हमारे बचपन में जब कभी कोई विदेश जाता था, तो कहा जाता कि “मुण्डा वलैत गया है।” यानी कि विदेश जाने का एक ही अर्थ था कि विलायत गया है। चाहे कोई अमेरिका गया है या हाँगकाँग या फिर नैरोबी या युगांडा… हमारे लिए विलायत ही गया होता था। सवाल यह भी है कि क्या कभी हमने सोचा कि यह विलायत आख़िर है क्या बला! जहाँ से गोरे अंग्रेज़ भारत पर राज करने आए थे, दरअसल उसी की कल्पना को विलायत कहा जाता था। तो आज हम इस बात का पता लगाते हैं कि आख़िर वह विलायत है क्या…?
इस समय पूरे विश्व का ध्यान ईरान, इज़राइल और अमेरिका पर केंद्रित है। पूरा मिडल-ईस्ट बंब-धमाकों से त्रस्त है। भारत का विपक्ष इन सबका ज़िम्मेदार भारत के प्रधानमंत्री को ठहरा रहा है। पूरी दुनिया में ट्रंप की दादागिरी की आलोचना हो रही है। ईरान की नारी-शक्ति ख़ामेनाई की मृत्यु पर ख़ुश हो रही है। दुनिया तृतीय विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है। ऐसे में ज़ाहिर है कि ‘पुरवाई’ के पाठक अपेक्षा कर रहे होंगे कि आज का संपादकीय इसी विषय पर केंद्रित हो।
एक संपादक के तौर पर मैंने महसूस किया है कि राजनीति और धर्म दो ऐसे विषय हैं, जिन पर निष्पक्ष होकर न तो लिखा जा सकता है, और न ही बोला जा सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चक्कर में मैंने कई मित्र खो दिए हैं। मज़ेदार बात यह है कि जिन मित्रों ने मुझसे बात करनी बंद कर दी है। मैं यह सोच कर हैरान हो लेता हूं कि जिस इन्सान को हम कभी मिलने वाले ही नहीं है, उसके चक्कर में अपनी मित्रता क्यों खोने को तैयार हो जाते हैं।
इस बात को ध्यान में रखते हुए, यह तय किया गया कि इस सप्ताह हम एक बिल्कुल अलग ही विषय की जानकारी अपने पाठकों को देंगे।… आपने ये चार नाम अवश्य ही सुन रखे होंगे – इंग्लैंड, ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम… क्या आपने कभी सोचा कि ये नाम क्या एक ही देश के हैं, या फिर इन नामों के पीछे कोई और इतिहास भी है।
हमारे बचपन में जब कभी कोई विदेश जाता था, तो कहा जाता कि “मुण्डा वलैत गया है।” यानी कि विदेश जाने का एक ही अर्थ था कि विलायत गया है। चाहे कोई अमेरिका गया है या हाँगकाँग या फिर नैरोबी या युगांडा… हमारे लिए विलायत ही गया होता था। सवाल यह भी है कि क्या कभी हमने सोचा कि यह विलायत आख़िर है क्या बला! जहाँ से गोरे अंग्रेज़ भारत पर राज करने आए थे, दरअसल उसी की कल्पना को विलायत कहा जाता था। तो आज हम इस बात का पता लगाते हैं कि आख़िर वह विलायत है क्या…?
वर्ष 1535 से पहले वेल्स, इंग्लैंड और स्कॉटलैंड तीन अलग-अलग राज्य हुआ करते थे। 1536 में हेनरी VIII ने एक बिल पास किया ‘एक्ट ऑफ़ यूनियन’ – एक कानून, जिसने मूल रूप से इंग्लैंड और वेल्स की न्यायिक प्रणालियों को मिला दिया, जिससे वेल्स प्रभावी रूप से इंग्लैंड का एक प्रांत बन गया। हालाँकि, इससे पहले, वेल्स के विभिन्न क्षेत्रों पर सदियों से एंग्लो-नॉर्मन शासन था, कुछ जगहों पर लगभग 500 साल। मगर स्कॉटलैंड अभी भी एक स्वतंत्र राज्य था।
इंग्लैंड और स्कॉटलैंड का आधिकारिक तौर पर 1 मई 1707 को एकजुट होकर ‘ग्रेट ब्रिटेन’ राज्य का गठन किया। यह राजनीतिक एकता 1707 के संघ अधिनियम के माध्यम से स्थापित किया गया था, जिसे स्कॉटिश और अंग्रेजी दोनों संसदों द्वारा पारित किया गया था, जिसके अंतर्गत दोनों राज्यों को एक ही राज्य में मिला दिया गया, और उनकी संसदों का विलय कर दिया।
यहाँ हमें स्मरण रहे कि इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड की आज भी अलग-अलग राजधानियाँ हैं, और अलग-अलग संसद भी है। इंग्लैंड की राजधानी है लन्दन, जो कि यूनाइटेड किंगडम की भी राजधानी है। वेल्स की राजधानी है कार्डिफ़, स्कॉटलैंड की राजधानी है एडिनबरॉ। दरअसल एडिनबरॉ 1437 से स्कॉटलैंड की राजधानी है। ठीक इसी तरह उत्तरी आयरलैंड की राजधानी है बेल्फ़ास्ट।
