नवंबर 1954 में दिल्ली में जन्मे बिमल सहगल, आई एफ एस (सेवानिवृत्त) ने दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स के साथ स्नातक होने के बाद, वह विदेश मंत्रालय में मुख्यालय और विदेशों में स्तिथ विभिन्न भारतीय राजदूतवासों में एक राजनयिक के रूप में सेवा करने के लिए शामिल हो गए। ओमान में भारत के उप राजदूत के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने जुलाई, 2021 तक विदेश मंत्रालय को परामर्श सेवाएं प्रदान करना जारी रखा। कॉलेज के दिनों से ही लेखन के प्रति रुझान होने से, उन्होंने 1973-74 में छात्र संवाददाता के रूप में दिल्ली प्रेस ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन्स में शामिल होकर ‘मुक्ता’ नामक पत्रिका में 'विश्वविद्यालयों के प्रांगण से' कॉलम के लिए रिपोर्टिंग की। अखबारों और पत्रिकाओं के साथ लगभग 50 वर्षों के जुड़ाव के साथ, उन्होंने भारत और विदेशों में प्रमुख प्रकाशन गृहों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और भारत व विदेशों में उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। अंत में, 2014-17 के दौरान ओमान ऑब्जर्वर अखबार के लिए एक साप्ताहिक कॉलम लिखा। संपर्क -
[email protected]
मेरे दृष्टिकोण से बिमल सहगल का यह लेख “व्यंग्य” की अपेक्षा अधिक एक संस्मरणात्मक कथात्मक गद्य बनकर सामने आता है, जिसमें व्यंग्य की मूल संरचना कई स्थानों पर बिखरती हुई दिखाई देती है। विषय अत्यंत सामयिक और संभावनाशील है—“पेपर लीक”—किन्तु लेखक उसे सामाजिक-राजनीतिक विडंबना के व्यापक धरातल तक ले जाने के बजाय वैवाहिक प्रसंग की निजी चुटकी तक सीमित कर देता है। परिणामतः रचना अपने आरंभ में जिस तीखे सामाजिक प्रहार का संकेत देती है, अंत तक पहुँचते-पहुँचते वही व्यंग्य घरेलू हास्य और व्यक्तिगत कटाक्ष में रूपांतरित हो जाता है।
व्यंग्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांद्रता और बहुस्तरीय व्यंजना होती है, जबकि यहाँ विवरणात्मक विस्तार कई बार अनावश्यक रूप से फैलता है। “पेपर लीक” और विवाह-प्रक्रिया का रूपक प्रारंभ में रोचक अवश्य लगता है, किन्तु लेखक उसे अत्यधिक खींच देता है। इससे प्रतीक की धार कुंद पड़ने लगती है। एक प्रभावी व्यंग्य में संकेत पर्याप्त होते हैं; वहाँ पाठक स्वयं अर्थ-संयोजन करता है। लेकिन इस रचना में लेखक बार-बार अपने आशय को समझाने की मुद्रा में दिखाई देता है, जिससे व्यंग्य की स्वाभाविक तीक्ष्णता कम हो जाती है।
भाषा स्तर पर भी रचना कई जगह पत्रकारिता-प्रभावित वर्णनात्मकता से ग्रस्त दिखाई देती है। व्यंग्यात्मक गद्य में जिस प्रकार की “संक्षिप्त प्रहारक ऊर्जा” अपेक्षित होती है, उसकी जगह यहाँ लम्बे अनुच्छेद, परिस्थितियों का अतिविस्तार और एक ही बिंदु की पुनरावृत्ति अधिक दिखाई देती है। उदाहरणतः लड़की दिखाने, बिचौलिये, पड़ोसन और नाश्ते के प्रसंगों को जिस विस्तार से लिखा गया है, वह कथा तो निर्मित करता है, पर व्यंग्य की धार को धीमा करता चलता है।
रचना की एक और सीमा यह है कि इसका स्त्री-चित्रण कई जगह पूर्वाग्रही और एकांगी प्रतीत होता है। पत्नी को “पेपर लीक कांड की प्रॉडक्ट” कहकर संबोधित करना व्यंग्यात्मक व्यंजना से अधिक व्यक्तिगत उपहास की श्रेणी में चला जाता है। यहाँ लेखक सामाजिक संरचना की आलोचना करने के बजाय स्त्री-पात्र को व्यंग्य का आसान माध्यम बना देता है। यदि लेखक विवाह संस्था, मध्यवर्गीय दिखावे और सामाजिक छल के व्यापक मनोविज्ञान को केंद्र में रखता, तो व्यंग्य कहीं अधिक प्रभावशाली हो सकता था।
मेरे नजरिए से रचना का सबसे बड़ा संकट यह है कि इसमें व्यंग्य का लक्ष्य लगातार बदलता रहता है। कहीं शिक्षा-तंत्र है, कहीं विवाह संस्था, कहीं पत्नी, कहीं बिचौलिया—फलतः व्यंग्य का केंद्र स्थिर नहीं रह पाता। एक सफल व्यंग्य अपनी चोट को केंद्रित रखता है; यहाँ वही एकाग्रता कमजोर पड़ती दिखाई देती है।
व्याकरणिक और शैलीगत स्तर पर भी कई वाक्य अत्यधिक लंबे और बोझिल हो गए हैं। व्यंग्य में भाषा जितनी चुस्त होती है, प्रहार उतना तीखा बनता है। यहाँ लेखक कई बार दृश्य-सज्जा में इतना उलझ जाता है कि कथ्य का व्यंग्यात्मक तापमान गिरने लगता है।
यह कहना अनुचित न होगा कि रचना में विषय की संभावनाएँ अत्यंत प्रखर थीं, परंतु लेखक उसे वैचारिक गहराई और संरचनात्मक कसाव तक पूरी तरह नहीं पहुँचा पाया। व्यंग्य का काम केवल समानता खोज लेना नहीं, बल्कि विसंगति के भीतर छिपे सामाजिक तंत्र को निर्वस्त्र करना होता है। इस कसौटी पर यह रचना आंशिक रूप से सफल और पर्याप्त रूप से असंतुलित प्रतीत होती है।
— बेबाक बोल एसपी सिंह