‘फेसबुक के ढेलमरवा गोसाईं’

  • दिलीप कुमार सिंह

‘‘वो फेसबुक के कंठीधारी हैं, वहीं पर जीना वहीं पर मरना फेसबुक के सिवा उनको जाना कहाँ। वो फेसबुक के ढेलमरवा गोसाईं हैं। ये ढेला (मिट्टी ईंट या पत्थर का टुकड़ा) मारने की कला भी विविध है। वो खुद को मशहूर करने के लिये दूसरों को ढेला मारते हैं और खुद को बदनाम करने के लिये भी दूसरों से ढेला मरवाते हैं। वो हमले करते भी हैं और हमले सहते भी हैं। इनके आलराउंडर गुणों को देखकर अक्सर लोग चकित रहते हैं कि ये महान आत्मा कहाँ से अवतरित हुयी।

तो किस्सा गालिबन यूं है कि अवध क्षेत्र के सुदूर सोहेलवा जंगल के किनारे नेपाल बार्डर से सटी बूंदी नाम की एक छोटी सी रियासत थी। वहाँ के राजा अपने पुरखों की बरखी में भरपेट बूंदी के लड्डू खिलाने के लिये मशहूर थे। महाभोज खाने वाले दो टोले थे रियासत से सटे एक गाँव में। एक साल एक टोले के लोगों को बुलाया जाता बूंदी लड्डू के भोज पर और अगले साल दूसरे टोले के लोगों को बुलाया जाता बारी-बारी से।

पता नहीं बूंदी रियासत की क्या परम्परा थी या बूंदी के लड्डुओं का पुण्य-प्रताप था कि एक ही टोला एक बार में बुलाया जाता। जब एक टोला भोज हेतु बुलाया जाता तब दूसरा टोला जल-भुन जाता और अपने आमंत्रित शुभचिंतको से भोज के बाद लौट रहे दूसरे पक्ष पर ढेला मरवाता। यही बर्ताव अगले वर्ष दूसरा पक्ष पहले पक्ष के साथ करता आमंत्रित शुभचिंतकों के जरिये। कालान्तर में ये दोनों तरफ के आमंत्रित शुभचिंतक ढेलमरवा गोसाईं कहलाये। ढेला मारना भी एक कला है। ये प्रतिरोध की निशानी है, सपोर्ट का संबल है। ढेला प्रेमियों के लिये आहट है, इशारा है। पहचाने जाने के खतरे से बचने का कारगर उपाय है ढेला।

ढेला एक ऐसा हथियार है जो कानून की किसी किताब में हिंसक अस्त्र-शस्त्र की कोटि में नहीं आता। ढेला बयान है अपने आने से पहले आने का, ढेला वफा का सुबूत है साथ निभाने का। ढेला लग जाये तो निशानची बनाता है, ढेला न लगे तो अंधे के हाथ बटेर लगने वाला किया गया असफल प्रयास कहलाता है। फिलहाल अवध के ये मशहूर ढेलमरवा गोसाईं और ढेलाविद दिल्ली में पाये जाते हैं और उन जैसे बहुतायत पाये जाते हैं।

आजकल ये ढेलाविद जान ही नहीं पाते कि उनको हमला करना है कि उन पर हमला होना है और उस पर तुर्रा ये हैं कि ये ढेलमरवा गोसाईं साहित्यकार भी हैं। ये ढेलाविद ‘‘बदनाम होंगे तो नाम न होगा’’ की तर्ज पर काम करता है। बेचारे लिखकर जितने मशहूर नहीं हो पाये, उससे ज्यादा बडे़ तो वे साहित्यकारों पर उंगली उठाकर हो गये और लाइमलाइट में आ गये। खुद के बारे में एक शेर ये बडे़ चाव से सुनाते हैं।

‘‘कितनी आसानी से मशहूर किया है खुद को

मैंने अपने से बडे़ शख्स को गाली देकर’’

ये राजधानी का दस्तूर है कि ये ढेलमरवों को बहुत महत्व देती है। जैसे ही इस गोसाईं ने ढेला मारा तुरत-फुरत वो स्टार बन गया भले ही उस ढेले से किसी निर्दोष का सर फूट जाये, तो उससे मिलकर बंदा उसे कैफी आजमी साहब का शेर सुनाता है तोड़-मरोड़ कर कि

‘‘है खता सर की तेरे जो जख्म तेरे सर में आये’’

फेसबुक के इस ढेलमरवा गोसाईं की माया अपरम्पार है। ये खुद को अवध का ब्राह्मण बताते हैं, बात सिर्फ इतनी है कि इनका घर गांव के बाभनटोली में था तो ये बाभन बने घूम रहे हैं दिल्ली में। गोसाईं जी की वास्तविक जाति पता नहीं क्या है? मगर शक्तिसंतुलन एवं ताकतवर बने रहने के लिये ब्राहणों के समूह में घुसे भी रहना है, और दिल्ली में महत्वपूर्ण बनने के लिये प्रगतिशील भी दिखना है। गोसाईं जी की प्रगतिशीलता का ये आलम है कि जब तब मांसाहार करते हुये अपनी फोटो फेसबुक पर डालते रहते हैं। दिल्ली के बाहर हर फार्महाउस पर हुई दावत को गोसाईं जी साहित्यिक गोष्ठी की तरह कवर करते हैं। दावत की डकार खत्म होते ही दावत देने वाले पर भद पिटा हुआ पर लेख लिखकर अपनी साहित्यिक शुचिता भी साबित कर देते हैं।

