सेवा निवृत्त उप पुलिस अधीक्षक दाउ साहब सत्तर के और सुगृहिणी मम्मा साहब पैंसठ की।
बघेल खानदान की मानें तो दोनों बहुत लड़ते हैं।
और मानें तो एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते।
लगभग पचास वर्ष का दाम्पत्य है। कहते हैं एक मुश्त सहचर्य में पति-पत्नी के आचार-विचार ही नहीं चेहरे भी मेल खाने लगते हैं।
यहाँ मामला सटीक नहीं बैठता। दाउ साहब गठे हुये अच्छी देह-बॉंह के, मम्मा साहब मोटी थुलथुल।
अच्छी देह-बॉंह वाला गठीलापन, क्षत्रियों वाला सामंती स्वभाव और पुलिस विभाग का दबदबा रहा कि दाउ साहब ने भ्रम जोड़ लिया – उन्हें किसी की जरूरत नहीं।
ग्राम और पोस्ट जसो। दाउ साहब का अॅंग्रेजों के जमाने जैसा बॅंगलानुमा मकान दूर से पहचाना जाता है। दाउ साहब पोस्टिंग में कुछ बार अॅंग्रेजों के जमाने वाले बॅंगलों में रहे हैं। तभी इरादा बना जसो के पैतृक घर को दोनों अनुजों को बख्श अपने लिये ठीक बगल में ऐसा मकान बनवायेंगे जो अॅंग्रेजों के जमाने का लगे। मकान देख उन्हें लगता पुलिस अधिकारी तो अब बने हैं। सामंती बोध को पुष्ट करते बॅंगलेनुमा घर के भव्य कमरों, ऑंगन, दालान, छत, चैगान, पछीती की बगीची में दाउ साहब और मम्मा साहब प्रहर और ऋतुओं के तापमान के अनुसार उठते-बैठते हैं और पैंतरे पर आ जाते हैं। आ जाते हैं कि बहस बढ़े। बढ़े तो समय कटे। खत्म न होने वाली निरर्थकता खत्म हो जो कि होती नहीं।
और अब सुबह का वक्त है –
पगडंडियों से होते हुये खेतों तक टहल आने, पश्चात् कसरत अब दाउ साहब देह में सरसों तेल चुपड़ रहे हैं। मम्मा साहब द्वार से झाँकने आई –
‘‘का कर रहे हैं ?’’
‘‘बॉडी बना रहा हॅूं।’’
‘‘काढ़ा ठण्डा हो रहा है। जुकाम ठीक से हुआ नहीं पर अदरक-तुलसी का काढ़ा चाहिये।’’
‘‘तो इन्तजार करूँ जुकाम ठीक से हो जाये ? आप सावधानी का महत्व कब समझेंगी ?’’
‘‘यह मूँद कर रख दी हैं, आगे आपकी मर्जी।’’
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अब दाउ साहब नहा खोर कर परदनी लपेटे तमाम कमरों में झाँक रहे है जबकि जानते हैं मम्मा साहब पूजा घर में कुर्सी पर बिराजी सॉंई चरित्र बाँचती मिलेंगी। मम्मा साहब के बाँये घुटने की हड्डी घिस गई है। चिकित्सकों की राय में अधिक उठ-बैठ करेंगी तो नी रिप्लेसमेन्ट ही उपाय बचता है। तो आशंका के मद्देनजर जरूरत मुताबिक ही भूमि का सुख लेती हैं।
‘‘क्या कर रही हैं ?’’
‘‘जनम सुधार रही हैं।’’
‘‘बिजुरी खाना बनाकर जा चुकी है। भूख लग आई है।’’
‘‘पाठ पूरा होने दीजिये।’’
‘‘शार्ट में कर लीजिये।’’
‘‘सारी कटौती पूजा में। तभी आपका प्रमोसन न हुआ। नहीं तो एस0 पी0 कहाते।’’
‘‘प्रमोसन की बात करती हैं। अरे मैंने दुर्दान्त चोर-डाकुओं को आदमी बनाया।’’
‘‘आपको आदमी बनाने में हमारी उमर लग गई।’’
‘‘और मैं आदमी नहीं बना ? है न। मेरे कारण आप अफसरानी बनकर रहीं। बीमार पड़ी (स्लिप डिस्क) सेवा मैंने की। आपके तीनों सपूत हाथ खडे़ कर देते थे कि मम्मा साहब का भारी शरीर। कैसे बैठायें। कैसे उठायें। आगे भी बीमार होंगी तो मेरा ही आसरा होगा।’’
‘‘तो आपके तोरा-तुलुआइस (सुख-सुविधा) में हमने कमी नहीं रखी। न घर आने का समय न जाने का। वहय ड्यूटी। ऐसी साहबी झाड़ते रहे कि छः बजकर तेरह मिनिट पर गुरुकुल काँगड़ी की चाय चाहिये तो चाहिये।’’
‘‘वह अत्याचार नहीं था। मेरे नैतिक बल को चुनौती न दीजिये।’’
‘‘चलिये प्रसाद पाइये (खाना खाइये) पूजा अब न होगी।’’
दोनों भोजन के लिये बैठे हैं।
मम्मा साहब सब्जी में रोटी बोरकर दिखाने लगीं –
‘‘आज फिर खाने में तेल उतरा रहा है। बिजुरी मानती क्यों नहीं ?’’
‘‘क्योंकि तेल हजम करने की उसकी उमर है ?’’
