Tuesday, October 6, 2026
होमपुस्तकमानव और मशीन के बीच संवाद का नया आख्यान : ‘यंत्रबुद्धि’

मानव और मशीन के बीच संवाद का नया आख्यान : ‘यंत्रबुद्धि’

  •  प्रो. हरीश अरोड़ा

तकनीकी क्रांतियों का इतिहास केवल उपकरणों के विकास का इतिहास नहीं होता वह मनुष्य की चेतना, उसकी आशंकाओं, आकांक्षाओं और भविष्य-दृष्टि का भी इतिहास होता है। इक्कीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है तब इस परिवर्तन को समझना केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं बल्कि बौद्धिक और सामाजिक दायित्व भी बन जाता है। ऐसे समय में बालेंदु शर्मा दाधीच की पुस्तक ‘यंत्रबुद्धि’ हिन्दी जगत के लिए एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है।

बालेंदु शर्मा दाधीच को मैं विगत 20 वर्षों से जानता हूँ और साहित्य और पत्रकारिता का प्राध्यापक होने के चलते उनकी रचनाधर्मिता से भी पूर्णतः परिचित हूँ। बालेंदु एक ऐसे रचनाकार हैं जो पुस्तकों के लिए लेखन नहीं करते बल्कि उनकी लेखनी एक आम पाठक के लिए ही उठी है इसलिए उनके तमाम लेखों को पढ़ते हुए यह आभास होता है कि पत्रकारिता और तकनीकी जैसे विषय भी सहज हो सकते हैं। वे भाषा के चमत्कार पर विश्वास नहीं करते बल्कि भाषा के सहजता ही उनके लेखों को सहज रूप से पठनीय बनाती है।

अब बात करते हैं उनकी पुस्तक ‘यंत्रबुद्धि’ की।

हिन्दी में तकनीक पर लिखना सदैव एक चुनौती रहा है। प्रायः तकनीकी विषयों की भाषा इतनी दुरूह हो जाती है कि सामान्य पाठक उससे दूरी बना लेता है लेकिन ‘यंत्रबुद्धि’ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि लेखक ने जटिल तकनीकी अवधारणाओं को अत्यंत सहज, प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी शैली में प्रस्तुत किया है। पुस्तक पढ़ते हुए कहीं भी यह अनुभव नहीं होता कि पाठक किसी शुष्क तकनीकी पाठ्यपुस्तक से गुजर रहा है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई अनुभवी शिक्षक अथवा संवेदनशील पत्रकार पाठक का हाथ थामकर उसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता की विराट दुनिया की सैर करा रहा हो।

बालेंदु शर्मा दाधीच की भाषा में पत्रकारिता की स्पष्टता और साहित्य की आत्मीयता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वे तकनीक को केवल मशीनों की भाषा में नहीं वरन मनुष्य और समाज के परिप्रेक्ष्य में समझाते हैं। यही कारण है कि पुस्तक केवल AI का परिचय नहीं देती, बल्कि उसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और नैतिक आयामों पर भी गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है।

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि लेखक कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अचानक घटित हुई तकनीकी घटना के रूप में नहीं देखते। वे इसके ऐतिहासिक विकासक्रम को रेखांकित करते हुए बताते हैं कि मशीनों को सोचने योग्य बनाने का स्वप्न नया नहीं है। गणना यंत्रों से लेकर आधुनिक जनरेटिव AI तक की यात्रा को लेखक क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

इस ऐतिहासिक विवेचन के कारण पाठक समझ पाता है कि आज जिन तकनीकों को हम चमत्कार मान रहे हैं वे वास्तव में दशकों के अनुसंधान, असफलताओं, प्रयोगों और मानवीय जिज्ञासा का परिणाम हैं। यह दृष्टि पुस्तक को केवल समकालीन विमर्श तक सीमित नहीं रखती बल्कि उसे एक व्यापक बौद्धिक दस्तावेज का रूप प्रदान करती है।

यह पुस्तक पत्रकारिता के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और मीडिया कर्मियों के लिए ही नहीं बल्कि AI की तकनीकी दुनिया से प्रभवित आम सामाजिक के लिए भी उपयोगी सिद्ध होती है। आज का ज़ेन-जी युवा जो AI के जाल में तो फंस चुका है लकें उसकी उपयोगिता और खतरों के पूरी तरह से परिचित नहीं है। वह उसे अपने जीवन के हर साधन का विकल्प मानकर उसका उपयोग कर रहा है। बालेंदु की यह पुस्तक उन युवाओं को ही नहीं बल्कि इस क्षेत्र के विषय में जानने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को स्पष्ट करती है कि AI पत्रकार का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहयोगी उपकरण हो सकता है। यद्यपि वे यह भी चेतावनी देते हैं कि तकनीक के अंधानुकरण से पत्रकारिता की मूल आत्मा सत्य, संवेदना और मानवीय विवेक पर भी संकट उत्पन्न हो सकता है।

बालेंदु का यह दृष्टिकोण संतुलित है। वे न तो तकनीक के अंध-समर्थक हैं और न ही उसके विरोधी। वे AI को एक साधन के रूप में देखते हैं जिसका उपयोग मनुष्य की बौद्धिक और नैतिक परिपक्वता पर निर्भर करता है। बालेंदु की यह पुस्तक ऐसे समय में पत्रकारिता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अंतर्संबंधों को अत्यंत गंभीरता से रेखांकित करती है।

