- आरती स्मित
भारत की संकल्पना जब राष्ट्र के रूप में की जाती है तब उसकी वाणी के रूप में जिस भाषा का बिंब नेत्र के समक्ष उभरता है या यों कहें कि भारतीयों को परस्पर जोड़ने में सक्षम भाषा के रूप में यदि कोई भारतीय भाषा देखी जाती रही है तो वह है ‘हिंदी’। वह हिंदी जो एक ओर सदियों पूर्व देवनागरी लिपि में कही/लिखी जाने वाली संस्कृत से उद्भूत तथा फ़ारसीमिश्रित रचना—मुकरी,पहेली, दोहे, भजन, गीत और कविता के अन्यान्य छोटी-बड़ी साहित्यिक नदियों का समन्वित रूप रही तो वहीं दूसरी ओर अलग-अलग क्षेत्रों में बोली-उपभाषा-भाषा के रूप में आम जनता के बीच जीवंत रही है।
समय के प्रवाह में इसके स्वरूप में परिवर्तन और विकास की कहानी इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ है। कुछ बातें जो जनमानस में सीधे-सीधे घर किए हैं, जो सहज रूप में समझ आती हैं, वह यह कि हिंदी अपनी विविधता में भी एकता की सुगंध बिखेरती ऐसी भाषा है जो भारत की आत्मा ‘आम जन’ की सबसे बड़ी संख्या द्वारा बोली-लिखी-पढ़ी तथा संवाद की समझ बनाने योग्य समझी जाती है। इन्हीं गुणों को लक्षकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ यानी राष्ट्र के अस्सी प्रतिशत को एकसूत्र में बाँधे रखने की योग्यता एवं क्षमता रखने वाली भाषा माना और इसे राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने हेतु सार्थक तर्क सामने रखे।
लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया, “भारत में सभी भाषाओं के लिए एक लिपि नागरी होने से भारतीय जनता की एकता और ज्ञान का अंतर्प्रान्तीय आदान-प्रदान सुगम हो जाएगा”
यदि ध्यान दें तो पाएँगे कि हिंदी में एकसूत्रता का गुण उसके भीतर ही विद्यमान है। हिंदी की प्रकृति ही ऐसी है कि वह उदारता से सबको अंगीकार कर लेती है। देश की एक वर्ष तक की यात्रा के दौरान एवं यात्रा समापन के बाद बापू को उनके प्रश्न का उत्तर मिल गया था। वे समझ चुके थे कि हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो क्षेत्रीय विशिष्टता रखते हुए भी दिलों को जोड़ने का हुनर रखती है। बिहार एवं उत्तर प्रदेश के विविध स्थलों को निकटता से देखने-समझने के बाद ही उन्होंने कहा था–
“हिंदी वह भाषा है जिसको उत्तर में हिंदू व मुसलमान बोलते हैं और जो नागरी अथवा फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। यह हिंदी एकदम संस्कृतमयी नहीं है, और न वह एकदम फ़ारसी शब्दों से लदी हुई।”
बाद के दिनों में उन्होंने अपने भाषण में इस बात पर बल दिया कि “भाषा वही श्रेष्ठ है जिसको जनसमूह सहजता से समझ ले।” और यहाँ उनका तात्पर्य ‘हिंदी’ से था।
एक गुजरातीभाषी जिनकी शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम से हुई, उनके द्वारा हिंदी को लोगों को जोड़ने वाली भाषा मानना अपने देशवासियों के गहरे अनुशीलन का परिणाम था। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी ने अपने भीतर एक बड़ा और जीवंत साम्राज्य बसा रखा था। एक ऐसी नदी जिसमें अलग-अलग बोली-भाषाएँ छोटी-बड़ी नदियों के रूप में स्वत: जाकर मिल रही थी और उसे समृद्ध कर रही थी। कहीं कोई विवाद न था। यह समृद्धि उन सभी बोलियों-भाषाओं के सामूहिक औदार्य का सुपरिणाम थी।
