Monday, May 11, 2026
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संपादकीय- सफ़ेदी भी स्याह हो सकती है!

इंसान की बनाई हुई कोई भी ऐसी चीज़ नहीं है, जो प्रकृति के लिए हानिकारक न हो। नहाने, कपड़े धोने, भोजन और दवाइयों आदि में इस्तेमाल की गई सामग्री का इंसान के शरीर पर या पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता ही है।

मेरे कुछ मित्र हमेशा शरीर पर एलर्जी की शिकायत करते हैं, मगर उन्हें यह समझ नहीं आ रही कि उन्हें किस चीज़ से एलर्जी है। शरीर पर खुजली भी होने लगती है और कई बार छाती पर लालिमा उभर आती है। मुझे स्वयं भी एक-आध बार ऐसा महसूस हुआ। मैंने इस विषय पर गंभीरता से सोचना शुरू किया। भाग्यवश मेरी नज़रों के सामने यूट्यूब पर एक वीडियो आया, जो कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट में शामिल तत्वों की व्याख्या कर रहा था। यह वीडियो सच में आँखें खोलने वाला था। ब्रिटेन के अग्रणी लॉन्ड्री डिटर्जेंट पाउडरों एवं लिक्विड डिटर्जेंट आदि मनुष्य के शरीर के लिए कितने नुकसानदेह साबित हो सकते हैं, इसकी गहराई से पड़ताल की गई थी।

ज़ाहिर है, साहित्यकार का मन कहाँ संतुष्ट होता है। कल्पना की उड़ान सोचने लगी कि जब ये साबुन और डिटर्जेंट मौजूद नहीं थे, तो इंसान कैसे नहाता और कपड़े धोता होगा। हमारे राजा-महाराजाओं और रानियों के वस्त्र तो आलीशान होते थे, भला उन्हें धोया कैसे जाता होगा? स्नान तो उन्हें भी करना पड़ता होगा, तो फिर हज़ारों सालों में कपड़े धोने और नहाने के साधन क्या रहे होंगे।

यह तो ज़ाहिर है कि आम आदमी और अमीर लोगों के कपड़े धोने और नहाने के साधन अलग-अलग होते होंगे। चाहे किसी भी युग में कितनी भी खुशहाली हो, सुदामा और कृष्ण तो हर युग में होते होंगे। यह भी एक शोध का विषय बनता है कि रामायण और महाभारत काल में नहाने और कपड़े धोने के साधन क्या होते होंगे। वैसे महारानियों को दूध, दही और उबटन से नहाते तो दिखाया गया है, मगर रामायण काल का धोबी कपड़े कैसे धोता था, इसका ज़िक्र कहीं मुझे नहीं मिला।

ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल, यानी कि ईसा से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व, नहाने और कपड़े धोने के लिए नीम, रीठा, शिकाकाई और हल्दी का इस्तेमाल किया जाता था। नीम की पत्तियों और तेल को विशेष रूप से जीवाणु-रोधी माना जाता था। रीठा तो नहाने और कपड़े धोने का राजा कहा जाता था। बाद में महिलाएँ रीठा और शिकाकाई का विशेष रूप से बाल धोने में भी उपयोग करती रहीं। आज तो हमें रीठा और शिकाकाई के शैम्पू भी बाज़ार में दिखाई दे जाते हैं।

गाँव का आम आदमी भी तो यह काम करता ही होगा। खोजने पर पता चला कि नदी और तालाब के किनारे एक सफेद-सा पाउडर बिखरा रहता है, जिसे ‘रेह’ कहा जाता है। इस पर कोई खर्च भी नहीं होता था और भारत में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। बस इस ‘रेह’ को पानी में मिलाकर कपड़े धो लिए जाते थे। हाँ, इस विधि में कपड़े धोने की थापी की ज़रूरत तो पड़ती ही थी। आज के इंसान में नज़ाकत बढ़ गई है, थापी का इस्तेमाल कम से कम शहरों में तो लगभग बंद ही हो चुका है।

हो सकता है कि यह बात ऐसा अहसास दे कि हम प्राचीन भारत की बात कर रहे हैं, मगर सच तो यह है कि कुछ दशक पहले तक भारत के गाँवों में मिट्टी और राख को बदन पर रगड़कर लोग नहाया करते थे। मगर एक ध्यान देने लायक बात यह भी है कि राख और मिट्टी का इस्तेमाल बर्तनों को साफ़ करने के लिए भी होता था। इंसान मिट्टी से बना है, इसलिए सफ़ाई के लिए मिट्टी की ओर ही आकर्षित होता था।

जिसे साबुन की बट्टी कहते हैं, भारत में उसका आगमन अंग्रेज़ी राज के दौरान सन 1897 में लाइफ़बॉय साबुन के रूप में हुआ। वहीं कपड़े धोने के लिए इसी साबुन के निर्माता लीवर ब्रदर्स (भारत में ‘हिंदुस्तान लीवर’) ने सनलाइट साबुन बनाया। हमारे बचपन में ये दोनों ब्रांड बहुत ही लोकप्रिय थे। मगर तब तक हमाम, सिंथॉल, रेक्सोना और लक्स जैसे नहाने के साबुन और कपड़े धोने के देसी साबुन आम मिलने लगे थे।

भारत में पहला लॉन्ड्री डिटर्जेंट ‘लीवर ब्रदर्स’ का ‘सर्फ़’ ही था। उसके बाद तो ऐसे कपड़े धोने के पाउडरों की कतार ही लग गई। रिन कंपनी का विज्ञापन तो उस ज़माने में वायरल ही था-“भला उसकी कमीज़, मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे?” दरअसल यह केवल डिटर्जेंट द्वारा कमीज़ में पैदा की गई सफ़ेदी तक सीमित नहीं था, यह वाक्य जीवन में ईर्ष्या का पर्याय बन गया था। इसे जीवन के हर पहलू में इस्तेमाल किया जाने लगा था।

1988 तक भारत के घरों में कपड़े हाथ से ही धोए जाते थे, चाहे गृहिणी कपड़े ख़ुद धोए या फिर काम करने वाली बाई। 1988 में वीडियोकॉन ने भारत में पहली घरेलू वॉशिंग मशीन से भारतीय घरों का परिचय करवाया। मुझे याद है, यह हरे रंग की होती थी और हमारे घर में भी सबसे पहली वॉशिंग मशीन यही थी। वैसे अमेरिका और यूरोप में तो वॉशिंग मशीन का निर्माण 1939 से ही शुरू हो गया था। वीडियोकॉन की इस मशीन को ट्विन-टब मशीन कहा जाता था, जिसमें दो खाने होते थे-एक में कपड़े धोए जाते थे और दूसरे में उन पर पानी डालकर उनमें से साबुन निकालकर खंगाला जाता था।

फिर यहाँ से टॉप-लोडिंग ऑटोमैटिक मशीन बनी और अंततः आज की आधुनिक फ़्रंट-लोडिंग वॉशिंग मशीन। जब तक कपड़े हाथ से धोए जाते थे, डिटर्जेंट सरल, सादे और हाथों के लिए तुलनात्मक रूप से सुरक्षित होते थे। मगर जैसे-जैसे वॉशिंग मशीनें अत्याधुनिक होने लगीं, डिटर्जेंट आसमान छूने वाले वादे करने लगे और अपनी प्रवृत्ति में कठोर से कठोर होते गए। तमाम कंपनियाँ अपने डिटर्जेंट में इस्तेमाल की गई सामग्री के स्थान पर अधिक पैसा विज्ञापनों पर ख़र्च करने लगीं। उपभोक्ता को विश्वास दिला दिया जाता है कि “उनकी कमीज़ से अधिक सफ़ेद किसी की कमीज़ नहीं।”

