समय है और तुम हाथ फैलाकर लोगों से भीख माँग रही है।“ इतना कहने के बाद महिला ने उसे पानी की एक बोतल दे दी। मुन्नी ज़ोर-ज़ोर से घटक-घटककर पानी पीने लगी। अब मुन्नी पसीने पोंछते हुए बोली, “मेरे माँ-बाप ने गुरु के हाथों मुझे सौंप दिया। अब मैं पूरे दिन उनके लिए भीख माँगती फिरती हूँ।“ यह सुनकर महिला ने झट से पूछा, “कहाँ है तेरा गुरु? कौन है तेरा गुरु? किस बात का गुरु?

“वह शाम को लेने आते हैं। इस रेड लाइट के पास से मुझे उठाकर अपने घर ले जाते हैं। हर सुबह फिर से यहाँ छोड़ जाते हैं।“ 

अब महिला ने मुन्नी से कहा, “क्या चलेगी अभी मेरे साथ। मैं तुझे स्कूल भी भेजूँगी और हम लोगों के साथ वहाँ रहना। आठ साल की मुन्नी में अब नयी उम्मीद की किरण दिखने लगी। वह मुस्कुराकर बोली, “क्या आप सचमुच में मुझे अपने घर ले जायेंगी?“ 

“क्यों नहीं? क्या डॉक्टर अरोड़ा जी? आपका क्या विचार है? ले चलें इस बेचारी को अपने साथ।“ 

इस पर अरोड़ा भी राज़ी हो गये। अब बस क्या था, मुन्नी झट से डॉक्टर अरोड़ा की कार में बैठ गयी। इसी रेड लाइट के पास से मुन्नी की ज़िंदगी ने दूसरी दिशा में करवट ले ली। डॉक्टर अरोड़ा और श्रीमती अरोड़ा मुन्नी को लेकर अपनी कोठी ग्रीन पार्क में आ गये। अब मुन्नी को नया घर मिल गया। वह इस घर में फूले नहीं समा रही थी। अब उसकी ज़िंदगी दुनिया के दूसरे चौराहे पर खड़ी थी। 

यह अरोड़ा दंपति पैंतालीस साल से ऊपर के हो गये थे, फिर भी अभी तक एक संतान से वंचित रह गये थे। आख़िरकार डॉक्टर अरोड़ा निराश होकर अपना भतीजा को गोद ले लिया था। इधर दो सालों से वह मेडिकल की पढ़ाई के लिए अमेरिका चला गया था। अरोड़ा दंपति काम के बाद अकेले इस हवेली में मायूस होकर पड़े रहते थे। पूनम अरोड़ा का दिल नहीं बहल पाता। डॉक्टर अरोड़ा ने कितने रोगग्रस्त लोगों का इलाज करके नयी ज़िंदगी दी थी, लेकिन वह अपनी ज़िंदगी में वह रौनक़ और उल्लास नहीं दे सका, जिसका वह हक़दार है। हर चीज़ तो इंसान के हाथों में नहीं है। वह अपने बाँझपन का कोई इलाज तलाश नहीं सका। अपने भतीजे को ही अपने संतान के रूप में स्वीकार करके रूह को तसल्ली देता रहता था। जब उसकी धर्मपत्नी पूनम अरोड़ा गाज़ियाबाद के रेड लाइट के पास भीख माँगती हुई इस लड़की को देखा, तो उसका दिल करुणारूपी मोम की चपेट में आकर पिघलने लगा। उसकी रूह में तीव्र इच्छा हिलकोरने लगी कि इस मुन्नी को ही अपनी कार में बैठा लूँ। अंततः ऐसा हुआ भी। उसने धूल, पसीने और गंदगी में समायी हुई मुन्नी को अपनी प्यासी गोद से लगा लिया। उसे ऐसा लगा कि मानो उसकी ज़िंदगी में नयी जान लौट आयी हो। उसकी ज़िंदगी में फिर से सवेरा हो गया हो।

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उन्होंने मुन्नी को एक बेटी की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया। मुन्नी पहली श्रेणी से दसवीं और बारहवीं की परीक्षा पास की। अरोड़ा जी का एक सपना था- ‘काश! मेरा अपना संतान होता। पढ़-लिखकर मेरे जैसे ही एक बड़ा डॉक्टर बनता। देश के लोगों का सेवा करता। देश का नाम रौशन करता।“ अब उसका यही सपना पूरा होने को था। मुन्नी ने मेडिकल की शिक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा पास कर ली। दिलोजान से समर्पित होकर पढ़ाई पूरी की और AIIMS में डॉक्टर बन गयी। इसके साथ ही डॉक्टर अरोड़ा का सपना भी साकार हो गया। अब डॉक्टर अरोड़ा हमेशा सोचता है- “बहुत अच्छा हुआ। पूनम मुन्नी को लेकर यहाँ आ गयी। एक डॉक्टर के रूप में मेरे काम को आगे बढ़ायेगा। मेरा नाम को मेरे मरने के बाद भी जीवित रखेगा। इससे ज़्यादा और क्या चाहिए?

मुन्नी ने अब लिंग संबंधी अपनी सर्जरी भी करवा ली है। अब वह सौ प्रतिशत लड़की है। फिर भी उसे एक बात का मलाल तो रह ही जायेगा। वह कभी भी अपना बच्चा पैदा नहीं कर सकती है। लेकिन जब दूसरी तरफ़ देखती है, तो पाती है कि उसका अपना पूरा भरा-भरा सा परिवार है। अरोड़ा जी के परिवार के दूसरे लोगों के बच्चे हैं। उनके साथ ही उसका दिल बहल जाता है। 

मुन्नी अपने पुराने नाम को नहीं भूल सकी। अब उसका नाम डॉक्टर राधिका अरोड़ा है। फिर भी मैं उसे इस कहानी में मुन्नी कहकर ही बुलाऊँगा, क्योंकि एक कहानीकार के रूप में मुझे राधिका से ज़्यादा मुन्नी नाम ही पसंद है। 

अस्पताल में ही उसे अपने एक सहकर्मी से प्यार हो गया है। वह अब सड़क छाप छक्का नहीं है। वह बहुत यशस्वी डॉक्टर है। हॉस्पिटल में उसके कामों की ख़ूब तारीफ़ होती है। वह किसी दूसरे डॉक्टर से किसी मायने में कम नहीं है। 

कभी-कभी वह उन दिनों को याद करती है, जब गाँव में लोग उस पर ताने मारते थे, फिर उसके माता-पिता ने उसे किसी गुरु को दे दिया था। उसके बाद बड़ा ही भयंकर नरकरूपी जीवन का आगाज़ हुआ। उसके बाद भीख माँगने का सिससिला शुरू हुआ। ये बातें सोचकर उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अनायास उसकी आँखों से आँसू टपकने लगते हैं। कभी-कभी तो आज भी वह दुःख के दिनों को याद करके आँसू के इन तेज़ धाराओं रोक नहीं पाती है। आँसू के अथाह समुंदर में गुमसुम होकर कल्पनाओं की बुलंद परवाज़ पर सवार हो जाती है।

हर सुबह हॉस्पिटल जाने से पहले जब वह आईने के सामने मेकअप करती है तो नहीं चाहकर भी नाक पर उसका ध्यान चला जाता है। उसकी नाक के ऊपर कटा हुआ निशान है। यह निशान उसे तीसरे लिंग में पैदा होने के एवज़ में मिला है। जब वह छः साल की थी, तो एक दिन माँ ने गुस्सा से उसकी नाक पर गिलास से प्रहार कर दिया। नाक के ऊपर का माँस का एक टुकड़ा ज़मीन पर आ गिरा। नाक से टपकते खून ने धारा की तरह प्रवाहित होकर उसके चेहरे को लाल कर दिया। इतनी छोटी उम्र में हुई इस घटना की याद आज भी उसके ज़ेहन में ताज़ा है। जब वह बड़ी हो गयी तो डॉक्टर अरोड़ा ने कई बार उसे कहा, “राधिका बेटी, चलो मेरे साथ, अब तेरे माता-पिता को खोज निकलता हूँ।“

लेकिन जब मुन्नी का ध्यान अपनी नाक पर जाता है तो वह किसी भी हालत में अपने माता-पिता, भाइयों और अपने समाज को ढूँढना नहीं चाहती है। नोएडा दिल्ली से बहुत दूर भी नहीं है। वह चाहती तो कब का अपने माँ-बाप से मिल लेती। आज भी उसके ज़ेहन में अठारह-उन्नीस साल पहले की धुँधली तस्वीरें क़ैद हैं, किंतु वह इन तस्वीरों की तरफ़ मुड़कर देखना तक पसंद नहीं करती है। फिर भी याद आती है। फिर ज़िंदगी की शुरुआती लम्हों की याद में कभी ना कभी फंस ही जाती है।