बापू हिंदी से जुड़े और हिंदी के विनम्र एवं मिलनसार स्वभाव के कारण इतने भावुक हो गए कि कह दिया, “मुझे अकेले छोड़ दिया जाए तो आप मुझे अपनी शक्ति भर सूत कातने और दत्तचित्त होकर हिंदुस्तानी (हिंदी) की पुस्तकों को पढ़ते हुए ही पाएँगे।“।
जन समूह से संवाद करते समय उन्होंने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि “आपकी अपनी एक राष्ट्रभाषा है, जो हिंदी है। आप अंतर्प्रान्तीय मामलों में आसानी से उसका प्रयोग कर सकते हैं, भले ही वह टूटी-फूटी हो।”
हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का मानना था, “लिपि की एकता विभिन्न भाषाओं के प्रचार की साधिका है और भाषा का ज्ञान राष्ट्र एवं संस्कृति की एकसूत्रता का सूचक और पोषक है।”
यहाँ दोनों महापुरुषों के विचारों में एक प्रमुख बिंदु समान है—लिपि की एकता या उसकी एकरूपता। ध्यान दें तो हम स्पष्ट पाते हैं हिंदी का भारतीय परिप्रेक्ष्य में विस्तार तथा कालांतर में हिंदी के वैश्विक प्रसार को विविध विशेषणों के साथ इसी गुण के आधार पर स्वीकार किया गया। हिंदी की मान्य आरंभिक विधा पद्य पर दृष्टि डाली जाए तो हिंदी विविध क्षेत्रीय सुगंधों में लिपटी एवं समृद्ध रूप में मिलती है। उनके बीच एकता लिपि की है और यह महत्त्वपूर्ण भी है।
महाकवि विद्यापति, अमीर खुसरो, मलिक मुहम्मद जायसी, कबीर, तुलसी, सूर, मीराबाई से लेकर भारतेंदु और उनके परवर्ती कवि— संत कवि तुलसी साहिब, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि अनेकानेक साहित्य-मनीषियों की रचनाओं में क्रमश: क्षेत्रीय भाषा –- मैथिली, हिंदवी, पूर्वी अवधी, सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी), साहित्यिक अवधी, ब्रजभाषा, राजस्थानी, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली, सामान्य खड़ी बोली एवं अन्य भाषा के शब्दों को आत्मसात् कर, आगे की यात्रा करनेवाली बहुरूपी-बहुरंगी हिंदी भाषा एवं साहित्य, विशेषकर साहित्य का समृद्ध रूप हमारे समक्ष प्रकट है।
धीरे-धीरे तत्कालीन समय की गूँज-अनुगूँज को पहचानती हुई हिंदी जनसामान्य की समझ में आने योग्य लचीली भाषा के रूप में विशिष्ट है। रचनाकारों एवं देश के कर्णधारों/ नौनिहालों ने हिंदी को देश की एकजुटता की डोर के रूप में पहचाना तो उसकी उदार प्रकृति के साथ ही उसकी अद्भुत ग्राह्य शक्ति प्रकट होने लगी। हिंदी के पंख धीरे-धीरे खुलने लगे। ये पंख इतने सबल हुए कि धीरे-धीरे सात समंदर पार जाना भी असंभव न रहा। भाव-विचार-कल्पना-सपना की प्रधानता ने उसे तकनीकी संकीर्णताओं से धीरे-धीरे मुक्त कर दिया। भाषा के रूप में यही उसकी उदारता की परिचायक है।
हिंदी एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें लगभग 46 बोलियाँ अपनी अस्मिता बनाए हुए हैं। हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि-आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने खुले तौर पर कहा, ”हिंदी सामान्य जन और शोषित की भाषा है। अगर आप हिंदी जानते हैं आप देखिए , बांग्लादेश में, नेपाल में , पाकिस्तान में, काबुल में, मॉरीशस में अब तो यूरोप में भी आपका काम ठीक से चल सकता है। तो हिंदी एक तरीके से अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनी नहीं है, वह है।”
