Monday, April 20, 2026
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डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता की ग़ज़लें

ग़ज़ल 1
2122-2122-2122-212
मैं किसी के ख़्वाब के साये में हूँ महका हुआ ,
नाम अख़बारों में पढ़ कर बल्लियों उछला हुआ ।
आज उसने ‘इश्क़’ कह, फिर रख दिया है फ़ोन को ,
है ‘शकुन’ , ये दिल मेरा ‘दुष्यंत’-सा पगला हुआ ।
क्या कहें? ‘ज्वालामुखी ही आग अपनी पी गए?’
एक भी शोला कहीं दिखता नहीं दहका हुआ।
फिर अचानक बढ़ रहा है मंदिर और मस्जिद का शोर ,
फिर भड़क उट्ठे न आख़िर द्वंद्व यह सुलगा हुआ।
अब अवार्डों की फुहारें इस क़दर हैं बढ़ रही ,
हर ‘अदीब’ इस रेस में है दिख रहा दौड़ा हुआ ।
जब भी चाहा, छू लिया करते थे हम जिस चाँद को ,
“प्लूटो” जैसा दिख रहा है दूर वो चमका हुआ।
जब ‘शलभ’ जलता नहीं हैं शम्अ के अभिसार में ,
शम्अ ने भी अब तो अपना रूप है बदला हुआ ।
ग़ज़ल 2
नल में पानी है नदारद औ’ कुँएँ सूखे हुए
2122-2122-2122-212-
नल में पानी है नदारद औ’ कुँएँ सूखे हुए ,
गाँवों के मंजर पुराने हैं सभी उजड़े हुए ।
छोड़ कर जाएँ कहाँ अपनी धरा, अपना गगन ,
एक मुट्ठी दाम में सब स्वप्न हैं बिखरे हुए ।
सब उगाह लेते हैं अपनी मेहनतों के मोल तो ,
पर हमारी माँगों पर ख़ामोश ‘सब’ सोये हुए ।
गाँव की “छल्ली” बिकेगी जा के अमरीका में अब ,
धन्ने-सेठों के दिखे गोदाम फिर भरते हुए।
अपनी “रमिया” को घुमा कर लाऊँगा ‘पेरिस’ मियाँ ,
हो न जाये बूढ़ी वो बस चाँद को तकते हुए ।
अब मशालों के जलाने से बनेगा कुछ नहीं ,
अब नये ‘ज़ारों’ को देखें सूलियाँ चढ़ते हुए ।
प्यास यह तेरी ‘शलभ’ पल में धुआँ हो जायेगी ,
शम्अ जब आग़ोश में लेगी तुझे जलते हुए ।
ग़ज़ल 3
1222-1222-1222-1222
सताती है बहुत लड़की मुझे दो चोटियों वाली ,
सितारे जिसके आँचल में ज़बाँ है मोतियों वाली ।
ग़ज़ब ढाता है वो उसका चमन में सैर को आना ,
कुलाँचे भर गजाला सी ठसक से तितलियों वाली ।
वो बिफरी बाघनी-सी बन के जब हुंकार भरती है ,
दहल जाती हैं सारी बिल्डिंगें वो गुम्बदों वाली ।
गुलाबों में गुलाबों-सी शराबों में शराबों-सी ,
थिरकती उसके यौवन से डगर पगडण्डियों वाली ।
अजब-सी ख्वाहिशें रखती है ला मेरी हथेली पर ,
वो जादू की छड़ी मेरी ग़ज़ब फ़रमाइशों वाली ।
इशारों ही इशारों में हज़ारों तंज कसती है ,
लगामें कस के रखती है मेरी वो बंदिशों वाली ।
मेरे काशाने में उसका ख़लल बढ़ता ही जाता है ,
मेरे सर चढ़ के बोले है वो लड़की हुज्जतों वाली ।
वो जोबन से दहकती है वो अंगारे सी जलती है ,
गरजती है , कड़कती है किरण वो बिजलियों वाली ।
‘शलभ’ की करवटों में , ख़ल्वतों में और ख़्वाबों में ,
बसी है रूह में लड़की अभी दो चोटियों वाली ।

 


डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता
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1 टिप्पणी

  1. आदरणीय विनोद जी!।

    आपकी गजलें पढ़ीं। कुछ शेर जो ज्यादा अच्छे लगे-
    पहली ग़ज़ल से-

    *फिर अचानक बढ़ रहा है मंदिर और मस्जिद का शोर,*
    *फिर भड़क उट्ठे न आख़िर द्वंद्व यह सुलगा हुआ।*

    -अपने हित के लिए नेता लोग इस तरह की स्थितियाँ पैदा करने में थकते नहीं।

    *अब अवार्डों की फुहारें इस क़दर हैं बढ़ रही,*
    *हर ‘अदीब’ इस रेस में है दिख रहा दौड़ा हुआ* ।

    -यह आज के साहित्यिक मंच की बड़ी सच्चाई है ।

    दूसरी ग़ज़ल से-

    *नल में पानी है नदारद औ’ कुँएँ सूखे हुए ,*
    *गाँवों के मंजर पुराने हैं सभी उजड़े हुए ।*

    फिलहाल आधे से ज्यादा हिंदुस्तानी गाँवों की शायद अब भी यही स्थिति है पानी के मामले में।

    *छोड़ कर जाएँ कहाँ अपनी धरा, अपना गगन,*
    *एक मुट्ठी दाम में सब स्वप्न हैं बिखरे हुए ।*

    -यह बड़ी त्रासदी ,बड़ा दर्द है।

    *सब उगाह लेते हैं अपनी मेहनतों के मोल तो ,*
    *पर हमारी माँगों पर ख़ामोश ‘सब’ सोये हुए ।*

    -यह राजनीतिक सच्चाई है।

    *अपनी “रमिया” को घुमा कर लाऊँगा ‘पेरिस’ मियाँ ,*
    *हो न जाये बूढ़ी वो बस चाँद को तकते हुए ।*

    -बधाई इस सही निर्णय के लिये।

    तीसरी ग़ज़ल से

    *सताती है बहुत लड़की मुझे दो चोटियों वाली ,*
    *सितारे जिसके आँचल में ज़बाँ है मोतियों वाली ।*

    सर आपकी तीसरी ग़ज़ल बहुत पसंद आई ।पूरी की पूरी। *किन्तु …. किन्तु… पहले शेर की पहली पंक्ति ने ज्यादा प्रभावित किया। विश्वास ही नहीं था कि दो चोटियों पर भी कोई शायरी होगी।*
    ग़ज़लों के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई !दो चोटी वाली ग़ज़ल के लिए ज्यादा।
    प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

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