उन्हें हम कालिंदी बुआ कहा करते थे। हमें यही बताया गया था वह हमारी दादी की मुंह बोली बेटी थीं। और वह हमारे घर जब आती भीं तो दादी के साथ।
परिवार की निजी घोड़ागाड़ी से। सन उन्नीस सौ पचास- साठ के उन दशकों के दौरान कई परिवारों में अपनी निजी घोड़ागाड़ी रखने का चलन था। अपने निजी कोचवान की देखरेख में।
उन की घोड़ा गाड़ी की अगली सीट सामान से खचाखच भरी रहा करती।
कभी ताज़ी तगाई लिए नयी रज़ाईओं की ऊंची गठरी के साथ।
तो कभी लोहे के संदूक के साथ, जिस में उन के हाथ से बुनी दरियां और खेस- खेसियां रहा करतीं : धारीदार और चारखानी ; दोकन्नी, तीनकन्नी, चारकन्नी ; दोतही, तीनतही, चारतही ; दोसूती, तीनसूती, चारसूती।
और कभी छोटी- बड़ी पांच पीपियों के साथ। एक में गाय का शुद्ध देसी घी रहा करता,दूसरी में बेसन के लड्डू ,तीसरी में मठरियां, चौथी में बड़ी- पापड़ और पांचवी में गुड़ के ढेले ।
गांव में हमारी अच्छी खेती थी । लेकिन हमारे पिता अपनी पढ़ाई के बाद इधर कस्बापुर में एक कालेज में अध्यापिकी पा लिए थे जहां हमारी मां भी पढ़ाया करतीं । दोनों एक दूसरे से वहीं मिले थे और ब्याहे थे । गांव न कभी वे ही जाते और न ही हम बच्चों को जाने देते। हांलाकि हमारे कस्बापुर से गांव की दूरी बीस मील से अधिक न थी।
हां, वहां रह रहे हमारे ददिहाल से हमारे ताऊ – ताई व उन के बच्चों का आना जाना ज़रूर लगा रहता। बल्कि ताऊ जी की दोनों बेटियां तो हमारे ही घर पर रहा करतीं और मेरी बहन वाले स्कूल ही में पढ़तीं ।
हमारी मां तो सभी का खूब ध्यान रखतीं किंतु हमारे पिता कालिंदी बुआ को देखते ही खिन्न और अनमने हो जाया करते।
उन दिनों दोमंज़िले हमारे मकान के ऊपर वाली मंज़िल से नीचे आते ही नहीं। बाहर निकलते समय भी वहां के लिए अलग बनी सीढ़ियां ही प्रयोग में लाते।
दादी ही ऊपर आतीं- जातीं। कालिंदी बुआ कभी नहीं।उन्हें वहां जाने की सख्त मनाही रही।
हमारे पिता का खाना- पीना भी मां को वहां पहुंचाना होता ।
यों भी उस मंज़िल पर उन का साम्राज्य तय रहा करता । अपनी मित्र मंडली के साथ वह वहीं अपनी बैठकें जमाया करते । अपना संगीत सुनते- सुनाते । अपना पढ़ते- लिखते। यहां यह बताता चलूं,अपने समय के वह एक लोकप्रिय उपन्यासकार रहे थे। एक नामी लेखक होने का पूरा लाभ उन्हों ने फिर खूब लिया भी। पारिवारिक काम-काज तथा अध्यापन- कार्य से बराबर छूट पाते हुए।
हम सभी बच्चों में कालिंदी बुआ मुझे सब से ज़्यादा प्यार करतीं थीं। मुझे हमेशा अपने दिए हुए नाम से पुकारतीं: ‘ गुुड्डा’ । और मैं भी उन्हें बहुत चाहता था। उन से खूब बतियाता- गपियाता। और मेरी बात वह बहुत अच्छे से सुनतीं भी। सभी कहते ,वह इस लिए क्यों कि, एक तो मैं लड़का रहा और तिस पर बच्चों में सब से छोटा और अनजान।
परिवार में लड़कियां मुझे तनिक न पूछती थीं । अपनी गुड़ियाओं और सहेलियों ही में मस्त रहा करतीं।
मां को भी लाड़ दुलार से अधिक अनुशासन पसंद था । घरदारी और अध्यापिकी की दुहरी ज़िम्मेदारी से लकदक वह हमेशा थकीं- थकीं रहा करतीं। चिढ़ीं- चिढ़ीं ।
मुझे नहीं याद पड़ता मां ने मुझे कभी पूछा हो,तुम क्या खाओगे?
इस के ठीक विपरीत, अपनी हर टिकान के दौरान, कालिंदी बुआ रात ही में अपनी कहानियों और लोरियों के बीच मुझ से पूछतीं,कल क्या खाना चाहोगे? हलुवा – पूरी? या फिर आलू- कचौड़ी?