जहाँ तक करेंसी का सवाल है, पूरे यूनाइटेड किंगडम में ब्रिटिश पाउंड करेंसी के रूप में चलता है। ब्रिटिश करेंसी के सिक्के तो ढलते भी वेल्स में ही हैं। मगर स्कॉटलैंड की सरकार अपने तीन बैंकों से भी पाउंड के नोट छापती है। विदेश और रक्षा के तमाम अख़्तियार इंग्लैंड के पास सुरक्षित हैं।
जहाँ तक आयरलैंड का प्रश्न है, इंग्लैंड ने 700 वर्षों तक आयरलैंड पर राज किया था। कहा जाता है कि आयरलैंड इंग्लैंड की पहली कॉलोनी थी। 1922 में आयरलैंड एक अलग देश बन गया, मगर उत्तरी आयरलैंड पर इंग्लैंड का कब्ज़ा बना रहा। वहाँ की करेंसी भी ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग ही है। मगर जैसे ही आप उत्तरी आयरलैंड से आयरलैंड में प्रवेश करते हैं तो वहाँ की करेंसी बन जाती है यूरो। उत्तरी आयरलैंड की राजधानी है बेल्फ़ास्ट तो आयरलैंड की राजधानी है डबलिन।
इस तरह से हम यह कह सकते हैं कि इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड से मिल कर ‘ग्रेट ब्रिटेन’ बनता है, और ये तीनों राज्य ब्रिटेन के घटक देश कहलाए जाते हैं- अंग्रेज़ी में ‘कॉन्सिटिचुएंट कंट्रीज़’। मगर जब उसमें उत्तरी आयरलैंड भी मिल जाता है, तो बनता है यूनाइटेड किंगडम। मगर बोलचाल की भाषा में ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम को केवल ब्रिटेन कह कर भी बुलाया जाता है।
यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि ओलंपिक खेलों में तो यूनाइटेड किंगडम एक देश की तरह भाग लेता है, वहीं बहुत से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड स्वतंत्र देशों की तरह प्रतिभागी होते हैं।
कहा जाता है कि ब्रिटिश लोग आदतों के गुलाम हैं, और कई खेल राजनीतिक बदलावों के बावजूद अपने मूल स्वरूप में ही बने रहे हैं… उदाहरण के लिए : फ़ुटबॉल इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड का खेल है; रग्बी यूनियन इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और आयरलैंड (संयुक्त) का खेल है; टेस्ट क्रिकेट को इंग्लैंड का खेल कहा जाता है, लेकिन इसमें इंग्लैंड और वेल्स भी शामिल हैं; टेनिस डेविस कप ग्रेट ब्रिटेन का खेल है।
स्कॉटलैंड ने भी अंग्रेज़ी साहित्य को बड़े दिग्गज लेखक दिए हैं। सर वाल्टर स्कॉट (1771-1832), आर्थर कॉनन डॉयल (1859-1930) – जिन्होंने शर्लक होम्स जैसे चरित्र का सृजन किया, कवि रॉबर्ट बर्न्स (1759-1796), रॉबर्ट लुई स्टीवन्सन (1850-1894), पीटर पैन जैसे चरित्र का निर्माण करने वाले जे. एम. बैरी (1860-1937) कुछ ऐसे दिग्गज नाम हैं, जिन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य को समृद्ध किया है।
आयरलैंड के अंग्रेज़ी लेखकों के नाम पढ़ कर तो सिर श्रद्धा से झुक जाता है। ‘गुलीवर ट्रैवल्स’ जैसी महान रचना के लेखक जोनाथन स्विफ़्ट, विलियम बटलर येट्स, सी.एस. लुई, ऑस्कर वाइल्ड और जेम्स जॉयस सभी आयरिश मूल के लेखक और कवि थे। मगर साहित्य सबको अपने भीतर समेट लेता है, इसलिए ये तमाम महान लेखक केवल अंग्रेज़ी के लेखक कहलाते हैं, और भारत के विश्वविद्यालयों में भी इन्हें अंग्रेज़ी साहित्य के पाठ्यक्रम में बिना किसी देश का नाम लिए शामिल कर लिया जाता है।
मुझसे एक अंग्रेज़ सांसद ने, जो कि मेरे मित्र भी हैं, एक बार सवाल पूछा, “एक बात बताओ भाई, तुम लोग इंग्लैंड में आने के बाद भी इंडियन, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी क्यों बने रहते हो… ब्रिटिश क्यों नहीं बन जाते?”
मेरा जवाब बहुत सीधा था। मैंने कहा, “टोनी, असली ब्रिटिश तो हम प्रवासी लोग हैं। तुम लोग तो बँटे हुए लोग हो। कोई इंग्लिश है तो कोई स्कॉटिश, कोई वेल्श है तो कोई आयरिश… क्या तुम कभी अपने आपको ब्रिटिश कहते हो?” मैंने उसे एक उदाहरण दिया कि मुझे एक अंग्रेज़ महिला न्यूयॉर्क में मिली। उसके बोलने के अंदाज़ से मुझे पता चल गया कि वह ब्रिटेन से है। मैंने उस महिला से पूछ लिया, “क्या आप लंदन से हैं?… तो उसने जवाब दिया… नो.. नो… मैं स्कॉटिश हूँ!”
