व्यंग्यात्मक संपादकीय - इमरान के शोले 3

दुनिया वालो अगर महात्मा गान्धी और नेलसन मंडेला के बाद कोई अमनपसन्द है तो वो हैं अफ़ग़ानिस्तान के तालेबान। इन तालेबानों को अफ़ग़ानिस्तान की औरतों ने वोट देकर वापिस गद्दी-नशीन होने की गुज़ारिश की है। एक बार तालेबान अफ़ग़ानिस्तान का राज-काज संभाल लें तो हमारे खित्ते में अमन और चैन की बंसी बजने लगेगी।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सुबह उठे तो उन्हें महसूस हुआ कि शोले फ़िल्म के वीरू की आत्मा उनके शरीर  में प्रवेश कर गई है। और वह अपनी बेगम साहिबा को बसंती कहकर बुलाने लगे। बेगम हैरान आखिर हुआ क्या है। 
अचानक इमरान खान ने शोले के रामगढ़ की पानी की टंकी लाकर इस्लामाबाद में खड़ी करवा दी और खुद उस टंकी पर चढ़कर शोर मचाने लगे। “गांव वालो”… फिर सोचा इस्लामाबाद तो गांव नहीं है। तो अपना सुर बदला… “पाकिस्तान वालो”… “दुनिया वालो” यह जो बाइदन है न! और नरेन्द्र मोदी… इन दोनों ने मेरी हालत खराब कर रखी है। बाइदन मुझे मरने नहीं देता और मोदी मुझे जीने नहीं देता।
बाइदन मुझे फ़ोन नहीं करता और मोदी मेरा फ़ोन उठाता नहीं। दुनिया वालो इन दोनों ने मिलकर मेरे ख़िलाफ़ एक ऐसा षड्यंत्र रचा है कि मेरे ही मूर्ख पाकिस्तान में मुझे हंसी का पात्र बना दिया है। 
कोई मुझे तालिबान ख़ान कहता है तो कोई मुझे यू-टर्न मास्टर कहता है। और तो और कनाडा वाले तो मुझे झूठा और मक्कार भी कहने लगे हैं। बाइदन और मोदी की तो कोई मौसी भी नहीं है। अब आप ही बताओ मौसी ना हो तो मैं बात किससे करूं। किनसे कहूं कि इनसे फ़ोन करवाए इनसे फ़ोन उठवाए।
अब मैं नहीं सहने वाला… मना लो इन दोनों को… समझा लो इनको अगर यह नहीं माने तो मैं… मैं नीचे कूदने वाला हूं। और मेरे मरने के बाद इस दुनिया में अकाल पड़ेगा… भुखमरी होगी तीसरी वर्ल्ड वार शुरू हो जाएगी।
मुझे तो अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश वाले भी न पिद्दी समझते हैं न पिद्दी का शोरबा। लोग मेरे पाकिस्तान को फ़ुटबॉल समझने लगे हैं। जिसका दिल करता है एक किक लगा के आगे बढ़ जाता है। सिंध वाले भी अब सिंधु देश के नारे लगाने लगे हैं। दुनिया वालो इंडिया ने 370 हटा दिया है और मैं शहज़ादा सलीम की तरह मुंह देखता रहा। जब मैंने आवाज़ उठाई तो अमित शाह कहता है, “और तुम कर भी क्या सकते हो?” 
नरेन्द्र मोदी तो मुझे सिक्योरिटी काउंसिल में भी घुसने नहीं देता। उसको याद दिला दो हमारे देश में पाव किलो से लेकर पंसेरी तक के एटम बम्ब हैं। इंडिया को हमसे डरने की ज़रूरत है। हमने 1948 में, 1965 में, 1971 में और कारगिल में इंडिया की फ़ौज के छक्के छुड़ाए हैं। हमसे दोबारा न उलझें। इस बार तो हमारी तरफ़ से कुलभूषण यादेव भी लड़ेगा।
