संपादकीय - पूरे विश्व में आपदा को अवसर बनाया जा रहा है 3

हर देश की सरकार भी इस बहती गंगा में हाथ धो रही है। मेरी बेटी आर्या को भारत से लंदन की यात्रा करनी थी। उसे ₹800/- प्रति वैक्सीन भारत में अदा करने पड़े। बिना दो वैक्सीन लगवाए वह यात्रा नहीं कर सकती थी। यात्रा से 48 घंटे पहले उसे आरटी.पी.सी.आर. टेस्ट करवाना था। घर से सैंपल ले जाकर टेस्ट करने के लगे ₹700/- मगर उसे मुंबई से ही लंदन पहुंचने के 48 घंटे के भीतर एक टेस्ट लंदन में  बुक करवाना भी ज़रूरी था। उसके लगे £69/- यानी कि ₹6,900/- उसके बाद उसे लंदन से फ़्लाइट पकड़ने के लिये 72 घंटे पहले फिर से कोविद टेस्ट करवाने के लिये ₹6,900/- देने पड़े। फिर यहां लंदन में ऑनलाइन एअर सुविधा का फ़ार्म भी भरना पड़ा जिसके तहत उसे मुंबई एअरपोर्ट पर पहुंचते ही कोरोना का आरटी. पीसीआर टेस्ट करवाने के चार हज़ार रुपये भरने होंगे। उसके बात सात दिन घर पर क्वारन्टीन और आठवें दिन फिर ₹700/- का आरटी. पीसीआर टेस्ट। यानी कि कुल मिला कर ₹17,000/- केवल टेस्टों में ही ख़र्च हो गये। यानी कि आजकल हवाई यात्रा का अर्थ है अपने आप को लुटवाना !

