पुस्तक समीक्षा : सात कदम रिश्तों और दुनियादारी का दस्तावेज 3

प्रवासी साहित्यकारों के मन में भारत को छोड़ने का दर्द और भारतीय संस्कृति की महक सदा बनी रहती है। ऐसे ही कहानीकार, कथा साहित्य में मानवीय मन की संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इधर 10-15 वर्षों से प्रवासी साहित्यकारों की तड़प उनके पात्रों के द्वारा व्यक्त हो रही है। ब्रिटेन के वातावरण में लगभग 40 वर्षों से रह रही, लेखिका जय वर्मा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है।

उनके कहानी संग्रह सात कदम में मात्र सात कहानियों के माध्यम से भौतिकवादी सुख और धन लोलुपता के कारण मानव मन किस प्रकार  विचलित होता है, यह दर्शाया गया है। लेखिका का अनुभव जगत विराट है, उनकी ब्रिटेन की भौगोलिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और खेल जगत की जानकारियों की बारीकियाँ कहानी के वातवरण, परिवेश को यथार्थ के धरातल पर समर्थ बनाती हैं।

स्त्री मन की संवेदना चाहें वह कोई भी हो एक समान होती है। हर व्यक्ति स्वाभिमान, सम्मान के लिए जीता है, यह सम्मान उनके सभी पात्रों में स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। स्वयं स्वाभिमानी दूसरों को आदर सम्मान देते हुए अपने सम्मान से कोई समझौता न करने का भाव रखने वाली जय वर्मा का चरित्र एक जुझारू, कर्मठ और जिदादिल इंसान के रूप में उभरता है, यही नहीं वह पति-पत्नी के संबंधों में नीरसता, असमर्थतता न आने के लिए मित्रवत् व्यवहार की अपेक्षा से जीवन नैया को जीवन जीने की कला से जोड़ती हैं।

कोई और सवाल कहानी में ब्यूटी क्वीन का खिताब जीतने वाली डोरीन आज़ाद विचारों की विदेशी महिला है। अपने से कम योग्य प्रेमी पीटर जॉन्सन से माँ के समझाने पर भी सिविल मेरिज कर लेती है। माँ, माँ होती है, कहीं की भी हो, वह सदैव बच्चों का हित सोचती है, लेकिन आज़ादी की चहक बच्चों को कुछ समझने नहीं देती है। यही कारण है कि बच्चे माँ यह जीवन मेरा है जिसे मैं अपने अनुसार जीना चाहती हूँ। जीवन बस एक बार ही मिलता है। तुम शादी का यह फैसला मुझ पर छोड़ दो।

डोरीन माँ की बात नहीं मानती एक बेटा और दो बेटियों के साथ जी-जान से पीटर का हाथ बटाती है। दाम्पत्य जीवन में वही पुरूष किस प्रकार जानवर बनकर डोरीन पर हाथ उठाना चाहता है डोरीन को बात-बात में उपेक्षित, तनावग्रस्त बनाकर छोड़ देता है। डोरीन तंग आकर एक दिन घर से भाग खड़ी होती है एक नव जीवन की तलाश में। तनावग्रस्त, उपेक्षित, अमर्यादित जीवन जीना कोई नहीं चाहता है। यह कहानी स्त्री-विमर्श और स्त्री अस्मिता का बोध कराती है। इसका शीर्षक कोई और सवाल अपने नाम की सार्थकता का भी बोध कराता है।

गूँज कहानी 30 वर्षों से इंगलैंड में बसी अमिता की कहानी है, जो इतने वर्षों में भी अपने को परेशान कभी कभी उदास सी बनी रहती है। मेरठ से 20 किलोमीटर दूर माखर गाँव की याद उसे अभी भी आती है। एक गूँज वह अक्सर रात में सुनती है, वह कैसी है, कहाँ की है यह जानने को बेताब रहती है। 30 वर्षों के बाद बेटे की शादी के बाद वह अपने पति, पुत्र के साथ गाँव जाती है।

