‘पुरवाई’ के पाठकों के साथ एक बात साझा करना चाहूँगा कि मुझे स्कूल-कॉलेज के ज़माने से एक्टिंग और स्टेज पर परफ़ॉर्मेंस करने का शौक़ रहा है। उन्हीं दिनों में एक आइटम बनाया था, जिसमें नर्सरी राइम ‘बा… बा… ब्लैक शीप’ को राग बहार में गाया करता था। यह आइटम ज़बरदस्त हिट हुआ करता था, क्योंकि मैं गीत शुरू करने से पहले एक लंबा आलाप लिया करता था।
इस माह चार अप्रैल को ज़किया जी के घर मैंने इसी आइटम गीत को मेहमानों के सामने जब सुनाया, तो पाया कि पचास साल बाद भी सुनने वाले ठीक उसी तरह हँसते हुए आनंदित हो रहे थे, जैसे कि पहले कार्यक्रम में हुए थे। यानी कि कुछ आइटम ऐसे होते हैं, जिनकी चमक लंबे अरसे तक कायम रहती है।
सच तो यह है कि जब से भारत में अंग्रेज़ी राज्य शुरू हुआ और भारत के स्कूलों में अंग्रेज़ी पढ़ाई जाने लगी, यह नर्सरी राइम और इसके साथ ही ‘हंपटी डंपटी सैट ऑन ए वॉल’, ‘लंदन ब्रिज इज़ फ़ॉलिंग डाउन’ और ‘जैक एंड जिल वेंट अप द हिल’ जैसी बाल कविताएँ हम सबके बचपन का हिस्सा बन गईं।
चलिए, आज ‘बा… बा… ब्लैक शीप’ का इतिहास खंगालने का मज़ेदार सा काम किया जाए कि आख़िर जिसे हमारे बहुत से पाठक ‘बाबा ब्लैक शीप’ समझकर सुनाते आ रहे हैं, वह दरअसल है क्या! यह बाल कविता किसी ‘बाबा’ के बारे में नहीं है। यहाँ ‘बा… बा…’ का अर्थ भेड़ की आवाज़ है, जैसे घोड़े का हिनहिनाना और शेर का दहाड़ना।
देखने में तो यह एक लयबद्ध, तुकबंदी वाली कविता लगती है, जिसमें एक काली भेड़ के शरीर से ऊन से भरे तीन थैले निकाले जाते हैं, लेकिन मान्यता यह भी है कि यह बाल कविता वास्तव में एक ज़माने में किसानों पर लादे गए करों (taxes), रंगभेद से जुड़े शुल्कों और कठिन समय की कहानी बयाँ करती है।
‘बा… बा… ब्लैक शीप’ के बारे में कहा जाता है कि यह बाल कविता पहली बार 1744 में प्रकाशित हुई थी, लेकिन संभवतः यह उससे भी पुरानी है। इसके बोल 18वीं शताब्दी की फ़्रांसीसी धुन ‘आह! वू दिरै-जे, ममन’ (‘ओह! क्या मैं तुम्हें बताऊँ, माँ’) पर गाए जाते हैं, जो ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटिल स्टार’ और कई अन्य बाल कविताओं के संगीत से मिलती-जुलती है।
इस कविता में जिन ऊन से भरे तीन बोरों की बात की जाती है, उनमें से एक कथावाचक के ‘मालिक’ को, एक मालिक की महिला (डेम) को, और तीसरा गली के नीचे रहने वाले एक छोटे लड़के को दे दिया जाता है। देखने में यह एक सीधी सरल कहानी लगती है।
ऐसा माना जाता है कि इस कहानी के पीछे एक ख़ास दास्तान है। इसकी पृष्ठभूमि में इंग्लैंड में 1275 से लेकर 1500 के दशक तक मौजूद एक मध्य-युगीन ऊन कर (wool tax) की नीति हो सकती है। इस नीति के तहत चरवाहों और भेड़ पालकों को अपनी ऊन का एक तिहाई हिस्सा तत्कालीन राजा एडवर्ड प्रथम की संपत्ति में जमा करना पड़ता था, जो धर्मयुद्ध (Crusades) के बाद धन की कमी से जूझ रहे थे।
इस कर नीति के तहत चरवाहों और भेड़ पालकों को अपनी ऊन का एक तिहाई हिस्सा चर्च को भी देना पड़ता था। (चर्च को महिला यानी ‘डेम’ के रूप में संदर्भित किया गया है।) इस प्रकार चरवाहों, किसानों और भेड़ पालकों को अपनी ऊन का केवल एक तिहाई हिस्सा ही मिल पाता था। 1275 का यह कर चर्च और राज्य दोनों के लिए धन का एक बड़ा स्रोत था और उस समय इंग्लैंड की वित्तीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। यह भी सच है कि इस नर्सरी राइम के बोल राजशाही और चर्च द्वारा कर लगाने और संपत्ति छीनने के इतिहास से काफ़ी हद तक मेल खाते हैं।