जिसे आज लोग जैम कहते हैं ,वह इसे फल की मीठी चटनी कहा करतीं । जिसे लोग स्टूयू का नाम देते हैं, उसे फल का मुरब्बा। जिसे मेरी बहनों के स्कूल में गौलीवौग के नाम से रंगदार कपड़ों में सिलसिलेवार रूई भरने पर अनेक आकारों की गुड़ियाओं को तैयार करवाया जाता था,उसी को वह पुतलों का नाम दिया करतीं और गुड़ियाओं के स्थान पर मेरे लिए तरह तरह के जानवर व पंछी तैयार किया करतीं जिन्हें दिखा- दिखा कर मैं बहनों को खूब चिढ़ाया करता। उन के हाथ से भरे व सिले हुए कुछ हाथी व घोड़े व चिड़ियाएं आज भी मैं संभाले रखे हूं।
सही में उन के हाथों में जादू था।फल छूतीं तो चमत्कार। सब्ज़ी छूतीं तो चमत्कार। क्रोशिया छूतीं तो चमत्कार। कढ़ाई करतीं तो चमत्कार। पुतलों को विभिन्न आकार देतीं तो चमत्कार।
किंतु अभी मैं ने अपने दस वर्ष पूरे भी न किए थे कि किसी एक दिन हमारे ताऊ जी अपनी जीप में हमारे घर आन प्रकट हुए :
“कालिंदी को अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में पहुंचा कर आ रहा हूं। नाज़ुक हालत में। अम्मा पास में हैं …..”
“ऐसी क्या बात है?” मां ने चिंता दिखलाई।
“डाक्टर कहते हैं,उस के फेफड़ों में पानी भर आया है। वह अब बचेगी नहीं। भाई तो वहां जाने से रहा । मगर आप को ज़रूर वहां चलना चाहिए…..”
“मैं आप के साथ चलूंगा,” मैं रोने लगा,” उन्हें देखना है मुझे…..”
“तुम बैठो यहीं ….” मेरे पिता ने मुझे डपटा ।
“ तुम्हें मैं ले चलूंगी,” मां को मुझ पर दया हो आयी ,” मगर आज नहीं ।”
“मेरी मानो,” ताऊ जी ने मेरे पिता को घूरा,” बच्चे का दिल न तोड़ो । उसे वहां हो आने दो । पहले मैं ने कहा नहीं,उधर कालिंदी भी इसी की रट लगाए रही……”
मेरे पिता ने फिर चुप लगा ली। बड़े भाई की बात वह कभी काटते नहीं। ताऊ जी भी अच्छी समझ रखते थे। ऐसी बात उन से कहते ही नहीं जो मेरे पिता निभा नहीं पाते।
“आप मर रही हो?” अस्पताल पहुंचते ही मैं कालिंदी बुआ के बिस्तर की ओर लपक लिया।
“मेरा गुड्डा,” छत पर टकटकी बांधें उन की आंखें मेरी ओर मुड़ लीं।
“आप अब भूत बन जाओगी?” मैं बहुत डर गया । वह पहले से आधी रह गई थीं।
“मेरा गुड्डा क्या चाहता है? भूत बनूं या चैन की नींद सो जाऊं?” उन की आंखें चमकीं।
“आप क्या चाहती हो?”
“मौत की आती-पाती के वक्त कई लोग आतुर सन्यास लेने की इच्छा रखते हैं । मुझे आतुर गृहस्थी की इच्छा है….”
“वह कैसा सन्यास है?”
“वह सन्यास जो मरने से कुछ समय पहले कराया जाता है,उसे आतुर सन्यास कहते हैं..
….”
“ और आतुर गृहस्थी?”
“ छप्पन सन में नया कानून आया था। भाई बोला था,दो शादी पर पाबंदी लगा दी गई है। कचहरी का हुक्म कोई नहीं टालेगा। लेकिन तेरे पिता ने मुझे अपने साथ रखने की बजाए मुझे तुम्हारी दादी के हवाले कर दिया..….”
“मां उनकी दूसरी पत्नी हैं?” मैं सकपका गया।
“ अगर तेरे पिता मेरा अंतिम स्नान ही कर दें,तब भी मैं मान लूंगी मेरा यह जन्म निरर्थक नहीं गया। मुझे जीवन स्नान मिल गया,” वह रो दीं,” तुम उन्हें मना लोगे न? मेरे गुड्डे ?”