‘‘नहीं मानेगी तो हम भगा देंगी।’’
‘‘तो आप खाना बनायें। पर आपसे नहीं होता सोलर कुकर में दाल दलिया बना दें।’’
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‘‘आप रिटायर होकर सुस्ता रहे हैं, हम चूल्हे में जूझें ?’’
‘‘हो गया, चैन से दो कौर खाने दीजिये।’’
दाउ साहब सुस्ता रहे हैं।
वक्त है कि गुजरता नहीं। मम्मा साहब को पुकारा –
‘‘इधर आइये।’’
मम्मा साहब चिल्लाईं ‘‘अरहर की दाल धूप में बगरा रही हैं।’’
दाउ साहब ऑंगन में आ धमके ‘‘चिल्लाकर क्यों बताती है ?’’
‘‘आपको सुनाई दे जाये तब न।’’
‘‘कान साथ नहीं देते।’’
‘‘हमारी तो आँख, घुटने, गर्दन, गुर्दे सब जवाब दे रहे हैं। गर्दन में कल बाँयी तरफ पीड़ा थी आज दाँयी तरफ है।’’
‘‘कल ठीक बीच में होगी।’’
‘‘आपसे तकलीफ बताना जुरूम हो जाता है।’’
‘‘मैं हकीम – वैद्य हॅूं ?’’
‘‘तसल्ली दे सकते हैं।’’
‘‘कोई मुझे दे दे।’’
खफा हो दाउ साहब पलटे और तेज गति दिखाते हुये कमरे में जा घुसे। देर बाद हाथ पोंछती हुई मम्मा साहब आई। देखा दाउ साहब अखबार में दत्त हैं। विद्युत आपूर्ति सुबह दस से रात आठ तक बंद रहती है। बिजना डुलाते हुये बोली –
‘‘लाइट ही नहीं रहती कि थोड़ा टी0वी0 देखें’।’’
‘‘टी0वी0 में कुछ नहीं रखा। लोग अपना दर्द बेंच रहे हैं, हॅंसी बेंच रहे हैं, सिनेमा वाले अपना तौलिया बेंच रहे हैं और वह डेढ़ लाख में बिक रहा है।’’
‘‘तौलिया में हीरे जवाहिरात लगे हैं ?’’
‘‘हमसे क्यों पूँछती हैं ?’’
‘‘अखबार में का खबर है ?’’
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‘‘खबर है बुजुर्गों की बढ़ती आबादी से समस्यायें पैदा होने लगी हैं।’’
‘‘मतलब ?’’
‘‘संयुक्त राष्ट्र ने संसार की बढ़ती हुई आबादी पर जो हालिया रिपोर्ट जारी की है उससे अर्थशास्त्रियों और राजनेताओं की चिंता बढ़ गई है।’’
‘‘मतलब ?’’
‘‘मतलब बुढ़ौनों को पेंशन और सामाजिक सुरक्षा देना समस्या बनती जा रही है।’’
मम्मा साहब सकपका गईं ‘‘हम किसको दिक्कत देते हैं ? किसके बाप का खाते हैं ?’’
‘‘सरकार का। पेंशन।’’
‘‘तो गला दबा लें कि फाँसी में झूल जायें ? भगवान नहीं बुलाता तो का करें ?’’
‘‘डरता है वहाँ भी गदर करेगी।’’
‘‘आपके जहर बाँण से तो पिण्ड घूटेगा।’’
‘‘स्वागत के लिये आपसे पहले पहुँचा रहॅूंगा।‘‘
और अब वक्त है रात का।
छत पर बिस्तर लगा है। दाउ साहब तारों भरा शुभ्र आसमान निहार रहे हैं। मम्मा साहब घुटनों में लहसुन और मेथी दाना डाल कर चुराया (पकाया) गया सरसों तेल पोत रही हैं। दाउ साहब बड़ा आग्रह कर बोले –
‘‘इधर आइये।’’
‘‘काहे ?’’
‘‘एड़ियों में दर्द है, तेल मल देतीं तो नींद आ जाती।’’
‘‘हमारे भी हाथ-गोड़ पिराते हैं पर हम किससे कहें तेल मल दे।’’
‘‘मैं मल देता पर बुढ़ा गया हूँ। कोई छत फाँद कर चढ़ आये और गला रेतने लगे तब खुद को छुड़ा लूँगा हाथ में इतना दम नहीं है।’’
‘‘न डराइये।’’
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‘‘अकेलापन डराता है। टी0वी0 में न्यूज थी दिल्ली में एक सम्पन्न बूढ़ा-बूढ़ी को किसी ने गला दबा कर मार डाला। हम यहाँ अकेले हैं। दादन का डर लगा रहता है। गाँजा पीकर उसे चेतना नहीं रहती। क्या पता क्या कर डाले।’’
दाउ साहब के सबसे छोटे भाई का निकम्मा पूत दादन। दाउ साहब के खेत अधिया में जोतता-बोता था। ठीक हिसाब नहीं देता था तो दाउ साहब ने खेत एक पटेल को दे दिये। दादन कहता फिरता है अफसर कक्कू पगला गये हैं। अपने लड़कों से बैर, अब मुझसे बैर ठान रहे हैं। किसी दिन ठीक करूँगा।
मम्मा साहब का दिल धड़क गया ‘‘आप बहुत खेत-बारी घूमने न जाया करें। दादन दिन में चार सरहंगों के साथ सट्टा खेलता है, रात में गाँजा चढ़ाता है। कभी कुछ —- आपने ऐसी बात कर दी कि आज हमें नींद नहीं आयेगी। बजरंगबली नेकी कुसल राखें।’’
दोनों ने आँखें मूँद कर एक-दूसरे के लिये मौन प्रार्थना की – सुबह जीवित मिलें।
और दाउ साहब का हाजमा खराब।
अकेलापन समस्या, खराब हाजमा एक समस्या। बुढ़ापे में चपल हुईं स्वाद ग्रन्थियों को काबू करते-करते दाउ साहब कल रात दर भरी (दाल भरी) पूड़ियाँ तादाद में खा गये। हाजमा ध्वस्त।
‘‘सुनती हैं, शौचालय जा रहा हॅूं। यह उन्नीसवाँ दस्त है। आपकी दर भरी पूड़ी हजम न हुई।’’
‘‘न खाते।’’
‘‘चुप रहिये। आप चुप रहें तेा इस घर की आधी समस्या हल हो जाये।’’
‘‘आप चुप रहें तो पूरी समस्या।’’
‘‘तब आप ही कहती थीं मैं आपके साथ दो मिनिट बैठकर बात करने का वक्त नहीं निकालता हॅूं। अब कहती हैं समस्या। मार्ग दर्शन दें क्या करूँ ?’’