दावत देने वाला बन्दा उनके साहित्यिक ढेले की मार से तिलमिला कर रह जाता है। मगर क्या करे वो बंदा गोसाईं जी से बैर भी तो नहीं ले सकता, क्योंकि गोसाईं जी उस रंग-ओ-नूर वाली पार्टी की कौन सी बात सार्वजनिक कर दें क्या पता? कि वहाँ कौन सी बड़ी बिंदी वाली महिला किसके साथ आई थी। किसने कौन से ब्रांड की शराब पी थी कौन नशे में मुर्गी की तरह उछल-कूद कर था और कौन पिनक में बतख़ की भांति चल रहा था।

शाकाहार पर किताब लिखने वाली मैडम ने कितने लेग-पीस खाये थे गोसाईं जी गिनकर रखते हैं ऐसे ही नहीं बने हैं वो फेसबुक के ढेलमरवा गोसाईं। गोसाईं जी एक कोचिंग में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं बहुत उम्दा प्रोफेशनलिज्म है उनका। जैसे बाजार नियामक सेबी के निर्देश पर हर कम्पनी को अपने लाभ-हानि का हिसाब त्रैमासिक देना होता है वैसे ही गोसाईं जी हर तिमाही पर अपने पाप-पुण्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर देते हैं फेसबुक पर। गजब का संतुलन है उनका। वो दो महीने उन्तीस दिन फेसबुक पर छल प्रपंचों के ढेले मार-मारकर लोगों को लहूलुहान करते हैं, लोगों की बखिया उधेड़ते हैं, अंतरंग बाते सार्वजनिक करते हैं और आखिरी के एक दिन पैतंरा बदलकर सभी से सार्वजनिक माफी भी मांग लेते हैं। लीजिये हिसाब-किताब बराबर, गोया वही बात हुई।

रात को पी ली, सुबह तौबा कर ली

रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गयी।

गोसाईं जी ऐसे किसी व्यक्ति की आलोचना फेसबुक पर नहीं करते जिसका उनके घर या उनके रोजगार की जगह आमदरफ्त हो क्योंकि कभी-कभार ब्लंडर का खतरा हो जाता है। किस्सा गालिबन यूं था कि एक बार गोसाईं जी किसी युवा कवयित्री को प्रमोट कर रहे थे सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। मगर अपने ढेला मारने की चुल्ल पर काबू नहीं रख सके और फेसबुक पर उस कवयित्री की कविताओं की छीछालेदर कर दी। लेखिका रो पड़ी, अनमनी हो गयी, कोपभवन ले लिया। तीन चार दिन तक उसने अपने ब्वायफें्रड का फोन नहीं उठाया। मैसेज पर अपने ब्वायफ्रेंड को सिर्फ इतना बताया कि उसके समस्त दुखों की वजह गोसाईं जी हैं। चोट खाये आशिक से महबूब की तड़प बर्दाश्त न हुई और बिना पूरा मामला जाने ही गोसाईं जी पर पिल पड़ा और ठोंक पीटकर उनके हाथ पैर सम कर दिये। कवयित्री को जब ये कांड पता चला तो उसने अपना सर धुन लिया उसने गोसाईं जी, ब्वायफ्रेंड और कविता तीनों को तिलांजलि दे दी। इस घटना के बाद से गोसाईं जी लेखिकाओं पर टीका-टिप्पणी नहीं करते कि कब किसी सिरफिरे आशिक से सामना हो जाये और लेने के देने पड़ जाये। गोसाईं जी कभी पुस्तक मेले में नहीं जाते हैं क्योंकि जिस-जिस के कहने पर जिन-जिन को गोसाईं जी ने फेसबुक पर साहित्यिक ढेला मारा है वो सब अगर आमने-सामने आ गये तो गोसाईं जी का क्या होगा? क्योंकि वो बहुत दुबले-पतले हैं लोग अक्सर कयास लगाते हैं कि गोसाईं जी डाइटिंग से दुबले हैं या फेसबुक पर निंदा रस लिखते-लिखते उनके शरीर का रस निकल गया है।

कवयित्री कांड की पिटाई के बाद गोसाईं जी बहुत आहत हुये थे कि इस घटना के बाद उन्होंने नारीशक्ति को पहचाना और हर महिला को जिज्जी कहना शुरू कर दिया था। जिज्जी कहने से सुरक्षा भी रहती है और विश्वबन्धुत्व टाइप के बडे़-बडे़ लक्ष्य भी भेद लिये जाते हैं। इनमें से कुछ जिज्जियां सप्ताहांत पर वास्तविक ढेलामार प्रतियोगितायें आयोजित कराती हैं जहाँ भाँति-भाँति के भोजन एवं तरह-तरह के सेल्फी हेतु पर्याप्त जगह होती है। ऐसे स्थलों पर निंदा रस को सुनने-गुनने एवं उसको प्रसारित करने के लिये पर्याप्त कान और जुबानें भी होती हैं। इन निंदा पुराणों की रिकार्डिंग से कई माह तक फेसबुक और तमाम बेबसाइटें गुलजार रहती हैं।