‘यंत्रबुद्धि’ का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष इसका नैतिक विमर्श है। पुस्तक केवल यह नहीं बताती कि AI क्या कर सकता है बल्कि यह भी पूछती है कि AI को क्या करना चाहिए और क्या नहीं! डेटा गोपनीयता, रोजगार संकट, फेक न्यूज, डीपफेक, एल्गोरिथ्मिक पक्षपात, बौद्धिक संपदा और मानवीय स्वायत्तता जैसे प्रश्नों पर लेखक गंभीरता से विचार करते हैं। यह विमर्श इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि तकनीक की चमक के बीच प्रायः इन प्रश्नों को अनदेखा कर दिया जाता है।

आज समाचार-संकलन, तथ्य-जांच, कंटेंट निर्माण, डेटा विश्लेषण और संपादन जैसे अनेक कार्य AI की सहायता से किए जा रहे हैं। लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से कई ऐसे लेखकों, पत्रकारों और शोधार्थियों को जानता हूँ जो AI की सहायता से कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना जैसे रचनात्मक कर्म के साथ ही कंटेन्ट लेखन का काम भी इसके माध्यम से कर रहे हैं। जहाँ AI उन्हें साहित्यिक रचनाएँ और लेख लिखने में सहायता कर रहा है वहीं साहित्यिक चोरी Plagiarism से बचने के लिए humanise करने के रास्ते भी दिखा रहा है। बिना किसी पुस्तक को पढ़े उसकी आलोचना के लिए AI का सहारा लेने से उनकी लेखन में समृद्धि अवश्य हुई होगी लेकिन उनकी मेमोरी में उन रचनाओं की वास्तविकता शून्य रहती है।

बालेंदु पाठक को यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि यदि भविष्य में मशीनें निर्णय लेने लगें तो मानव की भूमिका क्या होगी? क्या हम तकनीक के स्वामी रहेंगे या उसके अधीन हो जाएंगे? ये प्रश्न पुस्तक को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करते हैं।

हिन्दी में AI पर गंभीर, प्रामाणिक और सुव्यवस्थित सामग्री का अभाव लंबे समय से महसूस किया जा रहा था। इस दृष्टि से ‘यंत्रबुद्धि’ केवल एक पुस्तक नहीं वरन हिन्दी ज्ञान-परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण जोड़ है। यह पुस्तक तकनीकी लोकतंत्रीकरण का कार्य करती है यानि ज्ञान को अंग्रेज़ी के सीमित दायरे से निकालकर भारतीय भाषाओं के विशाल संसार तक पहुँचाती है। ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किसी भी समाज की बौद्धिक उन्नति की पहली शर्त है। इस संदर्भ में बालेंदु शर्मा दाधीच का यह प्रयास निश्चय ही अभिनंदनीय है।

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी स्रोत-समृद्धि है। लेखक ने विश्व-स्तरीय कृतियों जैसे कि एलन ट्यूरिंग, निक बोस्ट्रॉम, युवाल नोआ हरारी, स्टुअर्ट रसेल, पीटर नॉरविग आदि के शोध और पुस्तकों का उपयोग किया है। Attention Is All You Need, Computer Machinery and Intelligence, Superintelligence, The Age of Surveillance Capitalism जैसी चर्चित कृतियों का संदर्भ पुस्तक की अकादमिक विश्वसनीयता को बढ़ाता है।

यद्यपि पुस्तक अत्यंत समृद्ध है फिर भी कुछ स्थानों पर तकनीकी अवधारणाओं का विस्तार और अधिक किया जा सकता था। AI के कुछ उन्नत आयामों जैसे जनरेटिव मॉडल, न्यूरल नेटवर्क और मशीन लर्निंग की जटिल प्रक्रियाओं पर विशेषज्ञ पाठक संभवतः अधिक गहन विश्लेषण की अपेक्षा कर सकते हैं। किंतु यह कमी पुस्तक की मूल उपयोगिता को प्रभावित नहीं करती क्योंकि इसका उद्देश्य व्यापक पाठक वर्ग को AI से परिचित कराना है।

समग्र रूप से देखा जाए तो ‘यंत्रबुद्धि’ ऐसी पुस्तक है जो तकनीक को केवल मशीनों का संसार नहीं मानती बल्कि उसे मनुष्य की सभ्यता, संस्कृति और भविष्य से जोड़कर देखती है। यह पुस्तक पाठक को सूचना नहीं, दृष्टि प्रदान करती है; तथ्य नहीं, विवेक देती है। आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे समय की सबसे निर्णायक शक्ति बनती जा रही है, तब ‘यंत्रबुद्धि’ उस दीपक की तरह है जो तकनीक की चकाचौंध के बीच मनुष्य को स्वयं को पहचानने की दृष्टि देता है। यह पुस्तक वैसे तो सभी के लिए, जो  AI को जानने के इच्छुक हैं, उपयोगी है फिर भी पत्रकारिता, संचार, तकनीक, भाषा और समाज के अध्येताओं के लिए यह एक अनिवार्य पाठ है। बदलती हुई तकनीकी दिनीय में हिन्दी में AI को समझने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक पाठक की व्यक्तिगत टेबल पर इस पुस्तक का होना अपरिहार्य है।

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest