डिंक दंपत्ति आमतौर पर युवा, उच्च शिक्षित और बच्चों वाले दंपत्तियों की तुलना में पूर्णकालिक नौकरी करने की अधिक संभावना रखते हैं। सामान्यतः इनकी घरेलू आय अधिक होती है, लेकिन कुछ अध्ययनों के अनुसार, बच्चों वाले परिवारों की तुलना में इनकी संचित संपत्ति कम होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि ये लोग धन संचय की अपेक्षा जीवन का आनंद उठाने में अधिक विश्वास रखते हैं।
नए शब्द, विचार, अवधारणाएँ और सिद्धांत की जानकारी हासिल करने की कोई आयु सीमा तय नहीं की गई है। जीवन के अंतिम पलों तक इंसान कुछ न कुछ नया सीख सकता है। पिछले रविवार तक मुझे एक शब्द के बारे में रत्ती भर भी ज्ञान नहीं था, मगर केवल एक टेलीफोन कॉल ने मुझे एक नई दुनिया से परिचित करवा दिया।
मैं उन ऋषि-मुनियों में से नहीं हूँ, जो अपना ज्ञान केवल सुपात्रों तक सीमित रखा करते थे। मेरा मानना है कि जो नई जानकारी मुझे हासिल होती है, ‘पुरवाई’ के पाठकों का उस जानकारी पर पूरा-पूरा हक़ है। ज्ञान ही एक ऐसी वस्तु है, जो बाँटने से बढ़ती है। हमारा कोई शरारती पाठक यह भी कह सकता है कि संपादक जी, आजकल लोग वैसे ही बहुत ज्ञान बाँट रहे हैं, कम से कम आप तो हमें बख्श दें!
तो मित्रों, मैं जो जानकारी आपके साथ साझा कर रहा हूँ, यह आप पर निर्भर है कि आप उसे हासिल करने में रुचि रखते हैं या नहीं। जो पढ़े, उसका भी भला और जो न पढ़े, उसका भी भला!
हुआ कुछ यूँ कि कश्मीर से ‘पुरवाई’ परिवार की एक सदस्य एवं साहित्यकार का फोन आया- “सर, एक लघु-कथा लिखी है। शीर्षक दिया है ‘डिंक’।” मुझे सुनाई दिया ‘ड्रिंक’! सो पूछ ही लिया- ‘क्या कश्मीर में नशे पर लिखी है?’ तो सामने से जवाब आया-“सर जी, ड्रिंक नहीं- डिंक… अंग्रेज़ी में डी.आई.एन.के. DINK”
मैं शायद कहानीकार के सामने अपनी कमजोरी स्वीकार करने से डर रहा था कि वह बेचारी क्या सोचेगी कि ‘पुरवाई’ के जिस संपादक को वह ज्ञान का स्रोत मानती है, उसे इस सीधे-सादे शब्द की जानकारी नहीं है! मगर उस फोन कॉल ने मन में हलचल मचा दी कि पता तो किया जाए कि आखिर यह ‘डिंक’ है क्या बला! मैंने तो यू-ट्यूब पर एक फिल्मी गीत ही सुन रखा था- “डिंक चिका डिंक…” सोच रहा था, क्या उस गीत में कोई संदेश छिपा था, जो मैं पकड़ नहीं पाया। सोच और शोध दोनों जारी थे।
दरअसल अंग्रेज़ी का शब्द ‘डिंक’ एक संक्षिप्ताक्षर है, जिसका विस्तार होता है ‘डबल इंकम नो किड्स’ (Double Income No Kids)। इसे ‘ड्युअल इंकम नो किड्स’ (Dual Income No Kids) भी कहा जाता है। इसका सीधा-सा अर्थ है- वे पति-पत्नी जो दोनों काम (नौकरी) करते हैं, इसलिए घर में दोहरी आय होती है, मगर उनके बच्चे नहीं होते। दोनों ने आपस में तय कर रखा होता है कि बच्चे पैदा करने और उनके पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी से बचकर अपना जीवन पूरी तरह से आनंदपूर्वक जिया जाए।
डिंक की परिभाषा के प्रमुख पहलुओं पर ध्यान दिया जाए तो ऐसे दंपत्ति (विवाहित या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले), जिनके दोनों सदस्य कमाते हैं और उनके बच्चे नहीं होते- चाहे यह उनकी पसंद हो या परिस्थितिवश। ऐसे लोगों की जीवनशैली उच्च वर्ग जैसी होती है, क्योंकि अक्सर इनके पास अधिक खर्च करने योग्य आय होती है, जिससे वे यात्रा, विलासिता-पूर्ण खर्च या जल्दी सेवानिवृत्ति का विकल्प चुन सकते हैं।
डिंक दंपत्ति आमतौर पर युवा, उच्च शिक्षित और बच्चों वाले दंपत्तियों की तुलना में पूर्णकालिक नौकरी करने की अधिक संभावना रखते हैं। सामान्यतः इनकी घरेलू आय अधिक होती है, लेकिन कुछ अध्ययनों के अनुसार, बच्चों वाले परिवारों की तुलना में इनकी संचित संपत्ति कम होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि ये लोग धन संचय की अपेक्षा जीवन का आनंद उठाने में अधिक विश्वास रखते हैं।