अब उसे अपने सहकर्मी डॉक्टर राज के साथ हर मुराद पूरी हो जाती है। दोनों पूरे दिन हॉस्पिटल के एक ही वार्ड में एक साथ काम करते हैं। जब मुन्नी सड़क के किनारे से चलती है तो दूसरे हिजड़ों को भीख माँगते हुए, पचास रूपये पर जिस्म फ़रोशी करते हुए देखकर उसका दिल पीड़ा और वेदना से लबालब हो जाता है। वह अक्सर सोचती रहती है, “मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी बचपन देखा ही नहीं है। माँ के पेट से निकलते ही एक झटके में ही जवान हो गयी। फिर ख़ुद से सारी ज़िम्मेवारियाँ निभाना पड़ा। ऐसा लगता है कि मैं सीधे सातवें आसमान से उठकर ज़मीन पर आ गिरी हूँ। इस संसार में मेरा कोई वजूद है ही नहीं। क्या हम सिर्फ़, भीख माँगने और जिस्म फ़रोशी की दलदल में फँसने के लिए जन्म लेते हैं।

काश! ऐसा चमत्कार हो जाता कि मेरे समुदाय के सारे लोग मेरे जैसे ही हो जाते। इस समाज में हमें भी उतना ही प्यार मिलता, जितना स्त्री और पुरुष को मिलता है। हम भी तो दूसरे लोगों के जैसे ही नौ महीने तक माँ के गर्भ में पले-बढ़े हैं। उसी ईश्वर ने हमें भी आम लोगों की तरह इस संसार में भेजा है। फिर हमारे साथ भेदभाव क्यों। हम एक ही माँ-बाप के रज-वीर्य के संगम से पैदा होकर भी समाज और परिवार में हमारी हैसियत किसी सौतेले बच्चों से भी बदतर है। आख़िर ऐसा क्यों?…..?“ 

इधर डॉक्टर राज से उसे इतना ज़्यादा प्यार मिला है कि कुछ पल के लिए मुन्नी इस निर्दयी समाज की बेवफ़ाई को भूलकर राज की गोद में लेटकर अपने सुनहरे मुस्तक़बिल (भविष्य) के ख्व़ाब देखती रहती है। जब राज उसके रसीले होंठों को प्यार से चूमता है, उसकी घुँघराली ज़ुल्फ़ को आहिस्ता-आहिस्ता सहलाता है तो वह अपनी मनहूस काली माज़ी को कुछ देर के लिए भूल जाती है। फिर वह बड़ी तसल्ली के साथ राज के सीने को सहलाने लगती है। जब दोनों के होंठ एक दूसरे को स्पर्श करने लगते हैं तो उन दोनों को नैसर्गिक सुख की अनुभूति होती है।

कुछ पल के लिए महबूब की आग़ोश में गुम होकर यह दुनिया कितनी हसीन हो जाती है। अगर महबूब का साथ हो तो इस दुनिया में किसी चीज़ की कमी दिल में नहीं खलती है। बस एक कमी तो ज़रूर खलती है। अगर किसी ने अपना बचपन ही नहीं देखा हो तो यह कमी इंसान को जिंदगी की आख़िरी साँस तक परेशान करती है। मुन्नी के साथ भी कुछ ऐसा ही था। एक अफ़साने निगार के रूप में और एक आम पाठक के रूप में भी मैं मुन्नी के जज़्बात को तहेदिल से महसूस करता हूँ, क्योंकि मुझे भी अपने बचपन की वह कमी दिल में आज तक चुभती रहती है। 

कभी-कभी तो वे दोनों सोचते हैं कि आज AIIMS में नौकरी नहीं लगती तो हम दोनों की मुलाक़ात नहीं हो पाती। अगर मुलाक़ात नहीं हो पाती तो यह मुहब्बत आज परवान नहीं चढ़ती। राज को वह मुन्नी नहीं मिल पाती। वह ख़ूबसूरत और प्रतिभाशाली मुन्नी। राज को मुन्नी से हर ख़ुशी मिलती है, जो उसे किसी दूसरी लड़की से नहीं मिल सकी। अब तो वह मुड़कर भी किसी दूसरी लड़की की तरफ़ नहीं देखता है। मुन्नी में क्या नहीं है? उसकी बड़ी-बड़ी आसमानी काली आँखें, बड़ी-बड़ी काली घुँघराली ज़ुल्फ़, सपाट और मखमली रुख़सार, दोनों आँखों के ऊपर इंद्रधनुष के आकर के भौंह और होंठों पर वह रौनक़, जिसे देखकर डॉक्टर राज को अपनी ज़िंदगी से इत्मीनान और नैसर्गिक सुख की अनुभूति होती है। जब मुन्नी के चेहरे पर धीमी मुस्कान अंगराई लेने लगती है तो उसे चूमकर डॉक्टर राज की ज़िंदगी गुलज़ार हो जाती है।

