बायोमेट्रिक के बहाने पांडेय जी

– लालित्य ललित

बायोमेट्रिक के बहाने पांडेय जी - (व्यंग्य - लालित्य ललित) 5जब से तकनीक आई है,जाहिर है कुछ काम हुए है।कुछ फायदा भी तो कुछ घाटे का सौदा भी हुआ है।कुछ के क्रेडिट कार्ड के क्लोन बन गए और उनकी संचित पूंजी कहाँ गई, तफ्तीश जारी है।कुछ के बैंक में खाते थे,उनका न कोई डेबिट कार्ड था,पता चला किसी दिन कि उनके खाते में अब कुछ बचा ही नहीं।
पांडेय जी के एक मित्र है।किसी कालेज में पढ़ाते है।उनका कहना है कि भाई साहब,मैंने तो कभी कार्ड ही नहीं बनवाया।कौन इनको सम्भाले और आजकल आप देख ही रहे है कि कार्ड किसी का और चोरी किसी की और पैसा गया।रोते-कलपते रहे,कहीं कोई सुनवाई नहीं।
हिंदुस्तान कहाँ जाएगा! कुछ पता नहीं।
अभी चिलमन ने बताया कि कावड़ियों ने एक लड़की की गाड़ी तहस-नहस कर दीं।बाद में पता चला कि उसकी गाड़ी से एक कावड़िये का जल गिर गया था,फिर आव देखा न ताव सभी भक्तों ने अपनी भक्ति का चरम प्रकट कर दिया और जता दिया कि वे शिव के कितने बड़े वाले उपासक है।लानत-मलानत का दौर शुरू हुआ।पुलिस के अपने बयान भी आये।निष्कर्ष;मामला रफा-दफा.मोब के चलते किसी की पहचान न हो सकी।फाइल क्लोज्ड।
इधर राधेलाल जी को जब यह पता चला कि कितना खतरनाक मामला था,यदि उस लड़की और लड़के को ये मार भी सकते थे,कुछ भी हो सकता था।और जे पुलिस ने क्या किया-कुछ भी नहीं।कितने वीडियोस है,कोई कार्रवाई नहीं।खबर न छापने की एवज में बताया किसी ने कि ऊपर से मनाही होती है कि शिव भक्तों के साथ नरमी से पेश आये,वरना माहौल खराब हो सकता है।अगर यह पंगा ज्यादा बढ़ जाता।तब क्या होता-चिलमन पूछ बैठा।
राधेलाल जी आज भरे पड़े थे, कहने लगे-होता क्या चिलमन,उस इलाके का थानेदार नप जाता और दो चार पुलिसकर्मी निलंबित हो जाते।मामला सेटल।
इतने में विलायती राम पांडेय आते दिखाई दिए।कहाँ रह गए थे,उस्ताद जी।आज तो राधेलाल जी आ गए तो सवालों की झड़ी इनसे ही लगा दी।क्या करते!
अरे! भाई,सब गड़बड़ मामला है यदि पेट गड़बड़ा जाए तो सारी मशीनरी हिल जाती है।सुबह सैर को गए थे,लगता था कि सब साफ हो गया,लौट कर आये कि फिर से प्रेशर बन गया ।आप तो समझ सकते है कि नेचर कॉल इसको ही कहते है।
राधेलाल ने कहा-पांडेय जी,एक उम्र के बाद तो लोग रात को एक गिलास गर्म दूध पी कर सोते है,जैसे मैं पीता हूँ,कुछ लोग इसबगोल,कायमचूर्ण या आजकल नया आया है,पेट सफा! वह भी लेने लगे है।अरे! क्या बात ले बैठे आज सुबह-सुबह।चिलमन देखो तो घड़ी ने कितने बजाए! उस्ताद जी सात बज गए। अच्छा,राधेलाल जी,मैं चला।समय हुआ।कल मिलेंगे।शनिवार भी है,कल आराम से बैठ सकते है।
दफ्तर पहुंचते ही पांडेय जी ने देखा कि कतार लगी है।जैसे लोग आते ही मदर डेयरी की दुकान में लग गए कि सिक्का डालेंगे और डिब्बे में दूध भर लेंगे।पर महाराज,ये सर्वर है,इसकी इच्छा है कि जब चले,तब चले।न भी चले तो क्या कर लीजिएगा!
