डर तो नहीं रहीं ? पता नहीं उसे किस बात से डरना था ? पर जब उस गहरी मर्दानी आवाज ने हल्के मद्धम स्वर में पूछा “डर तो नहीं रहीं?” तो उसने नहीं में सर हिला दिया।
न जाने पूछने वाले ने उसका ना में सर हिलाना देखा या नहीं क्योंकि उसी समय सड़क से कोई गाड़ी गुजरी और उसकी हेड लाइट सरसराती हुई खिड़की के चौकोर खानों वाले सींखचे से अंदर आ गई और आँखें पल भर को चौंधियाँ गईं। आँखें मूँदने पर भी उसने देखा या शायद महसूस किया, प्रश्न पूछने वाला रोशनी की आहट मिलते ही झपट कर पीछे हो गया था मगर पीछे हटते भी उस भागती हुई रोशनी के अधूरे पल में, उसे भरपूर नजर से देख रहा था।
रोशनी से कौन डरता है भला? अजीब व्यक्ति है! उसने सोचा या यूँ ही आ गया दिमाग में।
“बैठ जाओ”, कहा ही नहीं गया, कंधे पकड़ कर बिठा भी दिया गय। खिड़की पर पर्दा खींच दिया गया था। उसने आँखें गड़ा कर बाहर देखने की कोशिश की। कुछ नहीं दिखा। फिर से कोई गाड़ी आए तो कुछ दिखे शायद।
हवा तो है बाहर, तेज नहीं हल्की, परदे में एक धीमी सुस्त लहर बनाती बस। इस घर में वह जब आई, दिन था। आते समय देखा था, बड़े से गेट के अंदर बने घर तक पहुचने के पहले एक बगिया थी। दुत्त बगिया नहीं लॉन कहते हैं उसे ! छोटी अगर सुनले उसे लॉन को बगिया कहते तो कितना हँसे!
जमीन बेकार कर रखी है इन लोगों ने, एक भी बड़ा पेड़ नहीं, अप्रैल बीत रहा है और मई आ रही मगर न नीम की तुर्श न आम की खट्टी महक! दरअसल कोई महक नहीं ! न अच्छी न बुरी!
दिन में जिस कमरे में बिठाया गया था, वो इस कमरे से बड़ा था। शायद सास का था। आलीशान बड़ा सा बिस्तर और खिड़कियों, दरवाजों पर बेशकीमती परदे ! पर वहाँ एक अजीब अजनबी महक थी। खुशबू वाले साबुन और फिनायल की मिली जुली हो जैसे।
हो सकता है, आजकल ऐसी ही महक का चलन हो!
“तुमसे बहुत अच्छी खशबू आ रही है, कौन सा पर्फ्यूम लगाया है?” गहरी आवाज ने पूछा।
वो सकुचा गई, जैसे अपराध की सफाई दे रही हो ऐसे बोली “पड़ोस में एक भाभी है उन्होंने ही लगा दिया” फिर लगा, कुछ और बोलना चाहिए, इसलिए बोली, “लाई भी हूँ अटैची में रखी है शीशी।”
वो बड़ा मीठा सा हँसा पर फौरन ही रुक गया, जैसे हँसना मुनासिब न रहा हो। लगा वो अंधेरे में उसे देख रहा है, फिर न जाने क्या सोच कर मोबाईल की टॉर्च की रोशनी में उसे देखता रहा काफी देर। उसने आँखे झुका लीं थीं और जब तक जी में आया कि वो भी उसे देख ले, तब तक उसने टॉर्च बुझा दी।
दूर से आती एक साँस गले में रोक वो बोला, बहुत छोटी हो तुम!
“नहीं बाईस की हो गई! देखने में छोटी है बस” उसकी माँ कहती। “शादी हो जाएगी तो बदन अपने आप भर जाएगा। ”
शादी! शादी हो गई उसकी! जबसे होश संभाला, यही महसूस किया जैसे उसके जीने का एक ही मकसद है, अच्छे घर में शादी! अच्छा घर माने ? पैसे वाला घर ? नौकरी वाला दूल्हा ? या शायद सबसे जरूरी जो ज्यादा पैसे लिए बिना,एक बीहड़ पहाड़ी गाँव की रहने वाली, जहाँ आज तक सड़क भी नहीं पहुंची उस पर भीषड़ गरीब बाप की पाँच बेटियों में तीसरी, यानि उसे ब्याह ले जाएँ।
न जाने कितना बज रहा होगा ? यह कमरा इतना अंधेरा क्यों है ? “लाइट जला लें ?”
