“तू इधर -उधर की न बात कर,
ये बता कारवाँ क्यूँ लुटा,
मुझे रहजनो से गिला नहीं,
तेरी रहबरी का सवाल है “
यहाँ रहजन और रहबर दोनों अदीब ही हैंl इन लोगों ने हिंदी कविता की ट्रेन को बेपटरी कर रखा हैl जैसे मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री का दर्जा विशिष्ट होता है उसी तरह कवि सम्मेलन में संचालक का दर्जा भी विशिष्ट होता हैl जिस तरह से प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों के विभागों का बंटवारा करते हैं और किसी को अति महत्वपूर्ण विभाग देते हैं और किसी को कम महत्वपूर्ण विभाग देते हैंl उसी तरह संचालक किसी पर इतनी ज्यादा कृपा और उदारता दिखाते हैं कि उन्हें ऐसा प्राइम टाईम देते हैं जब वीआईपी लोग बैठे हों और महफ़िल में भीड़ जमा होl भले ही उस शायर का कलाम घटिया और घिसा -पिटा होl पांच मिनट के कलाम को पैतालिस मिनट तक संचालक साहब खिंचवा सकते हैंl उस शायर को सारी दाद और वाह वाही भीड़ से अपील करके संचालक साहब दिलवाने की कोशिश करते हैंl लेकिन संचालक साहब की “गुड बुक ” में अगर कोई कवि नहीं हैं तो फिर तो उसे फिर अपनी कविता कहने का अवसर तभी मिलेगा जब मजलिस खत्म होने को हो और सारी भीड़ जा चुकी हो l तब उस कवि के श्रोता सिर्फ टेंट और बिजली वाले बचते हैं जो सोचते हैं कि कब यह कवि अपनी कविता बोलना बंद करे और हम अपना माइक, टेंट और शामियाना समेटना शुरू करें l यानी सिर्फ काबिल कवि होने से कोई दाद का हकदार नहीं हो जाता बल्कि उस कवि पर मजलिस के संचालक की नजरे इनायत भी होनी चाहिएl
जैसे हर कन्या के लिए एक उचित वर की जरूरत होती है, ठीक उसी तरह हर कवि सम्मेलन के लिए एक संचालक की आवश्यकता होती है। अध्यक्ष पद के लिए लोग काबिल होने के बावजूद महत्त्वहीन पद पाये व्यक्ति की तरह उदासीन रहते हैं, मगर संचालक पद के लिए टाप लेवल की गुटबंदी होती हैl साथ ही बहुमत के कांटो से भी गुजरना पड़ता है। इसमें ज्यादातर सुरा -सुंदरी विशेषज्ञ व्यक्ति ही संचालक के पद के दावेदार होते हैं और उन्हीं टाप थ्री में अक्सर कोई एक संचालक का पद हथिया लेता हैl
संचालक जिसे हृदय से चाहते हैं, उसके लिए अतिशयोक्तिपूर्ण उद्घोषणाएं करने से परहेज नहीं करते। बोलते-बोलते कब उनके ओज का कवि जोश में आ जाएगा, इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है। श्रोताओं में उपस्थित अपने मित्रों, खासकर महिलाओं के नाम ले ले कर उनकी उपलब्धियां गिनाते हैं, उन्हें ख्यातिलब्ध कवियत्री की उपमा देकर उनकी कविता का खूब गुणगान करते हैं l जिस कवियत्री का कहीं कोई विशेष नाम न हुआ और नवोदित हो उसमें संचालक साहब “असीम कवित्व की संभावना ” तलाश लेते हैंl वह बेचारी क्या जाने कि “जाल फेंका रे मछेरे ” वाली बात हो रही हैl
इस सबका फ़ायदा संचालक साहब को ये फ़ायदा होता है कि कार्यक्रम के बाद महिलाएं उन्हें धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए घेर लेती है। फिर वे जमकर अपनी उपलब्धियां सुनाते है। इंडिया से लेकर इंडोनेशिया तक कितनी ही सारी बातें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। दूसरे कवि मसोसते रहते है कि कब इस साहित्य हिरणी को यह संचालक रूपी ब्याघ्र अपने वाक्पंजो से मुक्त करे और मैं काबिज हो जाऊं!