गाँव की बेटी का स्वागत और मिट्टी की सौंधी महक सबको भाती है। वहाँ पहुँच कर दूर से आती हुई एक जानी-पहचानी आवाज सुनकर अमिता दौड़ती हुई दरवाजे तक पहुँची। सारंगी की मधुर लय सुनकर वह चौखट पर ठिठक गई। खुशी के मारे जोर से चिल्लाई… यही है… यही है जिसको मैं बहुत दिनों से खोज रही थी। (पेज- 34) अमिता पूछती है कि तुम ऐसी सारंगी कैसे बजाते हो, मैंने एक बुजुर्ग को सारंगी बजाते देखा था। वह बताता है कि वह मेरे वालिद थे, जो अब नहीं रहे हैं। गाँव की स्मृतियाँ मस्तिष्क में घर कर जाती हैं, जो स्वप्न में परेशान करती हैं, कुछ खोजती हैं। अमिता को ऐसी सुखद गूँज मिल जाती है, जिसे वह खोजती थी। यही भारतीयता है, यही भारत की स्मृति है, जो हमें विदेशों में रहने पर भी जोड़े रखती है।

गुलमोहर कहानी एक कोठी के नाम पर आधारित है। यह मकान और घर को समझाने की अनूठी कहानी है। माँ कमला पति के देहान्त उपरान्त भी बड़े तरीके से जीवन जी रही है, जिसे घर के पुराने नौकर आज भी सम्मान देते हैं। पति और बच्चे ध्रुव की यादों को संजोए जीवन व्यतीत कर रही है। 19 वर्ष बाद कनाडा से दूसरी बार पुत्र माँ की ममता का मोह या फिर भौतिकवादी सोच के कारण आता है। उसे अब पता चल गया है कि गुलमोहर कोठी की कीमत चार करोड़ से ऊपर की है। पत्नी शार्ली के कहने पर अब वह अपने बच्चे के सुंदर भविष्य के लिए मोटल खोलना चाहता है।

अपने बच्चे और अपनी सुख सुविधाओं के लिए माता को बेघर करने की शुष्क संवेदनाओं का जोर अब देखने को मिलता है। ध्रुव आकर अपनी माँ कमला को बता भी देता है कि वह अब इस गुलमोहर कोठी को बेचकर अपने साथ उसे ले जाएगा, बुढ़ापे में अब तेरी कौन सहायता करेगा, देखभाल करेगा। लाख तरह से समझाकर वह अपनी माँ को साथ ले जाने के लिए तैयार कर लेता है। कमला समझाती है कि वहाँ उसका मन नहीं लगेगा। उसकी सहेली का अनुभव भी ठीक नहीं रहा, परन्तु पुत्र के हठ के सामने उसकी एक ना चली। माँ का पासपोर्ट वीजा सब कुछ लग जाने की तैयारी ध्रुव एक अनुष्ठान की तरह करता है। जाने वाले दिन इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर माँ को चेक इन करवाकर अभी आता हूँ कहते हुए, ध्रुव माँ को वहीं छोड़कर कनाडा चला जाता है। माँ के पर्स में एक फ्लैट के कागज और चाबी छोड़कर। दुख देने वाला कोई और नहीं अपना ही बेटा निकला। अपने भाग्य को ही दोष दूँगी। बेटे के प्यार ने मुझे अंधा बना दिया। (पेज. 51-52) समाज में शुष्क होती संवेदनाओं की तस्वीर यह कहानी है।

स्वार्थ और धन की लोलुपता ने मानव को अंधा बना दिया है। दिल को छूने वाली मार्मिक, सत्य से परिपूर्ण कहानी है। कमला का दर्द, व्यथा आज के उस बुजुर्ग महिला का है, जो एकांत में, अकेले में रहने को मजबूर हैं। सब कुछ पास होने पर भी पुत्र की अधिकार भावना की प्रबलता, केवल स्वयं के बारे में, अपने परिवार के बारे में सोचने की संकीर्णता को दर्शाती है। यह भी बताती है कि हम कितना गिरते जा रहे हैं। एकल परिवार की त्रासदी है, जिसमें हम बड़े होने पर माँ-बाप को ही भूलते जा रहे हैं। मानवीय संबंधों पर भौतिकवादी सोच कैसे हावी होते जा रही है। यह कहानी बहुधा हमें अपने वातावरण में घटित होती नज़र भी आ रही है।