1959 में हृषिकेश मुखर्जी की एक फ़िल्म आई थी ‘अनाड़ी’ जिसमें राज कपूर, नूतन, मोतीलाल, शोभा खोटे और नाना पलसीकर ने अभिनय किया था। गीत शैलेंद्र और हसरत के थे और संगीत दिया था शंकर जयकिशन ने। यह फ़िल्म हृषि दा की दूसरी ही फ़िल्म थी और शानदार रूप से सफल रही। इसे पाँच फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिले थे और राष्ट्रपति का रजत पदक भी।
फ़िल्म के दो गीत तो आज भी युवा पीढ़ी की ज़बान पे सुनाई दे जाते हैं – सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी / सच है दुनिया वालो के हम हैं अनाड़ी और किसी कि मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार… पहले गीत के लिये शैलेंद्र को फ़िल्मफ़ेयर सम्मान भी मिला था।
फ़िल्म की कहानी हमारे आज के कोरोना काल की कथा कहती सुनाई देती है। सिंगापुर से मद्रास (आज का चेन्नई) तक फ़्लू नामक बीमारी पहुंच चुकी है – जैसे कि आज चीन से कोरोना पूरे विश्व में पहुंच चुका है।
सेठ रामनाथ सोहनलाल (मोती लाल)  औषधियों के निर्माता हैं। उनके पार्टनर का किरदार निभाया है पुराने कलाकार नाना पलसीकर ने। नाना इस फ़िल्म में एक पुजारी भी हैं जिनमें स्थितियों का लाभ उठाने की प्रवृत्ति कूट-कूट कर भरी है। उन दिनों फ़्लू एक आपदा से कम नहीं था। शहर में कुछ लोगों को फ़्लू हो जाता है। और नाना पलसीकर चाहते हैं कि फ़्लू की दवाई का निर्माण ज़ोर शोर से बढ़ा दिया जाए। संवादों के ज़रिये अपनी बात को हृषि दा बहुत बढ़िया ढंग से दर्शकों के सामने रखते हैं।
नाना :  सेठ जी, फ़्लू मद्रास पहुंच गया।
सेठ जी :  मगर मद्रास तो अभी दूर है।
नाना :  मगर भगवान तो दूर नहीं हैं, उन्होंने फ़्लू सिंगापुर से मद्रास भेज दिया। वहां से बंबई आने में क्या देर लगती है?
सेठ जी :  कितने आदमियों को हुआ है… पचास… हिन्दुस्तान में तो पैंतीस करोड़ आदमी बसते हैं।
नाना :  आप यह क्यों नहीं सोचते कि यह बीमारी पाँच से पचास, पचास से पचास सौ, पचास हज़ार, पचास लाख, पचास करोड़… नहीं नहीं भगवान मैं लालची नहीं हूं… मैं तेरे दरवाज़े का भिखारी हूं भगवान।
(इतने में ब्रह्म भारद्वाज की एन्ट्री होती है)
सेठ जी :   सुनो वो फ़्लू की दवाई जो है वो हमें बहुत ज़्यादा मिक़दार (मात्रा) में बनवानी है।
ब्रह्म भारद्वाज :   जी, तब तो फ़ैक्टरी तीनों शिफ़्ट चलानी पड़ेगी।
सेठ जी :  तो चलाइये।
ब्रह्म भारद्वाज :  लेकिन, अगर फ़्लू की बीमारी इतनी ज़्यादा न फैली तो?
नाना :  लो! एक और नास्तिक आ गया। अरे भाई तुम अपना काम करने के बजाय भगवान के काम में क्यों दखल देते हो?… तुम्हारा काम है दवाई बनाना… बनाओ।
इस बातचीत के दौरान सेठ रामनाथ सोहनलाल भारत की जनसंख्या भी बताते चलते हैं – पैंतीस करोड़। यानी कि 1959 से 2021 तक भारत ने अपनी आबादी में एक अरब लोगों की वृद्धि की है। आज के कोरोना काल में जिस तरह पूंजीपतियों ने भारत, ब्रिटेन, युरोप, कनाडा और अमरीका ने वैश्विक महामारी से आर्थिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति दिखाई है उस में सेठ रामनाथ सोहनलाल उनके सच्चे पूर्वज लगते हैं।
कोविद-19 की दूसरी लहर के दौरान भारत में जिस प्रकार दवाओं की काला-बाज़ारी हुई; ऑक्सीजन की मारा-मारी हुई; और हस्पताल में बिस्तर मिलने पर बेईमानियां हुईं… उनका ज़िक्र 1959 में अनाड़ी फ़िल्म ने पहले से ही कर दिया था।
फ़िलहाल दिल्ली सरकार ने क्रिसमिस और नये साल के समारोहों पर बैन लगा दिया है। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक आयोजनों में भीड़ के जमा होने पर भी बैन लगा दिया गया है। एक महीने से कम समय में  ओमीक्रॉन वायरस ने पूरे विश्व में भय की लहर दौड़ा दी है। सौ से अधिक देशों में एक लाख से अधिक लोग इस नये वायरस से पीड़ित बताए जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का दावा है कि यह विश्वमारी 2022 में समाप्त हो जाएगी। मगर वैक्सीन बनाने वाली बड़ी कंपनियां ऐसा होने नहीं देंगी। वुहान से शुरू हुआ यह वायरस उन कंपनियों के लिये सोना देने वाली मुर्गी है… एक ऐसा मौक़ा जिसमें वे धड़ल्ले से पैसे बना सकती हैं। अमरीका के डेमोक्रैटिक पार्टी के बर्नी सांडर्स ने इसे अश्लील बताया है। उनका कहना है कि इन कंपनियों को अपने लालच पर लगाम लगानी चाहिये।
