Sunday, April 26, 2026
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संपादकीय – ना इधर चैन ना उधर…

भारत में इन दिनों न्यायालय और न्यायमूर्ति ख़ासे विवादों के घेरे में हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी, दिल्ली उच्च न्यायालय की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा एवं जस्टिस तेजस करिया ने कुछ ऐसे निर्णय लिए हैं, जिन पर सोशल मीडिया में जमकर चर्चा हो रही है।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल की अपील को ठुकराते हुए उनके केस से अलग होने की माँग को अस्वीकार कर दिया। जस्टिस तेजस करिया ने केजरीवाल से जुड़े दूसरे मामले से अपने आप को अलग कर लिया। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने तो तीन दिन में तीन निर्णय लेकर ऐसा कमाल कर दिखाया, जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने 17 अप्रैल 2026 को ‘राहुल गाँधी नागरिकता केस’ में निर्णय देते हुए आदेश दिया कि राहुल गाँधी के विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज की जाए और सीबीआई मामले की जाँच करे। अगले ही दिन, 18 अप्रैल को जज साहब ने अपना ही निर्णय बदलते हुए आदेश दिया कि राहुल गाँधी को नोटिस जारी किए बिना फैसला सुनाना उचित नहीं है। इसीलिए एफ.आई.आर. और सीबीआई वाले निर्णय पर रोक लगा दी गई। और 21 अप्रैल को जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने अपने आपको इस मामले से अलग करने का फैसला सुना दिया।

भारत में न्यायिक प्रक्रिया के विरुद्ध बोलने से न्यायालय का अपमान होता है और ऐसा करने वाले को सज़ा हो सकती है। हमारा मानना है कि विश्व में जितनी भी संस्थाएँ बनी हैं, उन्हें चलाते तो इंसान ही हैं। अंग्रेज़ी में एक कहावत है- “To err is human!”, यानी गलती करना इंसान की फितरत है। तो क्या न्यायमूर्ति अपना पदभार संभालते ही आम इंसान से सुपरमैन बन जाते हैं और कभी कोई गलती नहीं करते?

इन तीन मामलों में तीन न्यायाधीशों ने अलग-अलग निर्णय लिए… क्या इन पर सवाल उठाना न्यायालय की अवमानना माना जाएगा? ‘पुरवाई’ पत्रिका का भारतीय न्याय व्यवस्था की अवमानना करने का कहीं कोई इरादा नहीं है, मगर इन मामलों की सच्चाई अपने पाठकों के सामने लाना हमारा पत्रकारिता धर्म है। हमारे पाठकों को पता होना चाहिए कि आखिर इन दिनों न्यायालयों में मामले किस तरह निपटाए जा रहे हैं।

दरअसल, जस्टिस तेजस करिया के मामले के तार एक तरह से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से भी जुड़े हुए हैं। 13 अप्रैल को जब अरविंद केजरीवाल अपना पक्ष जस्टिस स्वर्ण कांता की अदालत में रख रहे थे, तो उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया। इस मामले में एक जनहित याचिका अधिवक्ता वैभव सिंह द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में प्रस्तुत की गई।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की रिकॉर्डिंग और उसके सोशल मीडिया पर प्रसार को लेकर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि इस तरह की रिकॉर्डिंग नियमों का उल्लंघन करती हैं और इन्हें सोशल मीडिया पर प्रसारित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने अधिवक्ता वैभव सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

कोर्ट ने इस मामले में अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और पत्रकार रवीश कुमार को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई अब 6 जुलाई को होगी।

इससे पहले यह केस जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था, लेकिन जस्टिस तेजस करिया ने स्वयं को अलग कर लिया, जिसके बाद इसे नई पीठ को सौंप दिया गया। जस्टिस करिया ने अदालत में स्पष्ट किया कि एक वकील के तौर पर वे पहले इसी तरह के एक मामले में मेटा और फेसबुक की तरफ से पेश हो चुके हैं। चूँकि वर्तमान याचिका भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी से जुड़ी थी, इसलिए ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ (हितों के टकराव) से बचने के लिए उन्होंने केस छोड़ना ही उचित समझा।

