Tuesday, June 30, 2026
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पद्मश्री अशोक चक्रधर की तीन ग़ज़लें

मित्रो, पूरा हिन्दी जगत भाई अशोक चक्रधर जी के एक हास्य-व्यंग्य के कवि रूप से ही परिचित है। उनका गंभीर रचनाकर्म बहुत कम पाठकों की नज़रों से गुज़रा होगा। इस मामले में पुरवाई पत्रिका भाग्यशाली है कि अशोक जी ने अपनी तीन ग़ज़लें हमारे पाठकों के लिए विशेष रूप से भेजी हैं।… तो पढ़िये एक हास्य-व्यंग्य के कवि की तीन ग़ज़लें…

– संपादक

ग़ज़ल-1

अब गया जाके बोध क्या करना?
इतने अंतर्विरोध, क्या करना?

इतनी जंजाल जिंदगी जी है
अब सरल या सुबोध। क्या करना?

शांत रहना नहीं आसान मगर
अब किसी पर भी क्रोध, क्या करना?

खूब निष्कर्ष मिल गये मुझको
और जीवन का शोध, क्या करना?

अपने अंदर भी भला क्यों झांकूँ?
अब नया आत्मबोध, क्या करना?

जो मेरी ज़िंदगी से जाता नहीं,
ऐसे रस का विरोध, क्या करना?

काम करवाना है, करवा दो मियाँ!
लिख के दूं ‘सानुरोध’, क्या करना?

न मुड़के देखूँ, न रुकना है मुझे,
बनके आत्मावरोध, क्या करना?

कोई पद चाहिए नहीं मुझको
चुन भी लो निर्विरोध।, क्या करना?

ग़ज़ल-2

ईश्वर की इल्तिजा है, ज़रा मुस्कुरा तो दे।
ऐसी भी बात क्या है, ज़रा मुस्कुरा तो दे।

माना तू अजनबी है और मैं भी अजनबी हूँ
डरने की बात क्या है ज़रा मुस्कुरा तो दे!

मैं कोई नहीं तेरा, तू कोई नहीं मेरा,
फिर भी कोई रिश्ता है, ज़रा मुस्कुरा तो दे!

हूँ में भी एक इंसां, और तू भी एक इंसां,
इंसानियत के नाते, ज़रा मुस्कुरा तो दे!

दुख तुझपे है लदा सा, हूं मैं भी ग़मज़दा सा
रस्ता जुदा जुदा है, ज़रा मुस्कुरा तो दे!

हाँ तेरे लिए मेरा, और मेरे लिए तेरा
चेहरा नया नया है, ज़रा मुस्कुरा तो दे!

मैं भी न मिलूँ शायद, तू भी न मिले शायद
इतनी बड़ी दुनिया है, ज़रा मुस्कुरा तो दे!

तू सामने है मेरे, मैं सामने हूँ तेरे
युंही सामना हुआ है, ज़रा मुस्कुरा तो दे!

नज़रों से मिलीं नज़रें, कुछ कह रही थीं नज़रें
अधरों को क्या हुआ है, ज़रा मुस्कुरा तो दे!

मेरा नाम चक्रधर है, अब तू मुझे बता दे
अच्छा ‘नहीं पता’, पर, ज़रा मुस्कुरा तो दे।

ऐसी भी बात क्या है, ज़रा मुस्कुरा तो दे
अनुरोध है ख़ुदा का, ज़रा मुस्कुरा तो दे।

ग़ज़ल-3

कुछ दुश्मन कुछ यार ख़रीद?
हम बैठे तैयार, ख़रीद।

कामदेव बन गए कुबेर,
खुला ख़ज़ाना यार ख़रीद।

शब से कुछ उजियारा ले,
दिन से कुछ अंधियार ख़रीद।

बस चुनाव आने को हैं,
गीदड़ और सियार ख़रीद।

जिनको दुश्मन समझ रहा,
ऐसे कुछ हुशियार ख़रीद।

मन की ऊर्जा बुझा नहीं
उसके लिए अगियार ख़रीद।

नई उमर की नई फ़सल
इनसे नई बयार ख़रीद।

अमरीका तो चाह रहा,
तू फ़ौरन हथियार ख़रीद।

  • पद्मश्री अशोक चक्रधर
    जे-116, सरिता विहार, नई दिल्ली-110076
    मोबाइल – +91 98110 13621
    ई-मेल – [email protected]

 

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