छब्बीस साल का अमन मीर हमेशा दूसरे लड़कों से अलग दिखाई देता था।
बचपन से क्रिकेट का दीवाना था, पर एक अजीब आदत थी। कभी किसी के सामने कपड़े नहीं बदलता था। ग्राउंड का लॉकर रूम हो, चाहे स्कूल का बाथरूम – वह कोने में चला जाता, दूसरों की तरफ़ पीठ करके शर्ट बदलता। लड़के हँसते – “बड़ा शर्मीला है।” माँ भी यही कहती – “मेरा अमन थोड़ा शर्मीला है।”
पर बात शर्म की नहीं थी। बात थी एक खालीपन की।
देखने में सुदर्शन, अनंतनाग का रहने वाला अमन, श्रीनगर के एक प्राइवेट स्कूल में पीटी टीचर की नौकरी मिल गई थी। वहाँ भी वो सबसे अलग-थलग रहता था। बच्चों में घुल जाता, पर बड़ों से दूरी बनाकर रखता। उसे कुछ ऐसा अहसास था कि ऊपर वाले ने उसके साथ अन्याय किया है। उसका शरीर अधूरा बना है।
सच यही था – उसके शरीर में एक अंडकोष ही नदारद था। दाईं ओर सब सामान्य था, पर बाईं ओर सिर्फ खाली स्थान। और बाएं तरफ, पेट के नीचे, हमेशा एक भारीपन सा महसूस होता, जैसे अंदर कुछ अटका हुआ हो, कोई गाँठ सी।
बचपन में माँ गाँव के हकीम साहब के पास ले गई थी। हकीम साहब ने कहा था – “बड़ा होगा तो ठीक हो जाएगा।”
अमन बड़ा तो हो गया, पर कुछ ठीक नहीं हुआ।
पिछले एक साल स्थिति और विकट हो गई थी… कुछ नये बदलाव पैदा हो गये थे।
उसे हर महीने, लगभग हर महीने दिन में, पेशाब करने के बाद नीचे पेट में मरोड़ जैसा दर्द उठता। दो से तीन दिन रहता, फिर खुद ही चला जाता। वह कैलेंडर पर निशान नहीं लगाता था, पर शरीर अपना कैलेंडर खुद चलाता था।
और अब तो उसके लिये रिश्ते भी आने लगे थे। लड़का सुलझा हुआ था, परिवार अच्छा था। एक लड़की, सना, उसे पसंद भी थी। एक दिन सना ने हँसते हुए मजाक में कह दिया – “आपको तो पीरियड्स जैसा मूड स्विंग होता है।”
अमन हँस तो दिया, पर अंदर तक काँप गया। जैसे किसी ने उसके सबसे गहरे राज़ पर उंगली रख दी हो।
अब माँ-पापा को भी इस बात का अहसास होने लगा था मामला कुछ गड़बड़ है। अब डॉक्टर को दिखाना ही होगा।
उनके घर के निकट ही यूरोलॉजिस्ट डॉ. निसार का एक छोटा सा क्लिनिक है। अमन को वहां ले जाया गया। डॉ. निसार ने अमन का मुआयना किया, आराम से पूछा और सिर्फ इतना कहा – “पूरे पेट का अल्ट्रासाउंड करवाओ। अंडकोष नीचे उतरने का केस लगता है।”
अमन अकेला गया। लैब में हल्का अंधेरा था। लेडी डॉक्टर स्क्रीन देख रही थी, फिर अचानक रुक गई। उसने सीनियर डॉक्टर को बुलाया।
सीनियर डॉक्टर ने स्क्रीन देखी और धीरे से कहा – “आपके अंदर… एक छोटी सी यूटेरस है। और दोनों तरफ फ़ेलोपियन ट्यूब के आकार जैसा कुछ अंग भी दिख रहा है।”
अमन ने वो शब्द पहली बार सुना। उसे लगा जैसे किसी ने उसके शरीर का नक्शा ही फाड़ दिया हो। वो रिपोर्ट हाथ में लेकर झेलम के किनारे देर तक बैठा रहा। उसके दिमाग को एक ही सवाल मथे जा रहा था – मैं लड़का हूँ या लड़की?