‘‘सौचालय जाइये।’’
और अब रसोई का समान लाने दाउ साहब जीप से निकटवर्ती कस्वा गये हैं।
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एक वक्त था जब जसो के लिये पक्की सड़क नहीं थी। अब प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में अच्छी सड़क बन गई है। तीन-चार जीप गाड़ियाँ परिवहन में नाम-दाम कमा रही हैं। दाउ साहब सुबह ग्यारह पर गये हैं
अब साँझ होने को है। लौटे नहीं। प्रत्येक जीप की आहट पर मम्मा साहब चागान में झाँकती हैं। दाउ साहब किसी जीप से नहीं उतर रहे। घर से जाने के बाद कहाँ मालूम होता है आदमी सकुशल लौटेगा। तेज रफ्तार। दुर्घटनायें। बूढ़ों के लिये कहीं जगह नहीं।
घबराई मम्मा साहब हनुमानजी को सुमिरने लगी – दाउ साहब सलामत रहें वरना हम कहाँ जायेंगी ? सिरीनिवास और अंजनी (छोटे बेटे-बहू) की सरण में ? वहॉं से भाग आयी हैं फिर वहीं जाना ——— लाज राखो बजरंगबली ——-।
बजरंगबली ने लाज रखी।
दाउ साहब अगली जीप से आ गये।
मम्मा साहब ने सुनाया ‘‘वहीं बस जाते।’’
‘‘आपकी दिद्दा के घर में ?’’
मम्मा साहब की बड़ी बहन कस्बे में रहती हैं।
‘‘हमने सोचा का हो गया ?’’
‘‘आज आपका सुहाग सचमुच उजड़़ जाता। मैं रोड क्रॉस कर रहा था। बाइक पर चढ़े दो लड़के इतनी तेज गति से मुझसे टकराते हुये गये कि लगा भूचाल आया है। गलती लड़कों की लेकिन पीछे बैठा लड़का चिल्लाता है बुड्ढा बच गया रे। बुड्ढा। आज की पीढ़ी में गैरत नहीं रही। बाबूजी कह देता। कुछ आदर दिखता।’’
दाउ साहब उद्धिग्न से अधिक उदास। बुढ़ा गये हैं पर जरूरी है बीच सड़क में चिल्लाकर एहसास कराया जाये बुढ़ा गये हो, सड़क में झोले लादे न फिरो ?
‘‘कैसा था वह साँड़ ?’’
‘‘साँड़ ?’’
‘‘लड़का।’’
‘‘मर्दानगी ढूँढ़े न मिलती थी। एकदम चिकना चेहरा, पिचका पेट, पतले हाथ।’’
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‘‘पलक झपकते आपने उसका हुलिया जान लिया ?’’
‘‘आप प्रश्न ही ऐसा करती हैं। अपनी जान बचाता कि लड़कों की सूरत निहारता ?’’
‘‘तभी कहती हैं रोज-रोज झोला मटकाये न चल पड़ें।’’
‘‘पेंशन निकालने न जायें कि सब्जी न लायें कि फल न लायें कि चूरणवटी न लायें।’’
मम्मा साहब सब्जी वाला झोला लेकर ऑंगन में बैठ गईं।
‘‘भिण्डी में कीड़े हैं।’’
‘‘कीड़े हैं तभी अच्छी है वरना सब्जी के पौधों में ऐसे तेज असर वाले कीटनाशक छिड़के जाते हैं कि कीड़े पनप नहीं पाते। भिण्डी में कीड़े हैं तो जानिये जहरीली नहीं है। केमिकल रंगों में डुबोकर ऐसी चमकदार सब्जियाँ दुकानों में सजी हैं जैसे पॉलिश की गई है।’’
‘‘हम लोग कीड़े खायें ?’’