कोई जबाब नहीं मिला, उसने ‘ना’ समझ लिया।
वो उठकर, खिड़की के पास जा सींखचे पकड़े खड़ा था कुछ देर, गिरे परदे से भी झीनी सी उजास आती थी । सड़क पार के किसी बल्ब की या फिर चाँद की ही शायद। बस इतनी कि अंधेरा ओढ़े काया दिखे। दिखे कि कुर्ते का रंग बहुत हल्का है, यह भी न पता चले कि वो हल्का पीला है या हल्का भूरा या गुलाबी !
न जाने कब वो सो गई, सोई थी, यह जाग कर ही पता चला। नींद में वह वापस अपने गाँव घर की, अपनी गंदी कथरी पर पहुँच गई थी। बड़ी देर लगी याद आने में कि वो कहाँ है। खिड़की के बाहर रोशनी हो गई थी, पर्दा सरकाया, देखा दूर तक गाड़ियां धुल रहीं थीं। इतनी गाड़ियां? अच्छा मेहमानों की भी तो होंगी, सब अब जाने को होंगे। कौन कौन आया होगा? उससे तो किसी को मिलवाया नहीं गया, न किसी के पैर पड़ाया गया, न किसी ने न्योछावर की, न निहोरा, न आशीष ! यहाँ नई बहू की मुँह दिखाई की रस्म नहीं होती शायद ।
एक सजी धजी स्त्री, नहाने की तैयारी कराने आ गई। कपड़े, तौलिया निकाल कर बोली, मैम पानी गरम है नहा लीजिए! मैम? यानि यह कोई रिश्तेदार नहीं? अच्छा हुआ, झिझक कर खड़ी रही, पैर नहीं छूए! च च ऐसे नहीं सोचते, छू भी लेती तो क्या? उम्र में बड़ी ही लग रही!
नहा कर निकली तो एक लड़की सी वर्दी में खड़ी थी, साड़ी जेवर पहनाने। बाल बना, चेहरे पर थोड़ा मेकअप करके जब तक तैयार हुई, नाश्ता भी आ गया। इतना कि जब दोपहर का खाना आया तो उससे छुआ भी न जाए। सुबह से बैठी बैठी ही थक गई थी। दोपहर बाद न जाने कब सो गई !
मैम उठिए! वी आर हियर टु हेल्प यू इन गेटिंग रेडी !
रेडी? उसने अपनी सुबह सलीके से पहनी, कीमती साड़ी पर हाथ फेरा । एक भी क्रीज़ नहीं बिगड़ी थी, वो ऐसे एक करवट सोई थी।
पूरी टीम आई थी इस बार उसे तैयार करने। पता चला, उसके स्वागत में शहर के बड़े होटल में पार्टी रखी गई है। परतों में फहराते, जमीन पर लिथड़ते, गुलाबी ईव्निंग गाउन में वो खुद को ही पहचान नहीं पाई। उसके पहाड़ी नदी की उलझी धाराओं से, घूमेरदार बाल, मशीन में फँसा कर सीधे कर दिए गए ! ऐसा नहीं था कि उसने कभी यह सब देखा सुना नहीं था, शहरों में ब्याही सहेलियाँ थीं, वो खुद भी कितनी बार शहर गई है और फिर एक पुराना टीवी तो था ही ।
मोबाईल जरूर अभी तक बटन वाला ही था उसके पास ! उसने सोचा, जब उनसे बात करने लगूँगी तो कहूँगी एक अच्छा वाला मोबाईल ल कर देने को। ‘उनसे!’ पुलक सी गई नीमा।
पार्टी में एक सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे उसने सुना,
“और? साहेबजादे कहाँ हैं आपके ? आज भी गायब ?”