रिपोर्ट में एक शब्द लिखा था – पी.एम.डी.एस.
दो दिन बाद वो माँ के साथ गवर्मनमेंट मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग में गया। डॉक्टर रुख़साना ने बहुत आराम से समझाया, “बेटा, डरो मत। इसे पर्सिस्टेंट म्यूलेरियन डक्ट सिंड्रोम कहते हैं। ये एक लाख लड़कों में से किसी एक में होता है।”
“जब तुम माँ के पेट में आठ हफ्ते के थे, तब तुम्हारे अंदर दो रास्ते थे। एक से लड़का बनता है, एक से लड़की। तुम्हारे वाई-क्रोमोसोम ने कहा – लड़का बनो। पर जो हार्मोन, ए.एम.एच. तुम्हारी बच्चेदानी को गलाना चाहिए था, वो तुम्हारे शरीर में बना ही नहीं। तो तुम्हारा शरीर बाहर से पूरा लड़का बन गया, पर अंदर एक दूसरा घर भी रह गया।”
“तुम इंटरसेक्स नहीं हो, तुम ट्रांस नहीं हो। तुम पूरे लड़के हो, जिसके अंदर एक ऐसा अंग रह गया है जिसकी तुम्हें जरूरत नहीं।”
डॉ रुख़साना ने माँ का हाथ पकड़ा – “आप एक बात समझ लीजिये कि इसमें आपके बेटे की कोई गलती नहीं, न आपकी। एक लाख बच्चों में से कोई एक ही ऐसा होता है जिसमें यह विकार होता है। इसके दो ख़तरे जो अंडकोष पेट में रह गया है, उसमें तीस साल के बाद कैंसर का खतरा पन्द्रह गुना बढ़ जाता है।”
अपनी बात जारी रखते हुए डॉ. रुख़साना ने कहा, “जो गर्भाशय अंदर रह गया है, उसमें हर महीने थोड़ी ब्लीडिंग होती है, पर बाहर निकलने का रास्ता न होने से खून वहीं जमा होता है – इसी से वो हर महीने वाला दर्द आता था। इसे निकालना ही पड़ेगा।”
माँ ने सब समझ लिया। बोली – “ऑपरेशन करना है?”
अमन अंदर से बहुत डरा हुआ था। माँ ने सिर पर हाथ रखा – “डरने की कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा, डॉक्टर साहब ने कहा है।”
उस हफ्ते अमन ने किसी से बात नहीं की। यूट्यूब पर उल्टे-सीधे वीडियो देखे, खुद को कोसा। फिर उसने सना को फोन किया।
काँपती आवाज में सब सच बता दिया।
सना कुछ देर चुप रही… फिर बोली – “तो दर्द इसीलिए होता था? तुमने पहले क्यों नहीं बताया?”