‘‘कीड़े जहर से बेहतर हैं।’’
‘‘आप इतनी बहस क्यों करते हैं।’’
‘‘कि लगे जिन्दा हैं।’’
और अब दोनों दिद्दा के पोते के तिलक में सम्मिलित होने कस्बा जा रहे हैं।
मम्मा साहब जामुनी फूलों वाली प्योर सिल्क साड़ी पहनकर तैयार हैं।
दाउ साहब ने माधुरी बिखेरी ‘‘खूबसूरत लग रही हैं।’’
‘‘सब दिन थीं। आपने देखने की जरूरत न समझी।’’
‘‘समझी।’’
‘‘नहीं समझी। तभी इस घर में हम पत्नी नहीं पसु बनकर रहीं। जबकि आजकल की दुलहिनें डार्लिंग बन कर रहती हैं। पति को एक नहीं डरतीं।’’
‘‘आप भी डार्लिंग ——। अच्छा, चलिये, फिर जीप में आगे की सीट पर जायेगी।’’
‘‘भर जाये। भाग्य में धक्के बदे हैं। कहा था आपसे सिरीनिवास को फोन कर दीजिये। वह तिलक में आयेगा ही। यहाँ तक आ जाता। हमें कार की सुविधा मिल जाती।’’
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‘‘श्रीनिवास को इतनी तमीज होनी चाहिये कि खुद होकर हम लोगों को लेने आता। मैं उसका सिपाही बनकर नहीं रहॅूंगा।’’
समारोह की चहल-पहल से पृथक एक ओर बैठे दाउ साहब तप रहे हैं और चाह रहे हैं श्रीनिवास आये। बीच में दिद्दा आकर बता गई श्रीनिवास नहीं आयेगा। दाउ साहब अधिक तप गये। नहीं आयेगा क्योंकि जानता है यहाँ मैं मिलूँगा। जबकि दिद्दा के दोनों बेटे-बहू कितना सक्रिय होकर भागीदारी दे रहे हैं। आज भी संयुक्त परिवार है। और गौरव के साथ हैं। दाउ साहब ने जो भी खाया और बड़ी छत के एक कोने में बिस्तर लगवा कर पड़े रहे। देर बाद मम्मा साहब और दिद्दा आईं। दिद्दा ने दुःख दर्द पूँछा –
‘‘बहनोई मच्छर तो नहीं चाब (काट) रहे हैं ?’’
‘‘चाबेंगे तो आप मरहम लगा देंगी ?’’ दाउ साहब दो तकियों के सहारे ओढ़क कर बैठ गये।
दाउ साहब के तपने को दिद्दा न समझी। मम्मा साहब ने समझाया –
‘‘सिरीनिवास नहीं आया इसलिये रिसाये हैं।’’
दिद्दा ने अचरज दिखाया ‘‘बहनोई आपको तो मालूम होना चाहिये सिरीनिवास नहीं आयेगा। फोन पर बात नहीं होती का ? हमारा बड़ा बेटा निमंत्रण देने गया रहा। सिरीनिवास बोला उसकी इच्छा आने की बहुत है
पर दाउ साहब उसको देख कर अच्छा महसूस नहीं करते हैं। उसकी वकालत ठीक नहीं चलती इसलिये परेसान रहता है अब सायद निकुंज (श्रीनिवास का पुत्र) की फीस की कुछ समस्या है।’’
मम्मा साहब पूँछने लगीं ‘‘का समस्या है ?’’
‘‘बहिनी यह तो तुम्हें पता होगा।’’
‘‘हमें नहीं बताता।’’
‘‘और तुम कबहूँ पूँछती नहीं ? बहनोई आप सिरीनिवास से ऐसा नाराज हो गये कि उसका घर तज कर जसो आ गये तो आ ही गये।’’
‘‘मैं उसका सिपाही बनकर नहीं रह सकता।’’ दाउ साहब अपने कुख्यात क्रोध को नहीं रोक सके।
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दिद्दा विमूढ़ हुई ‘‘सिपाही जैसी का बात है ? बहिनी तुम अकेले कैसे रहती हो, घबराहट नहीं होती ? हम तो घर-परिवार के बिना नहीं रह सकते। थोड़ा सह जाते हैं कि बच्चों का साथ बना रहे।’’
दाउ साहब ने भृकुटि तान ली ‘‘साथ बना रहे इसलिये मैं श्री निवास की स्तुति करूँ ? मैं उसका परिवार पाल रहा था वह मुझे नहीं पाल रहा था।’’
‘‘ठीक है आपके पास पैसा है और आप उसकी मदद करते थे पर अब हम लोगों के सरीर में ताकत नहीं है इसलिये झुकना होगा। बहिनी बताती है दादन जैसा दुइ कौड़ी का लड़का आप लोगों को धमका देता है।
जबकि यही आपकी पनही में पालिस करता था। अब बहिनी के भी हाथ-गोड़ थक गये हैं। कहाँ तक आपकी तुलुआइस बजायेगी ?’’
दिद्दा आगे बोलती किन्तु मम्मा साहब ने संकेत से बरज दिया।
तिलक समारोह से लौट कर दोनों आरोप-अभियोग पर उतरे –
दाउ साहब का बयान आया ‘‘सोचता था तिलक में उत्साह रहेगा पर आपकी दिद्दा ने शान्ति न बनाये रखी।’’
‘‘दिद्दा का कौन दोस ? हर कोई कह रहा था तीन बेटों के होते हुये आप लोग जसो में अनाथ की तरह पड़े हैं। लोग हमें मजाक से देखते हैं या तो दया से।’’
‘‘लोग हमे अपने तरीके से जीने दें। कहिये तो सब छोड़-छाड़ वृद्धाश्रम चला जाऊॅं।’’
‘‘वहॉं का होगा ?’’
‘‘आपके अलावा कुछ और चेहरे देखने को मिलेंगे।’’
मम्मा साहब कसमसा कर कुछ तिरछा होकर बैठ गईं ‘‘हमसे इतना उबिया (ऊब) गये हैं ?’’
