Sunday, May 31, 2026
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अपराधी के मनोविज्ञान का कथा प्रयोग है ‘फांसी’

पुस्तक: फांसी (उपन्यास) , लेखक: उद्भ्रांत व शैलेश पंडित; प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन इंद्रपुरी, नई दिल्ली, समीक्षक : रामधनी द्विवेदी, मूल्य: 375/

शोध-पत्र और अखबारों के लिए लेख दो लोगों द्वारा मिल कर लिखने का चलन तो पुराना है जिसमें एक व्‍यक्ति की भाषा और दूसरे के आंकड़े होते हैं। अथवा एक व्‍यक्ति शोध-पत्र लिखता है और दूसरा उसे अपडेट कर अपना भी नाम दे देता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि शोधार्थी के साथ उसके शोध निदेशक का नाम भी शोध-पत्र में दे दिया जाता है। लेकिन उपन्‍यास दो लोग मिल कर लिखें ऐसा दुर्लभ होता है। हिंदी में ‘ फांसी’ दूसरा उपन्‍यास है जिसे दो लोगों ने मिलकर लिखा है। इसके पहले ‘एक इंच मुस्‍कान’ राजेंद्र यादव और मन्‍नू भंडारी मिल कर लिख चुके हैं। लेकिन ‘फांसी’ के मूल लेखक उद्भ्रांत जी का दावा है कि उनका उपन्‍यास अपने में अलग इसलिए है क्‍यों कि इसे दो अलग- अलग पीढ़ी के लेखकों ने मिलकर लिखा है। दूसरे लेखक प्रख्‍यात कथाकार शैलेश पंडित हैं। उन्‍होंने ही इसका उत्‍तरार्ध पूरा किया है।

‘फांसी’ वैसे देखा जाए तो एक कथित अपराधी की आत्‍मकथा है जिसे उसने जेल की सजा काटते समय डायरी के रूप में लिखा है और वह डायरी तिहाड़ जेल की तेज तर्रार आई जी संतोष भाटिया को मिलती है। संतोष भाटिया उस डायरी को पढ़ती हैं और कहानी उसी के साथ आगे बढ़ती है। संतोष भाटिया नई सोच की पुलिस अधिकारी हैं। वह अपराधी को सजा देने में की नहीं उसे सुधरने का मौका देने की पक्षधर हैं। वह किसी भी अपराधी को फांसी देने के पक्ष में नहीं रहतीं। इस उपन्यास के नायक को भी वह फांसी के फंदे से बचाने का प्रयास करती हैं और सफल रहती हैं। उसे राष्‍ट्रपति से प्राणदान मिल जाता है।

इस उपन्‍यास में बताया गया है कि कैसे एक युवक अपनी बहन की इज्‍जत से खेलने वाले की हत्‍या कर घर से भागता है और बदलते घटनाक्रमों के कारण अंततोगत्‍वा अपराध जगत का नाम बन जाता है। वह यह सब जानबूझकर नहीं करता लेकिन स्थितियां उससे यह सब कराती रहती हैं। वह अपने को बदलना चाहता है लेकिन कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि वह अपराध करने को मजबूर हो जाता है। अंत में जेल में रहते हुए जब वह अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखता है तो उसे कहीं भी अपना दोष नहीं दिखता। उसे लगता है कि जो स्थितियां उसके सामने आईं,उनमें उसे वैसा ही करना मजबूरी थी जैसा उसने किया।

इस उपन्‍यास में मध्‍यमवर्गीय परिवार की समस्‍याएं हैं, कोई भी किशोर कैसे बिगड़ जाता है,यह मनो विज्ञान है तो अपराध जगत का थ्रिल तो है ही। उपन्‍यास की विशेषता यह है कि इसे पढ़ना शुरू करने पर कोई भी इसे बीच में नहीं रोक सकता, इतना प्रवाह है इसमें। पाठक की उत्‍सुकता अंत तक बनी रहती है। यह अच्‍छे जासूसी उपन्‍यास की तरह पठनीयता बनाए रखता है।

 

उपन्‍यास के नाम ‘फांसी’,तिहाड़ जेल, हत्‍याएं और मौत की सजा से इसे अपराध कथा के रूप में ही नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इसमें एक पूरा दूसरा समाज भी है जिसमें नायक के साथ सोमा है,स्‍वामी है,ललित है, मॉम हैं लिज हैं और इन सबका केंद्र ‘चंपावत कला केंद्र’ भी है। यह कला केंद्र सोमा और रोहित का सपना है जो समाज की गरीब महिलाओं को सहारा देने के साथ उन्‍हें आत्‍मनिर्भर बनाता हुआ बड़ा ब्रांड बन जाता है जिससे दूसरे ब्रांड दहशत खाते हैं और तरह-तरह की साजिशें रचते हैं। यही कला केंद्र एक बार खूनी टकराव का कारण भी बनता है लेकिन रोहित उसे फिर संवारने की कोशिश करता है।

अंत में यही कला केंद्र रोहित के प्राणदान मिलने का कारण भी बनता है। ‘चंपावत कला केंद्र’ चूंकि सोमा का सपना था,इसलिए उसकी अन्‍य शाखाएं खोलना भी रोहित का सपना होता है जिसे वह पूरा करता है। उपन्‍यास अंत में तीव्र गति से चलता लगता है लेकिन उससे उसका रस किंचित भी हल्‍का नहीं होता। इसकी सबसे मजबूत बात मुंबई की घटनाओं के समय मुंबइया बोली में डायलॉग् हैं। यह उपन्‍यास की रोचकता को और बढ़ाते हैं। उद्भ्रांत ने अपने मुंबई प्रवास के समय सुनी और समझी इस बोली का उपन्‍यास में भरपूर प्रयोग किया है। इससे पाठक को उपन्‍यास के पात्र असली मुंबइकर लगते हैं। वहां के मवाली जैसी भाषा बोलते हैं, उपन्‍यास में हूबहू वैसा ही उनसे बुलवाया गया है।

किसी उपन्‍यास की भूमिका अमूमन नहीं लिखी जाती लेकिन उद्भ्रांत ने इसमें लिखा है क्‍योंकि उन्‍हें यह बताना जरूरी हो गया था कि दो लेखकों को इसे लिखने की क्या जरूरत पड़ गई। दरअसल ‘फांसी’ एक बड़ी कहानी का उपन्‍यास में बदला रूप है। मूल कहानी कब लिखी गई थी, वह उपन्‍यास में किस तरह बदली, क्‍यों दूसरे लेखक की मदद लेनी पड़ी,यह सब वह भूमिका में बताते हैं।

दरअसल इसमें उनका यह मत भी है कि किसी को भी फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए। प्राणदंड कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। अनेक समाजशास्‍त्री इसके विरोध में रहते हैं और अनेक देशों में इसे खत्‍म कर दिया गया है। भारत में भी यह खत्‍म तो नहीं है लेकिन दुर्लभतम मामलों में इस दंड का प्रावधान किया गया है। उद्भ्रांत मानते हैं कि उनका नायक पेशेवर अपराधी नहीं था। उसे स्थितियों ने बनाया तो उसे प्राणदंड नहीं दिया जाना चाहिए। इसके कानूनी पक्ष की जानकारी उन्‍हें नहीं थी, इसी समस्‍या के हल के लिए शैलेश पंडित सामने आए। उन्‍होंने कानूनी नुक्‍तों को अच्‍छे वकीलों से मिलकर सुलझाया और अंत में बहुत जद्दोजहद के बाद यह उपन्‍यास पूरा हुआ।

उद्भ्रांत का कवि इस उपन्‍यास में भी कालू जल्‍लाद की व्‍यथा भी कविता के रूप में प्रस्‍तुत करता है। दो लोगों द्वारा मिल कर लिखने के बाद भी उपन्‍यास में कहीं भी इसके केंद्रीय भावभूमि से भटकाव नहीं नजर आता। भाषाई शिल्‍प में भी नहीं लगता कि दो लोगों ने इसे लिखा है।

यह उनका दूसरा उपन्‍यास है। ‘नक्‍सल’ नाम से उनका पहला उपन्‍यास भी बहुत पसंद किया गया था।

  • रामधनी द्विवेदी 
    मोबाइल –  9560798111
    ई-मेल – [email protected]
    आलिव 504,गुलमोहर रजिडेंसी
    इंदिरापुरम, अहिंसा खंड 2
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