इधर ओमीक्रॉन वेरिएंट के चलते वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां अरबों डॉलर बना रही हैं। कहा जा रहा है कि फ़ाइज़र, माडर्ना, के केवल 8 निवेश धारकों ने इस नये वायरस से दस अरब डॉलर का फ़ायदा कमाया है। यह तय हो चुका है कि नये ख़तरनाक वायरसों से बचने के लिये बूस्टर डोज़ आवश्यक है। इसलिये अब बड़ी कंपनियां बूस्टर बना-बना कर लाभ कमाने की फ़िराक में हैं।
फ़ाइज़र की योजना है कि एक बूस्टर डोज़ को $175/- में बेचा जाए। याद रहे कि 8 वर्ष पहले माडर्ना कंपनी घाटे में चल रही थी और कोरोना कहर के चलते अचानक ही अरबों डॉलर फ़ायदे में चली गयी है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि डॉक्टर, नर्सें व लोग चाह रहे होंगे कि यह विश्वमारी समाप्त हो जाए। मगर वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों के पूर्वज सेठ रामनाथ सोहनलाल और नाना पलसीकर इसे होने नहीं देंगे !
एक चौंकाने वाले खुलासे में अमेरिकी सीक्रेट सर्विस ने कथित तौर पर कहा है कि अमेरिका में कोरोना वायरस राहत कार्यक्रमों से कम से कम 100 अरब डॉलर की चोरी हुई है। अमेरिकी श्रम विभाग ने खुलासा किया कि बेरोजगारी भत्ते में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी हुई है । एजेंसी कथित तौर पर बेरोजगारी भत्ता में $1.20 अरब और ऋण धोखाधड़ी  मामले में में $2.30 अरब की तहकीकात कर रही है। महामारी के दौरान किए गए धोखाधड़ी से जुड़े 900 से अधिक मामलों की जांच भी की जा रही है। यानी कि सरकारी-ग़ैरसरकारी स्तर पर कोरोना का जश्न मनाया जा रहा है।
हर देश की सरकार भी इस बहती गंगा में हाथ धो रही है। मेरी बेटी आर्या को भारत से लंदन की यात्रा करनी थी। उसे ₹800/- प्रति वैक्सीन भारत में अदा करने पड़े। बिना दो वैक्सीन लगवाए वह यात्रा नहीं कर सकती थी। यात्रा से 48 घंटे पहले उसे आरटी.पी.सी.आर. टेस्ट करवाना था। घर से सैंपल ले जाकर टेस्ट करने के लगे ₹700/- मगर उसे मुंबई से ही लंदन पहुंचने के 48 घंटे के भीतर लंदन में एक टेस्ट बुक करवाना भी ज़रूरी था। उसके लगे £69/- यानी कि ₹6,900/- उसके बाद उसे लंदन से फ़्लाइट पकड़ने के लिये 72 घंटे पहले फिर से कोविद टेस्ट करवाने के लिये ₹6,900/- देने पड़े। मगर यहां लंदन में भी ऑनलाइन एअर सुविधा का फ़ार्म भरना पड़ा जिसके तहत उसे मुंबई एअरपोर्ट पर पहुंचते ही कोरोना का आरटी. पीसीआर टेस्ट करवाने के चार हज़ार रुपये भरने होंगे। उसके बाद सात दिन घर पर क्वारन्टीन और आठवें दिन फिर ₹700/- का आरटी. पीसीआर टेस्ट। यानी कि कुल मिला कर ₹17,000/- केवल टेस्टों में ही ख़र्च हो गये। यानी कि आजकल हवाई यात्रा का अर्थ है अपने आप को लुटवाना !
याद रहे कि यह सारा ख़र्चा केवल एक यात्री करता है। विश्व भर में कितनी उड़ानें होंगी और कितने यात्री और कितने करोड़ों… अरबों का खेल है सब। और उस पर मेरी बेटी का अनुभव यह रहा कि तमाम डाक्युमेंट जिनकी तैयारी में हम दोनों ने करीब तीन घंटे लगा दिये न तो उन्हें लंदन एअरपोर्ट पर देखा गया और न ही मुंबई एअरपोर्ट पर। सारी कवायद धरी की धरी ही रह गयी।
समस्या अपना विकराल मुंह बाये खड़ी है… वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां, उनमें पैसा लगाने वाले निवेशक, हस्पताल, दलाल, केमिस्ट… सभी आपदा का लाभ उठाने में लगे हैं… लालच की तो कोई सीमा नहीं रह गयी है।
हमारे व्हट्सएप मित्र ओम प्रकाश ने अपने एक व्यंग्य में लिखा है जिस में दो ग़रीब बात कर रहे हैं…, “कोरोना का दूसरा भाई ओमिक्रॉन आ रहा है… फिर तो ठीक है… क्या ठीक है ?… यही कि गेहूं, दाल, चावल मुफ्त में फिर से मिलेगा… गेहूं, दाल, चावल वितरण का जो सिलसिला चला है वो तब तक चलेगा जब तक नये-नये किस्म के कोरोना आते रहेंगे… गरीबों के लिए तो अच्छी बात है… कम से कम कोरोना की वजह से दो वक्त की रोटी तो मिल रही है… कोरोना को यूं ही आते रहना चाहिए…”
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

