Wednesday, October 7, 2026
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 भारतीय संस्कृति के वैश्विक विस्तार में हिंदी की भूमिका

  • लता तेजेश्वर ‘रेणुका’ 

11वें विश्वहिंदी सम्मेलन का असर, जो मेरे मन में रेखंकित हो गया, उसके संदर्भ में कुछ बातें जिसके अंतर्गत मुझे भारतीय संस्कृति के विश्वभर में फैलने की प्रगाढ़ अनुभूति  हुई।

हर ‌चार साल के अंतराल में विश्वभर में हो रहे विश्व हिंदी परिषद के सम्मेलनों से उन सभी देशों में भारतीय संस्कृति के साथ हिंदी भाषा का प्रचार, प्रसार हो रहा है। पिछली बार 11वें विश्वहिंदी सम्मेलन में मॉरीशस जाना मेरे लिए अत्यंत आनंददायक रहा। स्व. सुषमा स्वराज जी का भाषण और मॉरीशस में हिंदी वेबसाइट का लोकार्पण, वहाँ के सांस्कृतिक यात्रा सभी अनमोल यादें आज भी मेरे दिल में समाई हुई  हैं।  मॉरीशस की संस्कृति व वहां के लोगों द्वारा हिंदी में बोलचाल सुन मैं आश्चर्य चकित थी। यहाँ के इतिहास जानने के उपरांत मेरा रोम-रोम आनंद से भर उठा क्यों कि वहाँ की संस्कृति, भारत से भिन्न नहीं थी। वहाँ के गिरमिटिया जो मॉरीशस के आधी आबादी हैं, भारत मूल के ही हैं। बिल्कुल वैसी ही अनुभूति 2015 में भूटान यात्रा के दौरान हुई थी जब मेरा एक साहित्यक सम्मेलन में जाना हुआ था। भूटान के लोगों से मिलकर और उनकी हिंदी में बोलचाल सुनकर, हिंदी के प्रति उनका प्रेम देख, सुन एक आत्मिक आनंद का अनुभव हुआ था।

ब्रिटिश काल में भारत से नौकरी और रोज़ी-रोटी की तलाश में विस्थापित भारतीय अग्रीमेंट के तहत मॉरीशस लाये गये थे। वही गिरमिटिया, जो मॉरीशस को छोटा-भारत का मान देते हैं, विश्व पटल पर हिंदी और भारतीय संस्कृति को फैला रहे हैं। वैसे ही भूटान, फिजी, नेपाल, बंग्लादेश  की संस्थाएँ मॉरीशस हिंदी संस्थान, विश्वहिंदी परिषद, हिंदी संगठन, हिंदी परिषद (नीदरलैंड्स), विश्व हिंदी संस्थान(कैनाडा),  जैसी कई संस्थाएँ विश्वभर में कार्यरत हैं। इस तरह हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति वैश्विक विस्तार में कार्यरत हैं।

भारतीय संस्कृति में हिंदी की भूमिका ;

मेरा मानना है, किसी भी देश की संस्कृति और उस देश की भाषा, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जब विश्व में भारत की भाषाओं के बारे में बात की जाए तो भारत के हर एक राज्य की भाषा और बोली अलग पाई जाती हैं। यहाँ तक कि जगह के अनुसार बोली-भाषा, आंचलिक-भाषा, प्रादेशिक-भाषा और राज्य-भाषा में भी अंतर है। जैसे बोलने का ढंग या लिखने की शैली। इस तरह कहा जाए तो सिर्फ भारत, एक देश में ही 600 भाषाएँ हैं और 19,500 बोलियां और उपभाषाएं बोली जाती हैं‌‌ जिसमें से सिर्फ 22 भाषाओं को संविधान में मान्यता प्राप्त है। केंद्रीय स्तर पर अंग्रेजी दूसरी आधिकारिक भाषा है जिसे अतिरिक्त भाषा के तौर पर सम्मिलित किया गया है। बाकी  आंचलिक भाषाओं और प्रादेशिक भाषाओं को मान्यता देने की माँग भी है। इस तरह भाषाएँ अपने प्रदेश की संस्कृति और बोली को सुदृढ़ करती हैं।

