साक्षी का जब से इस छोटे से शहर में ट्रांसफर होकर आया है । उसका किसी काम में मन नहीं लगता है। कहां झीलों का शहर भोपाल और कहां यह डाकू और बागियों का शहर भिंड। यहां आने से पहले उसने यहां के बारे में न जाने क्या- क्या सुन रखा था कि यहां के हर घर में बंदूक होती है और यहां के लोग बात- बात पर गाली और गोलियों की बौछार कर देते है ।ब्ला… ब्ला…
जिस दिन उसको अपना भिंड ट्रांसफर होने का पता चला था तो उस दिन वह बहुत रोई थी। एक बारगी तो उसके मन में आया था कि वह नौकरी से रिजाइन ही कर दे तो अच्छा है। अगर उस पर घर की जिम्मेदारियां ना होती तो शायद वह अब तक रिजाइन भी कर चुकी होती ।
उसने बड़े ही बेमन से सामान पैकिंग की और इस अनजान से शहर भिंड में आ गई।
शुरूआत में तो उसे इस शहर की आबो-हवा अच्छी नहीं लगी लेकिन जैसे -जैसे दिन बीतते गए तो उसका यहां कुछ मन रमने सा लगा । लेकिन उसकी बैंक की इस नौकरी का यही हाल है कि जब तक उसका मन किसी शहर में पूरी तरह से रम पाता है तब तक उसका ट्रांसफर हो जाता है।
नौकरी की शुरुआती वर्षों में तो उसे यह सब बड़ा अच्छा लगता था कि उसे अलग – अलग जगहों, लोगों और संस्कृतियों को जानने का मौका मिल रहा है । लेकिन जल्द ही उसे इस सब से ऊब सी होने लगी। अब उसे यह परिवर्तन बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है ।
वह सोचती है क्या छूटा हुआ शहर या छूटे हुए लोग कभी छूट पाते है हमसे? मानव मन की ये कौन सी विवशता है कि हम कभी वर्तमान में स्थिर नहीं रह पाते हैं।या तो हम भविष्य की सोचते रहते हैं या अतीत में खोये रहते है ।
वैसे उसे इस नये शहर में आए लगभग छः माह होने को आए थे लेकिन उसे यह शहर अभी भी अजनबी सा लगता है। हालांकि जितनी इसके बारे में अफवाहें सुनी थी सच्चाई उससे बहुत दूर थी। यहां के लोग जुबां से भले ही कुछ भी बोले मगर दिल के बेहद साफ है।
वह जिस मकान में रहती है वह मकान मालकिन एक बेहद उदार महिला है जो साक्षी को अपनी बिटिया जैसा स्नेह देती है। यहां तक दूधवाला, सब्जीवाला व मोहल्ले वाले सब उसका सहयोग करने को सदैव तत्पर रहते हैं।
रोज घर से ऑफिस फिर ऑफिस से घर ,उसकी जिंदगी की बस यही दिनचर्या बनकर रह गयी है । उसकी जिंदगी जैसे बस के पहिए की तरह घूम रही है ।ऊपर से बैंक में उसका खडूस मैनेजर जो मैनेजर कम हिटलर ज्यादा लगता है। ।
वैसे तो उसका नाम अश्विनी कुमार उर्फ एके है। मगर उसके तेजतर्रार स्वभाव की वजह से ऑफिस में सब उसे एके 47 कहते है। उसके बारे में पूरे ऑफिस में प्रसिद्ध है कि इंसान एक बार एके 47 के वार से बच सकता है मगर मजाल है कि एके की पैनी नजर से बच जाए।
वैसे वह अपना काम पूरी ईमानदारी से करती है और किसी भी प्रकार की ग़लती करने से बचती है फिर भी वह कभी न कभी उसके कोप भाजन का पात्र बन जाती है।
आज रोज की अपेक्षा उसे बैंक का काम निपटाते हुए बहुत देर हो गई थी।जल्दी घर जाने की हड़बड़ी में काम और बिगड़ गया। उसने किसी तरह से आंकड़ो का मिलान किया और वह जल्दी से बैंक से निकल कर बाहर सड़क पर आ गई तभी पीछे से उसे आवाज़ सुनाई दी।
“साक्षी रुको ।”
यह आवाज सुनकर उसका दिल धक्क सा रह गया । “हे!भगवान ये तो एके 47 की आवाज है वह मुझे क्यों बुला रहा है ? अब क्या गड़बड़ हो गई ?”उसने मन ही मन सोचा । फिर अपनी वाणी को संयत रखते हुए उसने पूछा
“जी सर , क्या बात है?”