‘‘हाँ, क्योंकि आप दिद्दा जैसी सहनशील नहीं हैं।’’
‘‘आप हमारे जीजा जैसे समझदार नहीं हैं।’’
‘‘दिद्दा हर काम में बहुओं को आगे कर रही थीं।’’
‘‘जीजा हर काम में बेटों से सलाह ले रहे थे। जबकि आपके राज में हमारे लड़के बकरी बन कर रहे।’’
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‘‘आपके राज में बहुयें।’’
‘‘आप बाप नहीं पुलिस कप्तान बने रहे।’’
‘‘आप अमरबेल। बहुओं से सेवा लेती रहीं और उन्हें सुखाती रहीं।’’
‘‘आप में और आपके तमंचे में बहुत फर्क नहीं रहा। आप बात-बात में तमंचे की तरह फूटते हैं।’’
‘‘रिवाल्वर और तमंचे में फर्क करना सीखिये।’’
‘‘हमको जो सीखना था सीख लिया, आपने बच्चों के साथ समझौता करना नहीं सीखा। अंजनी से रोटी तनिक जल जाये आप कहते थे कार्बन हो गई। आपको साम चार बजकर पन्द्रह मिनिट पर बेल का सरबत चाहिये तो चाहिये। तभी वह आपसे रिसायी रहती थी।’’
‘‘विभाग में काम करने का मेरा एक तरीका रहा है तो घर में रहने का तरीका रहा है।’’
‘‘तभी मुठभेड़ (एनकाउण्टर) करने की आदत नहीं जाती।’’
‘‘आपने अंजनी से कम मुठभेड़ की ? आपने बहुओं को खासकर अंजनी को घर का सदस्य माना ही नहीं। अब मुझे समझ में आता है उसने आपका बहुत शासन सहा। जबकि आपने अपनी सास को हिंडोले में नहीं झुलाया था। पैर नहीं दाबे।’’
‘‘हमने अम्माजी के पैर नहीं दाबे तो आप कौन सा तीरथ करा लाये थे ?’’
‘‘आपका दोष यह रहा आपने केवल अपना पक्ष सोचा। जब आप बहू थीं अम्माजी जल्लाद, अब आप सास हैं, बहुयें चालबाज। अंजनी से आपका खास बैर रहा कि दहेज न लाई। आप क्या लाई थीं ? हाँड़ा, कोपरी, बटुआ-बटलोई, एक ठो भैंसिया, मन भर चावल ———–।’’
‘‘बी0ए0 पास लड़के को तब यही मिलता था।’’
‘‘श्रीनिवास बघेल तो कलेक्टरी कर रहे थे।’’
‘‘नहीं कर रहा है इसीलिये आप उसे अपना सिपाही समझते हैं। दोनों बड़े खूब कमा रहे हैं। उन्हें आपका खजाना नहीं चाहिये। यह बेचारा मोहताज। आप आँखें तरेरते रहे। लड़के बराबर के हो जायें तो उनका अदब मानना पड़ता है। आपने नहीं माना। इसी कारण हम जसो में पड़े गर्मी झेल रहे हैं।’’
तो अब गुनाह कुबूल –
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मम्मा साहब चित्त पड़ी अदृश्य में निहार रही हैं। सामन्जस्य बनाना चाहिये था। हाथ-पैर हमारे थक रहे हैं। उनके मजबूत हैं। हम एहसान दिखाती रहीं ऐसे प्रतिष्ठित घर की बहू बनने की अंजनी की औकात नहीं थी। वह तो सिरीनिवास पढ़ने में कमजोर रहा और हमें समझौता करना पड़ा। बड़ी बहुओं की तरह यह दहेज न लाई इस अपराध में सबके बाद खाती, सबके बाद सोती, सबसे पहले उठती, चुप रहती, हुकुम बजाती फिर भी हम उसके औगुन गिनती रही। बड़ी बहू बड़े लड़के के साथ अमेरिका सटक ली। सुनती हैं किसी दुकान (शॉपिंग माल) में काम करती है। हमारा लड़का इतना कमा रहा है पर बहुरिया को संतोस नहीं। मझला लेह-लद्दाख जाने कहाँ काॅंलेज में पढ़ाता है तो मझली वहॉं सटक ली। सुनती हैं स्कूल में पढ़ाती है। हमारे हत्थे चढ़ते रहे सिरीनिवास और अंजनी। हमको पद और पैसे की बड़ी अकड़ रही। तब देह भी मजबूत थी। अब देह में दम नहीं है। पड़े हैं जसो में सराप भोगते। अमर बेल बन गये हम तो ———–।
बिछावन के दूसरे सिरे पर सिकुड़े दाउ साहब लगा रहे हैं लेखा-जोखा। कर रहे हैं हिसाब जिंदगी भर का। सच है, मैंने लड़कों को पुत्र कम सिपाही अधिक समझा। मैं प्रशासनिक अधिकारी बन कर रहा। विभाग में और घर में। विभाग में होती उठा-पटक, तिकड़मों से कभी निराश हुआ घर में अधिक कड़क-कठोर बन कर प्रस्तुत हुआ कि सत्ता कायम रहे। एक पुकार पर हुक्म की तालीम हो। बच्चे भय खाते रहे। मैं आत्म मुग्ध ऐसा रहा कि अपने अलावा सबको डफर माना। अपने काम को ऐसा ग्लोरीफाई करके बताता रहा कि किसी को बोलने का मौका नहीं