“उसे फुरसत है? बड़ी मुश्किल से तो ब्याह के लिए समय निकाल कर आया था सुबह की फ्लाइट से ही दिल्ली निकल गया” नीमा की सास थी ये
“अकेले? जा ही रहा था तो बहू को भी ले जाता ! हनीमून भी हो जाता काम के साथ” कहने वाले की आवाज में कुछ तंज जैसा था।
“दिल्ली? और हनीमून? वो भी कोई जगह हुई?”किसी ने नीमा की सास को इस अनपेक्षित प्रश्न से उबार लिया। नीमा ऊब रही थी। भारी नकली पलकें लगा दी गईं थीं, आँखे खोल कर रखना मुश्किल था। उस पर वो भी नहीं था यहाँ!
‘वो’ एक बड़ी सी, लगभग एक छोटे कमरे के नाप की महोगनी मेज के गिर्द लगी चौबीस कुर्सियों में से किसी एक किनारे की कुर्सी पर बैठा था।
“काम हुआ ?’’ चौबीस कुर्सियों वाली मेज के सिरे पर बैठे व्यक्ति ने पूछा
“नहीं”
“नहीं? क्यों नहीं?’’
“वो बहुत छोटी है और भोली भी”
भोली पर उसने ध्यान नहीं दिया, छोटी पर बोला “रबिश !! पूरे बाईस की है ,बालिग है ! टेन्थ का सर्टिफिकेट देखा है मैंने।
उसकी कुछ कहने की कोशिश को नजरअंदाज करते हुए उसने आगे कहा, तुम्हें यूके वापस जाना है या नहीं ?
इस बार ‘उसने’ यूके को नजरअंदाज करने की कोशिश की, “उसका नाम निर्मला है”
“है तो?”
“निर्मला मेरी माँ का नाम भी है।”
कुछ देर तक सिरे वाला व्यक्ति किनारे पर बैठे ‘उसे’ घूरता रहा!
फिर बोला “सुनो बेटा! तुम्हारी माँ का नाम निर्मला है। इसीलिए तुम्हें यह सब मिल रहा है, जिसके तुम हकदार नहीं !”
“क्या सब ?”
तुम्हारी लंदन में पढ़ाई, तुम्हारी माँ और तुम्हारे बाप के ऐशोआराम, तुम्हारी बहन की शादी।
बायोलाजिकल पिता हैं आप मेरे ! फर्ज है आपका यह ! मैं चाहूँ तो कोर्ट भी जा सकता हूँ
जाओ कोर्ट! डीएनए कराओ! कराओ छीछालेदर अपनी माँ की। सुनो छोकरे! ये है इंडिया, पचास साल निकाल दूंगा मुकदमे में! लड़ कर अगर तुम जीत भी गए तो पता चलेगा मेरे नाम कुछ है ही नहीं। ट्रस्टी हूँ बस तमाम जायजाद का। ऊपर से वो बाप तुम्हारा, जिसका नाम तुमारे सरटीफिकेटों में है, लिख कर देगा कि यह बिजनेस अग्रीमन्ट था बस! फिर क्या मिलेगा तुम्हें?”
“आपका नाम।”
“हँसाओ मत यार! पूछ कर आओ अपनी माँ से, उसे क्या चाहिए? बेवकूफ मत बनो, जैसे कहा जा रहा है वैसे करो। तुम मेरा खून थे तो कह रहा था वरना काम तो मेरा होगा ही। मिसिज़ मान जाए तो मुझमें भी सब खत्म नहीं हुआ अभी ! वीभत्स हँसी हँसा वो सिरे की कुर्सी वाला!
अगली दो अंधेरी रातों में नीमा को पता चला वो क्या था जिसके बारे में शादीशुदा सहेलियाँ और भाभियाँ मुँह दबा हँसती थीं। जिसका इशारा उसने कितनी ही बार टीवी के सीरियल और फिल्मों में समझा था।
तीसरी सुबह नीमा को माहवारी आ गई। नीमा की सास बहुत गुस्से में थी। बेवकूफ देहाती! कहा था इसकी माँ से, कि महीने आने के हफ्ते बाद शादी की डेट रखे। पर उसे तो मुहूरत और घड़ी की पड़ी थी! मूर्ख!
