Monday, March 9, 2026
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संतोष तिवारी की कहानी – एक ख़त

प्रिय भाई भावेश 
आशीर्वाद 
मैं उम्मीद करती हूं कि तुम अपने परिवार के साथ दिल्ली में मजे में होंगे।पिछले दिनों पैतृक गांव धुमाकोट के…..के पड़ोसियों से पता चला कि मां जी और बाबूजी दोनों लोगों का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। जैसा कि तुम्हें पता ही है आसपास के लोग मां जी और बाबूजी की देखभाल कर रहे हैं।मैं पीरुमदारा में हूं,लेकिन बराबर हाल-चाल लेती रहती हूं।तुम्हें भी मां जी और बाबूजी के तबीयत के बारे में पता होना चाहिए, मेरा मतलब है पता होगा।अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकालकर बीच-बीच में तुमको फोन कर लेना चाहिए ऐसा मैंने पहले भी कहा था।पहाड़ों पर इस साल अधिक बारिश हुई जिसके कारण मौसम कुछ ज्यादा ठंडा हो गया है। आगामी दिनों में ठंड और बढ़ेगी।पिताजी को कफ की शिकायत रहती है,खासकर जाड़े के दिनों में उन्हें ज्यादा समस्या हो जाती है,जिससे अस्थमा बढ़ जाता है। वात रोग के कारण मां जी के दाहिने घुटने में स्वेलिंग आ गयी है।मेरा मन नहीं माना और मैं उनको देखने के लिए गांव पहुंच गई।
मुझे देखकर मां जी और बाबूजी की आंखों में आंसू आ गए।उन्होंने कहा… बेटी तुम मेरा कितना ख्याल रखती हो। भावेश तो दिल्ली जाकर के बस गया और अब वह हमारा हाल-चाल तक नहीं लेता। पहले तो कभी-कभार फोन भी कर देता था।अब वह भी बंद कर दिया।तुम्हारा दूसरा भाई सुनील प्राइवेट कंपनी में काम करने के कारण नोएडा में बहुत व्यस्त है।पिछले साल गांव में पूजा होने के कारण बहुत कम समय लेकर वह पहाड़ आया था। 
एक बहुत बड़ी समस्या आ पड़ी है कि गांव में अम्मा बाबूजी की देखभाल कैसे हो और कौन करे?इस बारे में, मैं बराबर सोचती हूं।तुम्हारे जीजा जी से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि तुम बाबूजी और मां जी को लेकर  पीरुमदारा चली जाओ। बाकी मैं देख लूंगा,लेकिन बात इतने पर खतम नहीं होती। गांव में अपना पुश्तैनी मकान है,दो नाली जमीन है।अम्मा-बाबूजी से कई बार मैंने कहा.. आप दोनों जन मेरे साथ पीरुमदारा चलकर रहिए। बहुत कहने-सुनने पर एक बार पीरुमदारा लेकर आई भी,लेकिन उनका मन यहां पर नहीं लगा,और वह फिर गांव लौट गए।अब आज की स्थिति पहले जैसी नहीं है।दोनों लोग कमजोर हो चुके हैं।उनकी देखभाल,उनके स्वास्थ्य,उनके खान-पान का ध्यान रखना अब बहुत जरूरी हो गया है।मैंने प्रयास भी किया कि किसी एक केयरटेकर को रामनगर से मैं वहां पर ले जाकर के रख दूं लेकिन इसके लिए अम्मा बाबूजी ने असहमति जताई कि किसी नए व्यक्ति के साथ हम नहीं रहेंगे।यह लिखते हुए मेरा मन भावुक है कि तीन संतानों के माता-पिता बुढ़ापे में आज अकेले जीवन काट रहे हैं। वे रामनगर की तरफ से आती हुई हर जेमो को बहुत उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं,काश, भावेश या सुनील काम से मौका निकालकर मुझे देखने आ रहे हों… पड़ोस में सरुली ताई ऐसा बता रही थीं।