घर लौटते ही मैं ऊपर अपने पिता के पास जा खड़ा हुआ और एक ही सांस में उन्हें कालिंदी बुआ का संदेश दे डाला।
“ वह बावली है,” सुनते ही मेरे पिता ने भृकुटी तान ली,” मुझ से वह बवाल बनते न बनेगा। मूर्खा समझती नहीं सारा दोष हमारे पिता लोग का रहा। जो मुझे मेरे ग्यारहवें वर्ष में मुझ से तीन साल बड़ी उस बकरी से मुझे ब्याह दिया। “
“ बुआ बकरी नहीं हैं,” मेरी रुलाई फिर छूट ली।
“ जो भी है। है बेपढ़ और गंवार। उसे कोई भी कहीं भी धकिया दे। उस के लोग ने उसे कुछ अच्छा सिखाया ही नहीं,कहीं पढ़ाया भी नहीं। उसे बेपढ़ गंवार रहने दिया….”
“बुआ गंवार नहीं है,” मेरी रुलाई तेज़ हो चली,”वह सब जानती हैं । आप उन की बात नहीं मानेंगे तो वह फिर चैन से मर न पाएंगीं। भूत बन जाएंगी।”
“यह दिन तुम्हारे हंसने- खेलने के दिन हैं,” मेरे पिता ने मेरी गाल थपथपा दी,” ऐसी बेकार बातों पर रोने- धोने के नहीं….”
बताना न होगा,मेरे पिता अपने तर्क पर अडिग रहे। हर प्रकार के अपराध-भाव से अछूते। और आगे हुआ क्या? अपने अगले उपन्यास में उन्हों ने बाल- विवाह की कड़ी भर्त्सना करते हुए अपने केंद्र में उस स्त्री को महिमामंडन दे डाला जिस ने अपना पूरा जीवन उस पुरुष के नाम भेंट कर दिया था जो स्वंय पूर्णतः निर्दोष होते हुए भी अपने परिवार की गलत सोच के कारण बेमेल एक बाल- विवाह में उलझा दिया गया था।
बहुत मार्मिक कहानी है दीपक जी! लेकिन सत्य सी लगी। वह समय ही ऐसा था। जिस समय की यह कहानी है ,उस समय बाल विवाह हुआ करते थे।
हमारे घर में हमारी सास की शादी 10 साल की उम्र में हुई थी और 12 साल में गौना। बड़ी सास की तो 6 साल की उम्र में ही हो गई थी।
हमने तो गोद में लेकर बच्चों की शादी होते हुए भी देखा है। बंगाल में बाल विधवाओं की बहुत बुरी स्थिति रही।
विपरीत मानसिक परिस्थितियों से सामंजस्य से स्थापित करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
आपको बधाई इस कहानी के लिये।
दीपक शर्मा जी,
सर्वप्रथम ‘एक हाथ की ताली कहानी’ के लिये आपको बहुत बधाई।
यह कहानी एक बिना तालमेल वाली शादी में झोंकने वाली उस प्रथा का उदाहरण है जिसका परिणाम न जाने कितनी पत्नियां बाद में भुगतती हैं। वह पति की बेरूखाई सहकर प्रेमहीन रुखा जीवन बिताती रहती हैं। या फिर पति उसे अपने जीवन से निष्काशित कर देता है।
कहानी में वह बच्चा यानि कालिंदी बुआ का लाडला ‘गुड्डा’ न बताता तो हमें उसके बाप की करतूत भी न पता लग पाती। कहानी के मोड़ लेते ही पता चलता है कि कालिंदी उसकी बुआ नहीं बल्कि उसके लेखक पिता की पहली पत्नी थी जिसे उसने अपने अयोग्य समझकर उसको अपने जीवन से निकालकर उसे उसकी तकदीर के हवाले कर दिया था। इसीलिए वह दादी के साथ कालिंदी के आने पर उसका सामना करने से बचता रहता था। ये तो कहो कि दादी की समझदारी से कालिंदी को सहारा मिलता रहा। वरना राम जाने उसका क्या होता। मायके के लोग तो उन दिनों बेटी की शादी करने के बाद उसके भविष्य के बारे में सोचते तक नहीं थे। बेटियां तो लोगों को बोझ लगती थीं। मायके में कोई रखता भी था तो अधिक सम्मान नहीं।
और कहानी के अंत में जो व्यक्ति जिस प्रथा के खिलाफ था और जो स्त्री उसे सारे जीवन न भायी उसी कालिंदी के गुणगान अपने उपन्यास में करके उसे अपनी लेखन प्रतिभा का शिकार बना डाला। कालिंदी के मरने के बाद सिर्फ ख्यातिप्राप्त लेखक की उपाधि पाने के लिये उसकी कब्र पर कसीदे काढ़ डाले। स्वार्थ का मुखौटा पहन लिया।
वाह रे पति परमेश्वर
तुझे नहीं जरा सा डर
जीते जी वह मरी रही
अब लेने चला खबर।
हाय रे! भारत की नारी
तुझे कहते श्रद्धा की मूरत
कभी तो तू पूजी जाती है
और कभी न कोई जरूरत।
शन्नो अग्रवाल