परिंदा
परिंदा तो उड़ चुका है खुले आसमान में
दूरी नहीं सवाल रही अब उसकी उड़ान में
लोग हैं कि खोजते हैं दुनिया जहान को
मैं ढूँढता फिरूँ हूँ खुद को जहान में
लगता है वो उर्दू में कुछ बोल रहा है
मिसरी सी घुल गई है उसकी ज़ुबान में
ये कौन जगा रहता हर पल हरेक क्षण
इस हाड़ मांस के मेरे आरजी मकान में
अशआर ही अशआर हैं बिखरे इधर हुए
स्वागत है आप का मेरे अदबी मकान में
जिसकी फसल भरें है पूरे वतन का पेट
मुझ को खुदा दिखे है ऐसे किसान में
देखो उसे दबा के या फिर कुचल के देखो
रहेगा हर्फ़-ए-जुनूं उसकी ज़ुबान में
भूखा है जिसका पेट और नंगा सा है बदन
एक उम्र कट चुकी है उसकी थकान में
तुम्हारे शहर में
तुम्हारे शहर में ऐ दोस्त जीने में मजा नहीं मिलता
कभी मंजिल नहीं मिलती कभी रास्ता नहीं मिलता
ऐस क्या घटा है इस अज़ीम-ओ-शान बस्ती में
अजब सन्नाटा इधर पसरा कोई हँसता नहीं मिलता
अगर तुम प्यार से कुछ क्षण हमीं से बात कर लेते
तो इतना तय था कि ये रिश्ता उलझा नहीं मिलता
क़वायद चल रहीं ऐसी कि बच्चे बन जाएँगे मशीन
अग़र इंसा बनाना था तो उन्हें बस्ता नहीं मिलता
समर्पित हो चुका यह दौर बस जुगाड़बाज़ी को
कोई बन्दा सलीके से काम को करता नहीं मिलता
खुदा का नाम ले ले के मुझे क्यों तुम डराते हो
मेरा भी राबिता उससे ही है तुम्हें इतना नहीं दिखता
एक उम्र कट चुकी है उसकी थकान में
…मर्मस्पर्शी रचनाएंँ प्रदीप जी की।
धन्यवाद अनिता जी।
शानदार गजलें भाई साहब । बहुत बहुत बधाई ।
डॉ मनोज रस्तोगी
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