अमन पहली बार खुल कर रोया। सना ने कहा – “तुमने मुझे सच बताया, अब तुम हल्के हो गए न? मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
सच बताकर उसे पहली बार लगा जैसे सीने से कोई पत्थर उतर गया हो।
ऑपरेशन वाले दिन सब अस्पताल पहुँचे।
लैप्रोस्कोपिक सर्जरी – तीन घंटे। डॉक्टरों ने एक छोटा, अविकसित गर्भाशय और ट्यूब्स निकाल दिए। बाएँ अंडकोष को नीचे लाकर स्क्रूटम में फिक्स कर दिया।
अमन को जब होश आया तो माँ सिरहाने थी। डॉक्टर ने कहा – “ऑपरेशन एकदम ठीक हो गया है, घबराने की कोई बात नहीं।”
अमन और उसका परिवार बहुत खुश थे। उसे छुट्टी मिल गई, घर ले आए।
तीन महीने बाद, वो दर्द जो पन्द्रह साल से हर महीने आता था, आना बंद हो गया।
अब अमन फिर से ग्राउंड में बच्चों को पुश-अप करवाता है। शर्ट बदलने में अब शर्म नहीं आती। उसने सना से शादी कर ली है। डॉक्टर ने बताया है कि बाप बनने में उसे थोड़ी मदद की जरूरत पड़ सकती है, क्योंकि एक अंडकोष सालों तक पेट की गर्मी में रहा है, पर उम्मीद पूरी है। वह अपने आपको विश्वास दिलाता है। “मेरे अंदर एक घर था, जो मेरा नहीं था। उसे खाली करना पड़ा। अब मेरा शरीर सिर्फ मेरा है। मैं अधूरा नहीं हूँ, मैं थोड़ा अलग बना हूँ, बस। सब ठीक!”
डॉ. मुक्ति शर्मा,

बढ़िया कहानी! वैज्ञानिक औचित्य तथ्य और एक सुखांत के साथ।
आज के युवाओं को पसंद आएगी।
जी, बहुत बहुत धन्यवाद
आपको कहानी पसन्द आई।
बढ़िया विषय,शोध भी बढ़िया
जी धन्यवाद
‘अंदर एक और घर…’ : देह, पहचान और आत्मस्वीकृति की कहानी
डॉ. मुक्ति शर्मा की कहानी ‘अंदर एक और घर…’ अपने कथ्य और विषय-वस्तु की दृष्टि से समकालीन हिंदी कहानी में एक अलग पहचान बनाने वाली रचना है। कहानी एक दुर्लभ चिकित्सकीय स्थिति। Persistent Müllerian Duct Syndrome (PMDS)को आधार बनाकर शरीर, लैंगिक पहचान, पुरुषत्व, सामाजिक सामान्यता और आत्मस्वीकृति जैसे जटिल प्रश्नों को सहज कथा-भाषा में सामने लाती है। इसकी विशेषता यह है कि चिकित्सा-विज्ञान कहानी का केवल बाहरी विषय नहीं है, बल्कि वह पात्र के मनोवैज्ञानिक संकट और उसकी आत्म-पहचान को समझने की कुंजी बन जाता है।
कहानी का केंद्रीय पात्र अमन बाहर से एक सामान्य युवक है, लेकिन उसके शरीर के भीतर एक ऐसी संरचना मौजूद है, जिसकी उसे स्वयं जानकारी नहीं। बचपन से ही उसका अपने शरीर को लेकर संकोच, दूसरों से दूरी और एक अनाम-सा खालीपन बाद में अर्थ ग्रहण करता है। जब चिकित्सकीय जाँच में उसके शरीर के भीतर गर्भाशय जैसी संरचना के होने का पता चलता है, तो उसका संकट केवल बीमारी या ऑपरेशन का संकट नहीं रह जाता; वह अपनी पहचान को लेकर भी विचलित हो उठता है। उसके मन में उठता प्रश्न , “मैं लड़का हूँ या लड़की?” कहानी के सबसे मार्मिक क्षणों में से एक है।
