वातायन - वैश्विक संगोष्ठी-85 अनिल शर्मा ‘जोशी’ का काव्य संसार 7लंदन – 04 दिसंबर 2021: संगोष्ठी ‘अनिल शर्मा ‘जोशी’ का काव्य संसार’ के तहत कवि एवं व्यंगकार अनिल जोशी पर केन्द्रित थी। वातायन-यूके द्वारा आयोजित चर्चा-परिचर्चा के काव्यमय गोष्ठी की शुरुआत डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की अध्यक्षता में संपन्न हुई, जिसमें कवि अनिल जोशी ने अपनी भावपूर्ण कई कविताओं के साथ अपने रचना कर्म के बारे में रोचक बातचीत प्रस्तुत की। वातायन की संस्थापक, दिव्या माथुर के कुशल संयोजन और डॉ पद्मेश गुप्त के संक्षिप्त मगर सारगर्भित स्वागत-भाषण और अल्का सिन्हा के आत्मीय संचालन में इस संगोष्ठी की सफलता निश्चित ही थी। संगोष्ठी में विश्व भर से लेखक, विद्वान, श्रोता और मीडियाकर्मी जुड़े।

“फ़ासलों के दरमियाँ निर्वात अपने समय से बिना हिले-डुले जैसे- ‘एक व्यक्ति में रहते हैं कई एक व्यक्ति’ की तरह अपने सारे दायित्वों को निभाते हुए वे नये-नये आयाम रचते जा रहे हैं।” कवि अनिल जोशी  की शान में उक्त पंक्ति कहते हुए अल्का सिन्हा ने अपने संचालन की बागडोर सम्हाली और अनिल जोशी का वातायन मंच पर स्वागत किया।

अल्का सिन्हा ने ऑडियो-विजुअल के माध्यम से मेहमान कवि की तीन कवितायें प्रस्तुत की। कविताओं की उर्वरकता इतनी रही कि सुनने वालों की आँखें नम हो गयीं। किसी भी कवि के लिए ये सम्मानीय क्षण हो सकते हैं, जब श्रोतागण उसकी कविता की सम्वेदनाओं को महसूस कर सकें।

अपनी बातचीत के दौरान अनिल जोशी ने बताया कि ‘उनकी कविताओं को ब्रिटेन की जमीन पर पंख मिले’ और हम कह सकते हैं कि तब से बराबर काव्याकाश में आपकी कवितायें निर्विघ्न अपना सफ़र तय कर रहीं हैं। गोष्ठी में उपस्थित मेहमानों ने अनिल जोशी को अपनी पसंद की कविताएँ सुनने के लिये आग्रह किया। उस पर उन्होंने कई एक कविताओं का पाठ किया… जैसे – ‘इकबाल’, ’होश और अंगारे’, ‘बीच बहस में’,’शब्द एक रास्ता है’, ’माँ के हाथ का खाना’ आदि कविताओं के साथ ‘मोर्चे पर कविता’, ’धरती एक पुल’, ’नींद कहाँ है’, कविता संग्रहों के साथ-साथ उनके शीघ्र आने वाले कविता संग्रह,’शब्द एक रास्ता है’ से भी कविताएँ प्रस्तुत की।

गोष्ठी में विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए सुप्रसिद्ध दोहाकार नरेश शांडिल्य  ने कवि के साथ बिताये अपने समय औरवातायन - वैश्विक संगोष्ठी-85 अनिल शर्मा ‘जोशी’ का काव्य संसार 8 उसकी नज़ाकत को दिल से याद किया। उन्होंने एक बात विशेष रूप से कवि के लिए कही, ”अनिल जी जहाँ भी गये उन्होंने भाषा का मोर्चा हो या सामाजिक परिदृश्य, उसको सुधारने की बात ही सोची और जुड़ाव की बात कही।” उनकी ये बात अनिल जोशी के हृदय में छिपी मानवीय पक्षधरता को उजागर कर गयी।