“ कुछ बात नहीं साक्षी आज तुम्हें घर जाने के लिए बहुत देर हो गई है।चलो आज मैं तुम्हें घर तक ड्रॉप कर देता हूं ।”
“नहीं सर आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है मैं अकेली चली जाऊंगी ।”
“साक्षी ये शहर तुम्हारे लिए नया है और तुम्हें यहां के बारे में ठीक से कुछ भी नहीं पता है। जिद मत करो चलो कार में बैठ जाओ।”
यह खडूस मानेगा नहीं यह सोचकर वह चुपचाप कार की पिछली सीट पर आकर बैठ गई ।
यूं तो साक्षी ऑफिस में उससे रोज मिलती है। मगर कभी उसे ध्यान से नहीं देखा। मगर आज साक्षी ने उसे गाड़ी चलाते हुए बड़े गौर से देखा ।कर्पूर वर्णी रंग, बिलौटी आंखें,ऊंचा माथा ,लंबा कद और बालों से झांकती सफेदी चालीस की वय में भी उसके व्यक्तित्व को एक गरिमा प्रदान कर रही थी। उसके चेहरे पर झलकती बच्चों सी मासूमियत को देखकर कौन कह सकता है कि कोमल सा दिखने वाला यह व्यक्ति वास्तव में इतना कठोर भी हो सकता है?
उसे इस वक्त यह कोई दूसरा ही इंसान लग रहा था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही शख्स है जो ऑफिस में अपने कर्मचारियों के प्रति बेहद सख्त रवैया रखता है जो उनकी किसी छोटी सी भी गलती को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता है। अपने इसी सख्त और अड़ियल रवैए के वजह से ऑफिस में सब उसे हिटलर , एके 47 , अड़ियल, तानाशाह और न जाने किन- किन नामों से बुलाते है।
साक्षी रास्ते भर यही सोचती रही । मानव मन को समझना बड़ी टेड़ी खीर है । मैं इस इंसान को जितना समझने की कोशिश करती हूं। मुझे यह उतना ही रहस्यमय लगता है। कभी यह हिटलर जैसा तानाशाह लगता है तो कभी गांधी जैसा सत्याग्रही। राम जाने आखिर यह इंसान है कैसा ।उसे वह इन छः महीनों में भी पूरी तरह से नहीं समझ पाई थी ।
कार लश्कर रोड़ से इंदिरा गांधी चौराहे पर पहुंचने पर उसने साक्षी से पूछा
“साक्षी चौराहे से गाड़ी किस तरफ मोड़ना है ।” उसकी आवाज सुनकर वह ख्यालों की दुनिया से बाहर आई।
“यहां से बायीं ओर फिर थोड़ा आगे चलकर दायीं ओर टर्न ले लीजिए सर।”
वह साक्षी के बताए अनुसार गाड़ी को ड्राइव कर रहा था
“बस ,बस सर यही रोक दीजिए । उसने घर के सामने गाड़ी के आते ही कहा।”
साक्षी ने गाड़ी से बाहर निकल कर उसे धन्यवाद दिया और मन न होते हुए भी औपचारिकता वश उससे घर के अंदर आने को कहा।
“नहीं मुझे देर हो रही है फिर कभी आऊंगा ।”
“सर प्लीज चाय पी कर जाइए ना।”
साक्षी ने दुबारा उससे कहा तो वह उस के इस अनुरोध को मना नहीं कर सका।वह कार से उतरकर उसके साथ घर के अंदर आ गया ।
साक्षी मन ही मन उसे दुबारा बुलाने पर पछता रही थी।
“क्या जरुरी था इस हिटलर से सर आइए ना कहने की। अच्छा भला जा रहा था चले जाने देती। “साक्षी मन में खुद को कोस रही थी।
साक्षी उसे सोफे पर बैठा छोड़कर उसके लिए किचन में चाय बनाने चली गई और वह कमरे में करीने से सजी हुई एक- एक चीजों को देखने लगा। घर को व्यवस्थित देखकर उसे अपने घर का ख्याल आया।
सच घर को घर एक औरत ही बनाती है। उसने मन में सोचा
फिर वह सोफे से उठकर खुद भी किचन में पहुंच गया।
साक्षी तुम बैठो मैं चाय बनाता हूं।आज तुम मेरी हाथ की बनी चाय पीओ उसने हंसते हुए कहा
सर आप चाय बना लेते है
हां मैं अपना काम खुद करता हूं ।
सर आप बुरा न मानो तो आपसे एक बात पूछूं?