21 टिप्पणी

  1. बिडंबना है कि कोई कुछ कर नहीं सकता। इसे सहज और सस्ता होना चाहिए लेकिन होगा ऐसा भी नहीं दिखता क्योंकि सब जीवन की कीमत वसूल रहे हैं

  2. You have pointed out a topical and significant aspect of the pandemic where a section of people is exploiting the need for medicines and making hay.
    It is ironical that the film Anari made years ago could deal with such a grim exploitation.
    It is indeed regrettable that each travel to another country requires such a huge exenditure on tests alone.
    Your Editorial compels us to assess the misuse of the pandemic situation by various governments and pharmaceutical companies.
    One is tempted to thank you for this thought provoking discourse
    Deepak Sharma

  3. नमस्कार तेजेंद्र जी । बिलकुल सही कहा । गए दो सालों में वह सब देखा जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी । आँखों के सामने जान की क़ीमत लगाई जा रही थी । जिसकी जितनी अधिक बोली वह बचा । सिलेंडर रेमडेसवर क्या क्या?
    ‘कलियुगे…प्रथम पादै ‘ लेकिन क्या कुछ न देखा । अब और क्या बाकी है? शायद हमारी पीढ़ी तो निकल जाए । अमानवीय । दुखद ।

  4. बहुत ही प्रासंगिक मुद्दे को ,संपादकीय मे उठाया गया है।सभी लोग कोरोना के कारण उपजी इस व्यवस्था से दो चार हो रहे हैं। इस अंतराल में जीवन के हर क्षेत्र में आपदा में अवसर ढूंढने के नए तरीके ईजाद किये गए हैं जिनसे कुछ लोग मालामाल हो रहे हैं। वे सभी/अधिकांश कारण जिनसे मनुष्य सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति होने का दावा करता आ रहा हैं वे अब बमुश्किल दिखाई पड़ते हैं।। यूरोपीय देशों में भी बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार किया जा रहा है और अवसर का गलत ढंग से लाभ उठाया जा रहा है…….

  5. सामयिक विषय पर प्रासंगिक है आज की सम्पादकीय ।
    आपदा को अवसर में समाज का हर तबका बदल रहा है सिर्फ सरकारें ही नहीं । अवसरवादी पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में किये हुए हैं ।अवसाद में वेदना और व्यंग का सृजन हो सकता है पर समस्या का हल किसी के पास उपलब्ध नहीं है।
    Dr Prabha mishra

  6. अत्युत्तम सम्पादकीय। जिस चुभन और परेशानियों का आज सब सामना कर रहे हैं, उनका आपने बखूबी इस में ज़िक्र किया है। आपदा ने जहाँ लालच के घिनौने रूप को दिखाया है वहीँ राजनीतिक प्रतिशोध भी खूब खुलकर सामने आया है। यह कहना कि अमुक देश द्वारा बनाए गए टीके को हम मान्यता नहीं देते, भले ही वह टीका कितना प्रभावी रहा हो। यह सब देख कर लगता है कि लोग जैसे ऐसी आपदाओं के इंतज़ार में बैठे रहते हैं।

    • अति महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय पर संपादकीय समकालीन यथार्थ स्थिति पर आधारित है। जीवन रक्षक वैक्सीन व्यापार का जरिया बन गई है अत्यंत खेद जनक शर्मनाक स्थिति है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। क्षमा पाण्डेय

  7. आपने सही जगह अंगुली रखी है। आम आदमी भयभीत होने का कारण इन अवसरवादी तत्वों के आगे लाचार महसूस कर रहा है।

  8. संपादकीय के माध्यम से बहुत बड़ी समस्या का आपने उल्लेख किया है हर भारतवासी इस समस्या से जूझ रहा है परंतु कोई कुछ नहीं कर पा रहा मजबूर है सब क्योंकि हालात ही ऐसे बन चुके हैं आपने संपादकीय के माध्यम से आपबीती को व्यक्त किया है तथा सबसे अच्छी बात है सिनेमा से जुड़ी बात को भी उजागर किया है जिससे संपादकीय अति रोचक हो गई है। आपको अभिनंदन है।