एक मत यह भी है कि मूल कविता की एक पंक्ति थी- “एंड नन फ़ॉर द लिटिल बॉय, हू लिव्स डाउन द लेन!” जिसका अर्थ है कि राजा और चर्च किसानों, चरवाहों और भेड़ पालकों को इतना लूटते थे कि आम आदमी के लिए कुछ भी नहीं बचता था। मगर बाद में ‘नन’ को बदलकर ‘वन’ कर दिया गया- यानी एक राजा के लिए, एक चर्च के लिए और अंतिम एक आम आदमी के लिए। लोककथाओं को समझने के लिए उस काल की परिस्थितियों को जानना बहुत आवश्यक है।
हालाँकि, 1980 और 1990 के दशक में ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ को लेकर पश्चिमी देशों में बहसें तेज़ हो गई थीं। ऐसे समय में ‘बा… बा… ब्लैक शीप’ के अर्थ और प्रभाव पर भी सवाल उठने लगे। कुछ लोगों ने इसे नस्लीय अर्थों से जोड़कर देखा, विशेष रूप से दास व्यापार के संदर्भ में, क्योंकि इसमें ‘ब्लैक शीप’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
इसके बाद इस कविता के शब्दों के साथ प्रयोग होने लगे और ‘काली’ की जगह ‘इंद्रधनुषी’ या अन्य रंगीन विकल्पों का प्रयोग किया जाने लगा। यह बाल कविता बहस का केंद्र बन गई।
हालाँकि, जब मीडिया ने इस मुद्दे को उछालना शुरू किया, तो कुछ लोगों ने इसे मात्र शब्दावली का विस्तार बताया… जबकि कुछ अन्य लोगों ने इसे “राजनीतिक शुद्धता की सीमा पार करना” कहकर खारिज कर दिया। सच तो यह है कि विचार पूरी तरह से निराधार सिद्ध हुआ, क्योंकि नस्लीय संबंध का कोई ऐतिहासिक प्रमाण मिलना मुश्किल था।
आम तौर पर भेड़ का रंग सफ़ेद या हल्का भूरा होता है, जबकि इस कविता में काली भेड़ का उल्लेख है। काली ऊन को रंगना कठिन होता है, इसलिए यह भी कहा गया कि ‘ब्लैक शीप’ का चयन प्रतीकात्मक हो सकता है। कुछ लोगों के अनुसार काली भेड़ को दुर्भाग्य का प्रतीक भी माना जाता था, क्योंकि उसके ऊन को बेचना कठिन होता था।
मेरे जैसे कुछ लोग इस कविता को केवल साझा करने के आनंद और शिक्षण के रूप में देखते हैं- जैसा कि वह व्यक्ति करता है, जो ऊन को समाज के अलग-अलग हिस्सों में बाँटता है। आज ‘बा बा ब्लैक शीप’ के आधुनिक अर्थ कहीं अधिक सकारात्मक तथा प्रेरणादायक माने जा सकते हैं। यह एक उदार चरवाहे लड़के की कहानी भी हो सकती है, जो अपने ऊन को सबके साथ बाँटता है।
किसी भी समाज के लिए यह आवश्यक है कि वह आँख मूँदकर किसी भी चीज़ को स्वीकार न करे। मुझे याद है, जब किसी व्यक्ति के घर मेहमान आते थे, तो भारतीय माता-पिता अपने बच्चों से आग्रह करते थे कि वे मेहमानों के सामने अंग्रेज़ी की नर्सरी राइम सुनाएँ। कम से कम यह आलेख पढ़कर उन्हें यह जानकारी तो मिल ही जाएगी कि जिस कविता को हम बिना अर्थ समझे सुनते और सुनाते रहे, उसके पीछे भी एक इतिहास है।

कमाल का सम्पादकीय है । “बा… बा… ब्लैक शीप “
में विद्यार्थी जीवन की हास्य -व्यंग्य तरंगें इतिहास की परंपराओं से जुड़कर कविता के संसार में क्रमशः नया अर्थ देती हैं ।
सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा यदि कहानी के क्षेत्र में विख्यात न होते तो व्यंग्य विधा के शीर्ष पर कब से पताका फहरा चुके होते। किन्तु उनका संवेदनशील कथाकार आदमियत की जमीन पर धड़ाधड़ आगे बढ़ जाता है, लिहाजा वैश्विक फलक पर वे आज शीर्षस्थ हैं ।
पुरवाई की अन्य रचनाएँ हमेशा की तरह पठनीय हैं ।
जाकिया जी के घर में 50 वर्ष पुरानी स्मृतियाँ नया आकार और अर्थ ग्रहण करती हैं, इसलिए उन्हें भी साधुवाद ।
बहुत बधाई ।
—-
मीनकेतन प्रधान
11/4/26
संपादक जी , आपने अति रोचक व ज्ञानवर्धक शैली में ‘बा… बा… ब्लैक शीप’ जैसी साधारण लगने वाली नर्सरी राइम के पीछे छिपे इतिहास और अर्थ को उजागर किया है। अपने व्यक्तिगत अनुभव से शुरुआत करते हुए पाठकों को सहज रूप से विषय से जोड़कर आत्मीय और जीवंत संपादकीय लिखा है। एक सामान्य बाल कविता को केवल मनोरंजन तक सीमित न रखकर उसके ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदि संदर्भों को, विशेष रूप से इंग्लैंड की कर-व्यवस्था और चर्च से जुड़े तथ्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना, आपके अनुभवी दृष्टि का द्योतक है। आधुनिक संदर्भ में ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ का उल्लेख इसे समकालीन बना देती है।
