पुस्तक – सजल संग्रह : रश्मियों का अपहरण, रचयिता – ज. ल. प्रभाकर राठौर
प्रकाशक – शिवराज प्रकाशन,नई दिल्ली, मूल्य – ₹395
समीक्षक – प्रो. डॉ.विनीत मोहन औदिच्य
रश्मियों का अपहरण आदरणीय श्री ज. ल. प्रभाकर राठौर का नवीनतम सजल संग्रह है। आपका नाम शीर्षस्थ साहित्यकारों में शुमार किया जाता है। हिन्दी साहित्य की नवीन विधा सजल को प्रभाकर जी ने नूतन आयाम दिए हैं।
सजल की सजल में प्रभाकर जी सजल विधा को बहुत चतुराई से सरल भाषा में व्याख्यायित करते हैं।
रश्मियों का अपहरण का प्रारंभ माँ शारदे और मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की वंदना से करते हुए प्रभाकर जी पहली सजल में
आदर्श समाज की कल्पना करते हैं।
न तोड़ हो न फोड़ हो।
न अस्त्र-शस्त्र होड़ हो।।
दुखी रहे न एक भी।
सुखी प्रजा करोड़ हो। ।
राष्ट्र की गंभीर समस्याओं प्रति उदासीन नागरिकों का आवाह्न करते हुए वह लिखते हैं
अब तटस्थता त्यागो भी।
राष्ट्र – पक्ष में बोलो तो।
शांत, निरुद्यम क्यों बैठे?
कर्म करो कुछ डोलो तो।।
कलयुग के घोर स्वार्थी मनुष्य पर तीक्ष्ण कटाक्ष करते हुए राठौर जी कहते हैं
पाप करते सदा हम रहे।
आज गंगा नहाने चले।।
आग गुपचुप लगाए हमीं।
सामने फिर बुझाने चले।।
देश के समक्ष वर्तमान में उपस्थित तमाम गंभीर चुनौतियों से मुक्ति की प्रत्याशा में उनकी लेखनी मानसिक अवरोधों को पार करते हुए निर्बाध गति से अग्रसर होती है।
भारतीय राजनीतिक दलों के गठबंधनों की अलग अलग विचारधाराओं और स्वार्थ परक नीतियों, सांसदों के मर्यादाहीन आचरण पर इस सजल संग्रह में करारा व्यंग्य किया गया है।
संसद – गरिमा नित क्षत-विक्षत।
जनमानस के सपने आहत।।
आज अल्पमत में सच्चाई।
झूठ – पक्ष ने पाया बहुमत।।
……………..
गठबंधन में गाँठें साठ।
अपनी ढपली अपना राग।।
शांत क्षेत्र हो गया अशांत।
वक्तव्यों ने उगली आग।।
नारी की अस्मिता लुटना आज प्रतिदिन की समस्या बनी हुई है जिस पर अकुंश लगाने में हमारी राज्य सरकारें बुरी तरह से असफल रहीं हैं। नारी सुरक्षा पर चिंता जताते हुए कवि लिखता है
लुटी द्रौपदी सबके बीच।
देखा सबने आँखें मींच।।
रोज छली जाती सिय एक।
सक्रिय हैं रावण – मारीच।।
एक और सजल देखिए
पुनः प्रताड़ित अलका कोई।
जग का अश्रु न झलका कोई।।
कानों में पिघला सीसा – सा।
उद्यत हुआ तहलका कोई।।
आमजन को संबोधित कर नव आशा का संचार करते हुए प्रभाकर जी कहते हैं
असमभाव्य होता संभाव्य।
दृढ़ निश्चय रचता इतिहास।।
बनती हार, विजय – सोपान।
कभी न जाते व्यर्थ प्रयास।।
इस सजल संग्रह में कोई भी विषय अछूता नहीं रहा है। एक ओर
आतंकवाद, राजनैतिक मूल्यों में गिरावट, पर्यावरण क्षरण,
भ्रष्टाचार, संस्कारहीनता, मनुष्य का पापाचरण, दोहरा आचरण, एवं छद्म कवियों पर कठोर कुठाराघात किया गया है वहीं दूसरी ओर राष्ट्र भक्ति, सामाजिक चेतना जागरण, सत्य व न्याय प्रियता, आदर्श व्यवस्था आदि की पक्षधरिता को कवि ने अपना उतरदायित्व समझा है।
नैतिक शुचिता, दूषित आचरण और प्रगति की आकाशीय छलांग के साथ ही अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध के बीच जारी गतिरोध से उपजे वैश्विक संकट से चिंतित कवि आम जन की पीड़ा और भय को रेखांकित करता है।
युगाचरण अटपटे हुए हैं।
मर्यादा- पट फटे हुए हैं।।
सोम – भौम पर पहुँच गए हम।
निजी जड़ों से कटे हुए हैं।।
अगले विश्व युद्ध की आहट।
खड़े सभी रौंगटे हुए हैं।।
खेलों में व्याप्त राजनीति पर तीव्र प्रहार करती इस सजल को देखिए
अग्र हुआ जो रहा फिसड्डी।
अर्पित कर नोटों की गड्डी।।
खेलों का बन गया प्रमुख है।
जिसने खेली तक न कबड्डी।।
सामाजिक विषमता को लक्षित कर प्रभाकर जी कहते हैं
देखा नहीं महल ने पतझर।
झुग्गी में मधुमास नहीं है।।
उधर श्वान को अगनित व्यंजन।
इधर गाय को घास नहीं है।।
विज्ञापनों में नारी देह प्रदर्शन की आलोचना करते हुए कवि की कलम की पैनी धार प्रभावित करने वाली है।
किसी वस्तु का हो विज्ञापन।
प्रथम प्रदर्शित होती वामा।।
कैसा खेल रचा पुरुषों ने।