जहाँ तक जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा वाले मामले का प्रश्न है, वहाँ तो अरविंद केजरीवाल ने स्वयं अदालत में अर्जी दायर की थी कि न्यायमूर्ति अपने आपको इस केस से अलग कर लें, क्योंकि उन्हें उनसे निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं है। इस मामले में अरविंद केजरीवाल अपना पक्ष स्वयं ही अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर रहे थे। उन्होंने किसी भी वकील की सहायता लेने से इनकार कर दिया था।

केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर सीधे-सीधे आरोप लगाया कि जस्टिस शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में चार बार शामिल हो चुकी हैं। उनका इन कार्यक्रमों में शामिल होना उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।

केजरीवाल यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा कि जस्टिस स्वर्ण कांता के बच्चे केंद्र सरकार के सरकारी वकील हैं और तुषार मेहता के अधीन काम करते हैं। इसीलिए उनसे निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? केजरीवाल ने दस कारण गिनवाए, जिनके चलते उन्हें जस्टिस शर्मा की अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं थी। मुझे यूट्यूब पर केजरीवाल की जिरह के वीडियो देखने का अवसर मिला और मैंने पाया कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने बहुत धैर्य से केजरीवाल के सभी बिंदु सुने।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सोमवार, 20 अप्रैल को आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एवं अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया।

जस्टिस शर्मा ने कहा कि जज किसी वादी के पूर्वाग्रह के निराधार डर को दूर करने के लिए स्वयं को मामले से अलग नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक नेता को बिना किसी आधार के किसी संस्था को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि किसी जज पर व्यक्तिगत हमला न्यायपालिका पर ही हमला होता है।

 तो ये दो मामले थे, जिनमें जस्टिस तेजस करिया ने अपने आपको केस से अलग कर लिया और जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अलग होने से मना कर दिया। मगर सबसे अधिक रहस्यमय तो इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी का व्यवहार लगा। तीन दिन में एक ही मामले पर तीन निर्णय देने का दूसरा कोई उदाहरण याद नहीं आता।

भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता विग्नेश शिशिर द्वारा राहुल गाँधी पर भारत के साथ-साथ ब्रिटिश नागरिकता लेने का आरोप लगाते हुए एफ.आई.आर. दर्ज करने की माँग की गई थी। उनकी याचिका एम.पी.-एम.एल.ए. कोर्ट से खारिज हो गई थी। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में याचिका दायर की। जस्टिस विद्यार्थी ने इस मामले पर इतना कठोर निर्णय सुनाया कि पूरे भारतीय मीडिया में हलचल मच गई। उन्होंने एक मौखिक आदेश में राहुल गाँधी पर एफ.आई.आर. दर्ज करने और मामले की जाँच सीबीआई से कराने का निर्देश दिया।

मगर अगले ही दिन कानूनी बारीकियों और पुराने फैसलों का अध्ययन करने के बाद जस्टिस विद्यार्थी ने पाया कि विपक्षी पक्ष को नोटिस दिए बिना ऐसा आदेश देना उचित नहीं है। उन्होंने अपने आदेश को संशोधित कर दिया और राहुल गाँधी को नोटिस देने का निर्देश दिया। जाहिर है कि इससे याचिकाकर्ता नाराज़ हो गए और सोशल मीडिया पर जज के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। विग्नेश शिशिर ने अदालत के खिलाफ अपने ट्वीट में सख्त भाषा का इस्तेमाल किया।

न्यायालय ने एस. विग्नेश शिशिर द्वारा सोशल मीडिया पर की गई कई विवादित पोस्टों का उल्लेख किया। इन पोस्टों में अदालत पर गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिनमें ‘फ़ाउल प्ले’, ‘बैक-रूम एक्सरसाइज़’ और ‘डीप स्टेट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जिससे न्यायालय की निष्पक्षता पर सवाल उठे।