मानव, धर्म से जुड़े हैं। धर्म चाहे कोई भी हो मानव के अंदर प्रेम जागृत करता है तो यह काम दैविक है। हर धर्म में हर एक चर्या हमें यही सीखाता है कि हम हर छोटी चीजों से प्यार करें और सहानुभूति रखें। प्यार, ममता और सद्भावना हर मानव को चेतना और विकास की ओर ले जाती है। यही उद्दयेश्य लेकर जब हिंदी आगे बढ़ती है तो निश्चित ही अपने रास्ते से हर कांटे को, हर सीमा को लांघती हुई हिंदी का वैश्विक परिदृश्य में अपना एक स्थान स्थिर करती है।

विश्व के कई देशों में से भारत, भावनात्मक रूप से एक स्थायी, धार्मिक और सांस्कृतिक देश के तहत परिगणित होता है। इस देश की महानता यह है कि हम मानवता को सर्वोपरि मानते हैं। इस देश की मिट्टी भी हमारे लिए पूज्य है। जिस देश में राम, कृष्ण, दुर्गा, पार्वती, शिव आदि देवी, देवताएँ पूजनीय हैं, जिस देश में गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पावन नदियाँ बहतीं हैं, सिर्फ देवता ही नहीं बल्कि भारत की संस्कृति सृष्टि को पूजना सिखाती है। यह संस्कृति सृष्टि के हर एक कण के लिए हमारे हृदय में सद्भावना जगाती है। ग्रह-नक्षत्रों की गणना से भविष्य को आंका जाता है, हवा-पृथ्वी, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-अग्नि आदि हमारे जीवन को संचालित करते हैं। जिनके बिना जीवन असाध्य है, हिंदू धर्म उन्हें पूजना सीखाता है। मनुष्यों में सद्भवना जागृत करना ही धार्मिक भावना है।

धार्मिक भावना और संस्कार एक दूसरे से जुड़े हैं, जैसे कि हमारे रक्त में प्रवाहित खून हमारे वंशजों के नियमों और कानून, भाषा और सिद्धांतों के जरिए पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित होता है वैसे ही भाषा और सिद्धांतों के जरिए भारत की संस्कृति को अब तक जिंदा रखा गया है। इसमें भाषा का एक अहम भूमिका रखती है।

दो प्राणि/व्यक्तियों के बीच के मनोभावों और भावनाओं का आदान-प्रदान ही भाषा है। जरूरी नहीं कि बोलकर या कहकर ही हम अपने भावों को व्यक्त करें। मूक, जो बोल नहीं सकता वह भी अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं। फिर भी दूर में स्थित लोगों के लिए आवाज़ एक माध्यम है, जो शब्दों का संयोजन, शब्दों के भावविन्यास से ही प्रकट किया जा सकता है। शब्द भी महत्वपूर्ण है इसलिए भाषा एक ऐसा तार है जिससे हम सदैव एक दूसरे के संपर्क बनाए रख सकते हैं और अपने भावाभिव्यक्ति,  मनोभावों को सही तरीके से दूसरे तक पहुँचा सकते हैंजिसे हम लिख या बोलकर ही कर सकते हैं।