रोचक और तथ्यात्मक सूचनाओं से सुसज्जित संपादकीय। यह संपादकीय पहले तो अमेरिकी राष्ट्रपति का कारनामों का संदर्भ दिया है और यह मौजूदा परिस्थितियों का काला काल खंड है,जिसने सभी को अस्त व्यस्त यानी त्रस्त कर रखा है।कोई बारूद से दुखी है तो कोई बारूद की धांस से।कोई जेब से खाली हो रहा है तो कोई जीवन से खाली।
सियासत है कि अपनी चाल से या धमक से चल रही है। फिर यही संपादकीय ग्रेट ब्रिटेन के इतिहास को सार रूप से रोचक अंदाज़ से बताया है।
यही अति विकसित राष्ट्र की कलई और मानसिकता की ब्रेन मैपिंग बड़े ही व्यावहारिक रूप से देता है।
बधाई हो ।
भाई सूर्यकांत जी, आप तो दुबई में बारूद की महक महसूस कर रहे होंगे। आपकी भारत वापसी मुबारक हम सब के लिये।
“वाकई, बहुत ही सटीक विवरण है। आज दुनिया के जो हालात हैं, उन्हें देखकर तो यही लगता है कि तीसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका है, बस उसका स्वरूप बदला हुआ है। आने वाले दिन और भी चुनौतीपूर्ण नज़र आ रहे हैं और इसमें कोई दो राय नहीं कि इसे कलयुग के चरम की शुरुआत कहा जा सकता है।”
“एक दौर था जब ‘विलायत’ जाना किसी सपने जैसा होता था और वहां जाना ही कामयाबी की निशानी मानी जाती थी। लेकिन वक्त का पहिया देखिए कैसे घूम रहा है—आज हालात ऐसे बन रहे हैं कि खुद इंग्लैंड के लोग बाहर जाकर काम ढूंढने को मजबूर होंगे, और कई तो ऐसा कर भी रहे हैं। शायद भविष्य में ‘विलायत जाकर कमाना’ शब्द का अर्थ ही बदल जाए, जब वहां के लोग दुनिया के दूसरे कोनों में रोज़गार की तलाश करेंगे।”
इस सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद सारिका।
आदरणीय सर,
सादर प्रणाम।
‘पुरवाई’ के इस अंक का संपादकीय ‘इंग्लैंड, ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम’ न केवल भौगोलिक और ऐतिहासिक गुत्थियों को सुलझाता है, बल्कि यह प्रवासी जीवन की संवेदनाओं और पहचान के द्वंद्व को भी अत्यंत सुंदर ढंग से रेखांकित करता है। आपने ‘विलायत’ शब्द के बहाने जिस तरह से हमारे बचपन की स्मृतियों को आज के वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य से जोड़ा है, वह पाठक को विषय की गहराई में ले जाने के लिए एक सशक्त भूमिका तैयार करता है। यह देखना वाकई रोचक है कि किस प्रकार एक सामान्य भारतीय के लिए ‘विलायत’ शब्द सात समंदर पार की हर अनजानी भूमि का पर्याय बन गया था, जबकि वस्तुतः इसकी अपनी एक स्वतंत्र और जटिल संवैधानिक संरचना है।
भारत में आज भी आम जनमानस की यह सहज धारणा है कि जो गोरा है और विदेशी वेशभूषा में है, वह निश्चित ही ‘अंग्रेज’ होगा। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, चीन या श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के लोग तो अपनी शारीरिक बनावट और रूप-रंग के कारण अपेक्षाकृत आसानी से पहचान लिए जाते हैं कि वे हमारे अपने ही परिवेश के हैं। इसके विपरीत यूरोप, ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका से आने वाले सैलानी अक्सर हमारी दृष्टि में एक ही श्रेणी में रख दिए जाते हैं। हमारी आँखों को तो उन लंबी कद-काठी वाले महिला-पुरुषों को देखने की आदत है, जो काशी के घाटों, विश्वनाथ मंदिर, संकटमोचन या अयोध्या और मथुरा की संकरी गलियों में टहलते नजर आते हैं। टूरिस्ट बसों से उतरते ये विदेशी पर्यटक, जिन्हें हमारे यहाँ सुंदरता और सुगठित देह का मानक माना जाता है, प्रायः टी-शर्ट, हाफ पैंट, लंबे मोजे और मजबूत जूतों में दिखाई देते हैं। उनकी पीठ पर लदा वह भारी-भरकम बैग, जिसमें पानी की बोतल और कैमरे से लेकर रोजमर्रा की तमाम छोटी-छोटी चीजें होती हैं, उसे देखकर ऐसा लगता है मानो वे अपनी पूरी गृहस्थी ही कंधे पर उठाए चल रहे हों। आँखों पर काला चश्मा, सुनहरे बाल और एक बेफिक्र अंदाज लिये इन सैलानियों को देखते ही हमारे मुँह से अनायास ‘अंग्रेज’ शब्द फूट पड़ता है, भले ही उनका नाता दुनिया के किसी भी कोने से हो।
इन पर्यटकों का रहन-सहन और भारत की चिलचिलाती धूप या यहाँ की गहमागहमी के साथ तालमेल बिठाने का तरीका भी कम दिलचस्प नहीं होता। तपती दोपहर में भी वे सिर पर टोपी लगाए और तेज धूप से तमतमाए लाल चेहरों के साथ पूरे उत्साह में दिखाई देते हैं। उनके गले में झूलता कैमरा और मोबाइल पर खुला डिजिटल मैप उन्हें बनारस की उन घुमावदार गलियों में भी रास्ता दिखा देता है, जहाँ अच्छे-अच्छे चकरा जाएं। वे घाटों की सीढ़ियों पर घंटों मौन बैठकर गंगा की लहरों को निहारते हैं, आरती के समय शंख और घंटों की गूँज में खो जाते हैं और कई बार स्थानीय लोगों से टूटी-फूटी भाषा में संवाद करने की कोशिश भी करते हैं। उनकी सादगी भरी वेशभूषा के पीछे एक विशेष प्रकार का अनुशासन और आत्मनिर्भरता छिपी होती है। वे अपनी डायरी में कुछ न कुछ दर्ज करते चलते हैं और सड़क किनारे दुकानों पर सजी पीतल की मूर्तियों, लकड़ी की नक्काशी या स्थानीय हस्तशिल्प को बड़ी हसरत और कौतूहल से देखते हैं। जब वे मुस्कुराते हुए ‘नमश्टे’ या ‘कितना डाम है?’ या ‘ढन्यबाड’ जैसे शब्द कहते हैं, तो पल भर के लिए भाषाओं के अंतर का अभेद्य किला ढह जाता है और एक आत्मीय रिश्ता बन जाता है। खान-पान में उनकी सावधानी और बोतलबंद पानी पर उनकी निर्भरता उनके संभलकर चलने के स्वभाव को दर्शाती है।