माता-पिता की ज़िम्मेदारियाँ न होने के कारण डिंक जोड़ों के रिश्ते में स्वायत्तता और स्वतंत्रता की भावना अधिक होती है। उन्हें अपने व्यक्तिगत और साझा लक्ष्यों को प्राथमिकता देने की स्वतंत्रता होती है, जिससे उनका आपसी बंधन मजबूत होता है और भावनात्मक घनिष्ठता बढ़ती है। आत्म-देखभाल, आत्म-सुधार और व्यक्तिगत विकास के लिए पर्याप्त समय मिलने से वे एक संतुष्टि-दायक और गतिशील साझेदारी विकसित कर सकते हैं। हालांकि, परिवार में बच्चे न होने के कारण मानसिक तनाव की स्थितियाँ भी सामने आ सकती हैं।
कुछ जोड़े ऐसे मज़ाकिया वीडियो भी पोस्ट करते हैं, जिनमें वे दावा करते हैं कि वे नियमित रूप से शानदार पार्टियों, महंगे डिनर और मनचाही खरीददारी का आनंद ले पाते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे डिंक दंपत्ति हैं। वे यह भी कहते हैं कि उनके पास हमेशा खर्च करने के लिए पैसे होते हैं, उन्हें अचानक आने वाले बिलों की चिंता नहीं होती और वे गोल्फ तथा फुटबॉल जैसे अपने शौक को प्राथमिकता दे पाते हैं।
इस संक्षिप्ताक्षर के कई अन्य रूप भी विकसित हो चुके हैं, जिनमें शामिल हैं – डिंकी अर्थात ‘दोहरी आय, अभी तक कोई बच्चे नहीं’ (DINKY “Double Income, Not Yet Kids)”, ऐसे दंपत्ति जो भविष्य में बच्चे पैदा करने की योजना बना रहे हैं। उसके बाद ‘गिंक’ अर्थात ‘पर्यावरण के प्रति झुकाव, कोई बच्चे नहीं’ ( GINK- “Green Inclination, No Kids)”, ये वे लोग होते हैं जो पर्यावरण कारणों से बच्चे पैदा नहीं करना चाहते।‘डिंकवाड’ अर्थात दोहरी आय, बच्चे नहीं, लेकिन एक कुत्ता अवश्य ! (DINKWAD: “Double Income, No Kids With A Dog)”
डिंक की अवधारणा कोई नई नहीं है। यह शब्द 1980 के दशक से प्रचलित है, जब “यप्पी” (Yuppie) संस्कृति अपने चरम पर थी। “यप्पी” का अर्थ है- युवा, शहरी पेशेवर। समय के साथ इस शब्द की लोकप्रियता में उतार-चढ़ाव आया, लेकिन 2007 से 2009 की महामंदी के दौरान यह फिर चर्चा में आया। कुछ लोगों का मानना है कि इस जीवनशैली ने अमेरिका के मिनेसोटा राज्य के “डिंकीटाउन” नाम को भी प्रभावित किया होगा, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
जाहिर है कि ऐसे विचार अमेरिका या यूरोप से शुरू होते हैं और धीरे-धीरे भारत के महानगरों तक पहुँच जाते हैं। 1980 के दशक में शुरू हुआ यह चलन अमेरिका में काफी प्रभावशाली रहा है। प्यू रिसर्च सेंटर के 2023 के एक अध्ययन के अनुसार, 1970 में अमेरिका में 67% लोग विवाह कर बच्चे पैदा करते थे, जो 2021 में घटकर 37% रह गए।
डॉ. एमी ब्लैकस्टोन, जो अमेरिका में संतानहीनता के आंदोलन का अध्ययन करती हैं, उन्होंने एक साक्षात्कार ‘फिल शो में कहा- “कुछ लोग अपनी इच्छा से बच्चे नहीं चाहते, जबकि कुछ परिस्थितियों के कारण ऐसा करते हैं।”
जब प्यू रिसर्च सेंटर ने संतानहीन वयस्कों से पूछा कि वे बच्चे क्यों नहीं चाहते, तो 57% ने कहा- “वे बस बच्चे नहीं चाहते”, जबकि 44% ने कहा- “वे अन्य चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।” 50 वर्ष से कम आयु के ऐसे वयस्कों का प्रतिशत, जो कभी बच्चे नहीं चाहते, 2018 में 37% से बढ़कर 2023 में 47% हो गया।
भारत के महानगरों में यह प्रवृत्ति कितनी गहराई तक पहुँची है, इसका सटीक आँकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। फिर भी यह चिंता का विषय है कि यदि यह चलन बढ़ता है, तो जनसंख्या और सांस्कृतिक संतुलन पर प्रभाव पड़ सकता है। दूसरे शब्दों में यदि लोग विवाह करने के बाद बच्चे पैदा नहीं करेंगे, तो उस धर्म, सोच और विशेष परंपराओं वाली संस्कृति के लोगों की जनसंख्या में गिरावट आनी शुरू हो जाएगी, और समाज का जो हिस्सा ‘डिंक’ संस्कृति को नहीं मानता, उनकी जनसंख्या निरंतर बढ़ती ही रहेगी । इससे विश्व में गुणात्मक परिवर्तन होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । लेकिन दुनिया का नियम है- परिवर्तन। विकास और बदलाव निरंतर चलते रहते हैं और आगे भी चलते रहेंगे…
तब तक… डिंक चिका डिंक!