वस्तुतः सर्जना की विधा कोई भी हो, उसकी समृद्धि भाषा की समृद्धि से जुड़ी है। हिंदी की वरिष्ठ रचनाकार चित्रा मुद्गल के शब्दों में, ‘हिंदी का मतलब है — भारत!‘
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि ‘राजभाषा नियम 1976’ प्रशासनिक दस्तावेज़ के नियम 2 के उपनियमों के अंतर्गत वर्ग ‘क’ मूल हिंदीभाषी क्षेत्रों को रेखांकित करता है जहाँ कि राजभाषा हिंदी है; वर्ग ‘ख’ के अंतर्गत वे राज्य/क्षेत्र हैं जिनकी राजभाषा हिंदी नहीं है किंतु हिंदी का प्रचलन (बोले-पढ़े-लिखे और समझे जाने में सक्षम) सामान्य है, जबकि वर्ग ‘ग’ उन प्रांतों की तालिका प्रस्तुत करता है जिनकी भी राजभाषा हिंदी नहीं है और सामान्य स्थानीय जन द्वारा हिंदी कम बोली और समझी जाती है।
निजी अनुभव एवं स्थानीय जनों तथा पर्यटकों से संवाद के आधार पर यह कहना उचित होगा कि वर्ग ‘ग’ के अंतर्गत रखे गए राज्यों/प्रदेशों में भी कुछ स्थानों, विशेषकर, धार्मिक स्थलों एवं पर्यटन स्थलों में स्थानीय जनों द्वारा हिंदी सहज रूप में समझी और स्थानीय भाषा के लय में बोली जाती है। होटल, रेस्तराँ, मंदिर से लेकर छोटी-मोटी दुकान चलाते या बोट चलाते स्थानीय जन हिंदी में ही संवाद करते हैं। इतना ही नहीं, उन क्षेत्रों के वे निवासी जो देश के किसी भी कोने में जाकर रोज़गार या व्यापार करना चाहते हैं, हिंदी से भली-भाँति जुड़े हैं। भले ही उनका उच्चारण उन्हें हिंदीभाषी प्रदेश से अलग करता हो किंतु हिंदी की प्रकृति बाँहें फैलाकर स्वीकारने-अंगीकार करने वाली है। हिंदी की सहजता पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते।
हिंदी के स्वरूप में, विशेषकर संपर्क भाषा के रूप में उसका लचीलापन उसे अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक उदार एवं ग्राह्य बनाता है। इसी लचीलेपन एवं उदार स्वभाव के कारण हिंदी अपने देश के विविध भूभागों में अलग-अलग स्थानीय सुगंध में लिपटी मिलती है। ब्रज की हिंदी की मिठास राजस्थान की रेतीली भूमि और उससे सटे पंजाब और हरियाणा में ज़रा खरखराहट लिए अलग रूप-रंग की हो जाती है तो केरल-तमिलनाडु में बिलकुल अलग। उत्तर-पूर्वी भारत में, हिंदी में पहाड़ी सादगी और सरलता बहती है।
सार यही कि इस देश के भीतर स्नेह का जो अदृश्य कच्चा धागा एक-दूसरे को प्रत्यक्षतः-परोक्षत: जोड़े रखता है, वह धागा हिंदी ही है जिसके शब्द उच्चारण के स्तर पर बाहरी रूप-रंग या कहें कि सज-धज अलग दिखाते हैं किंतु उनकी आत्मा में बसे अर्थ की एकरूपता अमूमन बनी रहती है। उदाहरण के लिए शब्द ‘अग्नि’ लें। आप ‘अग्नि’ (तत्सम)को ‘आग’ (तद्भव)कहें या ‘आगिन’(देशज), अग्ग(राजस्थानी), ती (मलयालम), अग्नि (तेलुगु), ती (तमिल), लुत्ती(हिंदी एवं कई हिंदीतर ग्रामीण क्षेत्रों में), या कि अन्य शब्द रूप भी — अर्थ अपना चोला नहीं छोड़ता।
यह स्वयंसिद्ध है कि हिंदी का अर्थ वे सारी बोलियाँ और उपभाषाएँ हैं जिनमें घुल-मिलकर समय की बहती नदी में हिंदी ने अपना रूप धरा था या विविध रूपों में अवतरित हुई थी। यों कहें कि जिन्होंने कालांतर में मान्य ‘खड़ी बोली’ हिंदी को समृद्ध किया। हिंदी का अर्थ केवल खड़ी बोली या तत्सम, तद्भव ही नहीं, देशज और विदेशज भी हैं। संकर शब्दों का प्रचलन भी ज़ोर पर है ही। जैसे कि ‘रेलगाड़ी’, ‘पाँवपोश’ आदि संकर शब्द हैं। इसी प्रकार, ‘मेज़’ लिखें या ‘टेबल’ — दोनों हिंदी