लिहाजा पांडेय जी भी मुंह लटकाए निकल आये।
इतने में लल्लू जी दिखाई पड़ गए।दुआ सलाम के बाद कहने लगे कि यह सब चोंचले है।देखना कुछ दिनों में खराब हो जाएगी,मशीनें।हम तो पहले भी समय से आते थे,अब भी आते है।पर कुछ निकम्मे लोग है जो जब आना होता है,वे तभी आते है।पांडेय जी ने कहा।
जे तो है,लल्लू ने कहा और रजिस्टर पर सिग्नेचर किया और निकल गया।पांडेय जी ने दफ्तर की महिला से कहा-ये होना चाहिए कि बायोमेट्रिक में उंगली करते ही आपका बल्ड प्रेशर और शुगर की सब डिटेल तो आये,साथ ही घर पर मैसेज भी चला जाये कि जनाब या मोहतरमा दफ्तर पहुंच गए है।तो कितने सुखद ख्याल होंगे।ऐसा सोचना भी कितना फ्रुटफुल होता है।पर सरजी! आप भी न! क्या,क्या सोच लेते है।
पांडेय जी मुस्कराए।
अपनी सीट पर बैठे बैठे पांडेय जी का दिमाग चलने लगा कि लोग अपने दफ्तर को भी न घर समझे।
समझते नहीं।समझना चाहिए।जब सीट पर नहीं होते,उनकी लाइट्स ऑन रहती है।खर्चे यदि घर में करने पड़े तो नानी याद आ जाती है।फिर कहेंगे कि अरे! छोटू,ये लाइट बन्द करो।टीटू की मां ड्राइंग रूम का पंखा बत्ती चल रहे है।सब एक साथ एक कमरे में खाना खाया करो।डाइनिंग टेबल किस लिए ली है,कोई कपड़े प्रेस करने के लिए नहीं।कुछ दिन अमल में बातों को लाया जाता,फिर वही ढाक के तीन पात! कुछ नहीं होना न घर का न दफ्तर का और न सरकारी कर्मियों का!
पांडेय जी कई दिनों से महसूस कर रहे है कि सरकारी कर्मचारी आते ही घर फोन करेंगे-सुनो,पहुंच गया।हाँ, हाँ।मेट्रो टाइम पर थीं।ऑटो मिल गया था।
याद है,गैस बुक करवा दूंगा।बाय,लव यू। फिर बात करता हूँ।
अरे! पांडेय जी,उंगली की क्या!
क्या चौबे जी! आप भी शुरू हो गए अब!
अरे पांडेय जी,मशीन शुरू हुई,आधार वाली नहीं,पुराने वाली।जा कर लगा दो,उंगली।
वैसे अब यही सब रह गया है कि उंगली लगाओ और उंगली करो।
हा-हा-हा……
सर,कमरा साफ करना है,सफाई कर्मचारी ने कहा।भाई,पहले आया करो।देखो मशीन के चलते हम लोग कितने दूर से समय पर आते है।आगे से जल्दी आया करो,पांडेय जी ने हल्की डाँट पिलाते हुए कहा।
जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते है! पांडेय जी सोच रहे थे।आखिर दया के पात्र बन कर रहने में कितना सुख लोग एक दूसरे से रिसीव करते है सुना गया है बिना नेटवर्क के दौर में नेटवर्किंग बनाने का अपना सुख है।
वैसे भी किसी की लल्लो-चप्पो के बिना आपकी नैया पार हो ही नहीं सकती।यदि आपने सत्ता सुख उठाना है तो दरबारी बन कर रहने में असीम शांति का एहसास होता है।ऐसे कुछ लोग है जो सरकार किसी की भी हो वे हमेशा सत्ता में बने रहते है।यही सुख कुछ लोग साहित्य के गलियारे में भी उठाते देखे जा सकते है।
पांडेय जी सोचते है कि साधक और असाधक में कितना अंतर है! केवल उतना अंतर यदि आप चावड़ी बाजार वाली मेट्रो में चले जाएं,बिना प्रेस के कपड़े पहन कर जब बाहर निकलेंगे तो प्रेस सहित नजर आएंगे भीड़ ही इतनी है कि ऐसे पिचका देगी कि पता ही नहीं चलेगा कि टमाटर चालीस वाले लिए या दस वाले!