सच्चाई को सहज रूप से बयां करता हुआ,इस बार का संपादकीय एक अनूठे परन्तु औचित्य पूर्ण विषय पर केंद्रित है। डिंक एक सच्चाई या सही अर्थों में मानवीय अजीबोगरीब व्यवहार की बानगी है।
संयुक्त परिवार के बाद नैनो परिवार और अब जीरो की खतरनाक स्थिति को बयां करती है यह परिणीति यथा डिंक फैमिली।आदरणीय संपादक हमेशा ही कुछ नया सा परंतु प्रासंगिक विषय या सच्चाई ढूंढ ही लेते हैं!!!
उम्दा संपादकीय हेतु बधाई हो।
भाई सूर्य कांत शर्मा जी पुरवाई पत्रिका का प्रयास रहता है कि हम हर बार आपके लिये कुछ नया अवश्य लेकर आएं। आपकी टिप्पणी हमारे लिये हमेशा ही उत्साहवर्धक होती है।
हे भगवान…!!! यह कैसी मनोस्थिति है…??? कैसी विचारधारा के लोग??? Zombies हैं सबके सब। इन पश्चिमी देशों से कुछ सिखने से पहले हमारे देश की संस्कृति की सुंदरता के बारे में प्रथमतः विचार करना आवश्यक है। पर अब यह नया शब्द zen-z ने सोच -विचार को ब्लॉक करके रखा है… अब ये इतने सारे DINK, DINKY, DINKWAD आदि….!!! वासात्वमें… धीरे धीरे मानवता नाम का एक शब्द अदृश्य हो जाएगा.. विक्षनरी से भी यह शब्द अदृश्य हो जाएगा….यह अति भयानक स्थिति है….
इस नये परिवर्तन के बारे में लिखने हेतु.. आपका कोटिशः धन्यवाद आदरणीय सर…
पुरवाई पत्रिका को विश्व पटल पर ऐसे कई विषयों पर चर्चा करने हेतु सहस्र धन्यवाद….
आदरणीय अनिमा जी, यह सच में चिन्ता का विषय है। इसीलिये पुरवाई के पाठकों के लिये इस विषय को सामने लाना आवश्यक लगा।
Oh ये तो वाकई नई जानकारी है जो समाज के लिए कतई अच्छी नहीं है
आपने सही कहा आलोक भाई।
अजब-गजब दुनिया की अजब-गजब रीत।
कुड़ा-कचड़ा दुनिया की ढोते प्रतीत।।
सही फ़रमाया सरिता जी।
डंकी शब्द न जाने क्यों याद आ रहा है। आपकी पोस्ट ही नई जानकारियों के लिये पढ़ना होता है।
अरविंद भाई डंकी नहीं – डिंक – DINK – Dual Income No Kids.
नवीनतम जानकारियों से भरपूर आलेख; इसे पढ़ते हुए लगातार जो विचार मस्तिष्क को उद्वेलित कर रहे थे, वे इस संपादकीय की अंतिम चंद पंक्तियों में प्रकट किये गये हैं। यह प्रचलन किसी भी समाज/ देश के भविष्य के लिए नितांत चिंता का विषय है । आज की युवा पीढ़ी, जो निसंतान रहना फैशन समझ रही है या अपनी ज़रूरत या सुविधानुसार इस तरह से जीवन व्यतीत कर रही है , उसे यह समझने की आवश्यकता है कि भविष्य में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा वृद्ध होगा । युवाओं की जनसंख्या में कमी किसी भी देश या समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है । पर्यावरण की चिंता के चलते संतान न करके श्वान को पालने वालों को भी समझना होगा कि पर्यावरण के संतुलन के लिए भी मनुष्य का होना आवश्यक है। जानवर के साथ एक इंसान के बच्चे को गोद लेकर भी विवेकपूर्ण संतुलन स्थापित किया जा सकता है । धर्म / परम्परा विशेष की जनसंख्या में गिरावट का विचार ही भय पैदा कर रहा है । आधुनिकता का यह मूल्य भी चुकाना पड़ सकता
है…. सोचनीय विषय है।
इस विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए धन्यवाद! क्या पता इसे पढ़ने के बाद किसी किस्म की जागरूकता का जन्म हो जाये ! …
तब तक के लिए डिंक चिका डिंक।
धर्म / परम्परा विशेष की जनसंख्या में गिरावट का विचार ही भय पैदा कर रहा है । आधुनिकता का यह मूल्य भी चुकाना पड़ सकता
है…. सोचनीय विषय है।…. चिंताजनक स्थिति।
आज के अपने संपादकीय में आपने बड़े शहरों के समृद्घ विवाहित जोड़ों में लोकप्रिय हो रहे
डिंक दम्पत्तियों की जीवन- शैली व विचारधारा पर केवल प्रकाश ही नहीं डाला, किंतु उन के प्रभाव व प्रतिघात की चर्चा भी की है।
इधर यह विषय भारत के सोशल मीडिया पर भी अपनी पकड़ बढ़ा रहा है। ज्वलंत इस चर्चा को पुरवाई के पाठकों के सामने लाकर इसमें आपने जो सामाजिक विश्लेषण जोड़ा है, उस के लिए ढेरों धन्यवाद।
शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
आदरणीय दीपक जी… आपकी टिप्पणी तो हमारे लिये हमेशा स्पेशल वाली होती है।
आदरणीय सर,
सादर प्रणाम।
आपने संपादकीय ‘डिंक चिका डिंक’ के माध्यम से एक ऐसे विषय को पाठकों के सामने रखा है, जो आज के बदलते समाज की नब्ज़ पकड़ता है। नए शब्दों और आधुनिक जीवनशैली की जटिल अवधारणाओं को जिस सहजता के साथ आपने साझा किया है, वह न केवल हमारी जानकारी बढ़ाता है, बल्कि यह भी बताता है कि सीखने और सिखाने की कोई उम्र नहीं होती। ज्ञान को केवल ‘सुपात्रों’ तक सीमित न रखकर उसे ‘पुरवाई’ के पाठकों तक सहर्ष पहुँचाने की आपकी यह पारदर्शी और उदार दृष्टि वास्तव में सराहनीय है।
संपादकीय की उल्लेखनीय विशेषता इसकी अत्यंत रोचक और आत्मीय शुरुआत है। कश्मीर से आए एक फोन कॉल और ‘डिंक’ शब्द की जिज्ञासा से शुरू होकर ‘डिंक चिका डिंक’ गाने के मज़ेदार संदर्भ तक का सफर पाठक को विषय से पूरी तरह जोड़ देता है। आपने ‘डबल इनकम नो किड्स’ (DINK) के समाजशास्त्रीय पहलुओं (आर्थिक स्वतंत्रता, विलासिता और व्यक्तिगत आज़ादी) पर जो विश्लेषण किया है, वह यह समझने में मदद करता है कि आज की उच्च शिक्षित युवा पीढ़ी पारंपरिक पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर क्यों भाग रही है। 1980 के दशक की ‘यप्पी’ (Yuppie) संस्कृति से इसका ऐतिहासिक जुड़ाव दिखाना आपकी गहरी शोधपरक दृष्टि और व्यापक अध्ययन का परिचायक है।
आपने ‘डिंक’ के साथ-साथ ‘डिंकी’, ‘गिंक’ और ‘डिंकवाड’ जैसे जो नए और दिलचस्प शब्द सामने रखे हैं, वे यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि आधुनिक समाज अपनी प्राथमिकताओं को किस तरह नए-नए नाम दे रहा है। विशेषकर पर्यावरण की चिंता के कारण स्वेच्छा से संतानहीन रहने का चुनाव (GINK), या संतान के स्थान पर पालतू पशुओं को परिवार का हिस्सा बनाना (DINKWAD), आधुनिक मनुष्य की बदलती मानसिक और सामाजिक जरूरतों को बहुत ही सूक्ष्मता से रेखांकित करता है। इन आधुनिक विसंगतियों और बदलावों को आपने जिस सरलता से शब्दों में पिरोया है, वह आपकी विलक्षण संपादन कला और विषय पर आपकी पकड़ को दर्शाता है।
संपादकीय का उत्तरार्ध विशेष रूप से विचारोत्तेजक और गंभीर है, जहाँ आपने इस जीवनशैली के दूरगामी परिणामों की ओर संकेत किया है। ‘प्यू रिसर्च सेंटर’ के आंकड़ों के बहाने आपने जो वैश्विक तस्वीर पेश की है, वह केवल एक सांख्यिकीय गिरावट नहीं बल्कि भविष्य के प्रति एक बड़ी चेतावनी है। आपका यह तर्क बहुत वजनदार है कि यदि समाज का एक प्रबुद्ध और सक्षम हिस्सा केवल निजी सुख और ‘स्पेस’ के लिए संतानहीनता का मार्ग चुनेगा, तो इससे न केवल जनसंख्या का संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि विशिष्ट परंपराओं और संस्कृतियों के अस्तित्व पर भी गहरा संकट आ सकता है। समाज के एक हिस्से का ‘डिंक’ संस्कृति को अपनाना और दूसरे हिस्से का निरंतर बढ़ना, आने वाले समय में एक बड़ा सांस्कृतिक और गुणात्मक बदलाव ला सकता है, जिसे आपने बहुत बेबाकी से उभारा है।
आपने अपनी विशिष्ट शैली में बिना किसी पूर्वग्रह के एक आधुनिक बदलाव को चित्रित किया है, जो पाठकों को जागरूक भी करता है और भविष्य की चुनौतियों के प्रति सचेत भी।
यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संपादकीय इस अंक का संपादकीय वर्तमान समय में बदलती मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक मूल्यों का एक बेहतरीन आईना है। सूचना, ऐतिहासिक संदर्भ और भविष्य की गंभीर चिंताओं का यह अनूठा संगम निश्चित रूप से ‘पुरवाई’ के पाठकों के लिए एक अनमोल बौद्धिक उपहार है। आपकी लेखनी का यह सहज प्रवाह और वैचारिक गहराई पूरे संपादकीय को एक नई ऊँचाई और सार्थकता प्रदान करती है।