ब्रिटेन में जिन आठ लॉन्ड्री डिटर्जेंट्स पर प्रयोग किए गए, उनमें शामिल हैं- सर्फ़, डैज़, बोल्ड, फ़ेयरी नॉन-बायो, एरियल, कंफ़र्ट, पर्सिल और एरियल पॉड्स (Surf, Daz, Bold, Fairy Non-bio, Arial, Comfort, Persil, Arial Pods)। और पाया गया कि इन आठों में जैसे एक प्रतियोगिता चल रही है कि कौन-सा डिटर्जेंट सबसे अधिक हानिकारक है। याद रहे कि ये लॉन्ड्री डिटर्जेंट वहाँ के सबसे अधिक बिकने वाले डिटर्जेंट हैं।

इन उत्पादों के लगातार इस्तेमाल से त्वचा एवं श्वसन संबंधी समस्याएँ, हार्मोनल असंतुलन एवं प्रजनन संबंधी समस्याएँ, और यहाँ तक कि कैंसर का खतरा भी हो सकता है। होता यह है कि डिटर्जेंट में उपस्थित केमिकल पूरी तरह पानी के साथ बह नहीं जाते, वे कपड़ों के ऊपर चिपके रह जाते हैं, और वही इन तमाम बीमारियों का कारण बनते हैं।

इन उत्पादों में सोडियम लॉरिल सल्फेट (SLS) और सोडियम लॉरेथ सल्फेट (SLES) उपयोग किए जाते हैं, क्योंकि ये झाग बनाने वाले एजेंट हैं, जो डिटर्जेंट को झाग बनाने और गंदगी हटाने में मदद करते हैं। मगर इनसे त्वचा में जलन, एक्जिमा और डर्मेटाइटिस होने की पूरी संभावना रहती है, विशेषकर संवेदनशील व्यक्तियों में। ये त्वचा के प्राकृतिक तेलों को हटा सकते हैं, जिससे त्वचा रूखी और जलनयुक्त हो जाती है।

यदि इसमें डाइऑक्सेन की मिलावट भी हो, तो कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। डाइऑक्सेन एक कैंसरकारी रसायन है, जो डिटर्जेंट निर्माण का उप-उत्पाद होता है, और लेबल पर इसका उल्लेख अक्सर नहीं होता।

फ़ॉस्फेट और ईडीटीए (एथिलीनडायमाइनटेट्राएसिटिक एसिड) का उपयोग कठोर जल (हार्ड वॉटर) को नरम (सॉफ़्ट वॉटर) करने और सफ़ाई की क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। ये शरीर पर तो असर करते ही हैं- त्वचा में जलन और एलर्जी पैदा करते हैं- साथ ही वातावरण को भी दूषित करते हैं। ये बायोडिग्रेडेबल नहीं होते और वॉशिंग मशीन से निकलने वाले पानी में जीवित बने रहते हैं, जिससे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचता है।

ऑप्टिकल ब्राइटनर्स (कपड़ों में चमक पैदा करने वाले पदार्थ) का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि कपड़े अधिक सफ़ेद और चमकदार दिखाई दें। ये अल्ट्रा-वायलेट किरणों का उपयोग करके कपड़ों को अधिक उजला दिखाते हैं, मगर इनसे एलर्जी और त्वचा में जलन हो सकती है। साथ ही हार्मोनल असंतुलन भी हो सकता है। कपड़े धोने के बाद भी ये कपड़ों में चिपके रहते हैं, जिससे त्वचा पर इनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।

कृत्रिम सुगंध उपभोक्ताओं को आकर्षित करती है। विज्ञापनों में जब एक सुंदर नारी धुले हुए कपड़ों को सूँघकर मस्ती में आँखें बंद कर लेती है, तो उपभोक्ता के मन में लॉन्ड्री डिटर्जेंट के प्रति आकर्षण पैदा होता है। ताजगी भरी खुशबू के लिए कृत्रिम सुगंध मिलाई जाती है, लेकिन इनमें अक्सर हानिकारक रसायन होते हैं। इनसे श्वास संबंधी समस्याएँ, सिरदर्द और एलर्जी हो सकती है।

क्लोरीन ब्लीच (सोडियम हाइपोक्लोराइट) दाग-धब्बे हटाने और कपड़ों को सफ़ेद करने वाले डिटर्जेंट में पाया जाता है। मगर यह ब्लीच विषाक्त गैसें छोड़ता है, जिससे श्वसन संबंधी समस्याएँ और आँखों में जलन हो सकती है। अन्य रसायनों के साथ मिलकर यह कैंसरकारी उप-उत्पाद उत्पन्न कर सकता है। यह जल स्रोतों को दूषित करता है, जिससे जलीय जीवन को नुकसान पहुँचता है। सोचिये विश्व भर में कितनी करोड़ों वाशिंग मशीनें हर रोज़ कितना प्रदूषण वातावरण में फैला रही होंगी और पर्यावरण को किस कदर नुकसान पहुंचा रही होंगी।

अमोनिया से बने ‘क्वाट्स’ (Quats) जीवाणुरोधी एजेंट होते हैं, जो दुर्गंध दूर करने में सहायक होते हैं। मगर ये स्वयं अस्थमा, फेफड़ों में जलन और त्वचा की संवेदनशीलता से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। साथ ही ये एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के विकास में भी योगदान दे सकते हैं।

तो आपने देख लिया कि आजकल के कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट में मौजूद रसायन त्वचा में जलन से लेकर हार्मोनल असंतुलन और कैंसर के खतरे तक, कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। प्राकृतिक और विष-रहित विकल्पों को चुनकर आप अपने स्वास्थ्य और पृथ्वी, यानी कि पर्यावरण-दोनों की रक्षा कर सकते हैं।

पर्यावरण के अनुकूल कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट का इस्तेमाल शुरू करें, हानिकारक रसायनों से बचें और अपने घर को एक सुरक्षित और स्वस्थ स्थान बनाएं। अब समय आ गया है कि हम सफ़ाई को और अधिक बेहतर बनाएं, न कि कठोर।

आज हमने आपके सामने सफ़ेदी का दावा करने वाली डिटर्जेंट कंपनियों का स्याह चिट्ठा प्रस्तुत कर दिया है। सच ही कहा गया है कि सफ़ेद भी स्याह हो सकता है!