 भाषा और संस्कृति :-

 बचपन से ही, सिखाया जाता है कि सुबह उठते ही पलंग से उतरने से पहले भूमि को प्रणाम करें। पृथ्वी को हमारा भार उठाने के लिए धन्यवाद ज्ञापन करें, क्यों कि हम बचपन से खेलकूद से लेकर वृद्धाप्य तक भी हर समय भूमि पर पैर रखकर भूमि को कष्ट देते हैं। हमें सूरज से रोशनी मिलती है, चाँद से शीतल चाँदनी और स्वास भरने के लिए हवा है। जल, अग्नि हमारा खाना बनाने और भूख, प्यास शान्त करने में सहायक हैं। सभी हमारा पूज्य हैं और इनके बिना जीवन संभव नहीं है, जैसे माँ के बिना हमारा अस्तित्व नहीं। सृष्टि का हर कण जो हमारे सेवा में रत है उन्हें आदर करना या पूजना हमें हिन्दू धर्म सिखाता है। वैसे ही भाषा एक जरिया है एक दूसरे के संपर्क में रहने का।

विश्व के जुड़ाव में और हमारी संस्कृति को फैलाने में हिंदी का बहुत बड़ा योगदान रहा। ब्रिटिश काल में हमारी भाषाएँ अपनी अस्तित्व खोने के कगार पर थीं, तब से भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के हावी होने से आज तक हम अंग्रेजी को ढो रहे हैं। विश्व से खुदको जुड़ने की भाषा अंग्रेजी बन गई। जिससे आज तक हम पीछा नहीं छोड़ पा रहे हैं या यूँ कहूँ पीछा छोड़ना नहीं चाहते। पीढ़ी दर पीढ़ी अंग्रेजी का वर्चस्व को स्वीकार कर रही है और इस तरह हम अपनी भाषा को अंग्रेजी भाषा से कमतर समझने लगे हैं। जिसका एक बड़ा उदाहरण है भारत के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय, जहाँ अंग्रेजी भाषा में न्याय के लिए अर्जी दिया जाता है और केस लड़े जाते रहे हैं। यहाँ तक कि उच्चतम शिक्षा के लिए भी अंग्रेजी स्कूल कालेजों में पढ़ना हमारी मजबूरी है। अब सरकार इस वरियता को बदलने की प्रयास में जरूर है लेकिन इसके लिए और भी तैयारियों का सामना करना होगा जो चुनौतीपूर्ण है।

चाहे भारत की परंपराएँ हों या भारत की पुरातन नृत्य या गीत शैली, कई मायने में हम हमारे कला का विश्व को परिचय कराने में संभव हो पाए हैं। ओडिसा के ओडिशी नृत्य हो या केरल का कथक, आंध्रप्रदेश से भरतनाट्यम, तमिल की कथकली या हरियाणवी राजस्थान की परंपरागत नृत्य ही नहीं  नृत्य के साथ वाद्ययंत्रों, संगीत, खेल जैसे क्रिकेट, हॉकी आदि भी विदेश में लोकप्रिय हो रहे हैं। इनके अलावा भी हम कई प्रकार से हम विदेशों से कलात्मक ढंग से भी जुड़े हैं जैसे नाटक, सिनेमा, रंगमंच आदि। पुरातन हिंदी फिल्में संप्रदायिकता का बोध कराते हैं, वहीं नई हिंदी फिल्मों ने सांस्कृति, गीत, संगीत और भारत के इतिहास से लेकर उच्चकोटि के चरित्रों और इतिहास को परदे पर लाकर भारत का इतिहास को भी चरितार्थ किया है। यह अगर सम्भव हो पा रहा है तो इसका श्रेय हमारे हिंदी फिल्मों को जाता है। जो विदेशों में सबसे ज्यादा बोली जानी वाली भाषा है। यह अंग्रेजी भाषा में संभव नहीं, क्यों कि जब हमें दिल से कुछ कहना होता है उसी भाषा में ही सोचना भी पड़ता है, अगर दिल हिंदी का हो तो अंग्रेजी में बोलने से वह जुड़ाव सम्भव नहीं हो पाता।

हिन्दू धर्म का जन्म और देवनागरी लिपी का उपयोग:

कहा जाता है कि भारत की सभ्यता सबसे पुरातन सभ्यता है, और संस्कृत भाषा, देव भाषा में परिगणित होती है। जब संसार में जीव राशि पैदा भी नहीं हुए थे तब भी ग्रह-नक्षत्र, चाँद-तारे, बारिश-सूरज, आदि थे। सृष्टि में मानव के पैदा होने के साथ ही उसकी इच्छाशक्ति ने जन्म लिया जिससे वह अपने सोच के मुताबिक अपने जीवन में बदलाव लाने में कामयाब रहा, जिसका एक प्रकरण उस अलौकिक शक्ति से है। जो कुछ अपरिहार्य स्थितियों में वह दिव्य रश्मि सूरज और चाँद से गुहार लगा कर उन्हीं को अपना देवी, देवता मानकर पूरे मन से आस्था रखता। कुछ भय भी आस्था के साथ शामिल था जैसे साँप को पूजना आदि… यह विश्वास व आस्था ही उसे खुद को समर्पित कर कुछ नया पाने के लिए प्रेरित करने लगी। आस्था के प्रतीक स्वरूप देव देवी का रूप लेकर हमारे अंदर समाहित है। ऋषि मुनियों के जप-तप आदि ने हिन्दू धर्म को मार्गदर्शन किया, जिससे बेहतर आजीविका पाने में सहायता मिली ।

इस तरह हिन्दू धर्म प्रकृति से, सृष्टि से जुड़ाव रखता है। जब आकाश के अजीबोगरीब नज़ारे एक पहेली सी हुआ करती थी सामान्य आदि-मानव उसे चमत्कार के रूप में ग्रहण करता था। दिन, रात के समय के साथ ही चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण आदि के संदर्भों को लेकर लेखाजोखा भविष्य तय करने लगता और उनके गतिविधियों को मूल्यांकन कर बारिश और मौसम के बदलाव का अनुमान लगता है। यह आस्था और विश्वास से जुड़ा ज्ञान मानव में तब से पैदा हुए जब से शायद वस्त्र, परिधान आदि का ज्ञान उसे नहीं था। केले के पत्ते और जंगल के पेड़ों की छालों का प्रयोग से अपने अंग ढकता था।

इसतरह ऋषि-मुनियों ने ग्रह-नक्षत्र, सूर्य-चंद्रमा, आदि की गणना से आने वाले दिनों के मौसम की पुष्टि करते थे। इस प्राचीन इतिहास का प्रमाण उन ताल-पत्र ग्रथों में भी मिलता है, जिन्हें हजारों साल पहले भूमिगत, खुदाई में पाया गया। जिनकी भाषा विन्यास द्रविड़ में पाई गई थी, और संस्कृत, ऋषि-मुनियों की आम भाषा रही। यह पुराने मंदिरों की दीवार पर किम्वदन्तियां संस्कृत लिपि में लिखी देखने को मिलती है जिससे इस बात की पुष्टि होती है। धीरे धीरे समय के बहाव में और अन्य भाषाओं का उधृत होने से संस्कृत का उपयोग कम होती गई, यह  शास्त्रों व कुछ विद्या संस्थानों तक ही सीमित हो गई है। इस तरह विकसित हुई कई हज़ार भाषाएँ लुप्तप्राय हैं। अब भी भारत में बोली जाने वाली भाषाओं की संख्या गिनती में रह गई है। हिंदी की देवनागरी लिपी संस्कृत भाषा की ही देन है।

पर्यटन से भी सांस्कृतिक और हिंदी का प्रसार :

