Monday, May 11, 2026
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मनोरजंन कुमार तिवारी की कहानी – किन्नर कथा

एक अच्छा -खासा, चलता-फिरता आदमी(पुरुष), जो दौड़ सकता है, भाग सकता है, मगर वह दौड़ता नहीं, जरुरत पड़ने पर भागता भी नहीं, जैसे “माहवारी ” के दिनों में हो और आधुनिक “पैड” भी इस्तेमाल नहीं करता हो। चेहरे पर दुःख नहीं, दर्द नहीं मगर एक बेचारगी चप्पा है।

पुरुष होकर भी शायद स्त्रैण होने की बेचारगी, या खुद को ना पुरुष समझ पाता है ना स्त्री, इसकी बेचारगी। सर के बाल बहुत लम्बे कर लिया है उसने, वह अपने बालों को इतना प्यार करता है, जितना शायद कोई स्त्री भी नहीं करती होगी। दिन-भर वह अपने बालों को सवाँरने, धोने में लगा रहता है। अगर कोई उसे उपहार देता है तो वो बहुत खुश होता है। कपडे भी लड़कियों वाले पहनता है, क्रीम, लिपस्टिक, पावडर, तेल, अच्छे साबुन, शैम्पू उसके लिए अनमोल उपहार है
दाढ़ी, मूँछ और सीने पर बाल है, मगर उसे इन बालों से असुविधा होती है, उसका बस चले तो वह इन सभी गैर जरुरी बालों को हमेशा के लिए साफ़ कर दे।

संकोच और झिझक से सिमटा रहता है हर वक्त, सिर्फ कुछ करीब बने लोगों से धीमी आवाज में बात करता है, उनके साथ ही खाता-सोता है।आप कहेंगे इसमें आश्चर्यजनक तो कुछ भी नहीं है, ऐसा ही तो होते है किन्नर मगर यहाँ एक पेंच है। किन्नर होते होंगे ऐसे मगर वह एक किन्नर नहीं है, पुरुष है और किन्नर बन कर रहने के लिए मजबूर है।साऊथ परगना जिला, पश्चिम बंगाल का रहने वाला यह शख़्स बिहार में मधेपुरा से लेकर बक्सर जिला तक पहुँचा है। यह जब आठ-दश साल का होगा तभी किसी ने इसे लाइन होटल चलने वाले के हाथ बेचा था। उस समय से लेकर अभी पैंतीस वसंत देख चुका महेश एक हाथ से दूसरे हाथ में बेचा जाता रहा है। घर-परिवार होगा कहीं, पैदा करने वाले माँ-बाप भी होंगे, मगर भूल चूका है वह अपने परिवार को, जो उसे खरीद लेता है वही उसका मालीक/उसका उस्ताद होता है, उसका गुरु/उसका भगवान होता है। वह काम करता है, मगर उसके काम करने के मजदूरी नहीं मिलती, बस खाना -पहनना और उसी उस्ताद के साथ सो जाना, इतनी सी ही है उसकी जिंदगी। वह अपने उस्ताद से कितना प्यार करता है, बताने में उसे कोई संकोच नहीं, उसकी बातें इश्क़ को एक नई ऊँचाई प्रदान करती है, और हमारे जैसे लोग सोच में पड़ जाते है कि ” क्या सच में हमने कभी सच्चा इश्क़ नहीं किया?” ” क्या सच में हम अपने महबूब में रब को देखने से महरूम रह गए?”

वह इश्क़ को बिल्कुल एक अलग ही तरह से परिभाषित करता है, जैसे महान कवियों ने/ लेखकों ने कभी सोचा होगा, बावजूद इसके कि वह जानता है कि उसके उस्ताद ने उसे ख़रीदा है पैसा देकर और जरूरत पड़ने पर बेच भी देगा। फिर उसका मालिक/उसका उस्ताद/उसका महबूब/ उसका सबकुछ कोई और होगा। क्या वह अपने पहले के महबूब को कभी याद करता है? पुछने पर झेंप जाता है, और अंत तक जबाब नहीं देता जैसे कोई गूढ रहस्यों वाली स्त्री हो। विडम्बना यह है कि, उसे समझाया नहीं जा सकता कि वह एक चलता-फिरता इंसान है, उसे कोई बेच नहीं सकता, कोई खरीद नहीं सकता, कोई उसे खाने-पहनने को देता है तो उससे काम करवाता है, उसकी मेहनताना है। मैंने कोशिश की, उसे समझाया कि वह चाहे तो इतना ही मेहनत करके वह पैसे कमा सकता है, और पैसे बचा कर अपना एक परिवार, एक घर बना सकता है।