 

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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43 टिप्पणी

  1. अच्छी जानकारी लेकिन ये तलाश करना कि कौन सबसे कम हानिकारक ही मुश्किल है क्योंकि सभी कहीं न कहीं हानिकारक तो हैं ही, हम सब एक नकली हानिकारक और मिलावटी वस्तुओं के उपयोग करने को अभिशप्त हो चुके हैं, यही है हमारे आधुनिक जीवन का सच

  2. इंसान प्रकृति के करीब था तो बीमारियां भी कम थीं अब जीवन जीने के कृतिम साधन रासायनिक तत्वों से भरे हुए हैं अतः तरह तरह की बीमारी देखने सुनने में आ रहीं हैं।बचपन में माँ को रीठा उबालकर उसके पानी से उलन के कपड़े धोते देखा था शिकाकाई से हम बाल धोते थे, लंबी चोटियों का जमाना याद आ गया दुनिया बहुत आगे बढ़ गई।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  3. बीती रात जब सब मीठी नींद के आगोश में जा चुके थे तब मेरी नजर पुरवाई के ताजा अंक के संपादकीय पर ठहर गई। तेजेंद्र जी भी कमाल करते हैं कभी कूड़े की गाड़ी तो कभी डिंक सोसाइटी तो कभी स्कूल राईम और अब डिटर्जेंट पर इतनी गहराई से लिखा कि रामयुग का नदी के तट पर कपड़े धोता धोबी, अंगीठी पर दादी अम्मा के द्वारा रीठे उबालकर कपड़े धोना फिर ट्विन मशीन सब कुछ एकसाथ आंखों के सामने दृश्य आ गए। थापी का तो नाम भी आज के बच्चे नहीं जानते होंगे। बैट जैसी दिखती थापी से हम लोगों ने तो बैट बॉल भी खूब खेला हुआ है। घर के आंगन में हैंडपंप या कुएं के पास या गुसलखाने में कपड़े धोते हुए थापी से कपड़ों की जमकर पिटाई की जाती थी। उस दौर में मिट्टी या राख से हाथ धोए जाते थे। आज के लोगों को मिट्टी से हाथ साफ करने को कहा जाए तो वे इसे शुद्ध नहीं मानेंगे। आज तो साबुन की टिकिया, तरल साबुन, सेनेटाइजर, पेपर सोप, पाउडर के रूप में डिटर्जेंट न जाने कौन कौन से रूप में हमारे जीवन में शामिल है। इनके द्वारा होने वाले दुष्परिणामों को जानकर भी इनसे दूरी बनाना बहुत कठिन है। सारा संपादकीय पढ़कर रोंगटे खड़े हो गए कि ये झाग वाले एजेंट मानव व पर्यावरण के लिए काफी नुकसानदेह हैं। सारी असलियत जानने के बाद अब किसी की सफेद कमीज देखकर मुंह से निकलेगा इसकी कमीज कितनी स्याह है यानी ज्यादा खतरा सहा है।

    • सुनीता जी, आपने तो इतनी तरल टिप्पणी की है जो नदी की धार की तरह बहती जा रही है। इस रामबाण टिप्पणी के लिये आपको हार्दिक धन्यवाद।

  4. सादर नमस्कार सर…
    वस्ताव में… साहित्य किसमें नहीं है!!!
    डिटेर्जेंट ने कैसे हमारी प्राचीन सभ्यता को बदल दिया… इस शोधपूर्ण संपादकीय को पढ़ने पर स्मरण हुआ…
    साधुवाद सर,…
    वास्तव में आधुनिकता ने उस समय भी हमें प्रकृति से विछिन्न कर दिया था… आज हमें केवल ‘Products’ ही चाहिए जो कृत्रिम है…
    अब यदि ये सबकुछ समझ में आ भी जाए तो क्या… प्रकृति में रीठा, शिकाकाई भी अदृश्य होती जा रही है…
    मानव सभ्यता जो कि सदा प्रकृति निर्भर रही… आज प्रकृति मानव पर निर्भर करती है ताकि…वह और मानव दोनों जीवित रहें….
    साधुवाद सर…. इतना सुंदर और महत्वपूर्ण संपादकीय हेतु…

    • हार्दिक धन्यवाद अनिमा जी। आप का निरंतर समर्थन पुरवाई के लिये बहुत महत्वपूर्ण है।

  5. वास्तव में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी से लैस संपादकीय।
    हर बार की तरह आपके विषय का चयन अचंभित करता है। कौन सोच सकता है जो स्वच्छ करने के लिए बना है स्वयं कितना मलीन है..!

  6. आदरणीय भाई,
    सादर प्रणाम। आज का संपादकीय पढते हुए सुखद आश्चर्य, बचपन की स्मृतियां कपडे धोने के विभिन्न तरीके ,बचपन से अब तक न जाने कितनी यादें सिमट आयीं। आप भी नये नये अछूते से प्रसंग ले आते हैं जिनपर पर लिखना तो दूर लोग सहज सोचते भी नहीं। नानी के गांव में गंगा जी के किनारे की मिट्टी से या मुलतानी मिट्टी से. बाल धोया करते थे ,नहाते थे सभी।आपने सच लिखा कि नदी तट की रेह से कपडे धुलते थे और साफ भी होते।फिर सनलाईट और लाइफबाय का युग आया,लेकिन कभी एलर्जी या किसी त्वचा रोग का कारण नहीं बने । ये नहाने धोने के साधन सहज सुलभ और स्वीकार्य भी थे। गांव हो या शहर ,अमीर गरीब के प्रसाधन सामग्रियों में विशेष अंतर नहीं रहा। काशी नरेश की रानियां और लखनऊ के नवाब भी गुलाब हल्दी से बने उबटन लगाकर महकते रहते थे। आपने डिटर्जेंट और केमिकल युक्त साबुन, शैंपू की बात की तो यह बात बहुत आसानी से समझ आ गई कि इन चीजों को सालों तक सुरक्षित रखने के लिए भी तो केमिकल और प्रिजर्वेटिव्स इस्तेमाल होते हैं जो त्वचा के लिए हानिकारक हैं। पर्यावरण भी दूषित होता है।जैसा कि पुरवाई में आपने बताया —
    “फ़ॉस्फेट और ईडीटीए (एथिलीनडायमाइनटेट्राएसिटिक एसिड) का उपयोग कठोर जल (हार्ड वॉटर) को नरम (सॉफ़्ट वॉटर) करने और सफ़ाई की क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। ये शरीर पर तो असर करते ही हैं- त्वचा में जलन और एलर्जी पैदा करते हैं- साथ ही वातावरण को भी दूषित करते हैं। ये बायोडिग्रेडेबल नहीं होते और वॉशिंग मशीन से निकलने वाले पानी में जीवित बने रहते हैं, जिससे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचता है।”
    बहुत अच्छा सारगर्भित जीवनोपयोगी और आवश्यक विषय पर लिखा संपादकीय आंखें खोलता है।क्या हमें फिर से वापस प्राकृतिक उपादानों की ओर लौटना चाहिए? शायद आने वाला समय ऐसा ही होगा।
    बहुत बहुत बधाई और आभार भी इस सुंदर सार्थक संपादकीय के लिए। सादर प्रणाम भाई।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • प्रिय पद्मा, बेहतरीन टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद। तुमने लिखा है – “बहुत अच्छा सारगर्भित जीवनोपयोगी और आवश्यक विषय पर लिखा संपादकीय आंखें खोलता है।क्या हमें फिर से वापस प्राकृतिक उपादानों की ओर लौटना चाहिए? शायद आने वाला समय ऐसा ही होगा।” प्राकृतिक उत्पादों की ओर लौटना आवश्यक है।