यह सच है कि सोशल मीडिया और सूचना क्रांति के इस दौर ने हमें दुनिया की विविध संस्कृतियों के प्रति थोड़ा अधिक जागरूक बनाया है, फिर भी जमीनी हकीकत और पुरानी धारणाएं आज भी अडिग हैं। इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड के बीच के सूक्ष्म अंतर को जिस सरलता और स्पष्टता के साथ आपने समझाया है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सामान्यतः लोग इन सभी नामों को एक-दूसरे का पर्यायवाची समझ लेते हैं, जबकि इनके पीछे सदियों लंबी ऐतिहासिक और संवैधानिक यात्रा रही है। ‘एक्ट ऑफ यूनियन’ से लेकर 1922 के विभाजन तक की घटनाओं का जो क्रमबद्ध विवरण आपने दिया है, वह किसी भी जिज्ञासु के लिए ज्ञान का द्वार खोल देता है। आपने यह भ्रम बहुत खूबसूरती से तोड़ा है कि जिसे हम केवल ‘इंग्लैंड’ मान बैठते हैं, वह वास्तव में चार अलग-अलग राष्ट्रों का एक जीवंत संघ है। इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स का ‘ग्रेट ब्रिटेन’ के रूप में जुड़ना और फिर उत्तरी आयरलैंड के साथ मिलकर ‘यूनाइटेड किंगडम’ की पूर्णता प्राप्त करना, यह सब समझना किसी रोमांचक कथा से कम नहीं है।
संपादकीय का सबसे मर्मस्पर्शी पक्ष सांस्कृतिक और भाषाई अस्मिता से जुड़ा है। आपने खेलों और साहित्य का उदाहरण देकर यह सिद्ध किया है कि राजनीतिक संधियों के बावजूद इन राष्ट्रों ने अपनी मौलिक पहचान को आंच नहीं आने दी। फीफा विश्व कप में चार अलग-अलग टीमों का होना और ओलंपिक में एक ही ध्वज के नीचे आना, राष्ट्रवाद के एक अनूठे स्वरूप को दर्शाता है। इसी प्रकार, जोनाथन स्विफ्ट, ऑस्कर वाइल्ड और आर्थर कॉनन डॉयल जैसे महान रचनाकारों को केवल ‘अंग्रेजी लेखक’ कह देना उनकी व्यापक सांस्कृतिक जड़ों को सीमित करने जैसा है। आपका यह तर्क अत्यंत सटीक है कि जिसे हम ‘अंग्रेजी साहित्य’ के विशाल वटवृक्ष के रूप में देखते हैं, उसकी जड़ें असल में अनेक देशों और विविध संस्कृतियों के साझा योगदान से सिंचित हैं।
प्रवासी पहचान और ‘ब्रिटिश’ होने की परिभाषा पर आपका विश्लेषण इस विमर्श को एक नई ऊंचाई देता है। आपके और आपके अंग्रेज सांसद मित्र के बीच का वह छोटा सा संवाद समूची ब्रिटिश पहचान की परतों को उधेड़कर रख देता है। इसमें एक गहरा व्यंग्य भी है और एक कड़वी ऐतिहासिक सच्चाई भी। जो समाज कभी पूरी दुनिया को अपनी सभ्यता के रंग में रंगने का दंभ भरता था, वह आज खुद अपनी क्षेत्रीय अस्मिताओं के खांचों में सिमटा हुआ है। यही कारण है कि प्रवासी भारतीय अपनी नई पहचान के साथ-साथ अपनी मूल जड़ों को थामे रखने में अधिक गर्व महसूस करते हैं। आपका यह आलेख इतिहास, भूगोल और समाजशास्त्र के सूत्रों को एक लड़ी में पिरोते हुए हमें अपनी पुरानी धारणाओं पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा देता है। इस संपादकीय में संस्मरण की मिठास भी है और एक संपादक की सूक्ष्म दृष्टि वाली गंभीरता भी।
पुनश्च,
‘पूरवाई’ के पिछले अंक में प्रकाशित आपके संपादकीय को पढ़कर मेरे मन में जो कुछ भाव उत्पन्न हुआ था, उसे लेख के रूप में अपनी सम्मानित पत्रिका के वर्तमान अंक में स्थान दिया; इसके लिए हृदय से मैं आपका आभारी हूॅं।
एक बार पुनः सादर अभिवादन स्वीकार करें।
भाई चंद्रशेखर जी आपकी यह सृजनात्मक टिप्पणी पुरवाई के संपादकीय की एक नई व्याख्या कर रही है। बहुत बहुत शुक्रिया।
क्षमा-याचना के साथ-
पुनश्च के बाद, ‘पूरवाई’ को ‘पुरवाई’ पढ़ें।
वाह्ह्ह… बहुत सुंदर… ज्ञानवर्धक संपादकीय है….वैसे शेष प्रश्न से इतना ही समझ पाई कि विचारों में कितना अंतर है। जिस देश में कदम रखना हमें सपना सा लगता रहा वह देश भी बंटा हुआ है….। तो हमारे देश में विचारों के अंतर से इतनी तक़लीफ़ क्यों? अंतर होते हुए भी हम सभी अपने आपको भारतीय बताते हैं। Form fill up के समय nationality की जगह Indian लिखते हैं। जो लोग इस बात का पहाड़ बनाते हैं उनके दो प्रकार के दाँत होते हैं। मुझे यह संपादकीय बहुत ही पठनीय एवं संग्रहणीय प्रतीत हुआ।
साधुवाद सर….
हार्दिक आभार अनिमा जी।
आज विश्व के झुलसा देने वाले वातावरण में आपका रोचक एवं ज्ञानवर्धक सम्पादकीय शीतल झोंके का एहसास करा गया। आज विलायत कहना कितना अलग-सा लगता है, लेकिन बचपन से यही सुनते पढ़ते आए थे। यह सच है भारतीय कहीं भी हों स्वयं को भारतीय ही कहेंगे। बिहारी या पंजाबी नहीं कहते है। यह गर्व की बात है । आपने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है । साधुवाद
आपका समर्थन हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है सुदर्शन जी। बहुत बहुत शुक्रिया।
During school days was taught that whole square of a plus b is: a square plus b square plus two a b. Understood the genesis of this formula quite belatedly, now.
Thanks so much Bimal ji for this unique comment.