नीमा को लगा, उससे बहुत बड़ी गलती हो गई।
‘उसको’ यूके जाने से रोक लिया गया था। कॉलेज शुरू होने का, पढ़ाई का हर्ज होने का कोई बहाना नहीं चल सका। इस बार तय हुआ था वो पूरे महीने नीमा के साथ रहेगा।
कमरे में अंधेरा ही रहा, परदे खिचे रहे बस कुछ ऐसा हुआ कि कमरे में रात रानी की सुगंध आने लगी, बिस्तर कुछ और मुलायम कुछ और गुनगुना सा हो गया! कभी कभी वे रात रात भर जागे रहते, बिना एक दूसरे को देखे बस स्पर्श से बाते करते।
एक दिन नीमा ने उसकी उघाड़ी पीठ पर उंगली से लिख दिया ‘आई लव यू ’ उस दिन उसने नीमा को ऐसे दीवानावार प्यार किया कि नीमा को अपने गाँव की तेज बारिशों के दिनों में छलछला जाती पोखरी याद आ गई
अगले महीने डेट पर नीमा कपड़े से नहीं हुई ! उसे लगा सास कलेजे से लगा लेंगी, बलाएं उतारने लगेंगी मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ ! उन्होंने बस एक धीमा सा “ थैंक गॉड” कहा और डॉक्टर से अपॉइन्ट्मन्ट लेने को सेक्रेटरी से कह दिया ।
डॉक्टर के यहाँ उसी दिन ले जाई गई नीमा, सास भी गई थीं साथ ! दो लाइन आईं थी एक छोटी सी डिब्बी में। नीमा वो डिब्बी साथ ले आई, उसे बार बार देखती। वो फीके नीले रंग की दूसरी लकीर, उसके बच्चे की पहली पहचान थी। नीमा उत्ती सी लकीर में नन्हे नन्हे हाथ पाँव देखती, चेहरा नहीं दिखता। पिता का चेहरा देखा हो तो शायद यह सपना देखने में सुविधा होती कि कौन सा नक्श नीमा पर गया, कौन सा ‘उस’ पर।
अब कमरे से बाहर कभी कभी निकलती थी नीमा! किचन में काम करने की मनाही नहीं थी, मगर आजादी भी नहीं थी । एक तो इतना ताम झाम! तरह तरह की मशीनें जो पहले न कभी देखी, न सुनी ! और अब तो महक से उलटी भी आने लगी थी। नीमा को पता था, बच्चा पेट पड़े तो उल्टियाँ होती ही हैं, पड़ोस की भाभी को देखा था, उबकाइयां लेते, उल्टियाँ करते घर का काम समेटते। पर नीमा की हर उबकाई के बाद मेड दौड़ी आती, नीबू का शर्बत लिए । हर उलटी पर डॉक्टर को फोन जाता ! हर हफ्ते अस्पताल जाती। एक गाड़ी ड्राइवर बस उसी के लिए था। जहाँ जाना चाहती जाती, जो माँगती मुँह से निकलते, हाथ में मिलता।
बस नहीं मिलता तो ‘वो’
वो नहीं आया, पिछले पंद्रह दिनों से। उसे पता तो चल गया होगा पर नीमा को खुद उसे बताए बिना चैन कहाँ? मेड से पूछती तो उसका वही एक जबाब, छोटे साब बाहर गए हैं। एक दिन हिम्मत जुटा कर सास से भी पूछा तो वो कॉल कर लो, बोल कर निकल गईं। नंबर कहाँ नीमा के पास? किसे कॉल करे?
फिर एक दिन कहा तो सास ने खुद फोन मिल कर पकड़ा दिया, “लो बात करो इससे”
उधर से पहले तो कोई आवाज नहीं आई फिर बस इतना ही “ बिजी हूँ बाद में बात करता हूँ’’ और फोन कट गया।
इतना रूखा व्यवहार, इतनी रूखी आवाज़? आवाज़? यह ‘उसकी’ आवाज़ नहीं हो सकती। ऐसे सख्त लहजे में उसने कभी बात नहीं की मुझसे?
रोते रोते सोई नीमा उस दिन!