लल्लू ने बताया-मैं जब डेपुटेशन पर था,तो मेरे यहाँ भी बायोमेट्रिक मशीन का लगना था,काफी समय तक मेकेनिक नहीं आया फिर सर्वर का पंगा हुआ।इसी काम में महीनों लग गए।फिर मैंने कहा कि इस का हमारे यहां उपयोग नहीं हो सकता,इस क्षेत्र में मोबाइल का नेटवर्क बेहद गड़बड़ाता है।सो मेरे यहाँ लगा ही नहीं।कुछ महीनों के बाद हो सकता है कि नियम कायदे में कोई बदलाव आ जाएं।कभी यह सोच कर डर लगता है कि स्कूल यूनिफार्म की तरह हम लोगों की भी ड्रेस न हो जाएं।जैसे बच्चा लोग स्कूल जाता है।हम भी गले में पानी की बोतल,आई कार्ड और एक जैसी ड्रेस पहन कर जाना पड़े तो क्या कहिएगा!
चिलमन ने कहा कि उस्ताद जी यदि बायोमेट्रिक मशीन में आप उंगली लगाओ और मशीन उंगली पकड़ ले और तब छोड़े जब आपका रक्त जांच भी हो जाएं कि आपका कोलस्ट्रोल,ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है और आपके मोबाइल पर तत्काल नजदीकी डॉक्टर का पता और मुलाकात का समय भी कन्फर्म हो जाये और इसकी सूचना आपकी घरवाली या घरवाले को भी मिल जाये,तब असली विकास होगा।बात तो गहरी वाली की है बालक,चिलमन।जब से राधेलाल की क्लास में जाने लगा है तब से होशियार बन गया है।नहीं तो पहले कितना निकम्मा था जब लपकुराम के यहाँ ट्यूशन लगाई थीं।
उस्ताद जी,एक मन में बात आई,कह दूं! चिलमन ने कहा।हाँजी, कह दीजिये,वरना खाना कहाँ पचेगा!
चिलमन ने कहा कि जितने भी लवर गार्डन महानगरों में है वहां भी एंट्रेंस पर बायोमेट्रिक आधार कार्ड के जरिये हो जानी चाहिए और उसकी सूचना उनके पेरेंट्स के मोबाइल पर जानी चाहिए ताकि वे शाम को अपनी क्लास सम्पन्न कर जब लौटे तो माँ-बाप राशन पानी के साथ आपका स्वागत करते तैयार मिले।तब होगा असली विकास!
चिलमन,बातें तू आजकल बढ़िया वाली कर रहा है,जैसे हल्दीराम की काजू कतली टाइप।चिलमन शरमा गया,जैसे गुप्ता जी का बेटा बाय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड के प्रसंगों पर अक्सर शरमा जाता है।
कल तो चीकू ने कहा था कि पापा पंद्रह अगस्त आने वाला है।अच्छा! वोह तो हर साल आता है,इस बार नया क्या! पांडेय जी बोले।
कहने लगा,चीकू।पापा,मैं आपके साथ बाजार चलूंगा,खूब सारी पतंगे लाएंगे।फेर क्या होगा! पांडेय जी ने कहा।फेर क्या उसमें कन्ने बांधेंगे और आसमान में उड़ाएंगे।चीकू ने कहा।अच्छा! चीकू वैसे हर साल बारिश आती है,मौसम विभाग का कहना है।पापा,बेड़ा गर्क हो, मौसम विभाग का।यह दिन आजादी का होता है,लोग खुश रहते है बच्चे एन्जॉय करते है।वे चिल्लाते है,आई बो,वो काटा।