 कभी-कभी जब मरीज़ नहीं रहते हैं और अपनी केबिन में अकेली बैठी रहती है तो अपने समुदाय के लोगों की दयनीय स्थिति के बारे में सोचकर काफी बेचैन हो जाती है। उसने कई एन.जी.ओ. के साथ मिलकर किन्नर समाज में जागरूकता लाने का अभियान चला रही है। पूरे देश में कहीं ना कहीं सेमिनार में जाती है और पूरे मुखर स्वर में किन्नरों को वाजिब हक़ और सम्मान दिलाने के लिए पैरवी करती है। 

 मुन्नी को अब इस दुनिया में किसी चीज़ की कमी नहीं है। अरोड़ा दंपति जैसे माता-पिता उसे मिले हैं, जिनकी बदौलत उसने इतनी बड़ी मुकाम हासिल की है। डॉक्टर राज जैसा सच्चा महबूब का प्यार भी उसे मिल रहा है। इस समाज भी उसे इज़्ज़त मिल रही है। AIIMS में कई आम चिकित्सकों से ज़्यादा वह अच्छा प्रदर्शन कर रही है। उसे गर्व है कि वह अपने देश की सेवा पूरी निष्ठा, ईमानदारी और लगन से कर रही है। पैसे की भी कोई कमी नहीं है। कार, बंगला हर चीज़ मौजूद है। फिर भी उसे एक बात का मलाल रह जायेगा। उसे अपनों का प्यार नसीब नहीं हो सका। एक माँ जिसने उसे नौ महीने तक अपने पेट ढोया, जन्म लेने के बाद जब उसे पता चला कि मुन्नी हिजड़ा है तो उसके साथ कितना क्रूर और अमानवीय बर्ताव किया। पिताजी से भी उसे वह लार-प्यार नसीब नहीं हो सका, जो उसके भाइयों को नसीब हुआ था। अगर बचपन में ये सब मुन्नी को नसीब हो जाते तो आज वह इतना बड़ा डॉक्टर होने के बावजूद हमेशा उदास होकर ख़ुद में खोयी-खोयी सी नहीं रहती। कहने को तो पूनम अरोड़ा एक सगी माँ से भी काफी बढ़कर है। फिर भी हर बच्चे के दिल में अपनी जैविक माँ-बाप के लिए जगह हमेशा ख़ाली रहती है, जिस माँ ने नौ महीने तक बच्चा को पेट में ढोया है। इस खाली जगह को दुनिया की कोई भी ख़ुशी पूरी नहीं कर सकती है।

आजकल वह AIIMS के आपातकालीन वार्ड में काम करती है। यहाँ बड़े से बड़े गंभीर रोगी आते हैं। इनमें से कई को यहाँ नयी ज़िंदगी मिलती है। कई रोगी बदनसीब होते हैं। कई बार पैसे के अभाव में, या महंगे दवाई ख़रीदने में असमर्थता के कारण काल के मुँह में समा जाते हैं। एक शाम को एक रोगी को अचेतावस्था में AIIMS के इसी वार्ड में लाया गया, जहाँ मुन्नी ड्यूटी करती थी। कई दिनों तक बड़े तन-मन के साथ इसका भी इलाज करती रही। इस महिला की आँखें अंदर की तरफ़ धंस गयी थीं। शरीर के रंग कब का उतर गया था। मौत के मुँह में समाने वाले मरीज़ों को देखकर मुन्नी बहुत दुखी होती है।