सात कदम कहानी सिम्मी के जीवन को उद्घाटित करती है। भारतीय नारी का उदात्त रूप सिम्मी में नज़र आता है। कहानी का शीर्षक सात कदम अर्थात् जीवन का साथ और सात फेरों की कर्तव्य बोधता को दर्शाता है। सिम्मी शादी के उपरान्त पति प्रिंस के साथ इंगलैंड के डार्विशायर के पीक डिस्ट्रिक्ट में रहने लगती है। प्रति प्रिंस को भारत में भी अच्छी नौकरी मिल गई थी। लेकिन इंगलैंड की चमक पौंड की चमक भौतिक सुख की चाह उसे इंगलैंड ले आई। सिम्मी का मन भारत जाने को मचलता है, वह भारत अपने लोगों से मिलना चाहती है। केवल उसी जगह रहते-रहते बोरियत महसूस करती है। वह पति से कहती है। कितने दिनों से आप वायदा करते आ रहे हैं कि अंग्रेजों की तरह हम भी हॉलिडे में घूमने के लिए कहीं बाहर गर्म देश जायेंगे। (पेज- 53) ठंड की शिकायत करती स्वयं को घुड़सवारी, केक बनाने, कुत्ता पालने के शौक में व्यस्त रखती है। प्रिंस को केवल अपने काम और धन से ही मतलब है। पति-पत्नी की हल्की नौंक-झौंक के साथ जीवन जीती हुई सिम्मी कहती है- मुझे नहीं मालूम है कि इंगलैंड में बस जाने को मैं त्याग और बलिदान कहूँ या फिर वनवास अन्य स्त्रियों की तरह न तो मैं भोग विलास को ही जीवन का परम लक्ष्य समझती हूँ और न मेरे भीतर आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साधन जुटाने की प्रवृत्ति जाग्रत हुई है। सादगी का रहन-सहन जीकर क्या मैंने अच्छा काम किया है या अपने अरमानों का खून किया है। (पेज-56-57) सिम्मी की लगातार शिकायतों से प्रिंस एक दिन घुमाते हुए सिम्मी के हाथ में एक लिफाफा रख देता है, जिसमें दो मेडिटरेनीअन क्रूज के टिकट थे। सिम्मी अत्यन्त खुश हो उठती है, सब को बताती है कि हम कल हॉलिडे में क्रूज पर जा रहे हैं। डार्विशायर से साऊथ हेम्पटन, लिसवन पुतर्गाल, जिबराल्टर फ्रांस स्पेन घूमेंगे। सिम्मी कहती है कि धरती पर कहीं स्वर्ग है तो इसी हॉलिडे में है। प्रिंस डैक पर खड़ा सिम्मी को बाहों में लेकर कहता है हनीमून पर हम लोग नहीं जा सके थे, इसका मुझे अफसोस है। लेकिन मैं अपने मन की बात बताना चाहता हूँ कि वैवाहिक जीवन का यह हमारा सबसे सुंदर और अविस्मरणीय हॉलिडे है। अगर मैं एक चित्रकार होता तो इस पल को मैं कैनवस पर उतार देता। (पेज 61)

सिम्मी अगले दिन सुबह स्विमिंग पुल पर बैठ कर अपने पति का इंतजार करने लगती है। काफी देर तक प्रिंस के वहाँ ना आने पर केबिन में अपनी चाबी से दरवाजा खोलकर सोता देखती है। वह उसे जगाने का प्रयास करती है। लेकिन ठंडे हाथ पैर देखकर घबरा जाती है। क्या करूँ क्या न करूँ की स्थिति में अपने सफेद स्कार्फ से प्रिंस का चेहरा ढक कर दहाडे मार-मार कर रोने लगती है। उसे याद आता है कि प्रिंस की बिल के अनुसार उसने अपना मृत शरीर मैनचेस्टर मैडिकल कॉलेज के अनोटमी विभाग को दान दे दिया था। ऐसी हालत में कर्तव्यबोध, पति की अंतिम इच्छा पूरी करने हेतु सिम्मी बड़ी सावधानी से काम लेती है। कल जहाज इंगलैंड पहुँचने तक वह सन्नाटे में रहती है। वेटर को यह कहकर कि साहब सो रहे हैं, उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना। यदि आप चाहें तो हमारे नाश्ते की ट्रे यहीं कमरें में ला सकते हैं। ( पेज- 63) वह हेम्पटन पोर्ट के पहुँचते ही स्टूवर्ड्स से धीमी आवाज में कहती है मेरे पति के लिए आप कृपया एम्बुलैंस बुला दीजिए। (पेज 65) प्रेम और कर्तव्य की मार्मिक प्रेम कथा है।