न्यायालय ने इन टिप्पणियों को गंभीरता से लिया और कहा कि याची ने अदालत के प्रति अपना विश्वास खो दिया है। इन पोस्ट्स से सार्वजनिक रूप से अदालत की गरिमा को ठेस पहुँची है। एकल पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में उसी पीठ द्वारा मामले की सुनवाई जारी रखना उचित नहीं है। इन्हीं कारणों से जस्टिस विद्यार्थी ने अपने आपको इस केस से अलग कर लिया।

यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले कुछ दिनों से भारत का न्याय तंत्र खासे दबाव से गुजर रहा है। एक ऐसा मामला भी सामने आया है, जिसमें एक जज के घर से नोटों की बोरियाँ मिलने की बात कही जा रही है, जबकि अन्य न्यायाधीश विभिन्न प्रकार के दबावों से जूझ रहे हैं। कांग्रेस के नेता पवन खेड़ा भी एक अदालत से दूसरी अदालत के चक्कर लगा रहे हैं। राजनीतिक नेता और न्यायपालिका के बीच एक प्रकार की रस्साकशी दिखाई दे रही है। यह भारत के हित में होगा कि इन तमाम मामलों को और अधिक तूल न पकड़ने दिया जाए और उनका उचित समाधान निकाला जाए।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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22 टिप्पणी

  1. आदरणीय संपादक महोदय,
    आपका यह संपादकीय भारतीय न्यायिक व्यवस्था की जटिलताओं और विडंबनाओं को अत्यंत सशक्त, संतुलित और विचारोत्तेजक ढंग से प्रस्तुत करता है। आपने न्याय में हो रही देरी, प्रक्रियात्मक जटिलताओं और आम नागरिक की असहायता को जिस संवेदनशीलता और स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त किया है, वह पाठकों को भीतर तक झकझोरती है। लेख की भाषा सरल होते हुए भी प्रभावशाली है, जिससे विषय की गंभीरता और अधिक उभरकर सामने आती है। विशेष रूप से, आपने केवल समस्याओं का उल्लेख ही नहीं किया, बल्कि न्यायिक सुधार की आवश्यकता की ओर भी सार्थक संकेत किया है। यह संपादकीय निस्संदेह पाठकों को सोचने, समझने और न्याय व्यवस्था के प्रति जागरूक होने के लिए प्रेरित करता है।

    • यदि यह संपादकीय भारतीय न्यायिक व्यवस्था की जटिलताओं और विडंबनाओं को अत्यंत सशक्त, संतुलित और विचारोत्तेजक ढंग से प्रस्तुत करने में सफल रहा है तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। हार्दिक धन्यवाद।

  2. आपके संपादकीय के संदर्भ में यह स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को आलोचना से भयभीत नहीं होना चाहिए। विशेषकर न्यायपालिका जैसे महत्वपूर्ण स्तंभ के लिए यह और भी आवश्यक है कि वह पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के दायरे में बनी रहे। एक स्वस्थ लोकतंत्र में न्यायाधीशों को आलोचना से परे मान लेना न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत। रचनात्मक आलोचना व्यवस्था को मजबूत करती है, कमजोर नहीं। यदि न्यायपालिका स्वयं को आलोचना से ऊपर रखेगी, तो जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है। इसलिए संतुलित, जिम्मेदार और तथ्याधारित आलोचना को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अनिवार्य अंग माना जाना चाहिए।

    • आपने एकदम सही समझा है शैलेश भाई – न्यायपालिका जैसे महत्वपूर्ण स्तंभ के लिए यह और भी आवश्यक है कि वह पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के दायरे में बनी रहे… एक बार फिर धन्यवाद।

  3. हमेशा की तरह फिर एक महत्वपूर्ण विषय पर आपकी संपादकीय प्रभावी है। पुरवाई पत्रिका का संपादकीय, पत्रिका का आकर्षण है जिसकी प्रतिक्षा रहती है।
    अब तो ‘न्याय की देवी’ की आँखों पर लगी पट्टी भी हटा दी गई है और हाथों में तलवार की जगह संविधान भी पकड़ा दिया गया है। न्यायपालिका सर्वोपरि है पर निर्णयों में इस तरह की हेर फेर देख कर लगता है कि वह भी आम आदमी की तरह बच बचा कर चल रही है।
    धन्यवाद आपका