लगी दाँव पर घर की भामा।।
आशावादिता से परिपूर्ण कवि प्रभाकर जी की ये सजलें उल्लेखनीय है
चूर – चूर होतीं चट्टानें।
दृढ़ संघर्ष न जाता निष्फल।।
है पर्याप्त एक ही कंकड़।
मच जाती पानी में हलचल।।
और
करें आज ही काज न कल पर टालें।
निज तन – मन हो स्फूर्त, न आलस पालें।।
घृणा और विद्वेष, तिमिर के सूचक।
सुमति – प्रीति के दीप, सदा ही बालें।।
एक और उदाहरण :-
हर्ष से परिपूर्ण हम संसार रच लें।
प्रेम – पुष्पों का नया शृंगार रच लें।।
शुभ – अशुभ जो भी हुआ सो हो गया अब।
स्वप्न नव हों पूर्ण यह सुविचार रच लें।।
भ्रष्टाचार पर करारा व्यंग्य करती हुई यह सजल देखिए
पकड़े गए घूस लेते तुम।
देकर घूस गए हो फिर बच।।
बाँध, भवन, पुल, सड़कें भक्षित।
नेता को सब कुछ जाता पच।।
वर्तमान समय के तथाकथित मंचीय कवियों पर किया गया कटाक्ष साहित्य के गिरते स्तर को प्रदर्शित करता है
फूहड़ तुकबंदी मंचों पर।
नहीं काव्य में गहन कहन है।।
भाषा कठिन दुरूह भाव अति।
काव्य न ऐसा सुपचनीय है।।
निम्नलिखित सजल में समाज में व्याप्त कुरीतियों पर सशक्त वार करते हुए जागरूक किया गया है।
आज हुआ है गर्भ प्रफुल्लित।
लिंग पता कर रुला न देना।।
करना बाल विवाह कभी मत।
असमय कलिका फुला न देना।।
करना मत अबला का शोषण।
फंदे में तुम झुला न देना।।
कवि इस सजल में अपने लेखन का उद्देश्य स्पष्ट करता है जो कि अनुकरणीय है
पली हुई थी मन में पीड़ा।
बही काव्य – सरिता सी बनकर।।
मीठे गीत न गाते अब हम।
देते पर – पीड़ाओं को स्वर।।
प्रकृति के संरक्षण के अभाव में जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम उजागर हो रहे हैं
मौसमों के हुए वाम हैं आचरण।
शीत में उष्णता ग्रीष्म में शीत है।।
बिखरे सामाजिक ताने-बाने और वर्ग संघर्ष की प्रभावी अभिव्यक्ति निम्न शब्दों में प्रगट होती है।
रात को दिन कहे जग दिवस को निशा।
सत्य क्यों झूठ से आज भयभीत है!!
कर्म का क्षीरसागर मथे साथ हम।
खा गया एक ही वर्ग नवनीत है।।
पर्यावरण प्रदूषण के लिए हम सभी को उत्तरदायी ठहराती यह सजल देखें
पर्यावरण अपंग, हमारे ही कारण।
धुँधलाए सब रंग हमारे ही कारण।।
हर अविशिष्ट पदार्थ, बहाते हम जल में।
हुई मलिन है गंग, हमारे ही कारण।।
रोप रहे कंक्रीट, काट कर तरुवर हम।
दुर्लभ हुए विहंग, हमारे ही कारण।।
शीर्षक सजल के माध्यम से प्रभाकर जी मनुष्य की विद्रूपता को कुशलता से उजागर करते हैं।
सामने तन पर सुशोभित, स्वच्छता का आवरण।
पर मलिनता से भरा है, धूर्त का अंतःकरण।।
अंधकारों के समर्थक, ज्योति के चिर शत्रु हैं।
कालिमाओं से कराते, रश्मियों का अपहरण ।।
कवि प्रभाकर जी आज के साहित्यकारों से सजल काव्य विधा में अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का आग्रह करते हैं।
लो थाम सजल की नव्य राह।
हिंदी हित की यदि तीव्र चाह।।
………..
नित नूतन सजलें लिखें, सीखें नित नव छंद।
निष्कर्ष के तौर पर कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस सजल संग्रह में विषय विविधता, बढ़ते क्रम में मात्रा भार में निबद्ध छंद रचनायें, सहज व अलंकार युक्त भाषा का प्रयोग एवं अद्भुत शब्द विन्यास सहित अनेक विशेषताएं हैं।
श्री प्रभाकर जी ने इस संग्रह के लिए गागर में सागर भरने का विशेष श्रम किया है और उनकी साहित्य – साधना इस संग्रह में फलीभूत हुई है।
हिन्दी साहित्य में उनका अप्रतिम योगदान सराहनीय है। मैं आदरणीय ज. ल. प्रभाकर राठौर जी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें हार्दिक बधाई एवं साधुवाद देता हूँ। उनसे अपेक्षा है कि अपने उत्कृष्ट सृजन की निरंतरता से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करते रहें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपका द्वितीय सजल संग्रह रश्मियों का अपहरण, समस्त सुधी पाठकों के मध्य लोकप्रिय होगा।
इति शुभम्।

प्रो. डॉ.विनीत मोहन औदिच्य
साॅनेटियर एवं ग़ज़लकार
एम. आई. जी – 118, शांति विहार
मकरोनिया, सागर, मध्य प्रदेश