आदरणीय भाई सादर प्रणाम।
बहुत ही सशक्त सार्थक ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए हृदय से धन्यवाद आभार आपकौ।बहुत अच्छा लगा यह सारगर्भित और विलायत शब्द तथा वैश्विक परिवेश में भी बंटे हुए लोगों पर सटीक जानकारी पढकर। शायद इतनी गहराई से कभी सोचा नहीं था हमने।भारतीय परिवेश अपनी संस्कृति और पहचान को संजोए रखना सिखाता है।यही कारण है कि वे कहीं भी हों अपनी पहचान खुद बन जाते हैं।जबकि विदेशी चाहे ब्रिटेन स्काटलैंड या वेल्स युगांडा आदि किसी भी देश के हों हम उन्हे अंग्रेज या विलायती ही.समझते हैं। यह अंतर कि वे अलग परिवेश या संस्कृति से हैं आज ही समझ आया। जैसा कि संपादकीय में लिखा है**
असली ब्रिटिश तो हम प्रवासी लोग हैं। तुम लोग तो बँटे हुए लोग हो। कोई इंग्लिश है तो कोई स्कॉटिश, कोई वेल्श है तो कोई आयरिश… क्या तुम कभी अपने आपको ब्रिटिश कहते हो?” बहुत सही उदाहरण है।
एक बार फिर बहुत बहुत धन्यवाद भाई। प्रणाम।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
प्रिय बहना, तुमने संपादकीय की रूह को पकड़ा है। बहुत धन्यवाद।
पांच प्रकार के घ्वजों (झंडों ) को बेहतरीन तरीके से परिभाषित किया ।
गोरे भी विभक्त हैं ।
बस भिन्नता में एकता बनी रहे और विश्व में शांति हो ।
सम्पादकीय का समापन कहानी जैसा हुआ ।
रंगपर्व की शुभकामना
Dr Prabha mishra
हार्दिक धन्यवाद प्रभा जी।
आज के संपादकीय का सिरा पकड़ने में समय लगा l संपादकीय कहानीकार साहित्यकार का लिखा बिल्कुल नहीं लगा पर भाषा ने ब्यान कर दिया कि लेखक की भाषा पर सही पकड़ है l मेरी समझ में जो आया उसमे 3 आयाम हैं
भाषा-संस्कृति की स्मृति, समकालीन राजनीति की दुविधा
और ‘विलायत/ब्रिटेन’ की ठोस, तथ्यात्मक समझ। “मुण्डा वलैत गया है” जैसे घरेलू वाक्यांश से हुआ आरम्भ भारतीय मध्यमवर्गीय स्मृति में ‘विदेश’ और खासकर ब्रिटेन की धुँधली लेकिन प्रभावशाली छवि को उभारता है। संपादक महोदय पाठक को भावनात्मक जमीन पर खड़ा करके धीरे-धीरे प्रश्न उठाता है कि यह ‘विलायत’ सच में है क्या – कल्पना, सत्ता का प्रतीक, या कोई ठोस भू-राजनीतिक इकाई।
(ईरान–इज़राइल–अमेरिका तनाव, ट्रंप, मोदी, तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका आदि) को सिर्फ समाचार की तरह नहीं, बल्कि यह दिखाने के लिए लाया गया है कि आज की अत्यधिक ध्रुवीकृत राजनीतिक-धार्मिक बहसों में निष्पक्ष रहना लगभग असंभव हो गया है। इसी अनुभव के आधार पर वह संपादक के रूप में चतुराई से विषय बदलकर पाठकों को इतिहास–भूगोल की ओर मोड़ता है, ताकि बहस की जगह समझ पैदा हो। इंग्लैंड, ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम के बीच के अंतर को चरणबद्ध और सरल ढंग से रखा गया है – 1536 के एक्ट ऑफ यूनियन से लेकर 1707 के संघ अधिनियम, वेल्स का इंग्लैंड में समावेश, स्कॉटलैंड की अलग राजधानी और संसद, उत्तरी आयरलैंड व आयरलैंड का विभाजन, पाउंड और यूरो की मुद्राएँ, तथा “कॉनस्टिट्यूएंट कंट्रीज़” की अवधारणा तक। यह हिस्सा पाठक की पुरानी ‘विलायत’ वाली धुँध को साफ कर, एक स्पष्ट नक्शा और राजनीतिक ढाँचा सामने रख देता है। (फुटबॉल–रग्बी–क्रिकेट में अलग-अलग टीम संरचनाएँ, स्कॉटिश और आयरिश लेखकों की लंबी परंपरा, ओलंपिक बनाम अन्य प्रतियोगिताएँ) यह दिखाते हैं कि ‘ब्रिटिश’ होने की राजनीतिक पहचान के भीतर भी क्षेत्रीय अस्मिताएँ कितनी मजबूत हैं। न्यूयॉर्क वाली स्कॉटिश महिला की घटना और ब्रिटिश सांसद से संवाद, इन सारी ऐतिहासिक सूचनाओं को जीवंत और व्यंग्यपूर्ण मोड़ देते हैं – “असली ब्रिटिश तो हम प्रवासी हैं, तुम तो अब भी इंग्लिश/ स्कॉटिश/ आयरिश हो l संपादकीय बड़ी कुशलता से समझाने में सफल है कि पहचान, राष्ट्र और ‘विलायत’ जैसे शब्द कितनी परतों से बने हैं – औपनिवेशिक अनुभव, प्रवासी संवेदना, वर्तमान विश्व राजनीति और ब्रिटेन के भीतर की आंतरिक विविधता, सब मिलकर। भाषा रोचक है यह कि जिस ‘वलैत’ को बताती है कि हमने बचपन में एक अखंड, जादुई विदेश मान रखा था, वह वास्तव में टुकड़ों में बँटी, बहुस्तरीय और भीतर से उतनी ही जटिल दुनिया है जितनी हमारी अपनी। साधुवाद महोदय l सक्रिय रहें l
किरण जी, आपकी रोचक टिप्पणी संपादकीय को हर कोण से खंगालती है। ऐसी टिप्पणी लिखने के लिए सच में बहुत मेहनत मांगती है।
आदरेय संपादक जी!
सादर वंदन!