  7. इस संपादकीय की बात ही क्या कहें सर! सफेदी भी स्याह हो सकती है। ‘सकता’ शब्द भ्रामक तो नहीं है पर संभावनाओं से भरा जरूर है। खैर छोड़ो इसको। हम तो संपादकीय पर ही अपनी बात रखेंगे।
    गवेषणा शैली नए-नए विषय ईजाद कराती है। इसका मतलब होता है कि आप हर विषय को बारीकी से पकड़ते हैं और उसकी तह तक जाकर उसके वास्तविक तत्वों को पाठक के सामने रख देते हैं। ऐसे विषय पढ़ने लायक भी हो जाते हैं अर्थात पाठक चाहे बहुपाठी ही क्यों न हो, ऐसे नवीन विषय में अपनी रुचि दिखाने लगता है।
    यह संपादकीय संवेदना से जन्म लेती है। मित्र के शरीर की एलर्जी (तकलीफ) ने संपादक महोदय के दिलो-दिमाग में उथल-पुथल मचा दी। उन्हें इसका कारण ढूंढने पर मजबूर कर दिया गया। मित्र की एलर्जी एक तरह से व्यक्तिगत थी पर संपादकीय का साथ पाकर यह सार्वभौमिक हो गई।
    विश्व अत्यधिक जनसंख्या के बोझ से जूझ रहा है। मनुष्यों के भरण-पोषण की प्राकृतिक चीजें उससे दूर जा चुकी हैं। वह खाद्य सामग्री हो या साफ-सफाई में प्रयोग होने वाले साबुन , सभी में हानिकारक केमिकलों का योगदान देखने को मिल रहा है। ये केमिकल धरती के सभी प्राणियों के लिए नुकसानदायक है। खासकर मनुष्यों के लिए अधिक खतरनाक है। क्योंकि वह सबसे ज्यादा प्रयोग इन्हीं चीजों का कर रहा है।
    मिलावटखोरी ने जनमानस के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाला है। जानते-बूझते भी हमें इन चीजों का इस्तेमाल करना ही पड़ता है। आज का मनुष्य इस मामले में जितना विवश है उतना शायद ही किसी युग में रहा होगा। हम चाहकर भी इनसे पिंड नहीं छुड़ा सकते हैं। ये हमारे जीवन के अंग बन चुके हैं। सच तो यह है कि हम कुछ कर पाने की स्थिति में हैं भी नहीं हैं। धुलाई वाला एक केमिकल हटाएंगे तो दूसरा लेना पड़ेगा। और दूसरा केमिकल भी मौसी का लड़का नहीं होगा जो हमारा अहित न करेगा।
    तब??
    हमारे शरीर को उसी तरह की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानी पड़ेगी। डार्विन का सिद्धांत यही कहता है कि जो अपने आपको वातावरण के अनुकूल ढाल लेता है वही इस दुनिया में जीवित रह पाता है। शेष को प्रकृति माफ नहीं करती है।
    संपादकीय समस्या मूलक न होकर समस्या प्रधान है। इसमें समस्याएं तो रख दी गई है पर समाधान की बात नहीं की गई है। समाधान पाठकों पर छोड़ दिया गया है। पाठक इस विषय पर चिंतन में डूबता है, पर निष्कर्ष तक पहुंचने में अधूरापन महसूस करता है।

    • प्रिय भाई लखन लाल पाल जी, आपने लिखा है – “खाद्य सामग्री हो या साफ-सफाई में प्रयोग होने वाले साबुन, सभी में हानिकारक केमिकलों का योगदान देखने को मिल रहा है। ये केमिकल धरती के सभी प्राणियों के लिए नुकसानदायक है। खासकर मनुष्यों के लिए अधिक खतरनाक है। क्योंकि वह सबसे ज्यादा प्रयोग इन्हीं चीजों का कर रहा है।” सच में स्थिति चिन्ताजनक है।

  8. ओह! कोई. सपने में भी नहीं सोच सकता कि डिटर्जेंट शरीर के लिए कितने खतरनाक हैं। सफेदी की चमकार इतनी मंहगी भी हो सकती है।.सतर्क और सावधान करती महत्वपूर्ण. संपादकीय। बह एक.सर्वे यह होना चाहिए कि कितने कैंसर रोगी के परिवार में वाशिंग मशीन का उपयोग हो रहा.है।
    चेतना जागृत करने वाली संपादकीय।
    आत्मीय बधाई और अभिनंदन

    • अरोड़ा साहब, आपका सुझाव काबिले तारीफ़ है… संपादकीय को पसंद करने के लिये आत्मीय धन्यवाद।

  9. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    आपके इस विस्तृत और गहन शोधपरक संपादकीय को पढ़कर वास्तव में आँखें खुल गईं। आपने ‘सफ़ेदी भी स्याह हो सकती है’ के माध्यम से जिस प्रकार आधुनिक जीवनशैली के एक अत्यंत सामान्य किंतु घातक पहलू का विश्लेषण किया है, वह आपकी सूक्ष्म दृष्टि और समाज के प्रति आपकी चिंता को दर्शाता है। आपने न केवल डिटर्जेंट के रसायनों पर बात की है, बल्कि हमारे गौरवशाली अतीत से लेकर वर्तमान की मशीनी चकाचौंध तक का जो सफर साझा किया है, वह अद्भुत है।
    आपने संपादकीय की शुरुआत में ही एक बहुत बड़ी कड़वी सच्चाई को उजागर किया है कि इंसान की बनाई हर चीज़ प्रकृति के लिए बोझ बनती जा रही है। विशेष रूप से ब्रिटेन के डिटर्जेंट पाउडरों और लिक्विड पर जो आपने शोध प्रस्तुत किया है, वह डराने वाला है। आपने जिस तरह से सोडियम लॉरिल सल्फेट, डाइऑक्सेन, और ऑप्टिकल ब्राइटनर्स जैसे रसायनों के स्याह पक्ष को खोला है, उससे स्पष्ट होता है कि हम जिसे ‘सफ़ेदी’ समझकर खुश हो रहे हैं, वह दरअसल बीमारियों का एक जाल है। कैंसर, त्वचा रोग और हार्मोनल असंतुलन जैसे खतरों के प्रति आपकी यह चेतावनी अत्यंत सामयिक है।
    लेखन के क्रम में आपने जब अतीत की ओर रुख किया, तब संपादकीय का वह हिस्सा सबसे अधिक प्रभावित करने वाला रहा। आपने रामायण और महाभारत कालीन स्वच्छता पद्धतियों पर जो जिज्ञासा व्यक्त की और फिर वैदिक काल के नीम, रीठा, शिकाकाई और हल्दी जैसे प्राकृतिक तत्त्वों का स्मरण कराया, वह हमें हमारी जड़ों की वैज्ञानिकता से जोड़ता है। आपने जिस प्रकार नदी किनारे मिलने वाली ‘रेह’, मिट्टी और राख के उपयोग का वर्णन किया है, वह याद दिलाता है कि भारत की प्राचीन जीवनशैली कितनी पर्यावरण-अनुकूल और निरापद थी। रीठे को ‘नहाने और कपड़े धोने का राजा’ कहकर आपने पारंपरिक ज्ञान को उचित सम्मान दिया है।
    आपने भारत में साबुन और डिटर्जेंट के इतिहास को जिस क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया है, वह अत्यंत रोचक है। 1897 में ‘लाइफ़बॉय’ और ‘सनलाइट” के आगमन से लेकर सर्फ़ और फिर 1988 में वीडियोकॉन की पहली वॉशिंग मशीन तक का सफ़र आपने अपनी यादों के साथ पिरोया है। “भला उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे?” जैसे विज्ञापनों का उल्लेख कर आपने यह सटीक चोट की है कि कैसे इन कंपनियों ने ‘सफ़ेदी’ को केवल कपड़ों तक सीमित न रखकर उसे मानवीय ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा का पर्याय बना दिया। विज्ञापनों के पीछे छिपे इन रसायनों के ‘स्याह चिट्ठे’ को आपने बहुत ही सहजता से पाठकों के सामने रख दिया है।
    आपकी यह अपील अत्यंत मार्मिक और विचारणीय है कि अब समय आ गया है जब हमें सफ़ाई को ‘कठोर’ नहीं बल्कि ‘बेहतर’ बनाना होगा। आपने जलीय जीवन और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जो चर्चा की है, वह एक ज़िम्मेदार वैश्विक नागरिक की पुकार लगती है। आपका यह संपादकीय केवल एक लेख नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन और सुरक्षित पर्यावरण की दिशा में एक सशक्त घोषणापत्र है। सचमुच, आपने सिद्ध कर दिया कि विज्ञापनों की वह चमकती सफ़ेदी अपने भीतर कितना स्याह सच छिपाए बैठी है। आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति हर पाठक को अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती है।