शिंखडी के शस्त्र उठाने पर जिस तरह भीष्म-पितामह पशोपेश में पड़ गये थे और अर्जुन ने उनकों तीरों से बेध डाला था उसी तरह गोसाईं जी भी जिज्जी सेवा की आड़ में किसी भी व्यक्ति पर जोरदार हमला कर देते हैं और सामने वाला बडे़ से बड़ा धुरंधर इन वालंटियर जिज्जियों पर हमला नहीं कर पाता लोकलाज के भय से। गोसाईं जी की वालंटियर जिज्जी सेना छापामार युद्ध की रणनीति अपनाती है अचानक हमला करके फरार। इनकी वालंटियर जिज्जी सेना का आतंक इतना है कि राजधानी के तमाम बडे़ लेखक सोशल मीडिया से अज्ञातवास पर चले गये हैं। पहले ये ढेलमरवा गोसाईं जी फेसबुक के चाकर कहे जाते थे अब इनको फेसबुक का मीडिया मुगल कहा जाता है। बदला लेना गोसाईं जी का प्रिय शगल है, इनके लेखन के शुरूआती दिनों में जिन संपादकों ने इनकी रचनायें नहीं छापी थीं अब ये उन संपादकों की रासलीलायें छपवा रहे हैं। अगर कोई प्रतिवाद करता है तो इनकी शिखंडी सेना की वीरांगनायें सामने आकर उस वरिष्ठ लेखक की ऐसी की तैसी कर देते हैं कि डर के मारे वो पीड़ित कोप भवन ले लेता है।

गोसाईं जी दुनिया भर के बारे में लिखते हैं मगर बहराइच जिले के बूंदी रियासत के बारे में नहीं लिखते जहाँ से वो आते हैं। उनके लिये मास्को में क्या हो रहा है ये महत्वपूर्ण है, लेनिनग्राद की पल-पल की खबर है उनको। लेकिन अपने गाँव-जवांर की खबर फेसबुक पर कभी नहीं लिखते। लोग दबी जुबान में बताते हैं कि एक बार अपने गांव के दूसरे टोले की खबर इन्होंने फेसबुक पर लिख दी थी जिसमें किसी लड़की के भाग जाने का जिक्र करते हुये उपहास उड़ाया गया था। कुछ समय बाद गोसाईं जी जब नवा करने गांव गये और रात को जब पान-खाकर दुआ-बंदगी करने निकले तो फिर खून-खच्चर होकर लौटे।

गांव के लोग मानते हैं कि उसी भाग जाने वाली लड़की के परिवार वालों ने अंधेरे का फायदा उठाकर गोसाईं जी की अच्छी खांसी कुटम्मस कर दी। गोसाईं जी बेचारे बचपन से ढेला चलाने में सिहस्त थे सो लाठी का वार झेल न सके बस तभी से गांव-जवांर की राजनीति से तौबा कर ली। ऐसे लोकतांत्रिक ढेलमरवा गोसाईं पर ऐसा हिंसक हमला निश्चय ही अलोकतांत्रिक एवं अमानवीय था। गोसाईं जी अपने प्रिय नेता के नक्शे कदम पर चलते हैं वे सोमवार को फेसबुक पर विवादित पोस्ट डालते हैं, मंगलवार को उस पर चुप्पी साधे रहते हैं, बुधवार को उसका स्पष्टीकरण जारी करते हैं और फिर गुरूवार को खंडन जारी करते हुये सिरे से नकार जाते हैं कि उन्होंने ऐसी कोई पोस्ट डाली भी थी। इसीलिये वो फेसबुक पर लोगों के नूर-ए-नजर बने हुये हैं।

गोसाईं जी चुन-चुनकर ऐसे लोगों से दोस्ती करते हैं जहाँ से उन्हें कुछ आर्थिक लाभ मिलने की संभावना होती है। जहाँ से उन्हें धनार्जन की संभावना हो वहाँ से उन्हें कड़वी बातें और धिक्कार भी सुनना पडे़ तो वे बुरा नहीं मानते क्योंकि फेसबुक का ढेलमरवा गोसाईं बनाने की पहली शर्त यही है कि दुधारू गाय की दो लात भी भली’’। अघोषित रूप से वे फेसबुक पर ढेलमरवा गोसाईं बनने के तमाम गुर भी बताते हैं बशर्तें आप में उनके जैसे सारे मानवीय गुण हों, और अगर आप में ये गुण न हों उनके अगले ढेले का निशाना आप भी हो सकते हैं, सो बच के रहना ढेलमरवा गोसाईं से।

फ़ेसबुक के ढेलमरवा गोसाईं - व्यंग्य - दिलीप कुमार सिंह 3

दिलीप कुमार सिंह

ई-मेलः dk_writer@yahoo.co.in

 

 

 

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