इस बार का संपादकीय वास्तव में विश्व की सामयिक समस्याओं से कुछ अलग और यूनाइटेट किंगडम अर्थात ब्रिटेन के बारे में ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी से समृद्ध है। अपनी विशिष्ट पहचान और संस्कृतियों के लिए जाने जाने वाले वेल्स ,स्कॉटलैंड ,इंग्लैंड और आयरलैंड नामक अलग अलग राज्य किस प्रकार कल क्रम में यूनाइटेड किंगडम संघ के अंग बने ,यह जानना रोचक लगा।
सादर शुभकामनाएं!
हार्दिक धन्यवाद भाई इंद्र कुमार दीक्षित जी।
बहुत सुंदर, महत्वपूर्ण और रोचकता से भरा हमेशा की तरह शानदार संपादकीय। हार्दिक धन्यवाद
धन्यवाद सुषमा जी।
संपादक जी नमस्कार l
मुझे याद है एक बार आपने कहा था, साहित्यकार की कलम कैमरा होना चाहिए, जो ऐसा लेखन करे कि चीजें चलचित्र की तरह सामने दिखाई दें l आपके प्रत्येक संपादकीय में ये बात पूर्ण रूप से समाई रहती है l जैसे ही पढ़ना आरंभ करते हैं, विषय से संबंधित चित्र उभरकर सामने आने लगते हैं l
आपने इंग्लैंड, ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन, यूनाइटेड किंगडम का जो खाका बनाया है, वह विषय को समझने के लिए बहुत ही उत्तम और रोचक है l चारों का प्रशासन, चारों की राजधानी, राजनीतिक वर्गीकरण, बहुत अच्छी तरह से समझ में आ गया l
… और सचमुच इन चारों का राजनीतिक वर्गीकरण समझना थोड़ा कठिन था l
सभी संपादकीय आलेखों में, जानकारी आकड़ों, तारीखों और सम्बध्द व्यक्ति के नाम के साथ और दी जाती है l इससे पता चलता है कि लिखने से पहले अथक परिश्रम किया गया है I
चूकिं हम सब साहित्य के पुजारी हैं अतः किसी देश की बात करें और उस देश के साहित्यकारों की चर्चा न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता l इस लेख में भी, अँग्रेजी साहित्यकारों के सबंधित जानकारी प्राप्त हुई l जैसे ही किसी साहित्यकार का नाम पढ़ा, याद आया, ‘अरे हाँ ये तो हमने यूनिवर्सिटी में पढ़ा है l’ फिर से उनका साहित्य पढ़ने का मन होने लगता है l
धन्यवाद जी l
ऊषा जी आपको मेरी कही बातें याद हैं। किसी भी लेखक के लिए यह गर्व का विषय हो सकता है। हार्दिक धन्यवाद।
*विश्व की ब्रेकिंग न्यूज*
बी बी सी लंदन तेजेंद्र पुरवाई संपादकीय के माध्यम से,
विश्व तीसरे महायुद्ध के मुहाने पर…
ब्रिटेन की महिला के एक प्रश्न पूछने पर, तेज तर्रार तेजेंद्र का शानदार जबाब…
इंग्लैंड , ब्रिटेन ,ग्रेट ब्रिटेन,ओर यूनाइटेड किंगडम,क्या थे, क्या हैं उस पर एक गहरी, सूक्ष्म नज़र, पुरवाई के संपादक तेजेन्द्र जी की।
आदरणीय प्रिय तेजेन्द्र सर, यदि आप लेखक ना हुए होते तो एक बहुत अच्छे प्रोफ़ेसर ज़रूर होते, मजाल है की कोई आपके पढाने के बाद किसी प्रश्न के उत्तर की तलाश दूसरे से करता।
आप बहुत अच्छे चिंतक ,विश्लेषक ,निःसंदेह आला दर्जे के विद्वान सूत्रधार हैं।
कहते हैं कि, एक समय ऐसा था जब इंग्लैंड में कभी सूरज अस्त नहीं होता था, यानी कि इस देश ने विश्व के सर्वाधिक देशों पर राज किया है। और जहाँ-जहां भी ये रहे, इनके जाने के बाद भी इनकी छाप उस देश से आज तक मिटी नहीं।
अंग्रेजी भाषा,पूरे विश्व की संपर्क भाषा बनी हुई है,उनका केलेंडर विश्व का कैलेंडर है।
भारत से भी अंग्रेज चले गए ,मगर देश आज पाश्चात्य रंग में रंग हुआ है ।
वेल्स का इंग्लैंड में समावेश स्कॉटलैंड की अलग राजधानी संसद भी अलग, उत्तरी आयरलैंड और आयरलैंड का विभाजन के बाद उत्तरी आयरलैंड
यहां तक की पाउंड और यूरो मुद्राएं भी अलग अलग
लेकिन, ओलंपिक खेलों के वक्त सभी
यूनाइटेड किंगडम के झंडे तले एक।
साहित्य के मामले में भी अंग्रेजी में लेखन है तो वह अंग्रेज,ब्रिटिश ही हे चाहे स्कॉटिश हो आयरिश हो ।
बहुत ही बेहतरीन तरीके से क्रम बद्ध इंग्लैंड ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम के बीच का अंतर आपने बता कर अधिकतर पाठकों का ज्ञान वर्धन किया हे।
हम बड़े सौभाग्यशाली हैं की हमारी हींग लगती है ना फिटकरी और ज्ञान भी हमें, आपकी संपादकीय के माध्यम से चोखा प्राप्त होता है ।
अंत में आपने एक सिक्सर लगा दिया, जब महिला ने पूछा कि आप प्रवासी दिल से हिंदुस्तानी पाकिस्तानी या बांग्लादेशी क्यों होते हैं, तो आपका यह प्रश्न पूछना आप ब्रिटिश है ?
नहीं नहीं मैं स्कॉटिश हूं!