    • सुषमा जी आपने कहा है कि – पुरवाई पत्रिका का संपादकीय, पत्रिका का आकर्षण है जिसकी प्रतीक्षा रहती है। – हम आपके दिल से आभारी हैं।

  4. न इधर चैन न उधर चैन
    बस बोल न देना कोई
    खरे खरे कड़े कड़े बैन।
    बेहद साफगोई से संयमित भाषा में लिखा गया संपादकीय। भारत में न्याय को आंखों से पट्टी हटाकर सबसे पहले राजनीति से हटकर स्वच्छ और पारदर्शी छवि को जीवंत रूप से प्रस्तुत करने का भगीरथ प्रयास करना है।
    संपादकीय केवल आईना सामने रखता है जो कि पत्रकारिता का मूल धर्म और कार्य दोनों ही है।

    • भाई सूर्य कांत शर्मा जी, आपने तो गागर में सागर जैसी टिप्पणी लिख भेजी है। आपका हृदय तल से धन्यवाद।

  5. न्यायिक व्यवस्था निश्चित रूप से वही है जिसका अध्याय जाने से रोका था कोर्ट ने अगर ऐसा नहीं है तो RTI के दायरे में खुद को लाएं और खुद को खुद ही की.चयन प्रक्रिया के system से दूर हटें, आज साफ तौर से न्याय गरीबों और अमीरों के लिए अलग दिखता है, क्यों? पैसे मिलने के बाद भी ज़ज को क्यों नहीं निकाला गया ? एक रात में फैसले बदल जाते हैं, अधिकांश रेपिस्ट को, नेताओं को सजा क्यों नहीं हो पाती

  6. नमस्कार संपादक श्री
    ये फैसले चुटकी बजाते ही बदल जाते हैं क्या? किसी भी लेखन में ,विशेषकर संपादन में सदा आपकी साफ़गोई प्रभावित करती है । हम तो कहाँ ऐसी महान बातों में संलग्न हो सकते हैं ,जो भी जानने को मिलता है आपके संपादकीय के मध्यम से खुलकर जानने को मिलता है जो आप बिना किसी संकोच अथवा भय के लिए स्पष्ट करते रहे हैं व कर रहे हैं ।साधुवाद आपको
    सादर ,स्नेहिल धन्यवाद मस्तिष्क को फ़ीड देने के लिए !

    • आदरणीय प्रणव जी, आप का स्नेह और स्पष्ट समर्थन हमारे लिये आत्याधिक महत्वपूर्ण है। हार्दिक धन्यवाद।

  7. महत्वपूर्ण विषय पर विचारणीय सम्पादकीय। जो मुद्दे सिर के ऊपर से निकल जाते हैं उनके बारे में आपकी लेखनी इतनी सरल, सहज प्रभावशाली ढंग से समझा देती है कि बुद्धि के कपाट पूरी तरह खुल जाते हैं। न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता, ईमानदारी तो होनी ही चाहिए। न्याय व्यवस्था के प्रति जागरूक करते आलेख के लिए साधुवाद।