काव्य गोष्ठी का रंग कुछ यूँ जमा कि काव्यधारा में बहते हुए हम कब समय-सीमा को लांघ गये कि पता भी नहीं चला। उसी में जब संचालक महोदया अल्का जी ने अध्यक्षीय भाषण के लिए भारत के लोकप्रिय कवि-गज़लकार डॉ.लक्ष्मी शंकर वाजपेयी को आवाज़ दी। अल्का जी ने आपकी शान में बहुत कुछ कहते हुए जब ‘सम्पूर्णानंद’ का उन्हें विशेषण दिया तो डॉ. वाजपेयी भी मुस्कुरा पड़े।

अनिल जोशी की कविताओं और कविताई पर बोलना तो उन्हें भी बहुत था किन्तु समय की पाबंदी की वजह से डॉ. वाजपेयी  ने थोड़े में बहुत कुछ कहते हुए कहा, “किसी भी कवि की कसौटी संवेदना होती है। वही तत्व कविता को अमरत्व प्रदान करता है। काश! अनिल जी ‘फ़ुल टाइम’ कवि ही होते। हिंदी कविता को आपकी ज़रूरत है,आप मेरे प्रिय कवि हैं। आपको, आपका हक़ मिले। इस तरह का आयोजन करने के लिए दिव्या जी को भर-भरकर साधुवाद। अनिल जी वो सूर्य हैं जो बादलों से अटे आसमान को उजाले से भर देते हैं।”

वातायन - वैश्विक संगोष्ठी-85 अनिल शर्मा ‘जोशी’ का काव्य संसार 9अंत में कविता की वैविद्ध्य गूँज को मन में समेटे हुए डॉ पद्मेश गुप्त ने सभी प्रतिभाओं के प्रति अपना धन्यवाद ज्ञापित किया। श्रोताओं में विश्व भर के लेखक और विचारक सम्मिलित हुए, जिनमें प्रमुख हैं: प्रो टोमियो मिज़ोकामी, डॉ लुदमिला खोखोलवा, डॉ सुरेंद्र गंभीर, अनूप भार्गव, डॉ मनोज मोक्षेन्द्र, डॉ अरुणा अजितसरिया, डॉ जय शंकर यादव, राजेश कुमार, डॉ वेदप्रकाश, डॉ निखिल कौशिक, डॉ शैलजा सक्सेना, डॉ० वरुण कुमार, विजय नागरकर, विवेक मणि, राजीव रावत, सौभाग्य कोराले, तितिक्षा शाह, संतोष पंत, डॉ उषा उपाध्याय, गंगाधर वानोडे, डा साकेत सहाय डॉ. राज वीर सिंह, अरविन्द कुमार शुक्ल, आशा मोर, जय वर्मा, शिव निगम, श्यामा सिंह, रामेश्‍वर चंडक (माहेश्‍वरी), अरुण सब्बरवाल, गीतू गर्ग, डॉ मीरा सिंह, स्वर्ण तलवार, डॉ कृष्ण कुमार, शन्नो अग्रवाल, महादेव कोलूर, दीक्षा गुप्ता, इत्यादि।

 

प्रस्तुति: कल्पना मनोरमा, अध्यापिका एवं स्वतंत्र लेखिका, जिनकी साहित्य, संगीत और भ्रमण में रूचि है। kalpanamanorama@gmail.com

2 टिप्पणी

  1. गोष्ठी निसंदेह रोचक व् प्रभावी रही, एक व्यक्ति के भीतर अनेक व्यक्तियों का होना अनिल जी का उचित परिचय है!
    गोष्ठी का आनंद उठाते हुए, कुछ एक पंक्तियाँ मन में उभरीं:

    मोर्चे पर हैं अनिल जी
    नींद भगा कर बना रहे हैं पुल
    निरंतर चल रहे हैं और चला रहे हैं
    सोए हुए लोगों को जगा रहे हैं
    बैठे हुए लोगों को उठा रहे हैं
    अनिल जी
    अनिल जी
    अनिल जी
    धन्यवाद अनिल जी
    जय हो: अनिल जी!

    हिंदी जगत का ये सौभाग्य है की इसे अन्य कार्यकर्ताओं के संग संग शर्मा बंधुओं (अनिल-तेजेन्द्र) जैसे कर्मठ कार्यकर्ताओं की सेवाएं उपलब्ध हैं!

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