दुनिया वालो अगर महात्मा गान्धी और नेलसन मंडेला के बाद कोई अमनपसन्द है तो वो हैं अफ़ग़ानिस्तान के तालेबान। इन तालेबानों को अफ़ग़ानिस्तान की औरतों ने वोट देकर वापिस गद्दी-नशीन होने की गुज़ारिश की है। एक बार तालेबान अफ़ग़ानिस्तान का राज-काज संभाल लें तो हमारे खित्ते में अमन और चैन की बंसी बजने लगेगी।  
मेरा बस एक ही दोस्त है चीन… चीन… और चीन। मुझे तो बस एक ही बात पता है कि पाकिस्तान का बेड़ा गर्क किया है नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी ने । कुछ बाकी जो बचा वह शाहबाज शरीफ ने कर दिया मैं चाहे 20 साल तक राज करूं पाकिस्तान के हालात नहीं सुधरने वाले क्योंकि मैं हमेशा एक ही राग सुनाने वाला हूं कि पाकिस्तान का सत्यानाश किया पिछली हुकूमतों ने। 
मुझे मालूम है कि भारत ने पाकिस्तान की क्रिकेट की बैण्ड बजा रखी है। न तो कोई बाहर का खिलाड़ी पाकिस्तान में आके खेलता है और न ही भारत आई.पी.एल. में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को खेलने देता है। मुझे शाह महमूद कुरैशी ने बताया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच एटॉमिक वॉर क्रिकेट की वजह से ही होने वाली है। 
मुझे अपनी जिंदगी में बस एक ही काम आता था और वह था डोनेशन मांगना चाहे मैंने अपनी मां के नाम पर जो हस्पताल खोला उसके लिए डोनेशन मांगे या किसी भी और काम के लिए मगर मांगता मैं डोनेशन ही हूं। मगर अब पाकिस्तान चलाने के लिए कोई डोनेशन देता नहीं है… वे लोन देते हैं और मुझे पिछले लोन की किस्तें  उतारने के लिए भी लोन चाहिए। तो मैं अपना सरनेम बदलकर इमरान खान नियाज़ी की जगह अब इमरान लोन रख लूंगा और लोन मांगे बिना मैं छोडूंगा किसी को भी नहीं। जो मुझे लोन देगा उसको भी नहीं छोडूंगा और जो नहीं देगा उसको तो बिल्कुल नहीं छोडूंगा।
दुनिया वालो बस आपको एक बात कहना चाहूंगा… चाहे हिन्दुस्तान की आबादी एक अरब और थ्री हंडरड मिलियन है फिर भी हम सभी पाकिस्तानियों को याद रखना होगा… आपको घबराना नहीं है।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

11 टिप्पणी

  1. व्यंगात्मक टिप्पणी में पाकिस्तान के माली हालत पर गम्भीर
    ध्यानाकर्षण है । तालिबानियों के निशाने पर वज़ीरे आला भी हो सकते हैं यही डर उन्हें सताने लगा है ।
    चीन मौकापरस्त है फिर भी उससे दोस्ती इमरान खान की मजबूरी है ,सही लिखा आपने कि अब सहानुभूति के लिए कोई
    मौसी उनके पास नहीं है । हँसते हँसते लाज़वाब व्यंग ।
    Dr prabha mishra

  2. सत्य वचन महाराज, सम्पूर्ण सत्य.. इमरान को फख्र है कि तालिबान को उन्होंने पाला पोसा, सींचा और दुनिया को क़ीमती तोहफ़ा दे दिया.. उन्हें पता ही नहीं कि ये – अमरबेल – है। सीमाएँ जुड़ी हुई हैं, पहला शिकार पाकिस्तान ही होगा। अच्छा है रामगढ़ की टंकी से अभी छलाँग लगा लें, नहीं तो मोदी और बाईडेने की जगह, तालिबान होगा, जो न जीने देगा न मरने…

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