दिया। मेरा शासन ऐसा जबर रहा कि लड़कों की एक न सुनी। कभी नम्र नहीं हुआ। समझौता नहीं किया। बच्चों से समीपता बनाने का ख्याल तक नहीं आया। नहीं सोचा संबंधों को बनाये रखने का अभ्यास न करो तो वे असहज होते हुये फिर अमूर्त हो जाते हैं। न जाने कब और क्यों अनुशासन-प्रशासन, अहंकार-ऐंठ बनाये रखने की आदत बल्कि जिद हो गई। सच है, माँगने पर तत्काल चाय न मिले तो मैं उत्पात करता था। पुलिस विभाग का दबदबा, लाल बत्ती गाड़ी, सेल्यूट, जाँच, निरीक्षण, बैठक, दौरे, एनकाउण्टर, वर्दी वाले दिन नहीं रहे लेकिन मैं पुलिस कप्तान बना रहा ———।
सेवा निवृत्ति दिनाँक को दाउ साहब ने खुद को रिक्ति से घिरा पाया था। वर्दी उतरी मानो वजूद उतर गया। सम्भावनायें खत्म हो जायें लेकिन एकाएक सक्षमता खत्म नहीं होती। पद छूट जाये पर पद के प्रभाव को
एकाएक छोड़ देना सम्भव नहीं होता। फिर खुद को निष्क्रीय और चुका हुआ कैसे मान लें ? टहलना, खाना, पाचन सही रखना, शरीर की देख-भाल, रात में नींद आ जाये जैसी चिंता करना ही यदि अब जिंदगी का मकसद बचता है तो यह जिंदगी का उत्सव नहीं, मौत का इंतजार है। जसों
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में अॅंग्रेजों के जमाने जैसा बॅंगलानुमा घर सचमुच अरमानों से बनवाया पर अब बिजली, पानी, सड़क की असुविधा और गॅंवई लोगों की पंचायत सुनते हुये खुद को गारद करना उन्हें असम्मानजनक लग रहा था। उन्हें राहत मिली कि श्रीनिवास का भविष्य परख उसे लॉ की डिग्री दिलाकर वकालत करने की पात्रता दिला दी और गृह जिले में एम0आई0जी0 खरीद दिया। दोनों बड़े बेटों के अच्छे प्रतिशत और अच्छे पद दाउ साहब की छाती फुलाते थे जबकि श्रीनिवास का निम्न औसत प्रदर्शन पिचका देता था। वे उससे विशेष खफा रहते थे लेकिन लगा श्रीनिवास हुकुम बजाने के लिये बढ़िया है। अंजनी को सेवा में लगाये रहेंगे। विशिष्टता बोध बना रहेगा। योद्धा की तरह रहे हैं, और रहेंगे।
श्रीनिवास ने दाउ साहब के सम्मान में पीछे वाला छोटा कमरा सजा दिया। आगे का छोटा कमरा बैठक और दफ्तर की तरह इस्तेमाल होता है। जहॉं ईद के चाँद की तरह कभी कोई मुवक्किल दिखाई दे जाता है। लम्बे कमरे में वह, अंजनी, दो बच्चे, गृहस्थी। दाउ साहब को सेवायें मिल रही थी लेकिन लग रहा था खाली बैठकर अपनी क्षमता को जाया कर रहे हैं। जवानी में एम0ए0, एल0एल0बी0 एक साथ किया था। वकालत करने का चाव उमड़ पड़ा।
‘‘सुनो श्रीनिवास, तुम जैसे सुविधा भोगियों में काम करने का जज्बा नहीं बन पाता है। मैं आर्थिक सहयोग न करूँ तो पता नहीं क्या करोगे। मैं दिखाऊॅंगा वकालत कैसे की जाती है। कचहरी से संबंध रहा है। गवाही के लिये जाना पड़ता था।’’
दफ्तर में ठीक सामने दाउ साहब बैठे मिलेंगे जैसी भयावह कल्पना कर श्रीनिवास ने उनके हौसले तोड़ने का तमाम प्रयास किया पर वे जबलपुर से वकालत का लाइसेंस बनवाने में सफल हुये।
कचहरी में पुलिस विभाग का प्रतिनिधित्व करते हुये प्रस्तुत होना भिन्न अनुभव था, अधिवक्ता की तरह प्रस्तुत होना भिन्न। कहाँ पुलिस विभाग का रोब-दाब, अहंकार-अभिमान और कहाँ जमीन, जायदाद, पट्टे, दुकान,
हत्या, अपहरण में लगे मुवक्किलों का कपट। अहंकार से भरे जज, पेशकार, नाजिर। आदेश, निर्देश, रिमाण्ड, चालान, अपनी बारी का इंतजार और पेशी की बढ़ा दी गई तारीख। दाउ साहब को लगता वे लूजर हो रहे हैं। आक्रोश था या निराशा, श्रीनिवास के दफ्तर में बैठे मुवक्किल की काउन्सलिंग करने लगे —-
‘‘तलाक क्यों लेना चाहते हो ? मैंने अनपढ़ पत्नी के साथ उमर गुजार दी तुम तलाक चाहते हो कि पत्नी अल्पशिक्षित है। मैं उप पुलिस अधीक्षक रहा हॅूं तुम क्या हो ? कपड़े के व्यापारी न। तुम
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चाहते हो तलाक दिलाने के लिये मैं और श्रीनिवास तुम्हारी पत्नी को विक्षिप्त, मानसिक रोगी या चरित्रहीन साबित करें, यह नहीं होगा ——-।’’
श्रीनिवास घबरा गया ‘‘दाउ साहब आप ——।’’
‘‘चुप।’’
मुवक्किल ने वकील बदल लिया।
केस छिन जाने का झटका था या दाउ साहब के समक्ष पूरी उम्र हीन बनकर रहने का रिफ्लैक्शन। दाउ साहब सदमे में जबकि श्रीनिवास थम नहीं रहा था।