मैंने उसे डराया भी कि उसे पुलिस पकड़ सकती है, उसके उस्ताद को भी क्योंकि इक्कीसवीं सदी है यह और देश में इस तरह इंसानो को बेचना -खरीदना ज़ुर्म है। मैंने उसे भड़काया भी कि छोटे-छोटे बच्चों की तस्करी होती है, मज़बूर बच्चे कुछ नहीं कर पाते, मगर तुम तो जवान हो, तुम्हे कोई बेचता है तो तुम्हे कुछ मिलता भी नहीं, फिर भाग क्यों नहीं जाते दिल्ली, सुरत, मुम्बई कहीं मगर सब सिफ़र! वह अपने महबूब से जूदा होने के नाम से ही रोने लगता है। वह किन्नर नहीं, पुरुष है, जिसका पुरुषार्थ चूक गया है।

  • मनोरंजन कुमार तिवारी
जन्म स्थान:- भदवर, जिला- बक्सर, बिहार
वर्तमान पत्ता:- फरीदाबाद, भारत
मोबाइल न.-  9899018149
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1 टिप्पणी

  1. मनोरंजन जी!
    आपकी कहानी “किन्नर कथा” पढ़ी।
    पढ़कर एक बेचैनी सी होने लगी।
    मानसिकता बचपन में जिस तरह की बन जाती है उसे दिमाग से हटाना बहुत मुश्किल होता है।
    बचपन जिस परिवेश में रहता है,जो सुनता है, देखता है, बोलता है, महसूस करता है, वह उसका चरित्र बन जाता है जो उम्र दर उम्र पकता चला जाता है।

    न जाने कितनी बार बेचा गया होगा और कितनी ही बार उसको खरीदा गया होगा। कितने चरित्र उसके सामने से गुजरे होंगे, और किस-किस ने उसके साथ क्या-क्या किया होगा!

    अन्ततः किन्नरों के बीच तो वह निश्चित रूप से सुरक्षित था। किन्नर भी तो स्त्री पुरुष के भेद से परे होते हैं ना पूरे स्त्री,न पूरे पुरुष।
    बस वहीं उसे अच्छा लगा।जो वह नहीं था, जो उसके लिये अप्राप्य था। वह स्वयं को उस रूप में देखना चाहता था। स्त्री रूप में देखना चाहता था। वह अपनी चयन के लिए आजाद था। अपनी मर्जी से रहने और कपड़े पहनने के लिए स्वतंत्र, क्योंकि वह जिन लोगों के बीच में रह रहा था, वहाँ वह यही सब देख रहा था। यहाँ वह आजाद था। एक लंबी गुलामी के बाद मुक्त। किन्नरों के बीच जो बस जाता है उसे वे लोग सहजता से छोड़ते नहीं।
    इस संसार को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता होगा।
    वह इनको छोड़कर जाने का मतलब समझता था।

    जिसे बेचा जाता था उसके प्रति महबूब सी ईमानदारी इसलिये भी जरूरी थी कि पेट का भरना उस ईमानदारी पर ही निर्भर था

    उसका पुरुषार्थ पनपा ही नहीं था, उसे तो बचपन से ही उठने ही नहीं दिया गया। उसकी तो पहले ही हत्या हो गई थी।

    एक कहावत है-
    “का बरखा जब कृषि सुखाने”
    खेती के सूख जाने के बाद अगर बारिश हो भी, तो क्या फायदा?
    समझाइश का तो असर होना ही नहीं था।

    कहानी अनाथों की मजबूरी और दर्द को व्यक्त कर पाठक के
    हृदय में करुणा तो उत्पन्न करती है।

    कहानी में वर्तनी और भाषागत दोष कई जगहों पर है। जो पढ़ने का आनन्द खत्म कर देते हैं।वर्तनी की गलती से तो शब्दों के अर्थ ही बदल जाते हैं।यह संभवतः प्रांतीय भाषा का असर है। हम जो शब्द जिस तरह से बोलते हैं उस उच्चारण दोष की वजह से वैसा ही लिखा भी जाता है।

    जो भी हो,कहानी ने दिल को टच तो किया।
    बधाई आपको।
    कहानी पढ़वाने के लिये
    पुरवाई संपादक मंडल का आभार

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