भाई चंद्रशेखर जी आपकी टिप्पणी – यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संपादकीय इस अंक का संपादकीय वर्तमान समय में बदलती मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक मूल्यों का एक बेहतरीन आईना है। सूचना, ऐतिहासिक संदर्भ और भविष्य की गंभीर चिंताओं का यह अनूठा संगम निश्चित रूप से ‘पुरवाई’ के पाठकों के लिए एक अनमोल बौद्धिक उपहार है। आपकी लेखनी का यह सहज प्रवाह और वैचारिक गहराई पूरे संपादकीय को एक नई ऊँचाई और सार्थकता प्रदान करती है।… हमारे लिये किसी ट्रॉफ़ी से कम नहीं है।
नई जानकारी देता, मानवीय संवेदनाओं को जागृत करता विचारोत्तेजक सम्पादकीय। आपने एक नए शब्द और नई जीवन शैली से अवगत कराया और उसके दुष्परिणामों के प्रति सचेत भी किया है। साधुवाद तेजेंद्र जी।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मनुष्य के बेहतर जीवन के लिए आदि काल से समाज में भी कई प्रकार के परिवर्तन हुए हैं।पर परिवर्तन वही सही है, जिससे मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक मूल्यों पर कुप्रभाव न पड़े।
सोचने वाली बात यह है कि आधुनिकता और स्व-जीवन, स्व सुख के लिए सामाजिक परम्पराओं और प्रकृति के संतुलन के विरुध्द जाना मानव जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
बड़ी से बड़ी बात या समस्या को सरलतापूर्वक पाठकों तक लाना आपकी लेखनी की विशेषता है। धन्यवाद।
सुदर्शन जी, आपने एकदम सही कहा है कि – सोचने वाली बात यह है कि आधुनिकता और स्व-जीवन, स्व सुख के लिए सामाजिक परम्पराओं और प्रकृति के संतुलन के विरुध्द जाना मानव जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।… यह सच में चिन्ता का विषय है।
सादर प्रणाम भाई. एक बार फिर चौंकाने वाला संपादकीय पढकर खुश भी हूं और अचंभित भी।सचमुच यह शब्द मैने पहली बार सुना है या इसके शाब्दिक अर्थ को समझ पायी हूं। आज के बदलते परिवेश में जहां मान्यताएं,परंपराएं रोज बनती हैं ,ढहती हैं और वैचारिक नवीनता के साथ एक नयी लीक बन रही है। आज की पीढी का यह सच भौतिकतावादी संस्कृति और जीवन शैली को बढावा दे रहा है।एकांगी जीवन जीना स्वीकार कर रही है आज की युवा पीढी। बिल्कुल नयी सोच है यह जहां परिवार नहीं बल्कि निजता को महत्व दिया जाता है।अपने सामाजिक परिवेश में हमने परिवार को प्रमुखता दी एक दायित्व की पूर्ति और मानसिक संतुष्टि के लिए लेकिन dink की यह परिभाषा कम से कम मेरे लिए तो बिल्कुल नयी है।आपके संपादकीय ने हमेशा नये मुद्दों पर बात की है,नयी जानकारियाँ दी हैं और हमें आश्चर्यचकित भी किया है। पता नहीं हमारा आने वाला समाज कैसा होगा? क्या दृष्टिकोण होगा उनका घर परिवार जीवन व सामाजिक नैतिक मूल्यों के प्रति, हम नहीं जानते ।इस संपादकीय के लिए हृदय से आभार, बहुत बहुत धन्यवाद भाई।
पद्मा, तुम एक छोटी बहन होने के नाते अपना स्नेह हमेशा पुरवाई को देती हो। तुमने आज की टिप्पणी में कहा है कि – आपके संपादकीय ने हमेशा नये मुद्दों पर बात की है,नयी जानकारियाँ दी हैं और हमें आश्चर्यचकित भी किया है। पता नहीं हमारा आने वाला समाज कैसा होगा? क्या दृष्टिकोण होगा उनका घर परिवार जीवन व सामाजिक नैतिक मूल्यों के प्रति, हम नहीं जानते ।… यह पुरवाई टीम के लिये प्रसन्नता का विषय भी है मगर तुम्हारा सवाल सोचने के लिये मजबूर करता है।
सामान्य से हट कर परंतु महत्वपूर्ण विषय पर लिखा गया यह संपादकीय केवल एक नए शब्द ‘डिंक’ (DINK) की व्याख्या नहीं करता, बल्कि आधुनिक समाज की बदलती प्राथमिकताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गहरी पड़ताल करता है। आदरणीय तेजेन्द्र जी ने जिस ईमानदारी से अपनी अनभिज्ञता को बिंदास स्वीकार करते हुए शोध की प्रक्रिया को साझा किया है, वह पाठक को विषय से तुरंत जोड़ लेती है। संपादकीय लेखन की अद्भुत