‘‘दाउ साहब, ऐसे तो आप मेरे मुवक्किल तोड़ देंगे। मेरी वकालत नहीं चल रही थी तो आपके आने पर भी नहीं चल रही है।’’
बरसों का बना लिहाज तोड़ रहा है असुर।
दाउ साहब ने ऐनक उतार कर श्रीनिवास को जद में लिया –
‘‘चुप। तुम्हारे भीतर क्षमता ही नहीं। होती तो बड़े भाईयों की तरह कुछ कर दिखाते। उन दोनों ने मुझे मुक्त कर दिया पर मैं अब भी तुम्हारे परिवार को पाल रहा हॅूं। यह घर, यह कार, माल असबाब सब मेरा है।’’
‘‘तो रिअम्बर्स माँगेंगे ? आप भैया लोगों की तुलना में मुझे बुद्धिहीन बताते रहे, मैं चुप रहा। सख्ती करते रहे मैं चुप रहा। आप कुछ पैसे देते हैं उससे अधिक मैं डर कर रहता हॅूं।
मैं ही नहीं, अंजनी, ये बच्चे (निकुंज और उसकी बहन मनु) तक। आप और मम्मा साहब अंजनी के सामने मुझे निकम्मा कहते हैं, मुझे शर्म आती है। आपको मैं खलता हॅूं, मम्मा साहब को अंजनी। आप लोगों को घड़ी देखकर नाश्ता, खाना, चाय, गरम पानी चाहिये। अंजनी बच्चों से पहले आप लोगों का काम करती है। लेकिन आप लोग खुश नहीं होते। हमें जीने दीजिये दाउ साहब —–।’’
श्रीनिवास ने चिल्लाहट से बात शुरू की थी फिर उसकी आवाज टूटती गई। यह शायद पहली बार हुआ जब मम्मा साहब घबरा गईं।
‘‘सिरीनिवास चुप रहो न। बुढ़ापे में इ्रंसान बच्चों जैसा नासमझ हो जाता है।’’
दाउ साहब ने मम्मा साहब को हुरपेटा ‘‘सारे षडयंत्र आपके हैं। वैसे तो अंजनी और श्रीनिवास में हजार खोट अब मैं नासमझ। यह ज्ञानी हो गया। मैं इस हड़कम्प में नहीं रहूँगा।’’
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श्रीनिवास और अंजनी ने चरण गहे पर डेरा बॅंध गया। दाउ साहब में हनुमानजी की ताकत होती तो एम0आई0जी0 को हथेली पर उठाकर जसो के मकान की छत पर स्थापित कर देते। कार ले जाते यदि चलाना जानते। जरूरत मुताबिक श्रीनिवास सारथी बनता था।
तब से कम ही हुआ जब श्रीनिवास के घर गये हो। पेंशनर्स समाज की जिला इकाई की वार्षिक बैठक में जाते हैं। गये दूसरे दिन वापस। नहीं पूँछते श्रीनिवास अपना परिवार किस तरह चला रहा है। —— और अब दिद्दा से
ज्ञात होता है निकुंज की फीस को लेकर कुछ समस्या है। यदि है श्रीनिवास उनसे तरीके से मदद माँगे। यह असुर दिद्दा के पुत्र से दुःख कह सकता है, उनसे नहीं।
दाउ साहब भड़क रहे हैं। संधि जैसा प्रस्ताव रख मम्मा साहब ने अधिक भड़का दिया –
‘‘सिरीनिवास को कोई समस्या है इसलिये परेसान हुये जा रहे हैं पर फोन लगाकर पूँछ नहीं सकते का समस्या है।’’
‘‘वह नहीं बता सकता ?’’
‘‘थोड़ी मदद कर दीजिये।’’
‘‘हाथ जोड़ूँ मुझसे मदद लो ?’’
‘‘चलिये, एक-दो दिन को हो आते हैं।’’
‘‘नहीं जाऊॅंगा।’’
और अब दाउ साहब जा रहे हैं –
पेंशनर्स समाज प्रति वर्ष पाँच सेवा निवृत्त लोगों को सम्मानित करता है। दाउ साहब का सम्मान होना है। वे उत्साहित हो गये। यही तो चाहा। सम्मान मिले, सराहे जाये, थोड़ा अहम् की पूर्ति हो।
दाउ साहब दो शब्द कहने के लिये मंच पर आये। अग्रिम पंक्ति में बैठा श्रीनिवास भयभीत है संतति की कितनी आलोचना करेंगे पर दाउ साहब समरसता पर बोले –
—— इस मंच से बुजुगों के अधिकारों की खूब बात हुई। मैं दायित्व की बात करूँगा। हमें प्रयास करना होगा हम सम्मानित किस तरह बने रहें। हम सम्मानित बने रह सकते हैं यदि अपने बच्चों को सहयोग, सुरक्षा, स्नेह, सम्मान दें। हमें क्या नहीं मिला, अफसोस इसका नहीं, अफसोस हो हम क्या नहीं कर पाये ? नहीं कर पाये उसकी भरपाई कैसे करें ? बच्चों के अवगुण बता कर हम सही और सुखी नहीं हो जाते। दुःख बता कर हम समाज की सहानुभूति, दया और करुणा पाना चाहते
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हैं। सहानुभूति क्यों ? बुढ़ापा एक स्थिति है, सजा नहीं है। दया क्यों ? बुढ़ापा एक अवसर है आगामी पीढ़ियों से घुल-मिल जाने का। पर हमारी कमर झुक
