Sunday, September 20, 2026
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रेखा भाटिया की चार कविताएँ

हिटलर ,स्टालिन और गाँधी

अमेरिका में रहकर …
आदतनुसार मैं हर सुबह चाय के साथ
भारतीय अख़बार पढ़ती हूँ
इस आदत से
मैं भारतीय बने रहने का प्रयत्न करती हूँ

हर सुबह एक सवाल भीतर
गुंजायमान रहता है
आज भारत में क्या हुआ, क्यों हुआ,
कैसे हुआ ?

ग्लोबलाइजेशन से प्रभावित
भारत तेज़ी से
“इंडिया” बनता जा रहा है।

इसी ग्लोबलाइजेशन से प्रभावित,
सभी देश एक-दूसरे से लड़ रहे हैं।
भारत उदासीन-सा दिखता है
लेकिन निर्भय खड़ा है।
अहिंसा में रहकर
अन्याय का साथ नहीं देता।

एडोल्फ़ हिटलर , जोसेफ़ स्टालिन
और महात्मा गाँधी
एक ही समय काल में
तीन दिशाएँ ,
तीन विपरीत विचारधाराएँ
तीन क्रान्तियाँ।

इतिहास से पूछें
इतिहास पीछे जाकर
खुद को
दोबारा लिख नहीं सकता
लेकिन
सच्चाई छिपा नहीं सकता।

अब हर सुबह चाय के साथ
भीतर कई सवाल
गुंजायमान रहते हैं।
भारत के लोग
अब भी भीतर से भारतीय हैं।
आदतनुसार चाय पीते
उनके मन में कौनसे सवाल
उठते होंगे ?

बदल गया है मौसम

आओ ! बताती हूँ एक बात मन की
शायद , आपका मन भी वही कहना चाहता हो

बदल गया है मौसम !
आप सोच रहे होंगे
मौसमों का बदलना
कोई नई बात तो नहीं ?

देखिये !
कोई लाग-लपेट कर नहीं कहूँगी

माना हर मौसम सुहाना होता है
मौसम और ऋतुओं में बदलाव
कदाचित आवश्यक होता है

लेकिन सुनिए ,
पता है ,आपके सुनने से पहले
बहुत उदास था मन !

जीवन से जीवंत रस खो से गए थे
जब संघर्ष कम हो जाएँ
जीवन की निरंतरता में नीरसता

ज़िम्मेदारियाँ ,समारोह, उत्सव
जीवन के आचरण में समाहित हो
यही सुर-ताल पर नचाते हैं –
वहाँ ख़ुशियाँ भी अमूल्य कहाँ रहती हैं ?

लेकिन मुझे डर है ,
एक ढर्रे पर चलते जीवन में
मानों ,अचानक कोई रूकावट आ गई है
कहीं यही डर आपका भी तो नहीं ?

इन दिनों समाचार सुन कर , पढ़ कर
संशय युक्त परिस्थितियों में
मानों ,भरोसा उठ गया है प्रणाली से !

किसे अपना देश कहें ?
घर छूटा, छूटा अपना देश
नए द्वार खुले अवसरों के , रास्ता सुगम न था
खुद के अस्तित्व को समेटकर पूरी तरह
नए देश को घर मान लिया !

बदलते मौसमों-सी बदलती सरकारें
सहमति हो या न हो , औपचारिकता ही सही
जीवन की गाड़ी चलती रही

लेकिन अब की बार –
जैसे एक तूफ़ान गुज़र रहा है ज़िंदगियों से
यह मौसमी तूफ़ान नहीं है शायद !

मन रहता है खिंचा-खिंचा सबका
मेरा भी , आपका भी –
मेरे पास आगे सुनाने के लिए
कोई शब्द नहीं है
मेरे भाव तो आप समझ ही गए होंगे !

उस लम्हे में

बालकनी की कुर्सी पर बैठी
मैं निशब्द ,
सामने पर्वत श्रृंखलाओं पर श्वेत बर्फ़ देखती
मुझे तो ठहरना ही था।

उस पल ,उस क्षण , उस घड़ी –
हाथ पर बँधी घड़ी ,
दीवार पर लटका कैलेंडर ,
होटल रिसेप्शन पर साइन किए पेपर –
सब इशारा कर रहे हैं
पल-पल गुज़रते ,
इंसानों के बनाये वक़्त का।

मेरे पास समय सीमित है –
सीमित है क्षमता ,
सीमित है पहुँच।
मात्र वश में है पृथ्वी के घूमने से
बनते रात और दिन को हिस्सों में बाँट कर ,