  8. जब हम न्याय प्रक्रिया और राजनेताओं के बीच की खींचतान के बारे में पढ़ते या सुनते हैं तो धक्का लगता है। विधिक जानकारी न्यून होने के कारण आमजन के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि कौन सही है और कौन गलत!
    आज की संपादकीय में न्याय प्रक्रिया की जटिलता को विभिन्न स्रोतों से जिस प्रकार से उद्घाटित किया है, वह परेशान करने वाली है। इस तरह की घटनाओं में क्यास लगाए जा रहे हैं कि कुछ जजों पर राजनेताओं द्वारा दबाव बनाया जा रहा है। इस कारण वे केस से अपने आपको अलग कर रहे हैं। राजनेता अपने केस में एक जज विशेष को नहीं रखना चाहते हैं। राजनेता और जज का व्यक्तिगत हो जाना प्रश्न खड़े करते हैं।
    इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से लेना होगा। राजनेताओं पर यदि आरोप लगे हैं तो उन आरोपों का सामना उन्हें करना चाहिए और अपनी बेगुनाही न्याय के मंदिर में साबित करनी चाहिए न कि उस प्रक्रिया को सोशल मीडिया पर पोस्ट करनी चाहिए। न्याय सबूतों पर होता है तो फिर अन्य तरह से भटकाना क्यों?
    न्याय की कुर्सी पर बैठे लोगों को भी ध्यान रखना चाहिए कि वे न्याय के मंदिर के देवता हैं। उन्हें सार्वजनिक जीवन से दूर रहना चाहिए। खासकर राजनेताओं से उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए।
    अगर इन स्थितियों को सुधारा नहीं गया तो हमारी न्याय व्यवस्था कमजोर होगी जो देश और समाज के लिए सही नहीं होगा।
    पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा गया है। उसका काम है कि अच्छी-बुरी सभी बातों को निडरता के साथ समाज के सामने लाना चाहिए।जो बातें समाज हित में हो, देशहित में हो उन्हें तो जरूर ही लाना चाहिए।
    इस संपादकीय में ये चीजें पाठक के सामने रख दी गई हैं। संपादक महोदय ने पत्रकारिता धर्म का पालन बखूबी किया है।

    • भाई लखन लाल पाल जी आपने सही कहा है कि इन स्थितियों को सुधारना होगा, वर्ना हमारी न्याय व्यवस्था कमज़ोर होगी। हार्दिक धन्यवाद।

  9. आज के अपने संपादकीय मे जिन तीन न्यायाधीशों के विभिन्न समकालिक द्रष्टिकोणों व निर्णयों को आप हमारे संज्ञान में लाए हैं,वह एक महत्वपूर्ण व चर्चित विषय है।
    ज्ञान, बुद्धि व तर्क पर आधारित हमारे न्यायालयों के विषय में अतिरिक्त जानकारी हम सभी नागरिकों के लिए महत्व रखती है।
    धन्यवाद व शुभ कामनांए
    दीपक शर्मा

    • दीपक जी हमारा प्रयास रहता है कि हम हर ज्वलंत मुद्दे को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा पाएं। आपके समर्थन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  10. प्रणाम भाई,
    एक बार फिर आपका संपादकीय चर्चा में छा गया है।हमारे देश में शासन का सबसे महत्वपूर्ण और मजबूत तंत्र न्यायपालिका ही है ।अब यदि उनके ही फैसलों से जनता का विश्वास उठ रहा है तो न्याय की उम्मीद कहां से करें?
    माननीय न्यायाधीशों द्वारा अविश्वसनीय और असंगत फैसलों ने राहुल गांधी एवं केजरीवाल जी के केस को उलझा दिया ।और कोई केस से अलग हटकर अपने दायित्व से ही मुक्त हो गये। विशेष रुप से जो विषय आम जनता और सोशल मीडिया पर चर्चित हों उनपर तर्कपूर्ण निर्णय न लेना उचित नहीं ।अपने ज्ञान बुद्धि व तर्क की कसौटी पर ही न्याय सही सही मिलना चाहिए। आपका संपादकीय पुरवाई पत्रिका का सबसे मुखर और महत्वपूर्ण पक्ष है।और हम सबके लिए बडा आकर्षण भी जिसकी हर सप्ताह प्रतीक्षा रहती है। बहुत ही जीवंत और यथार्थ प्रस्तुत किया आपने।बहुत बहुत बधाई, हार्दिक शुभ कामनाए भाई।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  11. “All animals are equal, but some animals are more equal than others.” Looks like, the accountability of the judicial fraternity, as well as the delivery of justice in our system would be doubted as deeply influenced ever by irony of this all-time paradoxical quote of George Orwell from his allegorical ‘Animal Farm’ of 1945. Despite such widely prevalent discontent across different sections of society, resulting into occasional murmur of concerns, as in your editorial, given the fallacy of the political system we inherited, unfortunately, no one sees any light at the end of the tunnel.

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