मगर करें भी क्या, डॉक्टरी एक पेशा है, यहाँ दिखाने के लिए बाहर से वह दिल को मज़बूती कर लेती थी। कई बार गुस्से में आकर परेशान करने वाले मरीज़ों और उसके रिश्तेदारों को डाँट भी देती है, मगर बाद में उसे बहुत अफ़सोस भी होता है। मृत्यु शय्या में क़ैद हो रही इस महिला के पति और बेटे ने डॉक्टर से बहुत बार गुज़ारिश की, “मेरी माँ को बचा लीजिए। हमारे पास इतने पैसे नहीं है कि मैं अपनी माँ का लीवर ट्रांसप्लांट करवा सकूँ।“ मुन्नी क्या करें? हर रोज़ ऐसे गंभीर मरीज़ आते रहते हैं।

इलाज भी तो ग़रीब और अमीर के बीच बंट जाता है। जिसके पास बहुत रूपये होते हैं, वह किसी तरह से लीवर ट्रांसप्लांट करवा लेता है। बाक़ी जीना-मरना तो ईश्वर के हाथों में है। मुन्नी ने सिर्फ इतना आश्वासन दिया कि हम सब किसी तरह से बचाने की पूरी कोशिश करेंगे। वह एक डॉक्टर के रूप में अच्छी तरह से जानती है कि ऐसे मरीज़ बिना लीवर ट्रांसप्लांट के बच नहीं सकते हैं। लीवर ट्रांसप्लांट करवाना इतना आसान काम नहीं है। कोई अगर मुफ़्त में लीवर दान कर दे, तभी तो कम पैसे में लीवर ट्रांसप्लांट कराया जा सकता है। मुन्नी अच्छी तरह से जानती है कि अगर पैसे नहीं हो तो ऐसे मरीज़ों की मौत को कोई भी टाल नहीं सकता है। 

मुन्नी ने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की कि किसी तरह से यह मरीज़ बच जाये। सुबह, शाम, दोपहर दो हफ़्ते तक वह इस मरीज़ की देखरेख करती रही। पंद्रहवें रोज़ शाम में उसके होश आये। उस महिला मरीज़ के बेटे और पति दौड़कर मुन्नी की केबिन में आये। “डॉक्टर साहिबा, मेरे माँ के होश आ गये। आप हमारे लिए इस धरती पर साक्षात् भगवान के अवतार हैं। अब हमें पूरा विश्वास है कि हमारी माँ बच जायेगी। अभी-अभी उसने स्वस्थ होकर हमसे बातचीत की।“ यह सुनकर मुन्नी बहुत ख़ुश हुई। सोचने लगी, “यह चमत्कार हो गया। रखने वाले सैंया तो मार सके कोय। सचमुच में महिला के होश आ गये। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। सब कुछ भगवान के हाथ में हैं। वो चाह ले तो एक मुर्दा ज़िन्दा होकर उठ जाये।“

अब वह दौड़कर मरीज़ों के इस आपातकालीन वार्ड की तरफ़ जाने लगी। जैसे ही वह वार्ड में दाख़िल हुई, वैसे ही उसने देखा कि महिला बेड पर बैठी हुई है। अब वह नज़दीक आकर महिला से हाल-समाचार पूछा।

महिला कुछ बोलते हुए बिस्तर पर गिर गयी। फिर उसके पेट में ज़ोरदार दर्द उखड़ आया। उसने दर्द में कराहते हुए बड़ी गौर से मुन्नी की नाक के कटे हुए निशान की तरफ़ देखी। फिर वह दर्द में कराहते हुए, सिसकते हुए बोलने लगी, “मुझे लगता है कि मैंने आपको कहीं देखा है। क्या नाम है आपका? मुझे भी कई साल पहले एक बेटी थी। उसकी नाक पर आपकी तरह ही ऐसा ही कटा हुआ निशान था। दुर्भाग्यवश वह हमसे बिछड़ गयी। आज तक लौटकर नहीं आयी। हम लोग कई सालों तक उसे तलाश करते रहे, मगर वह कहीं नहीं मिली। अब तो मैं यह दुनिया छोड़ रही हूँ, मगर एक बार वह मिल जाती तो बहुत अच्छा रहता। कई सालों से दिल में मरी हुई एक इच्छा पूरी हो जाती। जीवन की अंतिम घड़ी में यूँ ही अनायास आपको देखकर अपनी बिछड़ी हुई बेटी की याद आ गयी।“ 

डॉक्टर मुन्नी के रोंगटे खड़े हो गये। उसके माथे से पसीने छूटने लगे। पसीने पोंछते हुए उसने उस मरीज़ से पूछा, “क्या नाम था आपकी बेटी की?” 