यहीं कहानी देह-विमर्श के महत्वपूर्ण प्रश्न से जुड़ती है। समाज अक्सर शरीर को कुछ निश्चित खाँचों में बाँटकर ‘सामान्य’ और ‘असामान्य’ की परिभाषा तय करता है। अमन का शरीर उस निर्धारित सामान्यता से थोड़ा अलग है, इसलिए वह स्वयं को अधूरा समझने लगता है। कहानी इस मानसिकता को चुनौती देती है। अंततः अमन जिस निष्कर्ष तक पहुँचता है , “मैं अधूरा नहीं हूँ, मैं थोड़ा अलग बना हूँ, बस” वही पूरी कहानी का केंद्रीय मानवीय कथ्य बन जाता है। यह वाक्य शरीर की भिन्नता को हीनता से अलग करता है और आत्मस्वीकृति को मनुष्य की गरिमा से जोड़ता है।
कहानी का शीर्षक ‘अंदर एक और घर…’ अत्यंत अर्थपूर्ण और बहुस्तरीय है। ‘घर’ यहाँ केवल शरीर के भीतर मौजूद जैविक संरचना का प्रतीक नहीं है; वह अमन के भीतर बसे भय, रहस्य, असुरक्षा और पहचान-संकट का भी प्रतीक है। अल्ट्रासाउंड के माध्यम से उस ‘दूसरे घर’ का सामने आना वस्तुतः अमन के अपने शरीर के अनजाने इतिहास से परिचित होने का क्षण है। इस दृष्टि से शीर्षक कहानी की संवेदना को एक सुंदर प्रतीक में समेट लेता है।
कहानी में माँ और सना के चरित्र भी महत्वपूर्ण हैं। माँ का स्नेह अमन के भय के सामने सुरक्षा का भाव पैदा करता है, जबकि सना उसकी शारीरिक भिन्नता को अस्वीकार करने के बजाय उसे स्वीकार करती है। विशेष रूप से सना के माध्यम से कहानी यह स्थापित करती है कि प्रेम का आधार ‘पूर्ण’ या ‘सामान्य’ शरीर नहीं, बल्कि व्यक्ति की संपूर्ण मानवीय उपस्थिति है।
शिल्प की दृष्टि से कहानी की भाषा सरल, संवादधर्मी और सहज है। कठिन चिकित्सा-विषय को सामान्य पाठक तक पहुँचाने में यह शैली प्रभावी सिद्ध होती है। झेलम का किनारा भी कहानी में एक सुंदर प्रतीकात्मक दृश्य रचता है, जहाँ बाहर बहती नदी अमन के भीतर चल रहे मानसिक द्वंद्व का प्रतिरूप बन जाती है।
फिर भी कहानी की कुछ सीमाएँ हैं। इतने जटिल मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संकट का समाधान अपेक्षाकृत जल्दी हो जाता है। अमन की आंतरिक उथल-पुथल, सना की अपनी आशंकाएँ और समाज की संभावित प्रतिक्रिया को अधिक विस्तार मिलता तो कथा और गहरी हो सकती थी। चिकित्सा-विज्ञान से जुड़े कुछ विवरणों को भी साहित्यिक सरलीकरण के बजाय अधिक वैज्ञानिक सावधानी से प्रस्तुत किया जा सकता था।
इसके बावजूद ‘अंदर एक और घर…’ की मूल उपलब्धि उसकी मानवीय संवेदना है। यह कहानी किसी दुर्लभ रोग की सूचना भर नहीं देती, बल्कि पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि क्या शरीर की भिन्नता मनुष्य को अधूरा बना देती है। कहानी का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। मनुष्य अपने शरीर से बड़ा है।
इसी मानवीय विश्वास के कारण ‘अंदर एक और घर…’ केवल चिकित्सा-कथा नहीं रह जाती, बल्कि देह, पहचान और आत्मस्वीकृति की संवेदनशील कहानी बन जाती है।
डॉ.ऋतु शर्मा ननंन पाँडे
भारत की बेटी
अंदर एक और घर…’कहानी का शिल्प प्रतीकात्मक और अत्यंत अर्थपूर्ण है, जो शरीर के भीतर मौजूद उस अनचाहे हिस्से और उससे उपजे मानसिक बोझ को खूबसूरत रूपक में बांधता है।
कहानी का बेहद सुखद पक्ष है कि कहानी अज्ञानता और हीनग्रंथि के अंधेरे से निकालकर ज्ञान, स्वीकार्यता और आत्म-विश्वास के उजाले की ओर ले जाने वाली एक बेहतरीन और उद्देश्यपूर्ण रचना है। बधाई डॉ मुक्ति l सधा हुआ लेखन l