की धारा में समाहित हैं, अब गाँव पहुँचकर यही ‘टेबल’ शब्द ‘टेबुलवा’ और मेज़ ‘मेजवा’ हो जाएगा, जैसे कि ‘बच्चा’ से ‘बचवा’। किसी भी आगत शब्द को हिंदी इस प्रकार अपने में रचा बसा लेती है कि उससे पराएपन का बोध हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। सधुक्कड़ी, ठेठ अवधी और फ़ारसी मिश्रित हिंदी हो या कि राजस्थानी, ब्रजभाषा, तुलसी की परिनिष्ठित अवधी और ब्रज — हिंदी की प्रकृति धरा-सी है। सभी को स्वयं में समाहित करनेवाली। हिंदी के आदिकालीन और मध्यकालीन साहित्य वर्तमान में अनुपम विरासत स्वरूप हैं। इसी भाषा ने बोलियों के साथ मिलकर समय-समय पर रंग-रूप में ज़रा परिवर्तन कर समाज की घिसी-पिटी रूढ़ियों, मान्यताओं को चुनौती दी और जीवन-मूल्यों की शाश्वतता को बनाए रखा।
हालाँकि विगत कुछ दशकों में मैथिली और भोजपुरी स्वतंत्र भाषा के रूप में अस्तित्व में आईं तो अन्य उपभाषा-भाषी के भीतर भी हिंदी से अलगाव की इच्छा का बीजारोपण हो गया है। इससे हिंदी की समग्रता तो भंग हुई ही, उसके गौरव और वैभव पर भी आँच आई है, किंतु हम यह भी याद रखें कि हिंदी सदैव सेतु का कार्य करती है — भावनाओं और संवेदनाओं की आवाजाही विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक संभव हो रही है। किसी भी विचार, सरोकार या साहित्यिक कृति को विश्व के कोने-कोने में पहुँचाने और विश्व के साहित्य भंडार को देश तक लाने का काम हिंदी बखूबी पूरा कर रही है। दलित एवं आदिवासी साहित्य (संथाली के अतिरिक्त) अपनी विशिष्टता, अपने संघर्ष के साथ हिंदी का अटूट हिस्सा बने हुए हैं। झारखंड-बिहार ही नहीं, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों, जंगलों और पहाड़ों में सिमटे दीन-हीन मजदूर अनपढ़ या अल्प साक्षर आदिवासी भी अपनी टूटी-फूटी हिंदी के द्वारा ही ग़ैर आदिवासी से जुड़ते हैं। भले ही उनकी हिंदी अपने ही क्षेत्र के अन्य शिक्षित रहवासियों से अलग होती है।
यहाँ यह कहना अतिशय नहीं माना जा सकता कि हिंदी हृदय की भाषा है, इसमें विगत कुछ दशकों से टूटन-विखंडन की जो प्रक्रिया आरंभ हुई है, उसका प्रत्यक्ष-परोक्ष कारण भाषा एवं साहित्य के स्तर पर कहीं-कहीं तर्क(कुतर्क)-बुद्धि का शामिल होना है, साथ ही, शहरों एवं महानगरों में बसे शिक्षित भारतीय परिवारों में समय की वैश्विक माँग को देखते हुए अंग्रेज़ी पर अवलंबन है– बावज़ूद इसके हिंदी पंख पसारे उड़ान भरती जा रही है, चाहे उसकी बढ़त का कारण स्थान-विशेष पर भिन्न-भिन्न हो।
आप ध्यान दें तो पाएँगे कि हिंदी की ग्राह्य शक्ति अपेक्षाकृत अधिक प्रबल है। वह किसी भी भाषा के शब्द को पराया या विदेशी नहीं रहने देती। वह विदेशी या हिंदीतर भाषा के शब्द को आगत रूप में ग्रहण कर, उसे अपने स्वभाव के अनुसार रचा-पचाकर ऐसा बदलाव करती है कि अर्थ अपनी महत्ता नहीं खोता और शब्द इतर सौंदर्य पा जाता है। सबसे मज़ेदार तथ्य यह है कि दैनिक जीवन में अक्सर होने वाले संवाद पर ग़ौर करें तो एक ही वाक्य में कई आगत शब्द मिल जाएँगे जिनका मूल इतर भाषा के होने का आम जन को पता भी नहीं होता, वे अपनी भाषा के अनुरूप उसे सहज रूप में ढाल लेते हैं। संवाद के माध्यम से एक बानगी —
पहला : “महँगाई तो जान लेकर रहेगी। आलू-टमाटर छोड़कर अभी और क्या है जो पचास(रुपये) के नीचे है!”