सरलता कि एक फिल्मी गीत “डिंक चिका” के माध्यम से इस गंभीर समाजशास्त्रीय विषय को जिस तरह पेश किया है, और ise बोझिल होने से भी बचा लिया है l
संपादक महोदय की स्पष्टवादिता कि कैसे पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका) से शुरू हुई यह ‘संतानहीन सुख’ की प्रवृत्ति अब भारतीय महानगरों के दरवाजों पर दस्तक दे रही है। यह आर्थिक संपन्नता और व्यक्तिगत विकास के बीच बदलते संतुलन को दर्शाता है।
मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक चिंता संपादकीय का सबसे सशक्त हिस्सा वह है जहाँ लेखक इसके दूरगामी परिणामों पर चर्चा करते हैं। ‘डिंक’ जीवनशैली जहाँ एक ओर आपसी घनिष्ठता और आर्थिक स्वतंत्रता देती है, वहीं दूसरी ओर जनसंख्या असंतुलन और सांस्कृतिक निरंतरता के लिए एक मूक चुनौती भी पेश करती है।’गिंक’ (GINK) और ‘डिंकवाड’ (DINKWAD) जैसे शब्दों का उल्लेख हमारे ज्ञानवर्धन के साथ-साथ यह भी बताता है कि आधुनिक पीढ़ी अपनी जीवनशैली को लेकर कितनी स्पष्ट और श्रेणीबद्ध (categorized) है लेकिन पथभ्रष्टता के अवसर बढ़ रहे हैं आदरणीय तेजेन्द्र जी आप की यह महत्वपूर्ण संपादकीय हमें इस विचार पर मजबूर करता है कि ‘विकास’ और ‘परिवर्तन’ के इस दौर में क्या हम वास्तव में अधिक सुखी हो रहे हैं, या हम उत्तरदायित्वों से भागते हुए एक एकाकी भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं? संपादकीय का निष्कर्ष “परिवर्तन ही दुनिया का नियम है”, एक संतुलित और यथार्थवादी समापन देता है। तेजेन्द्र जी निस्संदेह एक अत्यंत सामयिक और विचारोत्तेजक विमर्श!
किरण जी, आपकी टिप्पणी पूरे संपादकीय को बहुत गहरी नज़र से परखती है। आपने संपादकीय में उठाए हर मुद्दे पर बात रखी है। इस बेहतरीन टिप्पणी के लिये दिल से शुक्रिया।
तेजेंद्र जी आपकी सम्पादकीय एक सजग सम्पादक की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। जो पढ़ने वालों को भी सजग कर जाती है।
डिंक कपल के बारे में कई महीने पहले पढ़ा था और इस पर मनन कर रही थी कि यह तो सृष्टि के जुड़ी एक विचारधारा के विपरीत है। ऐसा नहीं है यह डिंक दंपति, आज अपनी आधुनिक विचारों के तहत में ऐसा सोच रहे हैं, वह उचित ही है। एक समय ऐसा भी आता है जबकि पैसा रुपया के रहते हुए भौतिक सुख और मौज मस्ती भी बेमानी लगने लगती है क्योंकि इंसान कभी तो चाहता है परिवार में दो लोगों के अतिरिक्त कोई तीसरा हो और शायद इसीलिए लोगों ने डॉगी पालन शुरू कर दिया है, लेकिन एक बच्चे से ज्यादा डॉगी की कवायत होती है जिम्मेवारी होती है। मेरे विचार से यह डिंक कपल की विचारधारा की उत्पत्ति पाश्चात्य से आई हो ऐसा भी नहीं है क्योंकि उनकी संस्कृति के अनुसार बच्चों के बड़े होते ही उन्हें अपने जिम्मेदारी उठाने के लिए छोड़ दिया जाता है और फिर वह दंपत्ति अपने तरीके से जीने के लिए स्वतंत्र होते हैं। उनके लिए ये बंधन हमारे देश की संस्कृति के अनुसार एक सांस्कृतिक सामाजिक बंधन नहीं है। जबकि हमारे देश में आज भी चाहे दंपति प्रेम विवाह करें अंतर्जातीय विवाह करें या फिर किसी भी रीति से अपना जीवन साथी खोजें, फिर भी अधिकांश अपनी संस्कृति के अनुसार विवाह पद्धति को एक बार अपनाना पसंद करते हैं। कई बार हिंदू मुस्लिम में विवाह हुआ तो वैदिक रीति से विवाह हुआ और उन्होंने अपने घर में मुस्लिम रीति से भी निकाह करना उचित समझा। ऐसा क्यों? क्योंकि आज भी उन्हें अपनी परंपराओं और उन परंपराओं के अंतर्गत होने वाली एक मानसिक प्रतिबद्धता में विश्वास होता है। अरे हम कुछ कर रहे हैं और अगर वह उसे परंपरा के प्रति यह संस्कार के प्रति ईमानदार है तो उस संस्कार से जुड़े अन्य संस्कारों से बचना क्यों नहीं चाहते हैं?