भावेश……तुम्हें पता ही है 12 साल हो गए मेरी शादी के।मैं यहां अपने परिवार और बच्चों को लेकर अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हूं।कोविडकाल में सासू मां की डेथ के बाद पिताजी अकेले पड़ गए।उन्हें शुगर और बीपी दोनों की प्राब्लम है।उनकी देखभाल अब एक बड़ी जिम्मेदारी है,जबकि इस बार बाबूजी यानी ससुर जी ने ही कहा कि राधिका बेटा… तुम धुमाकोट अपने माता-पिता के साथ कुछ दिन रह आओ।लेकिन जो स्थितियां इधर के दिनों में बनी हैं,उससे मेरा मन बहुत बेचैन रहता है।क्या हो सकता है ऐसा, कि सम्मानजनक तरीके से अम्मा और बाबूजी की से इस जिंदगी कट सके। मैं जब भी पिताजी माताजी से रामनगर चलने का निवेदन करती हूं तो वह कहते हैं कि ठीक है आएंगे। मेरी अपनी सीमाएं हैं मैं बहुत चाहती हूं उनकी अवस्था को देखते एक सहयोगी की सख्त जरूरत है ,जो उनके खान-पान ,दवा आदि को समय पर उनको देता रहे लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।गांव के कुछ लोग अम्मा बाबूजी का ख्याल रखते हैं लेकिन आदमी कितना रखेगा एक दिन ,दो दिन ,तीन दिन।पीठ पीछे लोग बड़ी बातें करते हैं।लड़का नोएडा और दिल्ली में काम में इतना बिजी है कि माता-पिता की देखभाल की भी फुर्सत नहीं है। पिछले महीने मैंने सुनील को भी चिट्ठी लिखी थी। उसकी परिस्थितियां थोड़ी दूसरी हैं। प्राइवेट नौकरी,12 घंटे की कड़ी ड्यूटी है। धुमाकोट में काम नहीं। रामनगर में लाला लोगों की चौबीस घंटे की नौकरी, घुड़की ऊपर से। दिल्ली मजबूरी है। सुनील कह रहा था फोन पर ….दीदी मेरी बड़ी इच्छा होती है कि मैं माता-पिता की सेवा करूं। उनको अब मेरी जरूरत है लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। तुम आर्थिक रूप से छोटे भाई से मजबूत हो।पिछले दिनों स्कूटी खरीदने में तुमने सुनील को मदद की, सुनकर  मुझे बहुत अच्छा लगा।
तुम्हें पता है माता-पिता हमारे आदर्श हैं।उन्होंने बहुत तकलीफ़ उठाई हमारे पालन पोषण और पढ़ाई लिखाई के दिनों में। उन्होंने कभी बेटा और बेटी में अंतर नहीं किया इसलिए गांव में लोग यह कहते हैं कि राधिका तो पटवाल जी के तीसरे बेटे के समान है।वह ठीक कहते हैं।मैं भी चाहती हूं कि मैं तन मन धन से माता-पिता की इतनी सेवा करूं कि लोग उदाहरण दें।इन सब बातों पर विचार करना और हमें इस बारे में मेरे इस पत्र का उत्तर देना।
मोबाइल के दौर में लोग अपनी कुशलता के नाम पर जब अंगूठा दिखाकर एक तरह की फॉर्मेलिटी करते हैं। इस पत्र के माध्यम से मैं वह सारे विचारों को तुमसे साझा कर रही हूं जिसको सोचकर मेरी आंखें नम हुईं,जिसको पढ़कर तुम भी जरूर विचार करोगे। मुझे और भी बहुत कुछ कहना है लेकिन मैं उम्मीद करती हूं कि तुमने मेरी सारी बातों को समझ लिया होगा।तुम्हारे जीजा ने भी कहा कि एक बार अपने भाई से बात करो, जरूर कोई न कोई रास्ता निकलेगा।मैं तुम्हारा सपोर्ट करता हूं और एक बात यह भी बता दूं कि मेरे  ससुर का भी यही मन है कि  माता-पिता के साथ बहुत अच्छा व्यवहार हो।
उनको पूरी इज्जत दी जाए। उनका पूरा ख्याल रखा जाए। तो हम लोगों के घर में इस बात को लेकर  एक राय है कि जो भी हो माता-पिता का अपने गांव के प्रति लगाव है,वह भी बना रहे और तुम लोगों का काम-काज भी बढ़िया से चलता रहे।इस पत्र को पाने के बाद तुम हमसे समय निकालकर बात करना। तुम भी अपनी भावनाओं से हमें अवगत कराना ।
तुम्हारी बड़ी बहन 
राधिका 
पीरुमदारा 
रामनगर (नैनीताल)
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
संतोषकुमार दास शास्त्री 
 नैनीताल


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