दूसरा : “और हमलोग ठहरे डायबिटीज के मरीज, आलुओ रोज कैसे खाएँ!”
कई एक शब्द तो हज़ारों मीलों की यात्रा करने के बावज़ूद अपने स्वरूप में अधिक परिवर्तन होने नहीं देते, अर्थ में तो बिलकुल नहीं। बानगी के तौर पर, लाहौर-पंजाब और आसपास के क्षेत्रों में पिता द्वारा ‘अपने आप में लीन’ बच्चे के लिए प्रयुक्त विशेषण — ‘मख़बूतलहवास’ (मूल शब्द– मख़बूत-उल-हवास) बिहार में ‘खबतुलहवास’ विशेषण रूप में प्रयोग में है। यहाँ भी पिता उसी अर्थ में अपने बच्चों को संबोधित करता है। ऐसे कई शब्द हैं। इसका विशिष्ट कारण यही है कि हिंदी की पाचन-शक्ति अनूठी है। किसी भी भाषा के शब्द हों, उसे आत्मसात् इस प्रकार अपने रंग में रंग देती है कि मूल रूप याद नहीं रहता।
एक और उदाहरण देखें— शब्द ‘लैंटर्न’। प्राचीन ग्रीक से लैटिन, फिर फ़्रेंच और अंग्रेज़ी भाषा की यात्रा करता हुआ यह शब्द हिंदी के शहरी भूभाग में ‘लालटेन’ बनकर ही नहीं ठहरा, गाँव में ‘ललटेनवा’, ‘लैट’ बन गया। ऐसे हज़ारों शब्द हैं जो हिंदी में रच-पचकर आम जनजीवन का हिस्सा हो गए। टमाटर (एज़्टेक-स्पेनिश-अंग्रेज़ी-हिंदी), कैंची (तुर्की-हिंदी), आलू (पुर्तगाली-लैटिन-हिंदी) जैसे कितने ही आगत हमारे दैनिक जीवन में घुल-मिल गए और स्थानीय रंग में रँगकर मगन हैं।
और अब ज़रा दृष्टि देश की सीमा से बाहर डालें तो हम पाते हैं कि हिंदी ही है जो देश से बाहर धीरे-धीरे विश्व-भाषा की उर्वर और बंजर भूमि में अपनी जड़ें जमाती गई। जड़ों का यह फैलाव कहीं अनायास तो कहीं सायास हुआ। हम सभी जानते हैं कि मॉरीशस, फ़ीज़ी, सूरीनाम, नार्वे, गयाना ,ट्रिनीडाड आदि जगहों पर हिंदी गिरमिटिया मजदूरों के माध्यम से पहुँची जिनकी मूल बोली/भाषा भोजपुरी या अवधी रही। अमेरिका, इंग्लैंड आदि देशों में हिंदी स्वेच्छा से जाकर बसे शिक्षित भारतीयों के साथ गई, जो विदेशों में अपना विकास तो देख रहे थे किंतु स्वराष्ट्र से दूर होने के बाद स्वदेश की माटी की सुगंध ने उन्हें न स्वदेश भूलने दिया, न अपने देश की भाषा। इसके साथ ही, परदेस की भूमि में पाँव रखते ही, पंजाबी-बंगाली, मलियाली, बिहारी आदि सभी परस्पर क्षेत्रीय पहचान भूलकर भारतीय रूप में मिलते हैं और उनके बीच की भावनात्मक डोर ‘हिंदी’ से जुड़ी होती है। यह जानकारी सामने आई है कि परदेस में जब एक शिक्षित भारतीय दूसरे भारतीय से मिलता है तो उस समय वे दोनों अंग्रेज़ी को संवाद का माध्यम नहीं बनाते, बल्कि हिंदी में बात करते हुए अपने देश की ख़ुशबू महसूस करते हैं। कहीं-कहीं ऐसा न होना अपवाद हो सकता है।
पूर्व जानकारी के अनुसार, विश्व भर में लगभग 196 विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई जारी है; विदेशी छात्र भारत आकर हिंदी सीखते-पढ़ते हैं ताकि इस देश की मौलिक गुणवत्ता को जान समझ सकें। यह किसी भी भाषा और भाषाभाषियों के लिए गरिमा का विषय है। विदेशों में बोली जानेवाली हिंदी का रूप कुछ भिन्न है। वैश्विक संदर्भ में यह बात सटीक बैठती है कि हिंदी भाषाभाषी लोग हर जगह अपनी पैठ बनाए हैं और दूसरे भाषाभाषी भी संपर्क साधने योग्य हिंदी सीख ही लेते हैं। विदेशों में भी भारत की ही तरह हिंदी पर स्थानीय प्रभाव स्वाभाविक है, सूरीनाम में सरनामी, मॉरीशस में क्रियोल, फ़ीज़ी में फ़ीजी बात, दक्षिण अफ्रीका में नैताली, तो गयाना में कुछ और नाम से जानी जाती है हिंदी।