समग्रतः संपादकीय सदा की तरह ही मनोरंजन तथा ज्ञान के साथ-साथ पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि साधारण दिखने वाली चीज़ों के पीछे भी गहरे अर्थ छिपे हो सकते हैं।
आदरणीया ज़ाकिया जी को उनके जन्म दिन पर पुनः बधाई हो। इस बात बचपन की याद दिलाई नर्सरी राइम की!? यह बाल कविता इस समय के वरिष्ठ जन ने अवश्य सुनी होगी और कुछ इसके पीछे सुनी हुई बातों से भी अवगत होंगड़ जो इस संपादकीय में लिखे गए हैं।आम जन का दर्द बयां किया गया है कि कर इतने अधिक थे कि उनका देना पहले भी कठिन था और आज भी,कम से कम भारत के संदर्भ में तो यही आज भी उतना ही कड़वा सच है ।
इस बाल कविता का इतिहास बताना भी इस संपादकीय की उपलब्धि कही जा सकती है। आज की पीढ़ी के लिए यह संपादकीय बेहद अहम और जानकारी से भरपूरा है।
बढ़िया और जानदार संपादकीय हेतु बधाई।
Nice selection of topic having background. This rhyme is quite common in all nursery schools in India and all over the world .
Is true due to certain reasons this was banned in USA SCHOOLS.
when police maker’s (king) and religious leaders becomes greedy poor worker like farmer sheep owners struggle and these types of rhymes are historical popular.
I really enjoyed your article please keep it up and dig out something new about Air-India hard workers and hardly working MAHARAJA’S.
Good luck and God Bless you
अंग्रेजों ने हम्प्टी डम्प्टी कविता भी हमें इसी तरह सिखा दी और हम भी सीख गए!
सही बात! हम्प्टी डम्प्टी कविता का भी विशिष्ट अर्थ है। हमें अंग्रेजों ने इसका मूल अर्थ समझाए बिना ही कविता सिखा दी और हम भी बड़े चाव से सीख गए!
अच्छी जानकारी,कविता का उचित अनुवाद है हर युग में लेखक के विचारों में व्यवस्था रही है और समय, काल, परिस्थितियों का प्रभाव रचनाकार पर पड़ा है उसने अपना दर्द कविताओंके माध्यम व्यक्त किया है।
Dr Prabha mishra
बा-बा ब्लैक शीप नर्सरी राइम के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त हुई, मगर अधिक रोचक जानकारी मिली आपके बचपन के गायकी शौक के बारे में और वो भी अपने ही स्टाइल की क्लासिकल गायन शैली की महारत जिसे अभी भी आपने बरकरार रखा हुआ है। दूसरी इंग्लिश नर्सरी राइम्स जैसे रिंग ए रिंग ए रोजेस, ए पॉकेट फुल ऑफ पोसीस, आ टिशु! आ टिशु! (या आईशा), वी ऑल फाल डाउन और हम्प्टी डंपटी सैट ऑन ए वाल, हम्प्टी डंपटी हैड ए ग्रेट फाल की भी ऐसी ही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि थी। रिंग ए रिंग रोजेस बताती है लन्दन में 1665 में फैले ग्रेट प्लेग की त्रासदी के बारे में, और हम्प्टी डंपटी कोई अंडा नहीं था जैसे बच्चों की किताबों में बने चित्रों में दिखाया जाता है बल्कि यहां यह नाम है एक बड़ी तोप का जिसका इस्तेमाल 1642 में छिड़ी इंग्लिश सिविल वार के समय हुआ था। ऐसा ही एक और कुमाऊनी लोक गीत है : अंग्रज सरकारा, डबल में पड़ो ट्वटल…। दूसरे महायुद्ध के दौरान 1944-45 में धातु की कमी के चलते, ब्रिटिश सरकार ने भारत में छेद या मोरी वाला तांबे के पैसे का सिक्का जारी किया। इस बात से अंग्रेजी सरकार के दिवालियेपन को लेकर मजाक उड़ाते यह लोकगीत बहुत प्रचलित हुआ, और आज भी गाया जाता है। उस सिक्के का मजाकिया नाम दिया गया: छेदू डबल, छेदू माने छेद वाला और डबल कहा जाता था करेंसी को।
ग़ज़ब का ज्ञानवर्धक लेख
धन्यवाद सर इस संपादकीय के लिए
धन्यवाद रक्षा।