  9. आदरणीय तेज भाई,
    अति संवेदनशील सुन्दर विषय चुना इस बार, पूरे विशव में आपदा को अवसर बनाया जा रहा है !
    हमारी फिल्मों की दूरदर्शिता दार्शनिक रूप से बहुत आगे है । फ़िल्म “जागते रहो” में राजकपूर जी ने सारे कारनामे एक रात की कहानी में बता दिए। अन्त में सन्देश दिया जागो मोहन प्यारे जागो ! अब मोहन प्यारे अब तक सो रहे हैं या दूसरे गीत ज़िन्दगी ख़्वाब है, ख़्वाब में ज़िन्दगी …. की तर्ज़ पर जिये जा रहे हैं।
    बचपन से सुनते आरहे हैं टीका करण(vaccination) गम्भीर बीमारियो/महामारी से बचने का एक उपाय
    चेचक का टीका लगवाने के बाद चेचक नहीं होती
    पोलियो का टीका लेने के बाद पोलियो नहीं होता
    इसी तरह कॉलेरा, BCG, MMR आदि का टीका होता है।
    लेकिंन ये नई कोविद19 ऐसी बीमारी है जिसकी दवा आज तक नहीं बनी परन्तु 98% रिकवरी हो रही है। ठीके के दो डोज़ लेने के बाद भी ये बीमारी हो रही है। अब तीसरे डोज़ बूस्टर के नाम से चलेगा। जैसे अजकल फ़िल्म के सेकवेन्स बनते हैं। ये बीमारी इतनी smart है कि हर वर्ष किसी उत्पाद के नए मॉडल की तरह एक नए वैरिएंट के रूप में आजाती है! मानो कोई अभिनेता फ़िल्म शूटिंग में कपड़े बदल कर आता है या कोई नेता अलग अलग शिलान्यास अथवा लोकार्पण या अगली जनसभा में नए रूप में सज संवर जाते हैं । आज पूरे सँसार में लोग आपदा में जी रहे हैं। इस आपदा के गले मे घण्टी कौन बान्धे !
    अब भला सच है क्या ! चीन का वुहान प्रान्त जहाँ से इस आपदा का जन्म हुआ और ये विस्व भ्रमण पर निकल पड़ी , वहाँ सब कुशल मंगल है और सब सुख चैन से हैं। जैसे शादी के बाद वधु पक्ष वाले निशचिंत होते हैं कि एक ज़िम्मेदारी पूरी हुई और वर पक्ष वाले नाचते हुए पति और ससुराल में बवाल की आपदा आ जाती है। जिस तरह आज तक विवाह के सुख दुःख का प्राम्भिक सिरा और अन्त छोर नहीं ढूँढ पाए बस वैसे ही आपदा से निजात नहीं मिली तो अवसर की उतपत्ति का ज्ञानार्जन हो गया !
    इस प्रकार जीवन मे अनेक कहानियाँ और उदाहरण हैं जिनसे आपदा में सुखी समृद्ध जीवन की प्रेरणा मिलती है। कुछ पुराने लोग इसे भ्रष्ट प्रवृत्ति कहते हैं पर आज की पीढ़ी इसे विकास के साथ अच्छे दिन की प्राप्ति का असीम आनन्द की अनुभूति मानते हैं। इस अनुभूति को ही अवसर मान कर प्रगति पथ पर अग्रसर हैं। मानलो हम दोनों आमने सामने रेतीले बीच पर खड़े हों, मैं दोनों के बीच रेत पर 6 लिख दूँ तो आप उसे 9 पढेंगे … !

  10. एक मज़े की बात बताता हूँ पिछ्ले महीने जब मैं भारत से लौट रहा था उन्हीं दिनों ओमिक्रोन का अवतरण हुआ था। पर नये नियम लागू नहीं हुये थे। यात्रा के 48 घंटे पहले passenger locator form में day 2 lateral flow test का reference भरना था। लंदन पहुँच कर दुसरे दिन टेस्ट के लिए जाना था पर व्यस्तता के कारण मैं भूल गया। तीसरे दिन सुबह जब टेस्ट के लिए पहुँचा तो मुझे बताया गया कि नियम बदल चुका है।कहा गया- ‘अब आपको आर टी पी सी आर कराना होगा और जो टेस्ट आपने मिस किया उसका refund भी नहीं होगा।’ थोड़ी देर बहस करने के बाद मैनें अगले दिन के लिये RTPCR test बुक कर लिया।
    अब घर आया तो ख्याल आया कि passenger locator form में भी तो test reference बदलना होगा। फिर वापस गया और उसने पूछा कि test reference कैसे बदलेगा।
    उनका जबाब था-‘ Don’t worry no one checks that!’.
    मतलब अगर मैं test न भी कराता तो कोई पूछने वाला नहीं था।

  11. सामयिक विषय को संपादकीय में रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। “सबहि नाचावत राम गोसांई “, तो जो कुछ है जैसा है, झेलना तो पड़ेगा. सिलसिला पुराना है, ये “फिल्म अनाड़ी” के प्रसंग से जाना जा सकता है. सामन्य जनता हमेशा से शक्तिशाली अर्थतंत्र और सरकारों के लिए, गिनी पिग ही रही है और रहेगी। पहले साधन नहीं थे, जानकारी नहीं मिलती थी तो असंतोष कम था, आज सब जान कर हम क्रुद्ध और असंतुष्ट हो रहे हैं, पर झेलने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकते…. तो रहिमन चुप ह्वै बैठिए….

  12. कोरोना का जश्न जब 17,000/- में पड़ रहा है, तो इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है। ग़रीबों को रोटी मिलती रहे, इसलिए कोरोना को आते रहना चाहिए, ये मानव सभ्यता का कैसा मख़ौल है।
    सन् 1959 की फ़िल्म “अनाड़ी” का आपने बहुत सटीक उदाहरण खोज निकाला है। त्रासदी की सामयिक पड़ताल करने वाला आपका यह सम्पादकीय मानवता की तथाकथित उन्नति को आईना दिखा रहा है।
    हार्दिक साधुवाद।

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