एक ओर विश्वभर में हिंदी का बोलबाला है तो दूसरी ओर भारतीय संस्कृति के प्रसार में हिंदी बीज की तरह काम कर रही है जिसने अन्य देशों के साथ पर्यटन को जोड़कर आकर्षित बनाया है। अपने प्रदेशों के सौंदर्यीकरण की दिशा में जोर-शोर से प्रयास हो रहा है और विदेशी पर्यटकों को लुभाने की कोशिश में भारतीय संस्कृति का प्रदर्शन भी एक प्रयास है। भारत की यात्रा के लिए टूरिज्म को बढ़ावा देकर अपने सांस्कृतिक कार्यस्थलों को अधिक सुंदर और आकर्षक बनाया जा रहा है ताकि देश का विकास हो और हिंदी से जुड़कर पर्यटक खींचे चले आएं।

 इसतरह देखा जाए तो हिंदी विदेशों से संपर्क बनाए रखने के लिए सेतु का काम कर रही है। भारत की संस्कृति और हिंदी भाषा एक दूसरे की पूरक हैं, एक के बिना दूसरे का विकास अधूरा है और पर्यटन से भारत की अर्थव्यवस्था के बेहतर होने व रोजगार  में वृद्धि होने की उम्मीद रहती है।

प्रवासी भारतीय :-

विश्व के 132 देशों में भारतीय मूल के दो करोड़ से ज्यादा निवासी प्रवासी जीवन-यापन कर रहे हैं।  ग्यारह देशों में पांच लाख प्रवासी भारतीय वहां की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जिसमें अधिकतर वहाँ की राजनीतिक, अर्थव्यवस्था के साथ हिंदी के प्रचार प्रसार व भारत की संस्कृति का विदेशों में विस्तार कर रहे हैं। विश्वभर में अकेले अमेरिका में ही हिंदी के करीब 400 तक  शैक्षणिक केंद्र स्थपित हैं। मॉरीशस, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान, नेपाल आदि देशों में सम्पर्क भाषा हिंदी है जो एक सेतु की तरह अपनी भूमिका निभा रही है।

विदेश में हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, सांस्कृतिक कार्यों व कार्यक्रमों में भगीदारी, देश विदेश पर्यटन, व्यापार वृद्धि और शैक्षणिक केद्रों की स्थापना ,भारत के मूल निवासियों के लिए अलग योजना और स्थल पूर्ति, नौकरियों में बढ़ोतरी, स्थायी निवास आदि जरूरी व्यवस्था की जा रही है। मोबाइल के प्रादुर्भाव से देश विदेश की  दूरी में कमी आई है। भारत में बैठे विदेशों में नौकरी कर रहे अपने बच्चों से वीडियो कॉल के जरिए मिल व देख पाना संभव हो रहा है। हवाई जहाज की सुविधा और जलयान की वजह से अब पूरी दुनिया एक घरौंदा बन गई है।

आज  प्रत्येक व्यक्ति दूसरे  धर्म  की भाषा व संस्कृति को महत्व दे रहा है। भारत के कुछ मुसलमान गणपति पूजा और दुर्गा स्तुति कर रहे हैं तो कई हिंदू भी यहूदियों की माँ मेरी व मुसलमानों की ईद या रमजान जैसे पर्वों का सम्मान कर रहे हैं।  इसका साक्षात उदाहरण यह है कि यहूदी की बच्ची एक तरफ गीता का अभ्यास करके रिकॉर्ड दर्ज कराती है तो दूसरी ओर मुसलमान की बेटी भी हिंदू से शादी रचाकर घर बसाती है, जिसमें हिंदू परिवार का सहयोग भी रहता है। यह इस बात का प्रमाण है कि सभी धर्मों के लोग आपस में मिलजुल रहे हैं व एक दूसरे के रीति-रिवाजों और परंपराओं में विश्वास कर उसका विश्व में प्रसार कर रहे हैं।

