पुस्तक: आओ लतिका घर चलें- लेखक: प्रकाश मनु, प्रकाशक: इंडिया नेटबुक्स प्रा.लि., मूल्य: 299/-, पृष्ठ संख्या:164, समीक्षक: कल्पना मनोरमा
‘आओ लतिका घर चलें’ प्रकाश मनु का कहानी-संग्रह है। इसमें दस कहानियाँ हैं। इसका प्रकाशन इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड ने किया है। प्रकाश मनु हिंदी बाल साहित्य के बड़े हस्ताक्षर हैं। मेरी स्मृति में उनकी पहचान बाल साहित्य से जुड़ी रही है। अब उनका कथा-संसार मेरे सामने हैं। इस संग्रह की कहानियाँ मनुष्य के जीवन और उसके भीतर चलने वाली महीन हलचलों को बहुत आत्मीयता चलचित्र की तरह दिखाती हैं।
प्रकाश मनु जी की कहानियों को पढ़ते हुए सबसे पहले उनकी भाषा अपनी ओर खींचती है। उनकी भाषा में एक अलग तरह की खुशबू है। कोमलता की, इनोसेंस की, बच्चे के खिलंदड़ेपन और कविता जैसी खुशबू। वे कथा के ठोस कैनवस पर शब्दनाद भरे बिम्बों को उकेरते हैं। उनके यहाँ शब्द केवल अर्थ पहुँचाने का माध्यम नहीं हैं। वे अपने साथ ध्वनि और दृश्य भी लेकर आते हैं। संयुक्ताक्षर वाले शब्दों का बार-बार आना उनकी भाषिक सजगता को सामने रख देता है। जीवन जैसे कभी कभी जल तरंग सा बज उठता है। यही नहीं, उनके विशेषण पाठक को ठिठकने के लिए विवश करते हैं। ‘औघड़ वसंत’, ‘हरचंद कोशिश’, ‘अनाविल क्षण’, ‘पुल-पुल होती जिंदगी’, ‘प्याजी बादल’ और लाल गूँजदार…ऐसे ही प्रयोग हैं। इनमें भाषा केवल वर्णन नहीं, बल्कि अपने साथ लेखक का अनुभव रचती है। विचारों के रंग भाषाई स्वाद आपस में मानो जुड़ जाते हैं। दृश्य के भीतर मनःस्थिति सदृश्य हो उठती हैं।
संग्रह की भूमिका में वे लिखते हैं, ‘मेरी कथा-यात्रा’ में वे बचपन की उन स्मृतियों तक लौटते हैं जहाँ कहानी उनके लिए किसी दूसरी दुनिया में जाने का रास्ता थी। नानी से सुनी कहानियाँ हों या अक्षरों को जोड़कर शब्द बनाने का शुरुआती कौतुक। इन स्मृतियों में कहानी के प्रति उनका आकर्षण साफ दिखाई देता है। अक्षर मिलकर शब्द बनाते हैं और शब्दों को सलीके से मिलाने पर एक विचार जन्म लेता है। यह बात उनकी कथा-भाषा को समझने की एक कुंजी भी देती है। उनके लिए कहानी केवल घटना नहीं है। शब्दों से जीवन का एक संसार बनाना भी कहानी का जरूरी हिस्सा है।
संग्रह की पहली कहानी ‘उस शहर में हमारा घर’ में घर की तलाश के बहाने मनुष्य की सामाजिक दुनिया खुलती है। घर यहाँ केवल दीवारों और छत का नाम नहीं है। उसके साथ रहने की इच्छा है। अपने ढंग से जीवन जीने की आकांक्षा है। कहानी का घरेलू वातावरण बहुत सहज है। बातचीत में हास्य भी है और व्यंग्य भी। स्त्रियों और पुरुषों की बातचीत के बीच समाज के बदलते व्यवहार की झलक मिलती है। मनु किसी निष्कर्ष को पाठक पर थोपते नहीं हैं। पात्रों की बातचीत ही बहुत कुछ कह जाती है।