…बस फंस गई मछरिया *तेज* जाल में
मादाम, दरअसल हम प्रवासी ही पूर्णतया ब्रिटिश है ।
सर आपका अनंत साधुवाद ,
आपसे दुनिया सीख रहे हैं।
कुन्ती हरिराम झांसी
कुंती जी, आपने तो सच में कमाल कर दिया। इसे कहेंगे धमाल टिप्पणी।
कई बार ऐसा होता है कि हम किसी देश के बारे में उथली- उथली जानकारी रखते हैं और कभी विस्तार में जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती किंतु यदि ज्ञात विषय के बारे में विस्तार से पढ़ने को मिल जाए तो बहुत अच्छा लगता है। इस बार मेरे साथ ऐसा ही हुआ। आपके संपादकीय से इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स, आयरलैंड की यूनाइटेड किंगडम में किस प्रकार की भूमिकाएं हैं, बहुत विस्तार में जानने को मिलीं।सबसे अच्छा लगा अलग-अलग कवियों के जन्म स्थानों को पढ़कर।
“असली ब्रिटिश तो हम प्रवासी लोग हैं…यह प्रसंग अच्छा लगा। भले ही सभी ब्रिटिश हैं किंतु इंग्लिश, स्कॉटिश, वेल्श आयरिश उनकी पहली पहचान है। यह पहचान छोड़ना और एक राष्ट्र की पहचान बनाना काफ़ी मुश्किल होता है, यह अपने देश के उदाहरण से भी हम समझ सकते हैं।
महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए बहुत धन्यवाद। युद्ध के समाचारों के बीच में सुकूनदेह संपादकीय है।
विद्या जी, इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद
यह संपादकीय विलायत के बहाने ग्रेट ब्रिटेन की कहानी बता देता है। इंग्लैंड, वेल्स,स्काट लैंड, उत्तरी आयरलैंड ये चार देश मिलकर यूनाइटेड किंगडम बनाते हैं। इन सबकी राजधानियां अलग-अलग है।
आपका संपादकीय पढ़कर न जाने कितने गवाक्ष यूं ही खुलते चले जाते हैं। मैं इसे पढ़कर सोच में डूब गया हूं। मन के तराजू के दोनों पलड़े एक साथ झूम रहे हैं। कभी ऊपर तो कभी नीचे।
देश हो या परिवार, ये एक बार अलग हुए तो दोबारा मिलना लगभग असंभव है। परिवार के लोग अलग होने पर पहले पड़ोसी और फिर कट्टर शत्रु बन जाते हैं। उनका दोबारा एक होना नामुमकिन है।
इसी तरह भारत के कई टुकड़े हुए हैं, वे क्या एक हो सकते हैं? उत्तर ‘नहीं’ में ही होगा। लेकिन अंग्रेज बहादुरों ने ये काम कर दिखाया है। सदियों पहले अलग हुए और फिर जुड़ गए। इससे ज्यादा जुड़ाव का उदाहरण इस भूमंडल पर तो नहीं है।
मेरा मन इस संपादकीय के साथ पिछली सदियों में भटक जाता है। जब ब्रिटेन यूनाइटेड किंगडम बन रहा था तब हमारा देश छिन्न-भिन्न हो रहा था। हो क्या रहा था वह था ही। राजा महाराजा एक दूसरे के परम शत्रु।
फिर भारत में अंग्रेजों का आना हुआ। उनकी मानसिकता एकीकरण वाली थी। इसलिए उन्होंने भारत को भी यूनाइटेड बना दिया। उसके एवज में हमें गुलामी मिली। खोया तो बहुत है पर उसमें भी पा लिया गया है।
आज के समय में इंच इंच भूमि के लिए मारकाट मची हुई। उस भूमि को पाने के लिए हजारों साल तक लड़ने के मंसूबे पाले बैठे हैं लोग।
AI और Chatgpt हमारे मन को ऐसे कंट्रोल कर रहा है कि उसके आगे हमारी बुद्धि स्थिर हो जाती है। हम उससे आगे सोच ही नहीं सकते हैं। गलत जानकारी दे तब भी हम उसी गलत को सही मान लेते हैं।
वहीं आपका संपादकीय दिमाग के रास्ते खोल रहा है। विचार और कल्पना के लिए जगह मुहैया करा रहा है।
राजनीति और धर्म के चक्कर में मित्र खो देना, केवल आपकी समस्या नहीं है यह बहुतों की समस्या है। सन् 87 से लेकर 2010 तक देश में ऐसी स्थितियां पनपी कि हमारा मोरल लगातार डाउन होता चला गया। आतंकवाद, भ्रष्ट राजनेताओं की कारगुजारियों ने जनमानस को बुरी तरह से आहत किया।
आज जब ये घटनाएं न्यून हो गई हैं तो मन में खुशी होती है। और वही खुशियां बाहर निकल आती हैं।
और अंत में,आपने अपने मित्र को जो उत्तर दिया था वह लाजवाब था।
प्रिय भाई लखन लाल पाल जी, आप इतनी व्यस्तता के बावजूद ना केवल संपादकीय पढ़ते हैं, बल्कि इतनी सार्थक टिप्पणी भी लिखते हैं कि आप पर नाज़ होने लगता है। हार्दिक धन्यवाद।
इतिहास और वर्तमान को जोड़ते हुए “ विलायत “ शब्द के माध्यम से अंग्रेज़ी शासकों की मानसिकता व फूट डालों शासन करो की नीति को आपने अपने संपादकीय में बहुत ही सरल व सहज भाषा में जैसा की आपकी शैली और व्यवहार में भी है जटिल को सरल बनाना उसी प्रकार यहाँ भी वहीं देखने को मिलता है। विश्व की सबसे बड़ी समस्या पर आपने बहुत ही सरल तरीके से प्रकाश डालते हुए पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है । पुनः बहुत बहुत आभार
स्नेहाशीष ऋतु इस प्यारी सी टिप्पणी के लिए।
एक ज्ञान वर्धक संपादकीय। हम लोग कितनी सुलभता से एक को दूसरे का पर्याय मान लेते हैं, जैसे कोई भारतीय अपने देश में गुजराती, मराठी, बंगाली, असमिया, पंजाबी कहलाता है। पर जब वह विदेश जाता है तो खालिस भारतीय कहलाता है।
वैसे देखा जाए तो बड़ी खूबसूरत परिकल्पना है, है न..!