भारतीय संस्कृति के विधि-विधान, मान्यताएं, जीवन शैली, रीति-रिवाज, परवरिश आदि पाश्चात्य देशों में बहुत सराहे जाते रहे हैं। पूजा पाठ के महत्व को भी जीवन में आत्मसात करने के लिए लोग तत्पर हैं जो सुख, आंनद, भव्य जीवन शैली के साथ परिलक्षित होता है जिससे इंकार नहीं  किया  जा सकता। भारत के प्राचीन ग्रंथों गीता, रामायण आदि के जीवन मूल्यों, भाईचारे के संदेश  इत्यादि को कोई भी अपने जीवन में शामिल करने का इच्छुक होगा। उन ग्रंथों को हिंदी या संस्कृत से विदेशी भाषाओं में अनुवाद कर घर-घर पहुँचाया जाता रहा है और वहाँ की भाषा को भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर उनकी संस्कृति को भारतीय भी रूबरू हो पा रहे हैं। साहित्यकारों की प्रयास से अनुदित रचनाएँ वह कमी भी पूरी कर रही हैं  जिनका घर बैठे इंटरनेट से आस्वादन किया जा सकता है ।

इतना ही नहीं भारत के कई तरह के मठों का विस्तार विदेशों तक किया गया है। त्योहारों पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, हनुमान, मातारानी पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती आदि देव देवियों के मंदिरों और इस्कॉन मंदिरों में भव्य आयोजन होता है। एक ओर ‘ॐ कार’ और दूसरे ओर ‘प्रभु श्रीकृष्ण’ का गीता पाठ किया जाता है। ऐसा ही एक मठ ‘ॐ शांति’ का विस्तार आंचलिक ही नहीं देश-विदेश तक पहुँचाकर शांति का संदेश पहुंचाता है। भगवत नाम स्मरण के साथ ही अलौकिक जीवन शैली का प्रचार प्रसार करता है।

भारत के लोग आज दुनिया के हर कोने  में विद्यमान हैं। जब वह हिंदी को वैश्विक स्तर पर उभरता देखते हैं तो विस्थापित होने के दर्द से उबरने लगते हैं और पूरे दिल से हिंदी का स्वागत करते हैं इसलिए आज भारत का नाम दुनिया भर में राम नाम की तरह पावन बन रहा है।

 संस्कृति और भाषा से दिल का दिल से जुड़ाव :

पूर्व में ओडिशा बांग्लादेश आदि के त्योहार पर्व का दिन महीना आदि अलग होता है जबकि पश्चिम की ओर यानी मुंबई राजस्थान की ओर यही पर्व त्योहार कुछ अन्य रूप से दिखता है। वैसे ही दक्षिण यानी आंध्रप्रदेश या चेन्नई केरल की ओर बढ़ते हैं तो कुछ पूजा का समय अवधि अलग होते हैं लेकिन आस्था, रीति-रिवाज एक ही दिखता है, बस रहन-सहन और स्थान के अनुसार पद्वति में भिन्नता दिखती है। यही हमें भाईचारा की ओर ले जाती है, वही वैश्विक स्त्रर पर भी भाषा के आदान-प्रदान और हिंदी के विस्तार से हमारी संस्कृति को दिखाने और उसके प्रसार में भारत कामयाबी हासिल कर रहा है जिसकी वजह से व्यापार को एक नया आयाम मिल रहा है ।

दिल से दिल का जुड़ाव ‘ॐ’ से शुरू होकर आज ‘श्रीयंत्र’ और ‘गीता’ की महनीयता को भी विश्व से परिचित कराने में सफल रहा है। ये सब हिंदी के  विकास से संभव हो पाया है। ऐसा महसूस होता है कि देश विदेश में रहने के बावजूद भी हम सब व हमारी भावनाएं एक हैं तथा एक डाली के फूलों की तरह एक दूसरे से भाईचारे का रिश्ता बना पा रहे हैं। शिक्षा के लिए विदेश जाने में पहले सा भय नहीं रहा। मोबाइल के प्रयोग से दूर रहकर भी सब मानो एक धागे से जुड़े हुए हैं।

विदेश में हमारी संस्कृति :