हां ,पूछो इसमें इतनी झिझकने वाली क्या बात है?
मैंने सुना है सर आपने शादी नहीं की ? आपने शादी क्यूं नहीं की सर? उसने डरते हुए पूछा।
उसे साक्षी से इस तरह के प्रश्न की कोई उम्मीद नहीं थी।
यह सवाल उसके दिल को अंदर तक भेद गया।
थोड़ी देर के लिए पूरे कक्ष में चुप्पी छा गई।
उसने सोफे पर अपना सिर टिकाकर आंखें बंद कर ली। फिर बोला साक्षी तुम्हारी जगह अगर किसी और ने यह प्रश्न पूछा होता तो मैं इस सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझता।
लेकिन मैं तुमसे आज कुछ नहीं छुपाऊंगा।
आम भारतीय परिवारों की तरह मेरा भी एक हंसता खेलता छोटा-सा परिवार था । पिता की परचून की एक छोटी सी दुकान थी और मां गृहिणी। इस दुकान से पापा बामुश्किल खर्चा चला पाते थे।
परिवार में मां पापा के अलावा मेरी एक छोटी बहन और एक अपाहिज भाई था।घर का सबसे बड़ा बेटा होने के कारण मैं बचपन से ही जिम्मेदार बन गया था ।
मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और मैं नौकरी की तलाश कर रहा था। तभी पिता का स्वास्थ्य खराब होने के कारण उन की परचून की दुकान बंद हो गई । दुकान बंद हो जाने से घर की माली हालत और ज्यादा खराब हो गई।
उन्हीं दिनों मुझे बैंक की नौकरी का लेटर मिला । इससे मेरे सपनों को पंख लग गए।
छोटी बहन अब शादी लायक हो गई थी। घर में बड़ा और कमाने वाला एकमात्र मैं था । इससे बहन की शादी की जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी। मैंने और पापा ने बहन के लिए एक अच्छा सा लड़का देखकर रिश्ता तय कर दिया।
मैंने शादी के लिए अपनी सैलरी से बचाए कुछ रुपए और कुछ बैंक से कर्ज लेकर बंदोबस्त किया।
मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस दिन घर में बहन की शादी की चहल-पहल मची हुई थी। बहन दुल्हन के रूप में सजी हुई बहुत सुंदर लग रही थी। और हम सब बारात आने का इंतजार कर रहे थे और हम इंतजार ही करते रह गए। दुल्हे समेत पूरी कार नदी में समा गई थी और उसी के साथ हमारी उम्मीदें भी डूब गई।
इस खबर ने खुशी के माहौल को मातम में तब्दील कर दिया और मेरी बहन बिन ब्याहे ही विधवा हो गई। इस घटना से मां को ऐसा सदमा लगा। कि उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया और कुछ ही दिनों में हम सब को रोता बिलखता छोड़कर इस दुनिया से चली गई।
इसके बाद हम सबने बहन को कई बार फिर से दुबारा घर बसाने को समझाया तो उसने हर बार यह कहकर टाल दिया