हिंदी के विस्तार पर एक उड़ती निगाह डालें तो हम कह सकते हैं कि हिंदी ने भारत के भीतर और बाहर अपनी बाँहें फैला दी हैं। उसने अनुवाद को माध्यम बनाया और प्रत्येक भारतीय एवं विदेशी भाषा और बोलियों में बिखरे नगीने को चुनने-पिरोने लगी। इस क्षेत्र में अहिंदीभाषी विद्वानों और समाज सुधारकों तथा विदेशी हिंदीसेवी विद्वानों के अथक प्रयास को भुलाया नहीं जा सकता और न ही परवर्ती पीढ़ी तक उनके नाम और काम को पहुँचानेवाली संस्था को।
ऐसे अहिंदीभाषी भारतीयों में मराठीभाषी लोकमान्य तिलक, गुजरातीभाषी महात्मा गाँधी एवं दयानंद सरस्वती, बांग्लाभाषी डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ,तेलुगुभाषी बालशौरि रेड्डी, कश्मीरीभाषी डॉ. बीना बुदकी, मणिपुरीभाषी डॉ. सी.एच. निशान नीङ्गतंबा आदि कई प्रमुख नाम हैं। एन.सुंदरम, तंकमणिअम्मा , प्रकाश भातम्ब्रेकर, दामोदर खडसे, अरविंदाक्षन, जे. एल. रेड्डी आदि अहिंदीभाषियों ने हिंदी में और हिंदी से मूलभाषा में अनुवाद करके हिंदी साहित्य को विस्तार और समृद्धि दी है।
यहाँ यह उल्लेखनीय है, दिसंबर 1916 में लखनऊ की एक सभा में गाँधी जी के निर्देश से हिंदी और देवनागरी को लेकर जो प्रस्ताव पास हुआ, उसके समर्थकों में दक्षिण भारतीय श्री रामस्वामी अय्यर और श्रीरंगस्वामी आयंगर थे। इसी प्रकार, ‘भारत की राष्ट्रभाषा देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी हो‘ — संविधान सभा में यह प्रस्ताव गोपालस्वामी आयंगर ने पेश किया था। प्राप्त जानकारी के अनुसार, हिंदी के प्रबल समर्थक लोकमान्य तिलक ने दिसंबर 1905 से जनवरी 1906 के आरंभिक दिनों तक वाराणसी में चलने वाले ‘भारत धर्म महामंडल’ के अधिवेशन में अपना ऐतिहासिक भाषण हिंदी में दिया था। इस भाषण में उन्होंने इस बात पर भी बल दिया था कि देश की एकता के लिए एक साझा भाषा और एक साझा लिपि का होना अनिवार्य है, और हिंदी (देवनागरी लिपि के साथ) इस जिम्मेदारी को उठाने में पूरी तरह सक्षम है। (संदर्भ स्रोत: भारत के लिए एक मानक लिपि/ A Standard Script for India)
बापू के अनुरोध पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1920 में काठियावाड़ में पहली बार हिंदी में भाषण दिया। हिंदी सेवियों की लंबी सूची और समृद्ध हो जाती है जब उसमें विदेशी हिंदी प्रेमियों और हिंदी सेवियों के नाम जुड़ जाते हैं।