जाती है, हम तने रहते हैं। स्थिति बदलती है, हम खुद को नहीं बदलना चाहते। केन्द्र से परिधि में नहीं आना चाहते जबकि बच्चे अपनी भूमिका के लिये तैयार हो चुके हैं। ——वृद्धाश्रमों की संख्या क्यों बढ़ रही है ? या तो बच्चों को हम अपने व्यवहार से इतना थका देते हैं कि वे हमें वृद्धाश्रम भेज देते हैं या हम अपने व्यवहार से परिवार से कटते जाते हैं और वृद्धाश्रम जाना पसंद करते हैं कि वहॉं हमारी उम्र के कुछ लोग मिलेंगे। मेरा मानना है बच्चे जब बड़े हो जायें अभिभावकों को उनका असिस्टेन्ट बन जाना चाहिये ।हम अपने हिस्से का पा चुके हैं, अब बच्चों की बारी है। जीवन का, प्रकृति का यही क्रम है। हमने अपने बच्चों में भविष्य देखा, वे अपने बच्चों में देख रहे हैं। बच्चों के लिये हमने जो कुछ किया वह हमारा कर्तव्य भर नहीं
था, हमारी भावना और संतोष था। पर पता नहीं क्यों कर्तव्य एहसान बन जाता है। भावना स्वार्थ बन जाती है। तो हम अपनी पीढ़ियों को स्नेह दें, सहयोग दें अवसर दें, मित्रता दें कि वह ताप और भरोसा बचा रहे
जिसकी उम्मीद वे हमसे करते हैं। पर हम चुनौती और चेतावनी देने लगते हैं। ——- समय बदलता है। बदलाव को हम आत्मसात न करें पर स्वीकार करें। नये तरीकों को न अपनायें पर बच्चों को उनके तरीके से स्वतंत्र जीने दें। अपने समय में हम क्या कम फैशेनबल रहें ——-।
दाउ साहब हॅंसकर भावुकता और भीतर की नमी को छिपा ले रहे हैं।
श्रीनिवास चकित है।
और अब आत्म शुद्धि –
समारोह से लौटे दाउ साहब हल्का महसूस कर रहे हैं। अहम्-अहंकार-अभिमान के उतरने का हल्कापन। उनके जाने के बाद उनका कमरा निकुंज ने अपना लिया है। आज साफ चादर बिछाकर उनके लिये तैयार कर दिया। अपनी किताबें समेट पढ़ने के लिये वह दूसरे कमरे में जाने लगा तभी दाउ साहब ने पूँछ लिया –
‘‘निकुंज पढ़ाई कैसी चल रही है ?’’
‘‘ठीक है दादू।’’
‘‘आगे क्या विचार है ?’’
‘‘एम0बी0ए0 का एन्ट्रेन्स दिया था। मुझे चार अच्छे इन्स्टीट्यूट मिल रहे हैं पर पापा कहते हैं उनके पास इतने पैसे नहीं हैं जब फैट फीस दे सके। दादू मुझे एजुकेशन लोन मिल सकता है ?’’
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ऋण की बात पर दाउ साहब उखड़़ना चाहते हैं पर आवाज को थोड़ा कड़क कर मान गये ‘‘निकुंज तुम भी अपने बाप की तरह घमण्डी हो। मेरी एक पोजीशन है। तुम ऋण लोगे ? मुझसे नहीं कह सकते फीस
चाहिये ? मैं ऐसा गैर हो गया ? मैं अभी जिंदा हॅूं। दादा जिंदा हो और समर्थ हो तो पोते को बाप से नहीं दादा से फीस माँगनी चाहिये।’’
निकुंज को चमत्कार की चाह थी। चीखा ‘‘दादू, मैं अपनी च्वाइस का इन्स्टीट्यूट ले लूँ ?’’
‘‘हाँ। बता दो अपने बाप को दादू में अभी दम है।’’
दाउ साहब को गर्व हुआ और शर्म आई। इतना बैंक बैलेंस, खेती-बाड़ी, घर-मकान, पेंशन और निकुंज ऋण जैसा इरादा कर रहा है। शर्म आई उनके समक्ष भयभीत रहने के कारण निकुंज अधिकार से नहीं कह सका दादू मुझे फीस चाहिये। श्रीनिवास औसत बुद्धि ही सही, न जमा सका वकालत पर इस घर में उसका हिस्सा है। हिस्सा उसे उपकार की तरह नहीं अधिकार की तरह मिले। निकुंज बघेल खानदान का उत्तराधिकारी। भरे ऊॅंची उड़ान ——-।
दाउ साहब ने आँखें मूँद लीं। अच्छा लग रहा है। लग रहा है सुरक्षित हैं। वह मनोबल भी पा रहे हैं जब दादन जैसे गाँजा प्रेमी को फटकार सके मेरे शरीर की ताकत खत्म हुई पर मन की दृढ़ता बाकी है। उन्हें आराम की मुद्रा में देख निकुंज कमरे की बिजली बुझा कर चला गया।
और अब क्षमा प्रार्थना –
नहीं जानता पुनर्जन्म होता है या नहीं। हो तो यही जिंदगी मिले, यही परिवार, यही बच्चे पर ईश्वर उन गलतियों से बचाना जो मुझसे इस जन्म में हुई। दाऊ साहब ने आँखें मूँद लीं।
भरा था दिल।
बरसने को थीं आँखें।
सुषमा मुनीन्द्र द्वारा श्री एम. के. मिश्र जीवन विहार अपार्टमेन्ट फ्लैट नं0 7, द्वितीय तल महेश्वरी स्वीट्स के पीछे रीवा रोड, सतना (म.प्र.)-485001 मोबाइल: 08269895950