बदलते मौसमों के परिवर्तन को बाँट ,
वक़्त का नाम दे देना और सोचना
सारी सृष्टि
इसी वक़्त के पहलू से बँधी है।

बालकनी की कुर्सी पर बैठकर
मैं ऊँचाई महसूस कर रही हूँ
यहाँ से पहाड़ साफ़ दिखाई पड़ते हैं।

नीचे पार्क में बेंच पर बैठकर
पहाड़ों को निहारना ,
अद्भुत रमणीक दृश्य था
पहाड़ रहस्यमयी लगते हैं वहाँ से।

कुछ ऊँचाई से दृश्य साफ़ है
कई जल धाराएँ ,
झरनों में बह रही हैं पहाड़ों मध्य
बर्फ़ के ग्लेशियरों के पिघलने से।

सूरज आग उगल रहा है ,
युगों से पिघलना चाहता है वह बर्फ़ को
यह खेल अभी भी चल रहा है।

शांत, रहस्यमयी पहाड़ और प्रकृति
ख़ामोशी से बहता
एक अद्भुत संघर्ष और संतुलन ,
सरसराती-बहती ख़ामोश हवा
तूफ़ानी झरने और शांत बर्फ़ ,
सफ़ेद-स्लेटी विशालकाय पहाड़ों पर

मुझे तो ठहरना ही था वहाँ
अचंभित ख़ामोशी से –
उस लम्हे में
मेरा अस्तित्व
हाथ पर बँधी घड़ी
दीवार पर लटका कैलेंडर
सब नगण्य था।

ओ जादुई ,
रमणीक देश स्विट्जरलैंड
तेरे यहाँ सौंदर्य
अपनी परकाष्ठा को पीछे छोड़ देता है
यहाँ प्रकृति ने बाँधा है स्वयं को मोह-पाश में !

एक पत्ता ख़्वाब

मन के झरोखों में झाँका फिर से
एक पत्ता ख़्वाब का
गिरा शाखा से
जीवन के पेड़ पर लगे थे कई ख़्वाब …

एक पल गुज़रा एक पल सिहर उठा
पल की रवानगी , पल की अदाएगी
कभी सुलझा उलझे, कभी उलझा सुलझे
पल में टूटे ख़्वाब, पल में सँवरे …

जीवन के इस खेल में, कभी होती जीत,
कभी हार से हुए हताश और दौड़ पड़े
हार को जीत में बदलने
मानों जीवन
एक जुआ है ,ताश के पत्तों का महल
झोंकों से बिखरे, फिर बन होता खड़ा

एक याद , एक बात अधूरी-सी अब भी
उस लहराते पत्ते की, उस ख़्वाब की
जो चमन में झूमता था

जब गिरा देखा उसने
पड़े हैं ख़ाक में टूटे कई ख़्वाब,
ख़्वाब जो झूमा करते थे चमन में
आज हैं गर्दिश में

अभी भी कई ख़्वाब पत्ते ,लगे हैं जीवन पेड़ पर
जिनकी रवानगी और अदाएगी बाक़ी है

ज़िंदगी की भागदौड़ से मिलाया था हाथ
तब क्यों ज़िंदगी ने
पासा पलटा और
इम्तिहान लेने को उसका दिल ललचाया

परख जीवन की करें या यह परखता है हमें ,
तभी शायद उस अनदेखे रब पर,
खुद से ज़्यादा भरोसा करना सीखते हैं हम

टूटते ख़्वाब पत्ते, मानों एक ताज़ा बूँद
पानी की
वक़्त की लहरों में डोलते
समुंदर से माँगती है
दुआएँ जी भर कर
प्यास बुझाने की, अधूरी ख़्वाहिशों की
आज एक पत्ता ख़्वाब गिरा है शाखा से !

  • रेखा भाटिया

अमेरिका में शार्लिट शहर, नॉर्थ कैरोलिना में रहती हैं । पेशे से एक शिक्षक हैं । प्रवासी हिंदी साहित्यकार, कत्थक नर्तकी और आर्ट-क्राफ्ट कलाकार हैं ।  इनकी रचनाएँ विभिन्न अंतराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपती हैं। शिवना प्रकाशन से इनके दो काव्य संग्रह “सरहदों के पार दरख़्तों के साये में“ ”मन की नदी से भीगे शब्द” तथा सहलेखन में पच्चीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । हिंदी की सेवा में यह अमेरिका में बारह वर्षों से बच्चों के लिए हिंदी अध्यापन का कार्य कर रही हैं। भारतीय संस्कृति , सभ्यता के प्रचार-प्रसार में पच्चीस वर्षों से कार्य कर रही हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। कई सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इनका बढ़चढ़ कर योगदान रहता है।

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