Tuesday, July 16, 2024
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संगीता राजपूत ‘श्यामा’ की लघुकथा – तिरिया-विमर्श

तिरिया ने आखें गोल- गोल घुमाते हुए कहा, ” देखो! मैं तो केवल स्त्री- विमर्श पर ही कलम चलाना पसंद करती हूँ| मैने माना कि स्त्री- विमर्श पर पहले बहुत कुछ लिखा जा चुका है पर अभी भी बहुत लिखना बाकी है और वैसे भी स्त्री-विमर्श पर लिखी पुस्तकें हाथो हाथ बिकती है इसलिए सब तरफ भागने का कोई फायदा नही |
हल्की गहरी श्वास छोड़ते हुए योषा बोली, मै तुम्हारे विचार से सहमत नही हूँ, केवल स्त्री- विमर्श पर लिखना और बाकी विषयो को दरकिनार कर देना, यह तो एक लेखक का धर्म नही है •• यदि स्त्रियो की वेदना पर कलम चलती है तो पुरूष की समस्याओ पर भी लिखना चाहिए |
         तिरिया तपाक से बोली,  अरे! बिलकुल नही! हम जिस समाज में रहते है उसे पुरूषो द्वारा चलाया जाता है •• पुरूष स्वतंत्र है •• वह हमेशा अपने अधिकारो का प्रयोग स्त्रियो के अस्तित्व को बौना करने में ही लगा देता है और मुझे तो आश्चर्य होता है कि तुम एक स्त्री होकर पुरूष- विमर्श पर लिखने की वकालत कर रही हो |  आज भी स्त्रियो को किसी भी कार्यक्षेत्र में पुरूषो से अधिक समस्याओ का सामना करना पड़ता है,तुम्हे यह बात याद रखनी चाहिए।
 योषा ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, ” मै मानती हूँ कि स्त्रियो के समक्ष बहुत सी चुनौती है परंतु अब परिस्थितियां पहले से बहुत बदल चुकी है और फिर सभी पुरूष बुरे नही होते तिरिया•• !   वैसे स्त्री व पुरूष विमर्श को छोड़कर भी बहुत कुछ है लिखने को •• प्रकृति, प्रदूषण, युवाओ में नशे की लत,  सोशल मिडिया के दुष्प्रभाव आदि | इन सभी मुद्दो पर लेख, कहानी व कविता के माध्यम से पाठको को जागरूक किया जा सकता है |
 { तभी तिरिया के मोबाइल पर उसके बेटे की काल आती है|
  मम्मी•• ! प्लीज मुझे बचाओ!  ” मै मुसीबत में फंस गया हूँ पुलिसवालो ने रात से मुझे थाने में बैठा रखा है फोन भी बहुत मुश्किल से करने दिया है|”
तिरिया ने घबराकर कहा,  क्या हुआ  •• तुम रात से थाने मे ही हो •• पर क्यो ? अब तो दोपहर हो चुकी है | पर पुलिसवालो ने थाने में क्यो बैठा रखा है ••
लायला कहाँ है  ?
नाम मत लो उसका •• मेरे जीवन में ग्रहण बनकर आयी है| उसने ही  झूठी  एफ आई आर दर्ज करवायी है कि मेरा पति और मेरी सास दहेज के लिए प्रताड़ित करते है।
“मैं •• मै तो यहाँ हूँ कानपुर में हूँ और वह शादी के तुरंत बाद ही तुम्हारे साथ नोएडा चली गई थी और फिर हमने तो कभी कोई दहेज लिया ही नही, “तिरिया की घबराहट बेचैनी में बदल गई| उसने गले पर आते हुए पसीने को पोछते हुए कहा, “तुम परेशान न हो”| तुम्हारे पापा और मै अभी नोएडा के लिए निकल रहे है |
योषा की आँखें तिरिया के चेहरे के हाव भाव पढती हुई और तिरिया की पलके जमीन में कुछ खोजती प्रतीत होती है।
संगीता राजपूत “श्यामा”
अलीगढ़ { उत्तर प्रदेश}
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3 टिप्पणी

  1. संगीता जी!कथनी और करनी का अंतर इस लघु कथा में महसूस हुआ। वर्तमान की यही सच्चाई है कि पुरुष भी स्त्रियों से प्रताड़ित हो रहे हैं।और भी ज्वलित समस्याएँ हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। किसी भी विषय पर दुराग्रह ठीक नहीं।
    आँखे खोलती लघुकथा।

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