‘आकाश और सुनंदा की सच्ची प्रेम कहानी’ में प्रेम को जीवन से काटकर नहीं देखा गया है। प्रेम के साथ परिवार है। सामाजिक व्यवहार है। मनुष्य की अपनी व्यावहारिक मजबूरियाँ हैं। कहानी में संवादों की महत्वपूर्ण भूमिका है। पात्र अपने बोलने के ढंग से पहचाने जाते हैं। यही प्रकाश मनु जी की कथा-शैली की खूबी है। वे पात्रों का परिचय देने के बजाय उन्हें बोलने और व्यवहार करने देते हैं।
‘सुक़रात मेरे शहर में’ और ‘यात्रा’ जैसी कहानियाँ संग्रह के संसार को और फैलाती हैं। यहाँ व्यक्ति अपने समय और समाज से अलग खड़ा हुआ दिखाई नहीं देता। उसके अनुभवों में उसके आसपास की दुनिया लगातार मौजूद रहती है। मनु का कथाकार उस दुनिया को किसी दूर खड़े निरीक्षक की तरह नहीं देखता। वह उसके भीतर जाकर मनुष्य के छोटे सुखों और छोटी पीड़ाओं को पकड़ता है।
‘आखिरी सलाम’ में जीवन और विदाई का भाव अधिक गहरा होकर आता है। लेखक की संवेदना का एक पक्ष यह भी है कि वे जीवन के अंतिम क्षणों को केवल दुख की दृष्टि से नहीं देखते। स्मृति वहाँ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसी जीव का जाना उसके साथ जुड़ी स्मृतियों का समाप्त हो जाना नहीं है। वह व्यक्ति अपने पीछे जो भाव छोड़ जाता है वही उसकी उपस्थिति को आगे बनाए रखता है।
‘तुम भी एक कहानी बन गए नंदू भैया’ में कहानी और जीवन के बीच की दूरी और कम हो जाती है। यहाँ स्मृति केवल किसी पुराने व्यक्ति को याद करने का माध्यम नहीं रहती। वह कथाकार को अपने भीतर लौटने के लिए भी बाध्य करती है। नंदू भैया का जीवन याद करते हुए आत्मीयता के साथ अपराधबोध भी उभरता है। किसी अपने को पूरी तरह समझ न पाने की कसक कहानी के भीतर बनी रहती है। यही कसक इसे सामान्य स्मृति-कथा से अलग बनाती है।
‘जादू’ में संसार बहुत छोटा है। एक चिड़िया है। उसका बच्चा है। नंदू है और घर है। लेकिन इसी छोटे से संसार में अपनेपन का अर्थ खुलता है। चिड़िया का घोंसला बनना और उसके बच्चे का उस घर से जुड़ना नंदू के लिए बड़ी खुशी का कारण बन जाता है। मनु की खूबी यह है कि वे इस छोटी घटना को किसी बड़े उपदेश में नहीं बदलते। वह अपने छोटे आकार में ही पूरी संवेदना के साथ उपस्थित रहती है।
‘खत्म हुई कहानी डॉ. शोभना की’ संग्रह की सबसे मार्मिक कहानियों में है। डॉ. शोभना दूसरों के जीवन में खुशी बाँटने वाली स्त्री हैं। मरीजों के लिए वे डॉक्टर से अधिक एक आत्मीय मनुष्य हैं। वे लगातार काम करती हैं। लोगों की मदद करती हैं और अपने आसपास उम्मीद का वातावरण बनाती हैं। कहानी के आरंभ में ही उनकी मृत्यु का संकेत पाठक को भीतर से विचलित करता है। इसके बाद उनका जीवन स्मृतियों में खुलता जाता है। तब एक प्रश्न सामने आता है कि जो मनुष्य दूसरों के जीवन में इतना कुछ भरता है उसके अपने जीवन की थकान और अकेलापन कहाँ जाता है। इस कहानी की मार्मिकता इसी जगह है कि मृत्यु से अधिक वह जीवन को याद करने की कहानी बन जाती है।