अच्छा,अच्छा भाई।चलेंगे।मार्किट,तुम चिंता न करो।पांडेय जी को अपना बचपन याद आ गया,कैसे वह पतंग उड़ाते थे,भागते थे,लूटने के लिए,कई बार चोट भी खाई थीं।मांजे से उंगली भी कटी थी।लेकिन वह उत्साह आज की पीढ़ी में नहीं के बराबर है।शहरी कालोनियों के बच्चे और पुरानी दिल्ली के बच्चों में जमीन आसमान का अंतर है आजकल वाट्सप,सोशल मीडिया ने इस शब्द का मानो अपहरण सा कर लिया है।एक घर में चार सदस्य हो, वे सन्नाटे में होंगे कहीं कोई सम्वाद नहीं।सब चुप। अपनी अंगलियों में लगे हुए रोबोट बने हुए।किसी को किसी से कोई मतलब नहीं।कितना बदल गया वक्त और वक्त के ताबेदार।
रामखेलावन ने कहा-पांडेय जी,क्या जमाना आ गया है कि आजकल कुछ साहित्यकार अपना बायो डेटा ही फेसबुक पर चिपकाने लगे है कि क्या पता कि इत्ता बड़ा परिचय देख कर कोई चेला चेली बन जाएं।आकलन से की गई बात में तर्क तो है ही।लोचा है यह कि उनके शिष्यों की कोई कतार नहीं,सो वे गाहे-बगाहे ई रास्ता चुन लिए।हमारे बिहार में होते न! तो फिर इनके बायो डेटा पर राय देते तो ई बाबू को समझ में आ जाता कि क्या होता है प्रचार का तरीका।
रहने दो! रामखेलावन जी,राधेलाल ने कहा।
इधर एक नाटककार ने सुझाव दिया कि कभी कभी नाटक भी देखा करो,इससे जीवन में रोमांच बना रहता है,मन में नए विचारों का उद्गम होता है।बात तो करारी कही थीं।
इधर चिलमन ने रामखेलावन को चुपके से बताया कि एक बीयर की केन रखी थीं।पिछले वित्तीय वर्ष से,हम ने लगे हाथों पी कर अपने समस्त कीटाणुओं का खात्मा कर दिया है,उ के बाद कुछ देर हमको जिंदगी के बेहतरीन सपने आएं।
रामखेलावन ने कहा कि बताइये चिलमन बाबू!
किस तरह के सपने आएं!
सपने आएं कि बड़े विद्वान किसिम के लोग विश्व हिंदी सम्मेलन जाते है।
अंदर की बात
विद्वान माने कौन
रसूक वाले और कौन!
चिलमन बाबू और कौन!
नहीं बताऊंगा कि कौन कौन हिंदी सेवा को मरा जा रहा है!
हिंदी जहां थीं,वही रहेंगी
केवल जा रहे यात्री खा पी कर लौट आएंगे और उनके पासपोर्ट पर विदेश से लौटने का ठप्पा लग जायेगा।फिर वे महीनों गाते फिरेंगे कि हिंदी ने वैश्विक पटल पर झंडे गाड़ दिए।मजा तो तब आता कि सभी उम्मीदवारों से चाहे वे नए चावल हो या पुराने वाले बासमती सबसे पूछा जाता कि क ख, ग घ पूरा सुनाओ तो माँ कसम आधे से ज्यादा की कम्पारमेंट आ जाती।पक्की बात।सभी सिफारिश धरे के धरे रह जाते।हो जाती हिंदी सेवा!
चिलमन तुम तो बड़े ज्ञानी किसिम के नए संस्करण हो।
बाबू जी! हम कोई बागपत के सड़े खरबूजे थोड़े है जो आप समझ रहे है,हम बड़ी ऊंची चीज है।रामखेलावन ने कहा कि महाराज आप ऊंची चीज नहीं,ऊंची रकम हो।
पांडेय जी भी मजे लेते रहते है सो उन्होंने एक पोस्ट लिख दी कि आजकल सम्बन्ध खपते है तो हैरत की बात यह रही कि बड़े दिलचस्प और मौजूं कथन प्रकट हुए। एक सज्जन ने लिखा कि यह वह नाला है जिसे पता है कि इसमें जो डूबेगा,उसके शरीर में मैला लगेगा, लोग फिर भी डुबकी लगाने को उत्सुक रहते है।धन्य है मेरे भारत के लोग।
राधेलाल जी,ये सेटिंग क्या होती है! राधेलाल जी ने कहा-मैं ही बचा हूँ,नहीं बताता।मेरा मन नहीं।यह मान को,मसूड़े में भयंकर पैन है हाई क्वालिटी वाला!