तमाम ऐसे शातिर शायर हैं जो अदबी जमात के रहबर के भेष में रहजन हैंl
ऐसे अदब के रहजन प्रतिभाओं की खोज में निरंतर लगे रहते हैं, लेकिन आज तक उन्हें कोई संभावनाशील पुरुष रचनाकर नहीं मिला,हाँ!अपने संचालन में होने वाले कार्यक्रमों के लिए कोई न कोई नई शायरा ढ़ूंढ़ ही लेते हैं।
यह और बात है कि बेचारी मंच पर आने के बाद पसीने-पसीने हो जाती है। वे नई शायरा को चांस देने के लिए उसके घर तक जाते हैं, होटल में खाना खिलाते हैं और छूटते-छूटते कटिंग चाय भी पिलाते हैं,किंतु उनका दर्द यह है कि उनकी इस खोज को शीघ्र ही दूसरे संचालक उड़ा ले जाते हैं, लिहाजा फिर से उन्हें नई ढ़ूंढनी पड़ती है।
किसी अजीम शायर ने ऐसे अवतारी लोगों पर कहा है –
“ये जो महंत बैठे हैं राधा के कुंड पर,
अवतार बनके गिरते हैं परियों के झुंड पर ”
अदब के रहबर बने कुछ रहजनो को अपनी मुस्कराती छवि बहुत अच्छी लगती है, इसलिए बिना वजह बराबर दाएं-बाएं, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे देखकर मुस्कुराते रहते हैं।
कई संचालक संचालन के दौरान कविताएं पढ़ते-पढ़ते कब रोने लगेंगे और कब हंसकर चुटकुले सुनाने लगेंगे, यह भांप पाना किसी नए श्रोता के लिए मुश्किल होता है। इनकी बातों का श्रोताओं पर कोई असर पड़े न पड़े, खुद बातें करते करते हंस भी लेते है, रो भी लेते हैं।
कुछ संचालक सिर्फ चुटकुले के सहारे पूरा प्रोग्राम संपन्न कर लेते हैं।उनकी नजर में हास्य के अलावा कोई रस है ही नहीं। जो शख्स चुटकुले सुनाकर तालियां बजवा ले, वही इनका भगवान है। वे संचालन के लिए 15-20 मजाहिया शेर और चुटकुले याद रखते हैं, इससे अधिक चीजें उनके दिमाग के हार्डडिस्क में नहीं अंटतीं।
कुछ संचालक ऐसे हैं जो बगैर चुटकुलों के कवि सम्मेलनों का साहित्यिक संचालन करते हैं। वे मंच पर जितने खुले और शालीन दिखते हैं, व्यवहार में उतने ही वीआइपी बने रहते हैं। इनकी एक खास अदा है कि किसी भी कार्यक्रम के लिए ना नहीं बोलते, पर जाते वहीं हैं जहां इनके घनिष्ठ और वरिष्ठ लोग होते हैं। नंबर वन की दौड़ में दूसरे संचालक इन्हें अयोग्य घोषित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाये रहते हैं लेकिन इनकी आजीविका का साधन कुछ और होता है,इसलिए वे निरपेक्ष बने रहते हैंl
जितने किस्म के संचालक उतने किस्म के शौक, किसी शायर ने तो संचालक को बादशाह की उपमा देते हुए फरमाया है कि-
“लगा कर आग शहर को बादशाह ने ये कहा,
उठा है आज दिल में तमाशे का शौक बहुत,
झुका के सर सभी शाह परस्त बोल उठे,
हुजूर का शौक सलामत रहे, शहर और बहुत
संचालन के राजरोग से ग्रसित ये आत्माएं पूरे भारत में भटकती रहती हैं। इन आत्माओं को नमन।
गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे ही यश लोलुप लोगों के लिए कहा था –
गुन अवगुन जानत सब कोई /
जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।
- दिलीप कुमार