    • प्रिय भाई चंद्रशेखर जी, आपने संपादकीय के बारे में लिखा है कि – “आपका यह संपादकीय केवल एक लेख नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन और सुरक्षित पर्यावरण की दिशा में एक सशक्त घोषणापत्र है। सचमुच, आपने सिद्ध कर दिया कि विज्ञापनों की वह चमकती सफ़ेदी अपने भीतर कितना स्याह सच छिपाए बैठी है। आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति हर पाठक को अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती है।” आपने संपादकीय के मर्म को पकड़ा है। हमेशा की तरह संपादकीय का पूरा विश्लेषण किया है।

  10. जीवनोपयोगी, महत्वपूर्ण, शोधपरक सम्पादकीय पढ़ते हुए एक विचार मन में आता रहा कि कैसे आप ऐसी छोटी से छोटी बात को ढूँढ लेते हैंऔर फिर उसे साहित्यिक रूप देकर रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक उसे पूरा पढ़े बिना छोड़ता नहीं।जिन नित्य प्रतिदिन आँखों के सामने आने वाली बातें , वस्तुओं की ओर सामान्य जन का ध्यान नहीं जाता आप उसका विस्तृत विश्लेषण, पूरा इतिहास बताकर महत्वपूर्ण बना देते हैं। हमने रीठे आँवले, कपड़े धोने वाले सोडा से लेकर अति अत्याधुनिक डिटर्जेंट का उपयोग किया है परउसके कालेपन की ओर ध्यान ही नहीं दिया। अब जब आपने आँखें खोल ही दी हैं तो सोचना भी पड़ेगा॥ साधुवाद तेजेंद्र जी।

    • सुदर्शन जी जब आप जैसे प्रबुद्ध पाठकों तक संपादकीय का मर्म पहुंच जाता है तो हम संतुष्ट हो जाते हैं कि हम सफल हो गये। हार्दिक आभार आपका।

  11. इस बार के सम्पादकीय को पढ़कर मान गए जितेन्द्र भाई आपकी खोज को। क्या बढ़िया विषय चुना है। पता नहीं किन किन कैमिकल से भरे हुए जो आजकल नए नए डिटरजैण्ट मार्केट में आ रहे हैं वो कपड़ों को साफ़ तो कर देंगे लेकिन कैमिकलों से धुले इन कपड़ों से जो शरीर पर असर होगा उसकी तो बनाने वाली कम्पनियों को परवाह नहीं। बस उनकी बॉटम लाइन दिन पर दिन मोटी होनी चाहिए जिस से शेयरहोल्डर भी खुश रहेंगे।

    पहनने के कपड़े तो हज़ारों साल से धोए जारहे हैं। इस के मुकाबले में जुम्मा जुम्मा वाशिंग मशीन और डिटरजैण्ट को तो आठ दिन ही हुए हैं। चलिए मेरे साथ जितेन्द्र भाई आज पुराने धोबीघाट की मैमोरी लेन में जहाँ आपको धोबी प्यारेलाल के हाथों “हमारे कपड़े कैसे धुलते थे” वाला दृष्य देखने को मिलेगा। डिटरजैण्ट के नाम पर प्यारे लाल किन किन साधनों का उपयोग करता है उसकी फ़हरिस्त कुछ ऐसे है।
    1. रेह एक प्रकार की सफ़ेद मिट्टी होती है, जिसमें सोडियम सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट और कैल्शियम सल्फेट होता है। इसे पानी में घोलकर इसमें कपड़े भिगो दिए जाते थे, जिससे कपड़ों से सारी गंदगी हट जाती थी, फिर हल्का सा रगड़कर उसे पत्थर या मुगरी से पीटकर कपड़ों को धोया जाता था।
    2. नदी तालाबों के पास जमने वाली सफेद परत जिसे नोना कहा जाता था।
    3. रीठा
    4. सोडा
    5. हिगोंट के फल
    6. मुल्तानी मिट्टी और गिलिस्रीन
    7. जब कुछ भी नहीं मिलता था तो नदी किनारे की सूखी मिट्टी में गीले कपड़े लपेटकर थोड़ी देर के लिए रखदेते थे,और मोगरी से कूट-पीट कर पछीट कर धोते थे।

    यहाँ मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हमें लकीर के फ़कीर बन कर पुराने रिवाज़ों को बनाए रखना चाहिए। समय के साथ तरक्की होती है और तरक्की से बदलाव आना आम बात है। इन बदलावों को अपनाने से पहले क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि इसका लोगों के स्वास्थ पर और पर्यावरण पर क्या असर होगा

    • विजय भाई, आपकी टिप्पणी ने भावुक कर दिया। आपने बिल्कुल ठीक कहा है कि – हमें लकीर के फ़कीर बन कर पुराने रिवाज़ों को बनाए रखना चाहिए। समय के साथ तरक्की होती है और तरक्की से बदलाव आना आम बात है। इन बदलावों को अपनाने से पहले क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि इसका लोगों के स्वास्थ पर और पर्यावरण पर क्या असर होगा

  12. दैनिक लोक व्यवहार में प्रयुक्त सामान्य वस्तुओं को वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषित कर सम्पादकीय विषयवस्तु बना देना वाक़ई सराहनीय और विचारणीय है ।
    प्राचीन काल से लेकर अत्याधुनिक साधनों को यादकर किस समय क्या प्रचलित था?
    इन वस्तुओं के संबन्ध में विस्तृत विवरण सहित सामाजिक – सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य पर भी दृष्टिपात किया गया है । बहुत मशक़्क़त का काम है यह ।
    प्रतिष्ठित कथाकार /सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा को बहुत बधाई ।