टिकट कैन्सल करा दिया उसने, तीसरी बार। फोन उठा कर एक नंबर पर क्लिक करते रुक गया कोई बीसवीं बार।
दो महीने हो गए आज! वो वापस यूके नहीं गया था, मुंबई नौकरी करने लगा था। गुजारे लायक ठीक ठाक पैसे मिल जाते। माँ उसके पास आने को तैयार नहीं थी। उसके यूके न जाने से नाराज थी माँ।
“क्यों जनम खराब कर रहा उस पहाड़न के लिए। एक बार लंदन में सेटल हो गया तो पचास मिलेंगी उसके जैसी। ”
समझता था वो भी, काफी समझ बूझ कर यह सौदा किया था उसने, चला ही जाएगा वापस।
जाने के पहले एक बार, उस से मिल आए क्या? अब अंधेरे में देखने को तो मिलेगी नहीं वो, दूर से देख आए ! डॉक्टर के यहाँ तो जाती ही होगी। पता चल ही जाएगा किसी तरह।
नहीं! खतरा है! फिर क्या? फोन करूँ? उसका पर्सनल नंबर नहीं मालूम, ले लेना चाहिए था तभी।
ठीक तो है वो ? इतनी दुबली पतली नाजुक सी लड़की प्रेग्नेंट है। सहन कर लेगी न तकलीफें! वो कल्पना में खुद को डॉक्टर के चैम्बर में नीमा के साथ बैठा सोचता। डॉक्टर से सब समझता। मेरी नीमा !मेरा बच्चा !!
शर्म आ गई उसे, काहे का मेरा बच्चा! उसे तो बेच आया वो ! अपने शुक्राणुओं की पूरी कीमत मिली थी उसे।
फिर भी एक बार, बस एक बार! देखना है तो अभी देखना चाहिए, पेट बड़ा हो गया या बच्चा ही हो गया तो देखकर एक मोह और गले से लिपट जाएगा।
फोन? हाँ फोन ही सही।
उसे बुला दीजिए, उसके गाँव से बोल रहा हूँ।
“हैलो!”
“कौन?”
“मैं”
“मैं नहीं जानती आपको” फोन कट गया था। उसने पहचाना नहीं क्या? नहीं उसकी आवाज़ पहचान ली थी, तभी फोन काट दिया ।
कोई एक घंटे बाद उस तरफ से कॉल आ गई, शायद इनकमिंग कॉल मिलाई होगी उसने
“मैं पहचान गई थी ’’
“हाँ! तुम पहचान गईं थीं’’
“क्यों किया फोन?”
“माफी मांगने के लिए”
“किस बात की माफी? मुझे छोड़ के जाने को या फिर प्यार करने के लिए?”
“ प्यार !! वो अचकचा गया, प्यार को अब तक उसने किनारे खड़ा कर रखा था वो बात में सबसे पहले आ जाएगा, उसने सोचा नहीं था।
“वो घर पर ही रहता है आजकल?”
“वो कौन?”
“तुम्हारा पति”
“रहता ही होगा, उसका घर है” वो हँस रही थी या सिसक रही थी, फोन पर पता नहीं चल रहा था ।
“सुनो अब खिड़की से रात रानी की गंध नहीं आती ! बेल कटवा दी शायद इन लोगों ने”
“नहीं कटवाई नहीं होगी, मौसम बदल गया है, रातरानी फूल नहीं रही होगी ।
“क्यों किया होगा ऐसा?
“नहीं कटवाई होगी, क्यों कटवाएंगे आखिर?”
“नहीं वो नहीं! मेरे साथ ऐसा क्यों किया? इन लोगों ने …. और तुमने?”
“पता तो चल चुका होगा, अब तक तुम्हें” शर्म से, दुख से डूब रही थी उसकी आवाज़
हाँ वो भी है उसके साथ, दोनों एक कमरे में सोते हैं, सुनो अब तो ऐसे रिश्ते सामान्य माने जाते हैं, कुछ देशों में तो विवाह भी होने लगे हैं मर्द मर्द और औरत औरत के। वहीं जा कर बस जाता? इनके पास तो इतना पैसा था!
