कलमकांड – लघुकथा

  • शील निगम

तीनों कलमें हैरान थीं। उनकी लिखी पुस्तकों का लोकार्पण होना था। पर यह क्या? मंच पर उन किताबों की प्रतियों के ऊपर सजी-सजाई राजसी ठाठ बाट से युक्त एक कुर्सी पर खद्दरधारी व्यक्ति बैठा पान चबा रहा था। आमंत्रित अतिथि आ कर चापलूसी करके उसकी तारीफ़ों के पुल बाँध रहे थे।

तीनों कलमों की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। आस-पास अपने स्वामी लेखकों को देखने की कोशिश की। कोई नज़र नहीं आया।

आख़िर नीली कलम गुस्से से बोल पड़ी, “कौन हैं आप? जो हमारी मेहनत को अपने कदमों तले कुचल कर वाहवाही लूट रहे हैं?”

हरी कलम भी चुप न रह सकी, “कहाँ हैं हमारे मालिक? जिन्होंने हमें कोरे पन्नों पर घिस-घिस कर अपना ज्ञान इन पुस्तकों पर उकेरा है?”

खद्दरधारी व्यक्ति ने पीकदान में पिच्च से पान का शोरबा थूका और बोला, ” कौन से मालिक? इन पुस्तकों के सर्वाधिकार मेरे पास सुरक्षित हैं। मैं हूँ इन पुस्तकों का लेखक।”

छुटकी कलम ने साहस दिखाया, “हम तीनों कलमें गवाह हैं कि ये पुस्तकें आपने नहीं लिखीं। हमें मालूम है कि इन पुस्तकों के असली लेखक कौन हैं?” खद्दरधारी महाशय ने फिर से पीक थूकी और कहा, “वे ‘अन्यार्थ’ लेखक हैं। मैंने खरीद लिया है उनको मोटी रकम देकर। अब जाओ यहाँ से। लोकार्पण का समय हो रहा है।”

‘अन्यार्थ लेखक’, यह नाम छुटकी कलम ने पहली बार सुना था। प्रश्नसूचक नज़रों से नीली कलम की ओर देखा।

नीली कलम ने छुटकी कलम के कान में फुसफुसाया, “अंग्रेजी नहीं जानती क्या? मैंने कहीं पढ़ा था। इसका मतलब है ‘घोस्ट राइटर’।”

“तो क्या हमारे मालिक भूत हो गये हैं?”छुटकी कलम ने घबराकर पूछा।

उनकी खुसर-पुसर खद्दरधारी व्यक्ति को समझ में आ रही थी।धीरे से बोला, “हाँ भूत ही समझो क्योंकि वर्तमान तो अब मैं हूँ।” तीनों कलमों की आँखों के आँसुओं का रंग अब सुर्ख़ हो चुका था। शील निगम मौलिक

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