अच्छा! तो इसका मतलब आप हिंदी की वैश्विक सेवा का बायकॉट करेंगे!
चिलमन ने लपक कर कहा।फौरन राधेलाल जी ने कहा-इतना भी दर्द नहीं मसूड़ों में जो हिंदी सेवा से कतरा जाऊं!
हम तो अव्वल वाले सेवक है,रोजगार मुक्त है,जिसको जहां और जैसी सेवा करवानी हो, वे सम्पर्क करें और हम चलने को तैयार है।
चिलमन ने कहा-राधेलाल जी,पता है।सब पता है।आपके मन में भी हिंदी सेवा की लहरें छलांग मार रही है।बाई दवे! अपने साथ स्वास्थ्य किट अवश्य ले जाना।मसलन दवाइयां वगेरह।ओ आर एस का घोल, दस्त की दवाई,ब्लड प्रेशर और सर दर्द वगैरहा।क्यों चिलमन इतना ज्ञान मुझे क्यों दे रहे हो और वोह भी कंट्रोल रेत पर! राधेलाल ने मुस्कराते हुए कहा।राधेलाल जी आपकी मुस्कराहट अंतरराष्ट्रीय किसिम की है,लगता है आओ जैसे हिंदी सेवक पर बहुत देर से विचार विमर्श हुआ।क्या कहना चाहते है!
अबे तू,चाय पिलवा।कुछ बोल दिया गलत-सलत, कहीं एयरपोर्ट से न बैरंग कर दिया जाऊं।
जी,समझ गया।चिलमन ने रामखेलावन की और देखा और चाय लेने निकल गया।
पांडेय जी ने कहा-राधेलाल जी,आप निश्चित रहिये,हम आपकी सुखद यात्रा की कामना करते है।कुछ ले आइएगा हमारे लिए वहां से,तो आनंद ही आनंद होगा।वैसे भी जीवन में जहां जो है वह बना रहे,उसके अतिरिक्त और क्या है! यह कथन रामखेलावन की समझ में नहीं आया,उसने कहा कुछ नहीं।पर यह सोचा कि पांडेय जी ने कही है तो इसका मतलब जरूर होगा।कभी फुरसत में पूछूँगा।
तभी दफ्तरी ने कहा कि ढाई बजे मीटिंग है,पांडेय जी।
पांडेय जी ने कहा-जी,महाराज।कुछ देर के लिए मौन हुए।एक बार लघु शंका को प्रस्थान किया और राहत का भाव चेहरे पर लाये।
पांडेय जी मन में विचार करने लगे कि मनुष्य जब तक खाली नहीं होता तो भरता नहीं।यह तो प्रक्रिया है जीवन की।
आज भी वे किसी लेखक को देखते है जो बुजुर्ग है,लेकिन सेवा का भाव उसमें झलकता है,लगता है कि ये है साधक।पर हैरानी और अचरच की बात सच्चे साधक वैश्विक चिंतन से कौसों दूर है।कौन सुनेगा,कौन नहीं।आजकल तो जे बात है,किसी ने कही तो भाई का ही पत्ता साफ!
चिलमन चाय ले आइये, फिर एक मीटिंग में जाना है।
लाया जी।
तभी रामखेलावन ने याद दिलाया कि पांडेय जी,शाम को मिल रहे है न!
वही जहां बुद्धिजीवी आते है
अच्छा,अच्छा!
प्रेस क्लब।मिलता हूँ भाई।आ जाइयेगा, समय पर।लखनऊ वाले भाई साहब भी आ रहे है।
हम्म!
बड़े-बड़े लोगों के बीच हम मामूली लोग क्या करेंगे!
रामखेलावन कहने लगा-हवन करेंगे,हवन करेंगे।
हा, हा, हा, हा, हा
एक उम्र के बाद आदमी हवन करने लायक ही बचता है।
वही कर लेंगे,मालिक।
बायोमेट्रिक के बहाने पांडेय जी - (व्यंग्य - लालित्य ललित) 6
सम्पर्क:लालित्य ललित
बी 3/43,ग्राउंड फस्ट फ्लोर
शकुंतला भाव,पश्चिम विहार
नई दिल्ली -110063

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