एक समय था जब हम लोहे, तांबे और मिट्टीके बर्तन में खाना बनाते थे लेकिन स्टील, एल्यूमिनियम के टिकाऊ होने की वजह से लोग स्टील की वस्तुओं को उपयोग में लाने लगे जब कि लोहे और मिट्टी के बर्तन में खाना सेहतमंद होने के साथ-साथ एक प्रकार से पूर्वजों का आशीर्वाद ही है ठीक उसी प्रकार जैसे आयुर्वेद के अनुसार पेड़-पौधों की जड़ से बनी आयुर्वेदिक दवाओं के उपयोग से लोग न केवल रसायन दवाओं के गलत असर से बचते हैं अपितु निरोग रहते थे। बिना रसायन के प्रयोग से बनी दवा को उपयोग में लाने से लोग रोग मुक्त रहकर सुखद जीवन व्यतीत करते हैं। आधुनिक जीवन शैली से जब लोग बीमार रहने लगे और रासायनिक दवाइयों से परेशान तो फिर से उसी परंपरागत आयुर्वेदिक दवाओं का इस्तेमाल करने लगते है। आधुनिक जीवनशैली में योग भी मंत्र की तरह चमत्कारिक सिद्ध हुआ है जिसकी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 21 अगस्त को “योग दिवस” मना कर विश्व भर में पहचान कराई है,  जिसका लाभ विश्व के हर नागरिक उठा रहा है। हमारी पुरानी संस्कृति के वाहक के रूप में इसे विश्व भर में फैलाने का कार्य हिंदी ही कर रही है।

हमारी संस्कृति को विश्व के पटल पर उन्नत व रोशन हिंदी भाषा  ने ही किया है फल स्वरूप इसको अपनाने के लिए ,जानने के लिए, देश , विदेश में कई हिंदी स्कूल, कॉलेज व विद्यालय व  संस्थान स्थापित किए गए है। इस दिशा में प्रवासी भारतीयों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

परम्पराएं और व्यापार-वाणिज्य

भाषा, अभिव्यक्ति के साथ ही संस्कृति, रहन-सहन, जीवनशैली की प्रवाहमान संवाहिका भी है, जो निरन्तर अपना काम करती जा रही है।  हिंदी भाषा के द्वारा भारत की संस्कृति का प्रचार प्रसार वास्तव में बहुत ही सराहनीय है। हिंदी अपनी रचनाओं और साहित्य ,भाषा विन्यास, बोलचाल, मेल-मिलाप, विदेश में हिंदी फिल्मों के प्रस्तुतीकरण  आदि द्वारा  हमारी संस्कृति को विस्तृत कर विदेशों में लोगों को लुभा रही है जिसका असर व्यापार में भी दिख रहा है।

पूजा विधियों, रीतिरिवाजों, भक्ति रस आदि से सौहार्द्रता की संवाहक भी है‌ जैसै कुछ साल पहले तक करवाचौथ सिर्फ कुछ ही राज्यों में मनाया जाता रहा हैलेकिन आज पूरे  विश्व में भारत मूल  की स्त्री, अपने पति और प्रेम के लिए यह व्रत एरखने को आतुर है। वहीं पश्चात के वैलेंटाइन डे को भारत में प्रेम दिवस के रूप में मनाते हैं। कहीं घर के बुजुर्गों को फूल देकर ,उनका आशीर्वाद लिया जाता है तो कही छात्र छात्राएँ  शिक्षकों  को‌ व‌ कहीं  परस्पर भाई-बहन ,कहीं माता-पिता इत्यादि को फूल देकर प्रेम का इजहार किया जाता है इसमें भाईचारा ही झलकता है। कई अपवाद भी इस दिशा में देखे गए  हैं। छठ पूजा कभी एकमात्र उत्तरप्रदेश में मनाई  जाती थी  मगर अब अन्य कई प्रदेशों में भी छठ पूजा की तैयारी होती है।

