आज बाएँ हाथ में कुछ ज़्यादा ही दर्द हो रहा है वैसे भी साँस फूलने लगी जाती है आजकल ध्यान ही नहीं दे पाती घर गृहस्थी के कामों के कारण खुद पर… सोचते  सोचते बीना आटा गूँधने लगी। वैसे तो छोटा मोटा दर्द हम लोग पानी की तरह पी जाती हैं लेकिन यह सीने  का दर्द है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है, अब तो झुँझलाहट होने लगी है। शाम को पति को बताया तो पति ने भी डांटा कि घर कहीं नहीं जाने वाला पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखो, पति की डांट खाकर शाम के खाने में लग गई। रात को सारे काम समेटते समेटते भूल ही गयी अपने दर्द को। 
करीब ग्यारह बजे के आस पास सोने आ गयी जब तक बच्चे और पति सब सो गये थे। सुबह क्या क्या करना है सोचते सोचते आँख लग गयी। अचानक तीन बजे के करीब सीने में बहुत तेज दर्द हुआ, सॉंसे अटकने लगी, पति को उठाने के लिये हाथ बढ़ाया लेकिन सब निढाल सा लग रहा था, आवाज तो कोसों दूर जा चुकी थी और बीना चिरनिद्रा में चली गयी। सपना कहें या कुछ और सामने एक विशालकाय काला सा आदमी खड़ा था कह रहा था कि पृथ्वी पर आपका इतना ही दाना पानी था, मैं यमराज आपको लेने आया हूँ।
बीना एक बार तो सकपकाई की कोई बहरूपिया घुस आया है… ये बच्चे भी ना दरवाज़ा खुला ही छोड़ दिए! यमराज के एक दो बार दुबारा बोलने पर बीना को आ गया ग़ुस्सा, जोर से झल्ला कर बोली कि क्या लगा रखा है ये, ऐसे कैसे मर सकती हूँ ? कितने काम बाक़ी है पता है तुम्हें?
मिर्च सुखा रखी है, अचार का मसाला बना रखा है। कौन डालेगा अचार? कपडों के आयरन करनी है, कपड़ों का ढेर पड़ा है।फ्रिज साफ करना था सुबह, अरे हाँ राशन भी तो लाना था इस सप्ताह का, वो कैसे भूल सकती हूँ। 
तभी यमराज बोला, देवी ये सब होते रहेंगे अब मोह माया त्यागो और मेरे साथ चलो, मुझे औरों को भी लेना है।
बीना इतने सारे अधूरे काम सोच कर ग़ुस्से से ज़्यादा चिंता में झूल रही थी तभी उसे याद आया कि बारह दिन में लोग भी तो आयेंगे, पति को तो कुछ भी पता नहीं है। हज़ारों बातें बनायेंगे, अचानक बोलती है, “यमराज जी आप बाक़ी लोगों को ले आओ, पृथ्वी पर थोड़ा भ्रमण भी कर आओ तब तक मैं बच्चों के लिये थोड़ी मठरियाँ निकाल देती हूँ, पति के लिये चार पाँच सब्ज़ियाँ बना देती हूँ फिर तो ये सम्भल जायेगें। एक बार इतना बड़ा धक्का जो लगेगा।”
“नहीं नहीं ऐसे नहीं हो सकता तुम्हें अभी चलना होगा।” 
“ओह कैसे सम्भलेगा यह घर मेरे बिना, सॉरी यमराज जी अभी तो मैं किसी भी हालत में नहीं जाऊँगी, बच्चे कैसे रहेंगे? आपको एक बार सूचना तो देनी चाहिये थी ना आने से पहले तो मैं सब कामों से निवृत्त हो तैयार हो जाती, परिवार से भी लगाव कम कर लेती।” 
यमराज हंसकर बोला, “देवी पंद्रह दिन से सूचना ही तो दे रहा था मेरे आने की, जब तुम्हें बायें हाथ में दर्द हो रहा था, फिर सॉंस भी फूलने लगी थी, सीने में भी तो दर्द हो रहा था ना पर तुम हो कि ध्यान ही नहीं देती। ऐसी डूब चुकी हो घर गृहस्थी में।”
बीना बोलती है, “सॉरी यमराज जी इस बार तो न हो पायेगा चाहे आप कुछ भी कर लो। आप बाद में आना।” यमराज देख रहा थी कि किस मिट्टी की बनी है मर रही है पर अभी भी घर की ही चिन्ता सता रही है।
तभी अचानक दूध वाले की घंटी से बीना की नींद टूटी, भागकर दूध लिया और चाय बनाने लगी और दूसरी तरफ़ मिर्च देखने लगी जिसका उसे आज अचार बनाना है। वहीं एक कोने में खड़ा यमराज बीना को देखकर सोच रहा था कि ये औरतें कभी खुद के लिये भी जियेंगीं?

2 टिप्पणी

  1. इंदु जी, आपकी लघुकथा ने कमाल कर दिया। विश्व की समस्त गृहनियों का ऐसा सुंदर चित्र बना दिया जिसका कोई जवाब नहीं। अति सुंदर ।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.