“भैया यदि शादी का सुख मेरे भाग्य में लिखा होता तो मेरे साथ यह सब न होता। अब मैं दुबारा शादी कभी नहीं करूंगी।मेरे माथे पर लगा यह कलंक मेरे मरने के साथ ही जायेगा ।मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करती हूं आप मुझे फिर कभी शादी के लिए नहीं कहेंगे। अगर मैं तुम्हें कभी बोझ लगूं तो मुझे बता देना मैं किसी रेलगाड़ी से कटकर मर जाऊंगी।
उस दिन के बाद फिर हमारे घर में उसकी शादी की बात कभी नहीं हुई।
मां के जाने के बाद अपाहिज भाई, कुंवारी बहन और बीमार पिता की जिम्मेदारी अब मेरे ऊपर थी। इन जिम्मेदारियों तले दबी जिंदगी ने फिर कभी अपने बारे में मुझे सोचने का अवसर नहीं दिया।
साक्षी ने उसकी तरफ पानी का गिलास बढ़ा दिया। उसने कुछ घूंट पानी पीने के बाद बताना जारी रखा
कुछ साल पहले पिता बीमार हो गए ।बहुत इलाज कराने के बाद भी वो ठीक न हुए । डॉक्टरो ने भी यहकर हाथ खड़े कर दिए कि उनके पास जीने के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है तो मैं बैंक से छुट्टी लेकर उनके पास आ गया।
मुझे अच्छी तरह से याद है वह रात।उस वक्त रात के बारह बज रहे थे पिता मृत्युशैय्या पर लेटे अंतिम सांसें ले रहे थे।वह बार – बार मेरे छोटे भाई की ओर देख रहे थे।और इशारे में जैसे मुझसे कुछ कहना चाह रहे थे। मगर कुछ नहीं पा रहें थे। न जाने क्या बात थी ? जो देह से उनके प्राणों को जानें से रोक रही थी।
मैंने पिता से कहा कि आज से छोटे भाई की जिम्मेदारी मेरी है ।मैं मरते दम तक इसकी देखभाल करुंगा। और अगर आपको लगता है कि मेरी शादी हो जायेगी और दूसरे घर की लड़की इसकी जिम्मेदारी मुझे उठाने से रोकेगी तो मैं आपसे वादा करता है कि मैं अपनी शादी कभी नहीं करुंगा।
मेरी बात सुनने के कुछ देर पश्चात पिता ने अपनी नश्वर देह को छोड़ दिया। मुझे उनके मृत चेहरे पर एक सुकून दिखाई दे रहा था ।
वह दिन था कि आज का दिन है फिर मैंने कभी अपना घर बसाने के बारे में नहीं सोचा।
ऐसा भी नहीं हुआ कि कोई लड़की मुझे पसंद न आयी हो ।बस बात शादी तक नहीं पहुंची।
साॅरी सर मैंने आपसे पूछकर आपके जख्म फिर से हरे कर दिए।
ज़ख्म भरें हीं कब थे ? उसने एक लंबी सांस लेते हुए कहा।
एनी वे मुझे काफी टाइम हो गया है। अब मैं चलता हूं लेट सी मीट यू टोमेरो
जी सर
वह उसे दरवाजे तक छोड़ने आई।
साक्षी सोच रही थी कि जीवन कितना अनिश्चित और आश्चर्यों से भरा है।
उसने आज तक सिर्फ मातृ पितृ भक्त श्रवण कुमार के बारे में सुना था लेकिन आज वास्तविक जीवन में श्रवण कुमार के किरदार को अपनी आंखों के सामने चरितार्थ होते देख रही थी।
कहानी अच्छी है, लेकिन है तो कहानी ही। ऐसी घटना काल्पनिक ही लगती है। लेकिन अच्छी है।
धन्यवाद सर