    “ पुरवाई “ का यह अंक कविता /समीक्षा आदि विधाओं की दृष्टि से भी पठनीय है ।
    ——
    मीनकेतन प्रधान
    रायगढ़ ( छत्तीसगढ़) भारत

  13. अत्यंत श्रमसाध्य शोधपरक आलेख, पुरानी स्मृतियों में हमें डुबकी लगवा कर सत्यता को निरूपित किया। कोई क्षेत्र नहीं छूटा जिसमें स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाले तत्व न हों। कैसे मिल पायेगा व्यापक रूप से फैले इन विंषैले रासायनिकों छुटकारा पाना। सबसे बड़ा दायित्व तो उपभोक्ताओं का होगा जो इन चीज़ों के इस्तेमाल पर रोक लगा दें। यह जानते हुए भी कि हेयर डाई कितनी हानिकारक है फिर भी बूढ़ा, बूढ़ी कहलाने के डर से बाल रंगना नहीं छोड़ेंगे।
    यहाँ जागरूकता बहुत महत्वपूर्ण है। क़ानूनी रूप से हानिकारक उत्पादकों में सख़्ती प्रशासन की ज़िम्मेदारी हो और हम आम इंसानों पर निर्धारित नियमों प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर जुर्माना या अन्य दंड। हम आशावान तो हैं कि समाधान निकलेगा पर वह गाना याद आता है कि” देर न हो जाय कहीं देर न हो जाय।” काश आपके संपादकीय से कान पर जूँ रेंग सके।

  14. शरीर पर एलर्जी और खुजली से चली यात्रा में आपने वैदिक काल से कपड़े धोने के साथ आधुनिक युग में कपड़े धोने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली वाशिंग मशीन तथा उपयोग में लाये जाने वाले डिटर्जेंट तथा ज्यादा सफ़ेद करने के लिए ब्लीचिंग एजेंट के फायदे नुकसान का संतुलित विश्लेषण का खाका खींचकर अचंभित कर दिया है।

    हर बार की तरह नया विषय तथा उसका सार्थक विश्लेषण। सच मनुष्य ने अपनी जिंदगी बेहतर बनाने के लिए अनेक चीजों की खोज की, उन्हें बनाया किन्तु इस खोज ने उसकी सुविधाओं में तो इजाफा किया किन्तु उनके साइड इफेक्टस से अछूता नहीं रह पाया। जिसका खामियाजा इंसान किसी न किसी रूप में सदैव से भुगतता ही आ रहा है।
    स्वस्थ जीवन के लिए प्रकृति का सानिध्य आवश्यक है।
    आवश्यक प्रश्नों को उठाता तथा समाधान करता ‘सफेदी भी स्याह हो सकती है!’ आँखें खोलने वाला
    ज्ञानवर्धक आलेख है।
    बधाई आपको।

    • सुधा जी, आपने बहुत सही कहा है कि – “सच मनुष्य ने अपनी जिंदगी बेहतर बनाने के लिए अनेक चीजों की खोज की, उन्हें बनाया किन्तु इस खोज ने उसकी सुविधाओं में तो इजाफा किया किन्तु उनके साइड इफेक्टस से अछूता नहीं रह पाया। जिसका खामियाजा इंसान किसी न किसी रूप में सदैव से भुगतता ही आ रहा है। स्वस्थ जीवन के लिए प्रकृति का सानिध्य आवश्यक है।” हार्दिक धन्यवाद।

  15. आदरणीय तेजेन्द्र जी,
    आपके संपादकीय के आधार पर संपादकीयता के मानदंड तय किए जा सकते हैं। हम रोज़ जिन डिटर्जेंट का इस्तेमाल करते हैं, उनके बारे में इतनी गंभीर बातें शायद ही कभी सोचते हैं। “सफ़ेदी” के पीछे छिपे नुकसान को जिस सरल तरीके से बताया है, वह आँखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं। खास बात यह कि आपने सिर्फ समस्या नहीं बताई, बल्कि पुराने समय के प्राकृतिक तरीकों, जैसे- नीम, रीठा, शिकाकाई की याद दिलाकर मार्गदर्शन भी किया। आज हम सुविधा के पीछे इतने भाग रहे हैं कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को नजरअंदाज कर देते हैं। यह लेख उसी लापरवाही पर हल्का-सा, किंतु जोरदार झटका देता है। पढ़ते-पढ़ते लगा कि अब थोड़ा सतर्क होना ही पड़ेगा। छोटी-सी आदत में बदलाव करके हम खुद को और प्रकृति को काफी हद तक सुरक्षित रख सकते हैं।

    • सुषमा जी,आपने संपादकीय पर एक ख़ूबसूरत एवं सार्थक टिप्पणी की है। आपने सही कहा है कि – छोटी सी आदत में बदलाव करके हम ख़ुद को और प्रकृति को काफ़ी हद तक सुरक्षित रख सकते हैं।

  16. पत्रकारिता और साहित्यकार के साथ साथ वैज्ञानिकता के संयोजन से सजा यह संपादकीय
    अर्वाचीन ,प्राचीन ,अतीत और वर्तमान की यात्रा मार्ग से सुसज्जित है।
    वरिष्ठ नागरिक की उपाधि से विभूषित समस्त मित्र इस संपादकीय के माध्यम से यादों को मज़े से जीकर खंगाल सकते हैं उन लम्हों को।गंध से सुगंध,प्रकृति से कृत्रिम,स्वस्थ से अस्वस्थ,सभी कुछ एक संपादकीय में और वह भी विशुद्ध केमिस्ट्री और बायोलॉजी के साथ मेडिकल नसीहत के साथ।इसीलिए ये हमारे प्रवासी साहित्यकार और MBE की चमक के साथ हर संपादकीय में तर्क और औचित्य के साथ गणितीय समीकरण सा मंज़र पेश करते हैं
    और वह भी हास्य और व्यंग्य की चुटकी के साथ। यकीन नहीं आया ना,,,आयेगा भी कैसे ,,,सब तो आभासी दुनिया में खोए हैं ,,,आईए तनिक बाहर आईए या मम्मी जी की थापी की आवाज़ ! धमकी या हल्के वार खाकर भागते नज़र आयेंगे,,,और सीधे गली में बैट्समैन बने और विकेट के पीछे दोनों चप्पलों को ग्लब्स बनाकर क्रमिच बाल से क्रिकेट खेलते और डांट
    खाते हुए मम्मी करेंगे।
    बढ़िया और शरारतों को याद दिलाता गुदगुदाता संपादकीय।
    बधाई हो बधाई।

    • इसे कहते हैं मज़ेदारम टिप्पणी… क्या बात कही है… आइए तनिक बाहर आईए या मम्मी जी की थापी की आवाज़ ! धमकी या हल्के वार खाकर भागते नज़र आयेंगे… और सीधे गली में बैट्समैन बने और विकेट के पीछे दोनों चप्पलों को ग्लब्स बनाकर क्रमिच बाल से क्रिकेट खेलते और डांट खाते हुए मम्मी करेंगे। बढ़िया और शरारतों को याद दिलाता गुदगुदाता संपादकीय।