‘आओ लतिका घर चलें’ संग्रह की शीर्षक कहानी है और इसकी केंद्रीय स्त्री लतिका अपने समय की एक बेचैन स्त्री है। सड़क पर चलती हुई लतिका केवल एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा रही। उसके भीतर भी बहुत कुछ चल रहा है। आसपास का संसार आधुनिकता और पैसे की चमक से प्रभावित है। लोग अपनी जरूरतों और इच्छाओं के बीच दौड़ रहे हैं। इस दौड़ में मनुष्य कहाँ छूट रहा है यह सवाल कहानी के भीतर बना रहता है।
लतिका के अनुभवों में स्त्री होने की पीड़ा भी है। पुरुष दृष्टि से पैदा होने वाला अपमान है। घर के भीतर के ताने हैं। बिन्नू और मोना के व्यंग्य हैं। इन सबके बीच लतिका अपने लिए किसी सुरक्षित जगह की तलाश करती है। यहाँ ‘घर’ शब्द का अर्थ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। घर वह जगह होना चाहिए जहाँ मनुष्य लौट सके। लेकिन लतिका के लिए घर भी पूरी तरह अपना नहीं है। इसलिए शीर्षक में आया ‘घर चलें’ केवल किसी स्थान पर लौटने का आग्रह नहीं रह जाता। वह अपनेपन की उस जगह की तलाश बन जाता है जहाँ व्यक्ति बिना अपमान और भय के रह सके।
लेखक लतिका को केवल पीड़ित स्त्री बनाकर नहीं छोड़ते। उसके भीतर सवाल हैं। वह अपने आसपास के जीवन को देखती है। उसे समझने की कोशिश करती है। इसीलिए कहानी की संवेदना व्यक्तिगत पीड़ा से आगे निकलती है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में मनुष्य का अकेलापन और घर के भीतर भी अपनेपन का संकट एक साथ दिखाई देने लगता है। संग्रह की अंतिम कहानी ‘एक उदास पेंटिंग की कहानी’ तक आते-आते लेखक की भाषा और संवेदना का एक दूसरा मेल दिखाई देता है। ‘उदास पेंटिंग’ अपने आप में एक दृश्य है लेकिन उसके भीतर मनुष्य के अनुभवों की परतें हैं। यही कारण है कि संग्रह की कहानियों में दृश्य और मनःस्थिति बार-बार एक-दूसरे में घुलते मिलते हैं।
इन दस कहानियों को एक साथ पढ़ने पर प्रकाश मनु जी का कथा-संसार किसी एक विषय या एक वर्ग तक सीमित दिखाई नहीं देता। घर है। प्रेम है। दोस्ती है। मृत्यु है। स्मृति है। स्त्री का अकेलापन है। बच्चों जैसी निर्मल खुशी है और आधुनिक जीवन की बेचैनी भी है। इन सबके बीच सबसे लगातार मौजूद है मनुष्य के प्रति लेखक की गहरी आत्मीयता।
प्रकाश मनु जी की विशेषता यह है कि वे जीवन के बहुत साधारण प्रसंगों में भी कहानी की संभावना पहचान लेते हैं। एक घर की तलाश। एक चिड़िया का घोंसला। किसी पुराने परिचित की स्मृति। किसी डॉक्टर की मृत्यु। सड़क पर चलती एक अकेली स्त्री। काली बिल्ली का बांबी इन छोटे-छोटे प्रसंगों में वे जीवन के बड़े सवाल खोज लेते हैं। उनकी भाषा इस खोज को अपनी विशिष्ट शब्द-सृष्टि देती है।
‘आओ लतिका घर चलें’ कथा संग्रह को पढ़ना इसीलिए केवल दस कहानियाँ पढ़ना नहीं है। यह उस कथाकार के साथ चलना है, जो शब्दों के भीतर मनुष्य को खोजता है और मनुष्य के भीतर कहानी, स्मृतियों और विनम्रता को। यही इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
पुस्तक के लेखक प्रकाश मनु

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