Tuesday, September 8, 2026
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जहाँ जीवन गाता है: बिहार के लोकसंगीत की सांस्कृतिक यात्रा

 स्मृति, मिट्टी और मनुष्य की अनश्वर गाथा

“लोक केवल अतीत नहीं होता; वह वर्तमान की साँसों में जीवित इतिहास होता है।”

शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। गंगा के मैदानी विस्तार पर धूप का अंतिम सुनहरा रंग ठहर-सा गया था। गाँव के बाहर पीपल के नीचे कुछ महिलाएँ बैठी थीं। उनके सामने न कोई तबला था, न हारमोनियम, न कोई मंच और न ही श्रोता। फिर भी संगीत था—इतना गहरा कि लगता था जैसे धरती स्वयं गा रही हो। वे धान साफ़ करते हुए एक पुराना सोहर गा रही थीं। पास खेलते बच्चे उस गीत के अर्थ नहीं जानते थे, लेकिन उसकी लय उनके भीतर उतर रही थी। तभी मुझे लगा कि लोकसंगीत की सबसे बड़ी शक्ति यही है—वह सिखाया नहीं जाता, जीया जाता है।

एक पत्रकार और लोक परंपराओं की अध्येता के रूप में बिहार की यह यात्रा मेरे लिए केवल एक रिपोर्टिंग असाइनमेंट नहीं थी। यह उन आवाज़ों की तलाश थी जो इतिहास की मोटी किताबों में नहीं मिलतीं, लेकिन पीढ़ियों से लोगों की स्मृति में सुरक्षित हैं। बिहार के लोकगीतों ने मुझे बार-बार यह एहसास कराया कि किसी समाज को समझना हो तो उसके स्मारकों से पहले उसके गीतों को सुनना चाहिए।

भारत की सांस्कृतिक संरचना में बिहार का स्थान अद्वितीय है। यही वह भूभाग है जहाँ ज्ञान, दर्शन और लोकजीवन ने सदियों तक एक-दूसरे को समृद्ध किया। बुद्ध की करुणा, महावीर का अहिंसा-दर्शन, विद्यापति की काव्यधारा और गाँवों की सामूहिक लोक-स्मृति—ये सभी एक ही सांस्कृतिक परंपरा के अलग-अलग स्वर हैं। इन्हीं स्वरों का सबसे सहज और जीवंत रूप है बिहार का लोकसंगीत।

मिथिला, भोजपुर, मगध, अंग और सीमांचल—हर क्षेत्र का अपना अलग संगीत है। बोली बदलती है, लय बदलती है, वाद्य बदलते हैं, लेकिन मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता नहीं बदलता। यही कारण है कि यहाँ के लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन के सामाजिक दस्तावेज़ हैं।

मिथिला की स्त्रियाँ जब समा-चकेवा गाती हैं, तब वे केवल पर्व नहीं मना रहीं होतीं; वे भाई-बहन के स्नेह, प्रकृति के संरक्षण और स्त्री-सामुदायिकता की सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखती हैं। मधुश्रावणी के गीत विवाह संस्था को केवल संस्कार नहीं, बल्कि संवाद में बदल देते हैं। विद्यापति के पदों की गूँज आज भी ग्रामीण अंचलों में सुनाई देती है, जहाँ भक्ति और श्रृंगार का अद्भुत संगम लोकभाषा में उतर आता है।

भोजपुर की धरती पर लोकसंगीत का स्वर अलग है। यहाँ गीत खेतों में जन्म लेते हैं, मेड़ों पर चलते हैं और प्रवासी की आँखों में आकर ठहर जाते हैं। चैता में ऋतु का उल्लास है, कजरी में सावन की भीगी प्रतीक्षा, फगुआ में रंगों का उन्मुक्त उत्सव और पूरबी में बिछोह की ऐसी मार्मिकता कि सुनने वाला अनायास अपने किसी प्रिय को याद करने लगे।

यही पूरबी आगे चलकर समुद्र पार कर गई। उन्नीसवीं शताब्दी में जब गिरमिटिया श्रमिक बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, गुयाना और त्रिनिदाद ले जाए गए, तब वे अपने साथ बहुत कुछ नहीं ले जा सके; लेकिन वे अपने गीत साथ ले गए। उन्हीं गीतों ने पराए देशों में उन्हें अपनी पहचान बचाए रखने का साहस दिया। आज भी उन देशों में छठ के गीत, बिरहा और भोजपुरी लोकधुनें सुनाई देती हैं। लोकसंगीत यहाँ सांस्कृतिक स्मृति का सबसे विश्वसनीय सेतु बन जाता है।

भोजपुरी लोकधारा के महान रचनाकार भिखारी ठाकुर ने इसी लोक को सामाजिक चेतना का माध्यम बनाया। बिदेसिया केवल एक नाटक नहीं है; वह प्रवासन का समाजशास्त्र है। बेटी-बेचवा स्त्री-अस्मिता का लोकघोष है। उन्होंने दिखाया कि लोककला सत्ता के विरुद्ध सबसे प्रभावी नैतिक आवाज़ भी हो सकती है। यही कारण है कि उन्हें केवल लोकनाटककार कहना उनके योगदान को सीमित कर देना होगा; वे लोकसमाज के संवेदनशील इतिहासकार थे।

