ग़ज़ल
अपनी मेहनत पे चल रहे हैं हम
फिर क्यों लोगों को खल रहे हैं हम
हो गए दूर तेरी दुनिया से
ख़ुद के रंगों में ढल रहे हैं हम
ना विरासत में कोई नाम मिला
गिरके, उठ के, संभल रहे हैं हम
मन के मौसम में आज गर्मी है
शाम में भी पिघल रहे हैं हम
जब से मौसम ख़िज़ाँ का आया है
तब से बुझ-बुझ के जल रहे हैं हम
न मिले कुछ तो कोई फ़िक्र नहीं
लग रहा है बदल रहे हैं हम
ले लो जाहो-जलाल सब ले लो
अब तो बेलौस चल रहे हैं हम
ग़ज़ल
होड़ कैसी है, दौड़ कैसी है
और ये जोड़तोड़ क़ैसी है
ज़िन्दगी सबकी बन गई मुश्किल
फिर भला तोड़ फोड़ क़ैसी है
बात बोली तो सीधी साधी थी
आपकी ये निचोड़ कैसी है
फिर से लगता है कोई दिल टूटा
मेरे दिल में मरोड़ क़ैसी है
साहबी नौकरी के साथ गई
फिर भी साहब में चौड़ कैसी है
साथ रहकर जो होते साथ नहीं
बीच उनके बिछोड़ कैसी है
छोड़ जाना है जब यहाँ सब कुछ
फिर भी ये भागदौड़ कैसी है
– रेखा राजवंशी