“शायद दिखावे के लिए या शायद वंश के लिए, बच्चे के लिए।”
“तो भी यह सब करने की जरूरत क्या थी? इतना बड़ा प्रपंच रचना? मुझसे यही एक बच्चा करके छोड़ देता। मैं काट लेती ज़िंदगी। तुमको बीच में लाने की क्या जरूरत थी….? तुम मेरी ज़िंदगी में न आते तो मुझे कभी कुछ पता नहीं चलता …. पता नहीं चलता कि चाहा जाना कैसा होता है तो मेरे लिए यह अनचाही ज़िंदगी जीना शायद थोड़ा आसान होता….”
उसको बच्चा नहीं हो सकता, वो सेक्सचेंज ऑपरेशन करा चुका है। दरअसल उसकी गलती नहीं है, वो तो शुरू से ओपन है। पेरेंट्स का प्रेशर था। इमोशनल भी और मॉनीटरी भी ….
“ पैसे का दबाव ज्यादा रहा होगा, इमोशनल होता तो एक निर्दोष लड़की का जीवन बर्बाद करने से पहले कुछ तो सोचता! या सोचा होगा, कीड़े मकोड़ों की ज़िंदगी जीने वाली जंगल गाँव की लड़की को महल में लाकर उपकार ही तो कर रहा है। मगर तुम ! तुमने भी पैसे के लिए ?
“मैं …!’’. हिचकिचा गया वो, मगर कहा, क्योंकि कहना तो था ही, नाली से बहकर आया ही सही, उसी घर के मालिक का लहू उसकी रगों में है उसके उसने अपने जींस, अपने डीएनए का सौदा किया था ।
मजबूर था नीमा, बहुत मजबूर।
कुछ देर, फिर बहुत देर चुप रही वो उस तरफ, जैसे मौसम बदलने की प्रतीक्षा कर रही थी। वो इस चुप को सुनता रहा बहुत देर ….
“ मुझे माफ कर सकोगी?’’
“हम्म! शायद! मगर शर्त है, मुझसे मिलने आओ!”
“ कुछ समय दो।’’
“समय नहीं है, यही तो शर्त है, वैसे भी मुझे पता है, आओगे तो तुम जरूर एक न एक दिन। मगर माफी चाहिए तो जल्दी आओ कल या परसों’’
“देखता हूँ टिकट।’’
एक शाम जब रातरानी नहीं फूल रही थी और रात गहराई नहीं थी वो उससे मिल रहा था।
“तुम आए !!’’
“हाँ तुमने कहा तो मैं कैसे न आता।”
“तुम्हें देख लूँ ?” यह प्रश्न न जाने किसका, किससे था मगर बहुत देर हवा में झूलता रहा।
“मुझसे प्यार करते हो?”
“नहीं” यह उत्तर झूठ था, मगर सही था।
“वो क्या था? वो हमारा योग? केवल संयोग ?’’
“नहीं! संयोग नहीं! संयोग से तो मिलन होता है। हमारे बीच जो हुआ उसे नियोग कहते हैं, जैसे महाभारत में हुआ था। वंश आगे बढ़ाने के लिए।
हाँ! अंबिका, अंबालिका और वेद व्यास! जानते हो अंबिका ने डर कर आँखें मूँद ली थीं इसीलिए उनको धृतराष्ट्र पैदा हुए, अंधे!
“मैंने आँखें नहीं मूँदीं थीं मैं डर भी नहीं रही थी, मगर अंधेरा था, घुप्प अंधेरा !! याद है न !”उसने पूछा
“ हाँ याद है ! सब याद है।’’
“ मुझे तब डर नहीं लगा पर बाद में लगा यह सोच कर कि कहीं अंबिका की तरह मेरा बच्चा अंधा न पैदा हो !’’
“नहीं ऐसा मत सोचो! कुछ नहीं होगा हमारे बच्चे को” उसने उसकी दुबली कलाई थाम ली।
‘हमारे बच्चे’ पर उसने एक निगाह उस पर डाली और आगे बोली
“ मैं उस डर से मुक्त हो गई …. ….’’
“मतलब?’’
“मतलब मैंने बच्चा गिराने की दवा खा ली, अब कोई बच्चा नहीं है।”
वो भौंचक्का रह गया। नीमा उठी, दो घड़ी उसे ताकती रही,उसका कंधा थपथपाया और चली गई । वो बहुत देर वहीं बैठ रहा अंधेरा घिरने तक।
- ज्योत्स्ना मिश्रा