बिहार का लोकसंगीत हमें यह भी सिखाता है कि संस्कृति का सबसे बड़ा विद्यालय परिवार और समुदाय होते हैं। अधिकांश गीतों के रचनाकार अज्ञात हैं। वे किसी एक कवि की रचना नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की उपज हैं। दादी से माँ, माँ से बेटी और फिर अगली पीढ़ी तक बिना किसी लिखित पाठ्यक्रम के यह सांस्कृतिक विरासत स्थानांतरित होती रहती है। आधुनिक सांस्कृतिक अध्ययन की भाषा में कहें तो यह एक जीवंत ओरल आर्काइव है।

किन्तु आज यही विरासत अनेक चुनौतियों से घिरी है। पलायन ने गाँवों की सामुदायिक संरचना को बदला है। डिजिटल मनोरंजन ने सुनने की आदत बदल दी है। बाज़ार ने लोकधुनों को लोकप्रिय तो बनाया, पर कई बार उनकी आत्मा को भी बदल दिया। पारंपरिक वाद्यों की जगह इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियाँ ले रही हैं, और अनेक लोक कलाकार आर्थिक असुरक्षा के कारण अपनी परंपरा छोड़ने को विवश हैं।

फिर भी उम्मीद की अनेक किरणें दिखाई देती हैं। भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, लोक कलाकारों के सम्मान और सांस्कृतिक अभिलेखन के लिए योजनाएँ संचालित कर रहा है। संगीत नाटक अकादमी ने दशकों से लोक और जनजातीय कलाओं के दस्तावेज़ीकरण तथा कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) पारंपरिक कलाओं के डिजिटलीकरण और शोध को नई दिशा दे रहा है।

बिहार सरकार भी लोकधरोहर के संरक्षण को नई प्राथमिकता दे रही है। कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा आयोजित राज्यस्तरीय सांस्कृतिक महोत्सव, लोक कलाकारों को मंच, युवा पीढ़ी को लोककला से जोड़ने के कार्यक्रम, सांस्कृतिक परिसरों का विकास तथा बिहार संग्रहालय जैसी संस्थाओं के माध्यम से विरासत को समकालीन विमर्श से जोड़ने का प्रयास उल्लेखनीय है। इन पहलों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि संस्कृति का संरक्षण केवल अतीत को बचाना नहीं, बल्कि भविष्य का निर्माण करना है।

इसके साथ ही विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और स्वतंत्र सांस्कृतिक संगठनों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दक्षिण एशिया के सांस्कृतिक अध्ययन के संदर्भ में बिहार का लोकसंगीत सीमाओं से परे जाकर साझा विरासत का उदाहरण प्रस्तुत करता है। नेपाल के तराई क्षेत्र से लेकर मॉरीशस के प्रवासी समाज तक, भोजपुरी और मैथिली गीत एक ऐसे सांस्कृतिक संवाद का निर्माण करते हैं जिसे राजनीतिक सीमाएँ विभाजित नहीं कर सकतीं।

आज आवश्यकता केवल अभिलेखन की नहीं, बल्कि संवेदनशील संरक्षण की है। लोकगीतों को संग्रहालयों में बंद कर देना पर्याप्त नहीं होगा; उन्हें उनके सामाजिक संदर्भों, उनके गायक समुदायों और उनकी जीवित परंपराओं के साथ बचाना होगा। यदि किसी गाँव की अंतिम लोकगायिका मौन हो जाती है, तो केवल एक कलाकार नहीं खोता—एक पूरा सांस्कृतिक पुस्तकालय समाप्त हो जाता है।

यात्रा के अंतिम दिन जब मैं लौट रही थी, तब दूर कहीं से फिर वही स्वर सुनाई दिया। इस बार मैं शब्दों पर नहीं, उस मौन पर ध्यान दे रही थी जो गीत के बाद भी देर तक हवा में बना रहता है। शायद वही लोक की असली शक्ति है। वह समाप्त होकर भी समाप्त नहीं होता; वह अगली पीढ़ी के किसी बच्चे की स्मृति में, किसी माँ की लोरी में, किसी प्रवासी की आँखों की नमी में और किसी शोधकर्ता की नोटबुक के बाहर जीवित रहता है।

बिहार के लोकगीत केवल बिहार के नहीं हैं। वे दक्षिण एशिया की साझी सांस्कृतिक चेतना के स्वर हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि आधुनिकता और परंपरा विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं। विकास तब अधिक मानवीय बनता है, जब वह अपनी मिट्टी की आवाज़ को सुनना नहीं भूलता।

शायद इसी कारण बिहार की इस यात्रा से लौटते हुए मेरे साथ कोई स्मृति-चिह्न नहीं था—सिर्फ़ कुछ धुनें थीं। और वे धुनें अब भी भीतर गूँजती हैं, मानो कह रही हों कि सभ्यताएँ अपने महलों से नहीं, अपने लोकस्वरों से पहचानी जाती हैं।

  • डॉ. मीना कुमारी
स्वतंत्र पत्रकार, शोधकर्ता, लेखिका एवं दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में संबद्ध प्राध्यापक।
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