  17. आप तो कमाल कर देते हो सर जी यानी की आप मिट्टी को भी हाथ लगाओ तो उसमें से भी संपादकीय निकल आएगी,
    भई कुछ हो या ना हो इस संपादकीय से हमें यह पता चल गया कि आज तक हमारी तंदुरुस्ती की रक्षा की शुरुआत कपड़ों की धुलाई लाइफ बाय सनलाइट से शुरू हुई थी जो हमारे पैदा होने के 54 साल पहले ही ईजाद हो चुका था यानी 1897 में बाप रे बाप कितना पुराना है यह साबुन रेक्सोना सिंथॉल लक्स की शुरुआत भी हो चुकी थी हमें बखूबी याद है एक एड महिला का जूड़े वाला सिर्फ गले तक का चित्र आता था शायद रिन का ही था तब हमारी एक सहेली एक दिन हमारे घर पर आई और उसने स्लेट पर उस चित्र को चाक से बना दिया हम बड़े हतप्रभ रह गए
    कि आखिर इसने कैसे बनाया हमारी जिज्ञासा इतनी बढ़ी कि हमने उस चित्र को एक महीने तक नहीं मिटाया उसे देख-देख कर प्रैक्टिस करते रहे, कभी पेपर से कार्बन लगाकर कॉपी की कालांतर में यह रूचि हमारी रेखा चित्रों में बदल गई और हमारी नोटबुक कॉपी का कोई भी हाशिया ऐसा नहीं बचता था जिसमें कोई रेखाचित्र फूल पत्ती चेहरा ना बना हो बहरहाल
    बात हानिकारक डिटर्जेंट जो साबुन बनाने में आज तक इस्तेमाल होते जा रहे हैं उनसे होने वाला नुकसान बहुत ही डरा देने वाला है
    आपने जो लिस्ट हानिकारक तत्वों की बताई है सोडियम लॉरेल सल्फेट डायोक्सीन फास्फेट ई डी टी ए की मिलावट ऑप्टिकल वाइटनर्स कृत्रिम सुगंध वाले रसायन क्लोरीन ब्लीच अमोनिया क्वाटस जीवाणु रोधी एजेंट
    यह सब पढ़ कर होश फाख्ता हो गए हम कि
    सफेदी के नाम पर हमारा शरीर क्या कुछ नहीं झेल रहा ओर तो ओर समाज में ईर्ष्या करने की होड़ करने का दुर्भाव भी इन डिटर्जेंट बनाने वाली कंपनियों के एडवर्टाइज से बहुत ज्यादा फैला,
    लेकिन अब इस युग में तो हम फास्ट भागने वाली जनरेशन फिर से रीठा शिकाकाई नींबू फिटकरी सोडा सिरका इस्तेमाल तो नहीं कर सकते हां लेकिन जब आता है एड , सफेदी की चमकार नींबू के साथ, सफेदी की चमकार फूलों की खुशबू के साथ, सफेदी की चमकार आयुर्वेदिक नीम के तत्वों के साथ ऐसे ही फिटकरी कभी सोडा कभी रीठा से बना उत्पाद आएगा तो इस्तेमाल किया जाएगा वरना किसको फुर्सत की रीठा उबाले फिटकरी सिरका में कपड़े एक निश्चित समय तक भिगोकर रखें हालांकि हानिकारक डिटर्जेंट पाउडर की लिस्ट देखकर मन में यह ख्याल जरूर आया कि यह सब आपकी संपादकिय की कॉपी स्वास्थ्य मंत्री को प्रेषित जरूर कर दी जाए ताकि वह इसकी गंभीरता नुकसान बीमारियों को देखते हुए एक सटीक निर्णय ले सके और डिटर्जेंट बनाने वाली इन फैक्ट्रियों पर हानिकारक तत्वों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा सके ,
    वैसे कुछ भी कहो सर आप लाजवाब है हर संपादकीय कुछ न कुछ सीख पाठकों को दे जाती है।

    • कुंती जी, आपको पुरवाई के संपादकीय पसंद आते हैं और आप सार्थक एवं गहरी टिप्पणी भी करती हैं। आपने सही रेखांकित किया है कि – आपने जो लिस्ट हानिकारक तत्वों की बताई है सोडियम लॉरेल सल्फेट डायोक्सीन फास्फेट ई डी टी ए की मिलावट ऑप्टिकल वाइटनर्स कृत्रिम सुगंध वाले रसायन क्लोरीन ब्लीच अमोनिया क्वाटस जीवाणु रोधी एजेंट – यह सब पढ़ कर होश फाख्ता हो गए हम कि सफेदी के नाम पर हमारा शरीर क्या कुछ नहीं झेल रहा। स्नेह बनाए रखें।

  18. इतने गंभीर विषय पर तो कभी ध्यान ही नहीं गया
    महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए बहुत-बहुत आभार

  19. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    हर बार की तरह इस बार का संपादकीय भी विचारणीय है। वैभव की चमक,आराम पसंद जिंदगी और सुविधाओं का बाजार जितना प्रगति कर रहा है, नुकसानों की लिस्ट भी उतनी ही बढ़ती जा रही है।

    दो दिन पूर्व ही हमारे एक दामाद से *भूमि आंवला* (ज्यादातर लोग भूँईं आँवला कहते हैं)आयुर्वेदिक औषधि वाले पौधे के बारे में चर्चा करते हुए यह प्रसंग आया था कि आजकल लोगों को बदन में खुजली की शिकायत बहुत हो रही है। एलर्जी प्रॉब्लम्स बहुत हो रही हैं।

    इत्तेफाक की बात है कि आपका संपादकीय डिटर्जेंट को लेकर एलर्जी की बात कर रहा है। संभवतः संपादकीय उनकी बताई एलर्जी से वास्ता रखता हो।

    रामायण महाभारत काल का तो पता नहीं,
    लेकिन जब हम लोग छोटे-छोटे थे तो हमने आँवले का तेल घर में बनाते हुए, मंजन,
    शीकाकाई, कई प्रकार के चूरण और कपड़े धोने का साबुन भी बनातेदेखा और सुना।

    उस समय साधन और सुविधाएँ बहुत कम थीं, लेकिन महिलाओं के लिए काम बहुत था।
    उपयोग करने वाली कोई भी चीज ऐसी नहीं थी जो हाथ से ना बनती रही।

    हमें लगता है 80 के बाद परिवर्तनों में तेजी आई है।

    शिकाकाई सिर धोने के लिए काम आती है लेकिन यह रीठा, आँवला के अतिरिक्त भी कई आयुर्वेदिक चीजों से मिलकर बनती है।इसमें रीठा झाग बनाता है।

    हो सकता है इस प्रकार का कोई पाउडर बनता हो जिससे रामायण और महाभारत काल में कपड़े धोए जाते रहे हों क्योंकि आयुर्वेद काफी समृद्ध है हर मामले में।

    उबटन या चिक्सा आज भी चलता है। प्राय: वैवाहिक अवसरों पर इसका प्रयोग ज्यादा करते हैं और नरक चतुर्दशी पर तो उबटन लगाकर नहाने का महत्व है। वैसे भी महिलाएँ और विशेष तौर पर लड़कियाँ इसका प्रयोग सामान्यतः महीने में शायद एक-दो बार करती ही होंगी।