महिला की आँखों से आँसू टपकने लगे। उसने अपने पेट को पकड़ते हुए जवाब दिया, “मैं प्यार से राधिका कहकर बुलाती थी। वैसे तो कोई उसे मुन्ना कहता था। कोई उसे मुन्नी कहती थी। मेरे लिए वह सिर्फ़ राधिका थी। मैंने ही छठी रात को ख़ुद से सोचकर उसका नाम राधिका रखा था।“ 

यह सुनकर डॉक्टर राधिका अरोड़ा की आँखों से आँसू की मूसलाधार बारिश होने लगी। उसने कई सालों से अपनी पथरीली आसमानी आँखों में इन बेशक़ीमती आँसू को जुगनू की तरह सजा रखा था। डॉक्टर राधिका अरोड़ा से अब रहा नहीं गया। बर्दाश्त अपनी सीमा लाँघ चुकी थी। उसने झट से अपनी माँ को गले से लगा लिया। एक मासूम नन्हा बच्चा की तरह सिसक-सिसककर रोने लगी। मानो कि बचपन में कभी रोने का मौक़ा नहीं मिला हो। बच्चे की तरह इस महिला के निर्बल शरीर को सहलाने लगी। ऐसा लगा रहा था कि इनके आँसू कभी भी थमेंगे नहीं। बीमार महिला के टांग के पास उसके दोनों बेटे और पति खड़े थे। 

वह नादान नन्ही बच्ची की तरह ज़ोर-ज़ोर से कलप-कलपकर सिसकते हुए बोली, “मैं ही राधिका हूँ। वही मुन्ना मुन्नी। मेरे भाई वही सोनू, मोनू थे ना। मैं अभी तक इन नामों को नहीं भूल सकी। इन नामों को कब तक छिपाकर इस दुनिया में जीती रहूँगी। बिना अपने जड़ के, बिना उसके पहचान के कब मुझे ख़ुशी मिलेगी? कब मेरी आत्मा को शांति मिलेगी? मैं आज भी अपने दिल के आंतरिक संसार में इन्हीं नामों के सहारे जी रही हूँ।“

अब माँ का शरीर हल्का होने लगा था। कुछ देर के लिए उसे दर्द से राहत मिलने लगी थी, मानो कि वह अब पूरी तरह से रोगमुक्त हो चुकी हो। अब उसे नयी ज़िंदगी मिल गयी हो। अब वह अपनी बेटी को इस तरह से सहलाकर कल्पनाशील संसार का चक्कर लगाने लगी, “मेरी राधिका अभी मात्र तीन महीने की है। मैं उसे प्यार से सहला रही हूँ। उसे चूम रही हूँ। उसे अपने सीने से लगा रही हूँ। उसे दूध पिला रही हूँ। हमने उसके लिए रंग-बिरंगे कपड़े ख़रीदकर लाये हैं। उसके पसंदीदा खिलौने ख़रीदकर लाये हैं। वह मेरी गोद में बैठकर इन खिलौनों से खेल रही है।

अब वह तीन साल की हो चुकी है। कपड़ों से बने गुड़ियों को अपनी गोद में लेकर आँगन का चक्कर लगा रही है। मुझसे तुतलाकर बात कर रही है।“ राधिका की माँ कई सालों बाद फिर से उसी दुनिया में लौट गयी, जब मुन्नी (राधिका) को अपनी कोख़ से जन्म दिया था। जन्म से लेकर आठ सालों की उम्र तक की सारी तस्वीरें उसके ज़ेहन में एक-एक करके दस्तक दे रही थीं। जब वह आठ साल की हुई तो उन्होंने हिजड़ों के गुरु को सौंप दिया। उसके बाद की तस्वीर मोहिनी के ज़ेहन से नदारद थीं। वह एक माँ के रूप में बाद की तस्वीरों को अपने मस्तिष्क में उतारने की भरपूर कोशिश कर रही थी।

अपनी बेटी के आँसू पोंछते हुए कुछ बोलना चाहा। बोलते समय उसकी जुबान लड़खड़ाने लगी। मुँह से सिर्फ़ दो ही शब्दें बड़ी मुश्किल से निकल पाये। “मेरी बेटी” इतना कहते ही महिला ने अपनी आँखें मूँद लीं। रोने-चीखने की आवाज़ कुछ देर तक इस आपातकालीन वार्ड में गूँजती रह गयी।

राकेश शंकर भारती
कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त आदि विधाओं पर लेखन। अबतक तीन किताबें प्रकाशित। संपर्क - rsbharti.jnu@gmail.com

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