किधर कहानी लंदन में बसे गोपाल के एकाकी जीवन को दर्शाने वाली है। पत्नी कुमुद की मृत्यु के बाद गोपाल अपना समय मित्र मोरिस के साथ बिताता है, नहीं तो पोते के साथ समय व्यतीत करता है। लंदन के मुक्त वातावरण में उसका मित्र मोरिस उसे नया पार्टनर बनाने की सलाह देता है। गोपाल अपने पोते को संगीत टीचर के यहाँ से लेने जाता है। संगीत टीचर सुमन से बातचीत होती है, फूलों का बड़ा गुच्छा और चॉकलेट का बॉक्स गिफ्ट में दिया था। (पेज- 73) ये सब बातें बेटे से सुनकर बहू का दिमाग ठनक जाता है। पति से उनके बारे में बात करती है। पुत्र और बहू का यह सोचना अगर उन्होंने ऐसा किया तो हम कहाँ जायेंगे, समाज में बदनामी अलग होगी। एक अकेले व्यक्ति के एकाकीपन, उसकी पीड़ा, व्यथा से कोई सरोकार नहीं है। बापू जी का हँसकर बात करना पुत्र वधू के लिए सिर दर्द बन गया है। मुझे यकीन है कि परिवार को दाँव पर लगाकर पापाजी प्यार के मार्ग पर नहीं चलेंगे। शायद थोड़े दिन के बाद उनका उत्साह कम हो जाये, या फिर। (पेज 77)

फिर मिलेंगे इंगलैंड की डेजी और भारतीय इंद्रजीत की कहानी है। डेजी सिंह ने तीन बच्चों को जन्म दिया। बड़ी लड़की सिमरन थी, जिसका माँ डेजी से कोई अब मतलब नहीं था। छोटा पुत्र जार्ज जो माँ की मर्जी के बिना फौज में चला गया, फिर कभी आया ही नहीं। इंडिया दूसरी लड़की थी, जो 19 वर्ष बाद पति को छोड़कर माँ के पास रहने आई थी। पति की मृत्यु के उपरान्त डेजी ने ही बड़े यत्न से बच्चों को पाला। अंत में डिमेंशिया बीमारी का शिकार होने के कारण भूल जाना, बचपन की घटना याद आना बच्चे को देखना इत्यादि तरह-तरह की गतिविधियों से माँ डेजी को इंडिया नर्सिंग होम में दाखिला करवा देती है। इंगलैंड में किस प्रकार सोशल सर्विस वाले काम करते हैं और नेशनल हेल्थ सर्विस वाले कार्य करते हैं, इसकी जानकारी दी गई है। डेजी घर के संदूक में जाकर देखती है कि घर के कागजात इंडिया के नाम है। भारत के पुराने मकान का फोटो है, जिसमें कुछ लोग खड़े हैं। मकान का नाम तख्ती पर हिंदी, पंजाबी या किसी भारतीय भाषा में लिखा हुआ था। इंडिया सोच में पड़ गयी काश मैं हिंदी पढ़ सकती, मैं विश्व की पुरातन भारतीय सभ्यता के बारे में और भी जानना चाहती हूँ। माँ का स्वास्थ्य ठीक हो जाने पर घर का पता भारत में कैसे ढूँढूगी क्या मालूम माँ को शहर का नाम भी याद है या नहीं (पेज-93) डेजी सिंह कहती है हम अंग्रेज औरतें अपनी शादी की अँगूठी कभी नहीं उतारते। यह मेरे पति इंद्रजीत सिंह की आखिरी निशानी है। इसे मैं जीवन भर अपने पास रखूँगी। (पेज 98) यह कहानी डेजी सिंह को भारतीयता के रंग में डूबा दर्शाती है। अंत समय तक उसकी निशानी नहीं उतारना चाहती, अपनी बेटी का नाम इंडिया उसके भारतीय प्रेम को दर्शाता है।

गोल्फ कहानी गोल्फर कहानीकार की है, जो स्वयं 25 सालों से गोल्फ खेलती रही है और इस खेल की बारीकियों नियमों का खूबसूरती से वर्णन किया है। खेल के माध्यम से सोनिया का घर टूटने से बच जाता है। पति मार्को का डॉक्टर होना और गोल्फ खेलना, उसके अहंकार को ओर बढ़ा देता है। पत्नी सोनिया की ओर ध्यान ना देना, बात-बात पर उपेक्षा करना। गोल्फ का खेल मेरी सौतन बन गया। मेरा वैवाहिक जीवन गोल्फ की भेंट चढ़ गया है। मैं एक गोल्फ विड़ो बन गयी हूँ। (पेज 95) सोनिया की सहेली नीतू उसे गोल्फ खेलने के लिए प्रेरित करती है। उसकी प्रेरणा से वह गोल्फ खेलती है और उसका घर टूटने से बच जाता है। नीतू जानती है कि पुरूष का अहं बहुत बड़ा होता है। वह अपने खेल अपने तौर तरीकों को बेहतर समझता है। साथ ही साथ गोल्फ खेलने से उसका समय कटने लगता है। वह दिन भर खेलकर थक जाती है। मार्को की ओर उसका ध्यान नहीं जाता अपितु अब मार्को उसकी ओर ध्यान देने लगता है। मार्को कहता है मैं तुम्हें बता देना चाहता हूँ कि गोल्फ तुम्हारे लिए चेतावनी है। यह गोल्फ का खेल जिंदगी की तरह है। गलती करने के बाद जैसे जिंदगी में दूसरा मौका नहीं मिलता। खेलते समय घटनाएँ घटती रहती हैं तथा खिलाड़ी कहते रहते हैं कि काश मैं ऐसा करता या वैसा करता लेकिन खेल का शॉट वापिस नहीं किया जा सकता।

प्रो. नवीन चन्द्र लोहानी के शब्दों में, जय वर्मा की कहानियों में उनके अनुभव जगत का साक्षात्कार है। ब्रिटेन की पृष्ठभूमि में रची गई ये सातों कहानियाँ अलग-अलग स्थितियों-परिस्थितियों से रू-ब-रू कराती हैं। सात कदम में शामिल सभी कहानियाँ अपने कथा फलक का पाठक से तारतम्य ही नहीं बिठातीं बल्कि अपने साथ बहा ले जाती हैं। उनकी कहानियों में अलग-अलग स्त्री छवियाँ नए चरित्रों से साक्षात्कार कराती हैं। चाहे वह डोरीन, हिमानी, कमला, इंडिया एवं सोनिया हों या फिर सात कदम की नायिका सिम्मी सब अपने समाज के प्रतिनिधि चरित्र हैं। स्त्री चरित्रों में उनकी गहरी पैठ है। लेखिका अपने पात्रों के वर्ग चरित्र को एकदम स्पष्ट पकड़ती हैं। जय वर्मा की कहानियाँ इंगलैंड के परिवेश, वहाँ की सामाजिक सुरक्षा, प्राकृतिक सुन्दरता, भौतिकवादी सुख-सुविधाओं से सम्पन्न खुशहाली के वातावरण को दर्शाती हैं, लेकिन उनकी कहानियों में भारत से अलग होने का दर्द, देश की गूँज सुनने की आतुरता, रिश्ते को समझने निभाने का दायित्व, संवेदनाओं के दौर में पुत्र का माँ को ठगना और खेल के माध्यम से घर का बचाना दिखाता है। कहानियाँ निःसंदेह पठनीय एवं सराहनीय होने के साथ-साथ शिक्षाप्रद हैं। सात कदम कहानी तो प्रेम और कर्तव्य की अनूठी गाथा है। भाषा में सहजता एवं सरसता है, जिज्ञासा का भाव अंत तक पाठक को बाँधने में सफल हुआ है।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.