सुइट में एंटर होते ही उसकी भव्यता ने मेरे भीतर के अभाव को कुछ इस तरह से कुचला जैसे सूखे उपवन में एकाएक बहार आ गई हो। हर तरफ़ सुर्ख़ गुलाब ही गुलाब… रौशनी ऐसी जैसी सुबह की लालिमा हो… सुंगध इतनी की कन्नौज वाले बड़े मियां की दुकान भी पानी मंगाने लगे। दिल चाह रहा था कि हर चीज़ को छूकर देख लूँ। इतना बड़ा सोफा तो मैडम के ऑफिस में भी नहीं है। बैठने का दिल किया पर बैठा नहीं। आख़िर मुलाजिम हूँ फिर मैडम मुझ पर इतनी जल्दी कितना विश्वास करने लगी हैं। नहीं तो अभी तक तो उनके साथ हर टूर पर चटर्जी सर ही जाते थे। इस बार उन्होंने पूरे ऑफिस के सामने कड़क आवाज़ में मुझसे कह दिया था।
“मुंबई टूर में मुझे आप एसिस्ट करेंगे।”
“यस मैम!” बिना किसी भी तरफ़ देखे ही मैंने कह दिया था। चटर्जी सर ने कहा भी था-“व्हाट आर यू डूइंग? उसके पास एक्सपीरिंयस नहीं है। डील बड़ी है। हम धोखा खा सकते हैं।”
“मिस्टर चटर्जी, माइंड योर लैंग्वेज। रही बात अनुभव की वह तो आपके पास भी नहीं था। आपनें भी इसी कंपनी से हासिल किया है।”
सारे डॉक्युमेंट्स लेने के लिए मैं चटर्जी के रूम में गया वह बेहद नाराज़ थे। पिनड्राइव मुझे देते हुए बोले- “नए शिकार हो। तुम भी इंजॉय करना।”
“जी सर!” बस इतना ही कहा मैंने।
मीटिंग ओवर हुई और मैम ने मुझे सुइट में वेट करने को कहा। जब से इस रूम में आया हूँ पैर ही ज़मीन पर नहीं हैं। तभी मैम ने डोर खोला और बोली-“बहुत थक गई हूँ। यहाँ नहीं बेडरूम में आओ।”
यस मैम वाली मुद्रा के साथ मैं बेडरूम में पहुँच गया। बेडरूम की संपन्नता में तो और भी क़यामत बरस रही थी। फ़िल्मों की तरह का रेशमी बिस्तर था। मख़मली तौलियों को चोंच लड़ाते हुए दो हँसों का रूप दिया गया था।उस कमरे के बाहर जाने से पहले वह सारा मंजर मैं अपनी आँखों भर लेना चाह रहा था कि मैम ने कहा-“जाओ नहाकर आओ।”
“जी?”
आदेशआत्मक स्वर में वह बोली-
“मूड स्पॉयल मत करो। फ्रेश होकर आओ और मुझे सैटिस्फाइड करो।”
अब मुझे सब तरफ़ काला अंधकार दिख रहा था। पूरे कमरे में मैनहोल जैसी बदबू भर गई थी। हज़ारों कीड़े मेरे बदन पर रेंगने लगे थे।
- ज्योत्सना सिंह, ओमेक्स, गोमती नगर, लखनऊ।
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