हार्दिक धन्यवाद सरस। ख़ुश रहें।
आपने अपने संपादकीय में इंग्लैंड, ब्रिटेन, ग्रेट ब्रिटेन और यूनाइटेड किंगडम… के इतिहास के बारे में अच्छी जानकारी दी है।
जैसाकि आपने बताया है उसके अनुसार आपने अपने मित्र के पूछने पर सही उत्तर ही दिया कि असली ब्रिटिश तो हम प्रवासी लोग हैं। तुम लोग तो बँटे हुए लोग हो। कोई इंग्लिश है तो कोई स्कॉटिश, कोई वेल्श है तो कोई आयरिश… क्या तुम कभी अपने आपको ब्रिटिश कहते हो?
यही स्थिति हम भारतीयों की है। भारत में भी हम नार्थ इंडियन और साऊथ इंडियन में तो बंटे ही हैं, स्वयं को गुजराती, मराठी, पंजाबी, मद्रासी या बंगाली कहने में गर्व महसूस करते हैं। यह बात अलग है कि ज़ब हम विदेश में होते हैं तब स्वयं को भारतीय (इंडियन )कहते हैं क्योंकि यही हमारी पहचान है।
वास्तव में हर देशवासी को जो जहाँ अपना बचपन गुजारता है, उस जगह से प्रेम होता है, चाहे वह भारतीय हो या विदेशी।
जानकारी भरे आलेख के लिए साधुवाद
एकदम सटीक टिप्पणी सुधा जी। एक एक शब्द चुनकर लिखा है आपने।
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
विलायत और विलायती शब्द पुरानी यादों में ले गए। आपने सही कहा कि विलायत का अर्थ पहले विदेश ही था।जब भूगोल में दुनिया के नक्शे से सामना हुआ तब जाना कि विलायत कितना बड़ा है।
पर तब भी विलायत का अर्थ एक ही था अंग्रेज और अंग्रेजियत।गोरे और मेम।
उस समय शिक्षा की कमी के चलते विलायती शब्द विदेशियों के लिये प्रचलन में आया होगा।
हमारी सास अक्सर कहती रहीं कि अंग्रेजों का राज ही अच्छा था। पूछने पर कई सारी बातें बताती थी।
महिलाओं को तो उस समय घर में भी गुलामी सहना था। उनके लिये दोनो जगह स्थिति एक सी ही थी।
हालांकि बात ऐतिहासिक है लेकिन विकास और सुधार के बरक्स यह निर्विवाद सत्य है कि परिवर्तन समयानुसार अपेक्षित है।
आश्चर्य यह हुआ कि आयरलैंड इंग्लैंड की पहली कॉलोनी थी।और फिर एक अलग देश बन गया।
आपने विस्तृत और तथ्य पूर्ण जानकारी दी देश, करैंसी, खेल, साहित्य और नामी व दिग्गज साहित्यकार जो सम्मिलित रूप में अंग्रेजी लेखक कहलाए।
संपादकीय का उत्तरार्द्ध काफी महत्वपूर्ण लगा।
अंत में मित्र को दिया गया आपका जवाब ट्रंपकार्ड की तरह लगा।
वर्तमान में राजनीति और धर्म ही विवाद का मुद्दा है। संबंधों को इनसे अलग रखना चाहिये।
एक बिल्कुल अलग किन्तु आवश्यक जानकारी के विषय से समृद्ध करते आपके इस संपादकीय के लिये आपका शुक्रिया।
हमेशा की तरह विस्तृत और अर्थपूर्ण टिप्पणी आदरणीय नीलिमा जी। आपने अनुभव साझा किए… हार्दिक धन्यवाद।
बहुत ज्ञानवर्धक संपादकीय है। आपने सभी भौगोलिक सीमाओं का खोलकर स्पष्ट विवेचन किया जिसमें साहित्यकारों व करंसी के बारे में भी स्पष्ट रूप से ज़िक्र किया गया है।
हम इतना अधिक तो नहीं जानते हैं किंतु अँग्रेज़ी राज्य के बारे में नानी और माँ से बहुत सी बातें जानी हैं जिनका ज़िक्र गाहे बगाहे घर में होता रहता था और इतना होता था कि मस्तिष्क पर गहरी छाप है, उन अधिकांश बातों का ज़िक्र मेरी संस्मरण की पुस्तक ‘इस छोर से उस छोर तक’ में अनायास ही जैसे लिखा गया है।
नाना जी के बहुत से क़रीबी अँग्रेज़ मित्र रहे जिनके साथ से नानी कतराती रहीं, उन्हें उनके पहनावे, उठने बैठने, कहीं साथ जाने से सदा आपत्ति रही।
प्रभाव इतना कि उन्हें कई बार कहते सुना, ऐसे इतरावै जैसे सीधे विलायत से आ रई है।यानि उनके लिए सब फ़ैशन या नख़रे वाले लोग विलायतियों के नकलची होते थे।
आपने जिस बारीक़ी से खोलकर समझाया है, उस प्रकार से हमने कभी सोचा भी नहीं है।
गुजरात में अमरीका का बहुत वर्चस्व है। संभवत:यहाँ के अच्छे व्यवसाय वाले लोग भी अपना खूब फला फूला व्यवसाय छोड़कर अमरीका के नाम से हर दम जाने क्यों पोटली बाँधे तैयार रहते हैं। NRI के ठप्पे से एक अलग ही पहचान व गर्व है उन परिवारों में। वैसे मैं विषय से हट गई हूँ किंतु 50 वर्षों से यही सब महसूस कर रही हूँ।
ज्ञानवर्धन कराने वाले संपादकीय के लिए साधुवाद आपको।
ईश्वर इस कठिन परिस्थिति से पूरे विश्व को बचाएं। सर्वे भवंतु सुखिनः।
आदरणीय प्रणव जी, यह भी एक तरह से संपादकीय की सफलता कहलाएगी कि आप अपनी पुरानी यादों में खो गईं। हार्दिक धन्यवाद।