इस तरह चाहे गाँव, शहर, क्षेत्र, देश-विदेश हो, लोग इन परमपराओं का आदान-प्रदान करने लगे हैं और यह एक विशालकाय रूप में दिखने लगा है। जैसे भारत में होने वाले रंगों का त्योहार हो या पटाखों का, चीन इसका बाजार भारत में स्थापित करता है, और यही भारतीय रंग और पटाखें आदि सीमापार विदेशों तक पहुँचाये भी जाते है, साथ मे कृषि के साधन, कपड़े,वस्तु, खाने-पीने के सामग्री भी। भारत केमंदिरों व नियमानुसार पूजा विधि  की विदेशों में भी बहुत मान्यता है। वैसे भारत में मस्जिद, चर्च की भी कोई कमी नहीं है। इस तरह भाषाओं का मेल-मिलाप संस्कृतियों का मिलन ही  है जो सीमापार अपना रंग बिखेरता है जिसका सीधा असर व्यापार पर पड़ता है जहाँ हिंदी भाषा के बिना बाज़ार में लेनदेन असम्भव मालूम पड़ता है।

पिछले कुछ सालों में हिंदी ने पूरे विश्व की भाषाओं के उपयोग में दूसरा स्थान प्राप्त किया है। यह तब हुआ जब   भारत के प्रधानमंत्री मोदीजी  वैश्विक मंचों पर हिंदी में भाषण देने लगे। उनके हर भाषण में हिंदी में भारत की संस्कृति और विशेषताएँ निहित होती है। भारत का वर्चस्व इसी से सिद्ध होता है कि भारत से शुरू वैश्विक योगा दिवस पूरा विश्व मनाता है। विदेश के मंचों पर हिंदी भाषा को ले जाना पहली विजय रही तो, विदेश के मंचों पर  हिंदी को सुनना एक नवीनतम अनुभव है जिससे मन प्रफुल्लित हो जाता है। भारत के विकास में संस्कृतिक दिवसों को बढ़ावा देकर भारत की पृष्ठभूमि को और भी सशक्त किया जा रहा है जिससे भारत को विश्वगुरु कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। जैसे जैसे हिंदी भाषा विदेश की धरती, और मंचों पर राज़ करने लगी है वैसे-वैसे हमारे भारत का गौरवशाली इतिहास भी जन-जन तक पहुंच रहा है। पिछले कुछ ही सालों में वैश्विक स्तर पर हिंदी बोली जाने लगी है।

भारत की संस्कृति में हिंदी :

हिंदी चाहे भारत की राष्ट्रभाषा बन न पाई हो लेकिन भारत की दो चौथाई राज्य हिंदी को संपर्क भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय भाषा का दर्ज़ा देने को तैयार हैं। बहुत जल्द विश्व भाषा होने के साथ ही हिंदी, राष्ट्रीय भाषा होने का विश्वास दे रही है। अब भी भारत के कुछ राज्यों का हिंदी से भारत को जोड़ने का प्रयास जारी है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे कुछ राज्य अभी भी हिंदीभाषा को राष्ट्रभाषा बनाना  स्वीकर नहीं करते जिससे हिंदी भाषा, राष्ट्रभाषा बनने में कुछ कदम पीछे रह जाती है। इसका एक कारण यह भी है कि हिंदी  अबतक रोजगार की भाषा नहीं बन पाई है। लोकभाषा बनने के लिए हिंदी को रोज़गार की भाषा बनाना होगा‌ जिसका प्रयास शुरू हो चुका है और डॉक्टर की उपाधि के लिए पुस्तकें हिंदी में तैयार कर एक कदम आगे बढ़ चुका है और निकट भविष्य में उम्मीद की जा सकती है कि हिंदी  राष्ट्र-भाषा बनने का ‌ गौरव प्राप्त करेगी ।

लता तेजेश्वर ‘रेणुका’

नविमुम्बई, खारघर
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