    हमने भी काली मिट्टी से सिर धोने और नहाने का काम बहुत किया।
    यह मिट्टी बहुत चिकनी होती है जिस दिन सिर धोना होता,उस दिन गलाकर रख लेते थे। और यह हमारा आजमाया हुआ है इसलिए हम जानते हैं कि वाकई मिट्टी से नहाना सुखकर है। बाल भी एकदम सॉफ्ट हो जाते हैं और मिट्टी पूरे शरीर का मैल निकाल देती है।

    विदेश का तो नहीं पता, के उन्होंने मिट्टी का उपयोग किया या नहीं पर अपने देश की तो मिट्टी तो कमाल की है।

    आपने सही कहा इंसान मिट्टी से बना है इसलिए मिट्टी की ओर आकर्षित होता है। बारिश की पहले बूँदें जब धरती पर पड़ती है तो उसकी सुगंध मिट्टी खाने के लिये लालायित करती है।

    हमें जहाँ तक याद है 1969 तक हमारे ससुराल में भी कोई डिटर्जेंट नहीं आता था। सर्फ भी नहीं।घरों में साबुन बनाने वाले देसी धोबी साबुन आया करते थे। और तब चादर या खोल वगैरह बड़े कपड़े धोने के लिये एक सफेद पाउडर आता था। आपने ‘रेह’ का जिक्र किया है। पर हम लोग यहाँ ‘सोडा’ कहा करते थे। कपड़े धोने का सोडा अलग आता था।खाने वाला अलग। पर पता नहीं कि रेह और सोडा एक ही चीज है या अलग-अलग।

    जो बड़े और ज्यादा गंदे कपड़े रहते थे गर्म पानी में सोडा डालते थे और उसमें कपड़ों को गला देते थे। उसमें झाग नहीं निकलता था। आपने सही कहा कि उसे मोगरी या कुटेला(यहाँ यही कहते हैं । जो लकड़ी की और बैट के आकार की रहती है। आपके हिसाब से थापी)से पीटकर या कहें कूटकर धोना पड़ता था। और निश्चित रूप से कपड़े बहुत साफ धुलते थे।
    सिर्फ पानी में मिलाने से साफ नहीं होता था। गर्म पानी में ज्यादा असर होता था। अब तो यह लगभग सभी जगह बंद हो गया है पता नहीं मार्केट में भी है या नहीं।
    पर साबुन बनाने में भी शायद इसका इस्तेमाल होताट था रीठे के साथ।

    इसके बाद आपने जितनी लंबी लिस्ट कंपनियों के नाम की और डिटर्जेंट में मिलाई जाने वाली नुकसान दायक चीजों की बताई; सुनकर आश्चर्य हुआ, तकलीफ हुई और चिंता भी। उन्हें अपने पैसों से मतलब है। इंसान को उससे कितना ही नुकसान हो रहा है या पर्यावरण को क्या नुकसान है; इससे उन्हें कोई मतलब नहीं।

    यह वर्तमान की सच्चाई है। बहुत सामयिक और चिंताजनक विषय पर आपकी संपादकीय दृष्टि पड़ी है जिससे सिर्फ मानव को ही नहीं, पर्यावरण को भी बहुत नुकसान है क्योंकि निम्न वर्ग को अगर छोड़ दें तो शायद ही कोई ऐसा घर हो जहाँ वाशिंग मशीन नहीं।
    सफेदी का स्याह रंग महसूस भी हुआ और तकलीफ भी दे गया।सफाई बनाम बीमारी और जल प्रदूषण।

    मानव जीवन व पर्यावरण के हित के लिए सचेत करते इस संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
    पुरवाई का आभार।

  20. आदरणीय नीलिमा जी आपको संपादकीय ने आपके जीवन के वर्ष 1969 में ले जाकर खड़ा कर दिया और आप ने अपने जीवन के तमाम अनुभव पाठकों के साथ साझा कर दिये। आपने सही कहा है कि इन डिटर्जेंट पाउडरों से मानव को ही नहीं पर्यावरण को भी बहुत नुक्सान पहुंच रहा है। यह संपादकीय सही मायने में मानव जीवन वा पर्यावरण के हित के लिये सचेत करने वाला है।

  21. नमस्कार संपादक जी,

    सच ! आपके विशाल ग्यान भंडार की क्या बात है ! मैं तो शब्द शून्य हो जाती हूँ l हर एक विषय इतना स्पष्ट और मौलिक होता है कि हमें उसके प्रत्युत्तर में लिखने के लिए कुछ बचता ही नहीँ है l चाहे वह बाबा बाबा ब्लेक शीप हो, डिन्क टिका डिन्क हो, गांधी बनाम गाँधी हो मिमिक्री कलाकार हो l आपको एक छोटे से दिया की टिमटिमाती रोशनी बस मिल जाए, आप उसे ज्ञान का विशाल रूप देकर प्रस्तुत कर देते हैं l धन्य हैं आप l
    अब साबुन, डिटर्जेंट या शैंपू को ही ले लो l वह भी संपादकीय का विषय बन गया l इनका इतिहास सामने आ गया l
    इतना तो पता है कि प्राचीन काल में, स्नान करने या वस्त्र साफ करने के लिए प्राकृतिक वस्तुएँ जैसे रीठा, शिकाकाई, मुल्तानी मिट्टी वगैरह प्रयोग में लाई जाती थी l हालाकि आज के समय की तुलना में वे इतनी प्रभावी नहीं थी, पर उनके साइड इफेक्ट भी नहीं होते थे l

    समय के साथ साथ रूप बदलता गया l उनमें मानव निर्मित घटक जैसे कास्टिंग सोडा, अन्य रसायन मिलाए जाने लगे l वह असरदार तो, थे पर नुकसान दायक भी थे l
    ….. और आज तो हम
    उनका य़ह रूप देख ही रहे हैं l त्वचा से सबंधित बहुत सारी बीमारियां साबुन और शैंपू के कारण भी होती हैं l

    सम्पादक जी,
    आप विषय से संबंधित सारी बातें स्पष्ट तौर पर लिखकर, पाठकों के उपर छोड़ देते हैं l लो भाई ! ये अच्छाईया हैं ये बुराइयाँ हैं, फैसला आपके हाथ में हैं l

    इसके साथ आंकड़े, तारीख, नाम, इतिहास तो इसमें होते ही हैं जो विषय को गरिमामय बना देते हैं l इन्हीं सब बातों को देखते हुए हर रविवार को पुरवाई का और सबसे ज्यादा संपादकीय का इंतजार रहता है l हमेशा लगता है, देखें इस रविवार कौन-सा अभूत पूर्व विषय पढ़ने को मिलेगा l धन्यवाद जी l

    • उषा जी इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए दिल से शुक्रिया। आपका स्नेह और समर्थन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

  22. सर समस्या की जड़ यह है कि हर एक चीज़ की परिभाषा गड़ दी गई है। सुंदर होने की परिभाषा जिसमें गोरी त्वचा ही सबसे बड़ा मानदंड है। स्वस्थ होने की परिभाषा सांचे में ढला शरीर।‌ स्मार्ट होने की परिभाषा चमकदार कपड़े। इन परिभाषाओं को व्यावसायिक दृष्टिकोण से गढ़ा गया और प्रचारित किया गया। हम सब उसके जाल में फंसे हुए हैं। अब तो त्यौहारों का महत्व भी धार्मिक कम व्यवसायिक अधिक हो गया है।

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