फिर भी डिंक दम्पति एक निश्चित उम्र और आर्थिक सम्पन्नता के बाद भी एकाकीपन महसूस करते हैं और करेंगे क्योंकि जीवन भर एकाकीपन ढोना सबके वंश की बात नहीं होती।
रेखा जी आपने एकदम सही कहा है कि – फिर भी डिंक दम्पति एक निश्चित उम्र और आर्थिक सम्पन्नता के बाद भी एकाकीपन महसूस करते हैं और करेंगे क्योंकि जीवन भर एकाकीपन ढोना सबके वश की बात नहीं होती।… अभी देखना है कि ज़ेन-जी किस करवट बैठती है।
जो एक बच्चे को है तरसता
वो सोने चाँदी में बस रहा है
जो बाल बच्चों से घर सुखी है
वो रोटियों को तरस रहा है
तेजेन्द्र भाई: पहले तो इतने बढ़िया सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद। आजकल की नई पीढ़ी का तो यह ट्रैण्ड होता जा रहा कि या तो शादी के झँझट में पड़ना ही नहीं । लेकिन ख़ुदा न ख़ास्ता; यदि किसी वजह से शादी कर भी ली तो फिर बच्चे पैदा नहीं करना और दबा के ऐश करनी है।
गृहस्थ्य जीवन का concept ख़त्म।
थके हारे दोनों मियाँ बीवी जब काम करके वापस घर आते हैं तो उनका स्वागत करने के लिए उनका प्रिय कुत्ता “शेरू” होता है। डिँक मानने वालों के पास पैसे की कमी तो होती नहीं। अब शाम का ख़ाना या तो नौकर ने बनाकर रखा होगा या फिर बाहर से ऑर्डर होगा। अधिक्तर ख़ाना बाहर से ही आता है।
घर में खाना बनाने की concept ख़त्म।
रात को देर तक मूवी देखने के बाद सुबह उठकर कौन चाय या नाशता बनाएगा? कोई बात नहीं, ऑफ़िस जाते हुए “सैकण्ड कप” से कॉफ़ी और एक मफ़िन बस नाशते के लिए काफ़ी है।
लँच की तो कोई चिन्ता ही नहीं क्योंकि इसके लिए दफ़तर के आसपास बहुत सारे रैस्टोरैण्ट जो खुल गए हैं।
यह सब शोशेबाज़ी किसी उमर तक तो ठीक चलती है लेकिन जैसे जैसे उमर बढ़ती जाती है, इस कैटग्री वाले अपने लाइफ़स्टाइल को मेण्टन नहीं कर पाते। बुढ़ापे में, जब देह के इंजर पिंजर ढ़ीले पड़ जाते हैं तो यही कपल फिर अपने आप से सवाल करता है कि!!!! कि जवानी में हम ने जो कुछ किया; क्या वो ठीक था??????
विजय भाई, इस जीवंत टिप्पणी के लिये ढेर सा धन्यवाद।
नये विषय पर बेहतरीन संपादकीय
धन्यवाद संगीता।
इस बार का संपादकीय ‘डिंक चिका डिंक’ ऐसे दंपतियों पर केंद्रित है जो धनी होकर भी संतान नहीं चाहते हैं। इन दंपतियों को डिंक कहा जाता है। संपादकीय से पहले डिंक शब्द का मतलब न तो मैंने सुना था और न ही इस बारे में कोई जानकारी थी।
इस नई ईजाद संस्कृति को जानकर मन में न जाने कितने प्रश्न उठते रहे। हमारे यहां तो बच्चे न होने पर वैद्य, डाॅक्टर, झाड़-फूंक, देव-देहुरा आदि न जाने कितने धतकरम करने पड़ते हैं। और एक यह तबका है जो बच्चे ही नहीं चाहते हैं। कारण ये कि जिंदगी आनंद से गुजारेंगे। बच्चों के झंझट में न पड़ेंगे।
उपमहाद्वीप भारत को समग्र रूप से देखें तो यहां बिना संतान वाले कुछ लोग भी मौज में रहने वाली बात करते हैं। जैसे – जिनकी किसी कारणवश शादी न हुई हो अथवा शादी न करने का मन बना लिया हो अथवा समाज या देश के लिए जीवन समर्पित कर दिया हो।
शादीशुदा दंपति के संतान न होने पर यहां का समाज इतना क्रूर हो जाता है कि उनका जीना दूभर कर देता है। उन्हें देखकर लोग टोकते हैं। कुछ तो अशुभ मानकर थूकते भी है। इस स्थिति में कई लोग आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध करने पर विवश हो जाते हैं।
बड़े-बड़े देशों और महानगरों का ‘अढ़ाई चावल हमेशा ज्यादा पकता है’। दोनों खूब पैसा कमा रहे हैं तो बच्चे पैदा न करेंगे।
मुझे महानगरीय संस्कृति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है तो मेरा टिप्पणी करना बनता नहीं है। मैं तो इतने में ही अपने मन को तसल्ली दे सकता हूं कि वहां बूढ़ों की सेवा करने वाली परंपरा विलुप्त हो रही है। उन्होंने स्वयं अपने माता-पिता की सेवा नहीं की होगी तो उनकी सेवा कौन करेगा? बढ़ती वृद्धाश्रमों की संख्या इस बात की तस्दीक करती है।
एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या यह प्रवृत्ति सृष्टि संतुलन के अनुकूल है?
यह संपादकीय दुनिया समाज के उस पक्ष को उजागर करती है कि कुछ लोग अपने आनंद के लिए सृष्टि के नियमों को धता बता रहे हैं। और मानकर चल रहे हैं कि यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न है।
प्रिय भाई लखन लाल पाल जी आपने बहुत सही सवाल उठाया है – एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या यह प्रवृत्ति सृष्टि संतुलन के अनुकूल है?
यह संपादकीय दुनिया समाज के उस पक्ष को उजागर करती है कि कुछ लोग अपने आनंद के लिए सृष्टि के नियमों को धता बता रहे हैं। और मानकर चल रहे हैं कि यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न है।… सोचना तो पड़ेगा।
बहुत ही बढ़िया। एक महत्वपूर्ण विषय पर शानदार संपादकीय। ये शब्द अर्थात डिंक जीवन इधर खूब चलन में आ गया है। आजकल शादी के 7-7, 8-8 साल हो जा रहे हैं, वे बच्चे के बारे में सोचते भी नहीं और न ही जरूरत के लिए मनी मैनेजमेंट के बारे में। बोलने पर कहते है अभी कोई प्लान नहीं किया। समझाने से भी कोई फायदा नहीं ।
एक हमारा जमाना था, बिना कोई प्लानिंग के शादी हो गई, बच्चे भी हो गए, वे सेटल भी हो गए और हम अब तक बिना किसी प्लानिंग के ही जिए जा रहे। कन्फ्यूज हूं पता नहीं वे गलत या हम गलत। समय बहुत बदल गया। जेनरेशन गैप भी बढ़ता जा रहा। हम आउटडेटेड होते जा रहे। स्थिति चिंतनीय है।
आपने बिल्कुल सही कहा सुषमा जी, हम आउटडेटेड होते जा रहे हैं। … समय बहुत बदल रहा है।
बहुत ही बढ़िया और बहुत सटीक संपादकीय इस बार ज्ञान बढ़ाने वाला है नई बातों की जानकारी देता हुआ आपका संपादकीय है सर, आपका बहुत आभार हालांकि मुझे भी पता चला है इस बारे में,, बेंगलुरु में जहां पति-पत्नी दोनों लोग जॉब करते हैं और वह बच्चे नहीं करते अधिकतर 40 साल की उम्र तक के हो गए हैं और दोनों अच्छा खासा कमाते हैं पर उनके बच्चे नहीं होते, घर में एक पैट्स पाल लेते हैं और उसकी देखभाल के लिए एक सर्वेंट रख लेते हैं, और खुद को उसका मम्मी पापा कहलाना पसंद करते हैं, उसको कोई कुछ कह नहीं सकता क्योंकि वह उनका बेटा होता है ….
बहुत ही बढ़िया और बहुत सटीक संपादकीय इस बार ज्ञान बढ़ाने वाला है नई बातों की जानकारी देता हुआ आपका संपादकीय है सर, आपका बहुत आभार हालांकि मुझे भी पता चला है इस बारे में, जब मैं बेंगलुरु में थी,..
जहां पति-पत्नी दोनों लोग जॉब करते हैं और वह बच्चे नहीं करते अधिकतर 40 साल की उम्र तक के हो गए हैं और दोनों अच्छा खासा कमाते हैं पर उनके बच्चे नहीं होते, घर में एक पैट्स पाल लेते हैं और उसकी देखभाल के लिए एक सर्वेंट रख लेते हैं, और खुद को उसका मम्मी पापा कहलाना पसंद करते हैं, उसको कोई कुछ कह नहीं सकता क्योंकि वह उनका बेटा होता है ….
बेहद खूबसूरत संपादकीय और जानकारी से परिपूर्ण। डिंक परंपरा को मानने वालों की श्रेणी में आज की युवा पीढ़ी में मेरे बच्चे भी शामिल हैं और मैं भी अन्य लोगों की तरह किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ। मेरे तर्क के सारे तीर हवा में जा रहे, एक भी निशाने पर नहीं लग रहे। अब मैं निहत्था उनके सामने विवश हूं। मुझे खुशी बस इसी बात की है कि वे अभी डिंकवाड नहीं बने। आपका संपादकीय सामयिक और विवेचना सटीक है। साधुवाद
ज्ञानवर्धन हुआ. दुनिया में तरह-तरह के लोग हैं.कुछ लोग शादी नहीं करते.कुछ लोग बच्चे पैदा नहीं करते.कुछ लोग गोद लेते हैं.लेकिन विवाह के बाद इरादतन बच्चे नहीं पैदा करना एक तरह का स्वार्थ ही है और जिम्मेदारी का भय भी.