विदेशी हिंदीसेवियों में नेपाल के धूस्वाँ सायमी, केदारमान ‘व्यथित’; प्राहा के डॉ. ओदोलेन स्मैकल, रोमानिया के इमरे बंगा तथा निकोलाया ज्वेर्या; अमेरिका के डॉ. माइकल सी.शपीरो एवं ब्रिटेन के रूपर्ट स्नैल; रूस के प. आ. बारान्निकोव एवं डॉ. येवमेनी चेलीशेव; बर्मा के ऊ-पारगू; बेल्जियम के फ़ादर कामिल बुल्के, जापान के डॉ. तोमियो मिज़ोकामि एवं प्रोफ़ेसर क्यूया दोई, इटली के प्रोफेसर जोर्जो मिलानेत्ति , न्यूजीलैंड के डॉ. रोनाल्ड स्टुअर्ट मैकग्रेगॉर ; जर्मनी के डॉ. लोथार लुत्से; कनाडा के डॉ. कैथरिन जी. हैन्सन; ऑस्ट्रेलिया के डॉ. रिचर्ड के. बार्ज; डेनमार्क के प्रोफेसर फ़िन थीसन; हंगरी की मारिया नेज्यैशी; इंग्लैंड के एफ.एस.ग्राउज के अतिरिक्त जे. फ़रग्युसन, जे. वी.गिलक्राइस्ट और डॉ.अब्राहम जॉर्ज ग्रियर्सन के नाम भुलाए नहीं जा सकते। भारत और हिंदी प्रेमी विदेशियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। बीजिंग के डॉ. चीनशेंग एवं प्रोफ़ेसर जिन दिंगहान निरंतर इस दिशा में सक्रिय रहे हैं। विश्व पटल पर दृष्टि दौड़ाएँ तो थाईलैंड, श्रीलंका भी हिंदी सीखने और भारत एवं भारतीय वाङ्मय से परिचित होने को कदम बढ़ा चुके हैं। फ़ीजी में तो संसद की मान्यताप्राप्त भाषा हिंदी बनी।
प्रवासी भारतीय हिंदी को महज एक भाषा नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक अस्मिता की वाहक समझकर उसे अंगीकार करते हैं और नई पीढ़ी में अपनी सभ्यता- संस्कृति का अलख जगाए रखना चाहते हैं, भले ही वे हिंदी से प्रत्यक्षत: जुड़े न हों। ये लोग अपने बच्चों को हिंदी सिखाने के लिए प्रयासरत हैं। विकसित देशों में हिंदी के प्रति उद्देश्यपूर्ण दृष्टि है। किसी भी भाषा के लिए यह महत् गरिमा का विषय है। डॉ. कामता कमलेश के शब्दों में, “हिंदी मात्र साहित्य की चीज़ नहीं वरन हृदयों को जोड़ने वाली ऊर्जा भी है और प्रेम की गंगा भी।”
हिंदी ने विश्व पत्रकारिता में भी स्वयं को स्थापित किया है और निरंतर कर रही है।फ़ीजी की फ़ीजी टाइम्स, ‘हिंदी शांतिदूत’; मॉरीशस की ‘वसंत’, ‘स्वदेश’, ‘आक्रोश’, ‘इंद्रधनुष’ ; इंग्लैंड की ‘पुरवाई’; अमेरिका की ‘सौरभ’ और ‘विश्व विवेक’ ; कनाडा की ‘हिंदी चेतना’, एवं वेब पत्रिका ‘साहित्य कुंज’; संयुक्त अरब अमीरात की वेब पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ और ‘अनुभूति’, अमेरिका की ‘साहित्य सेतु’ पत्रिका के प्रकाशन के साथ ही विपुल मात्रा में मध्यकालीन एवं आधुनिककालीन हिंदी कवियों/ कथाकारों की कृतियों का अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद भारतीय संस्कृति के प्रति उनके लगाव को और विश्वास को दर्शाता है। यही नहीं, हिंदी गीत-संगीत, फ़िल्में, रेडियो और टीवी के धारावाहिकों ने विश्व परिसर में प्रवेश का नया मार्ग प्रशस्त किया है। हिंदी पढ़ने आए बच्चों के एक समूह ने स्वीकारा कि हिंदी फ़िल्मी गानों के कारण उन्हें हिंदी समझने और सीखने में मदद मिली है।
हिंदी को उसकी सही जगह प्रतिष्ठापित करने हेतु ब्रह्म समाज, आर्य समाज, सनातन धर्म सभा,विश्व हिंदू महासभा, सेवा शिविर, थियोसॉफिकल सोसाइटी ,प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन, त्रिवेणी एवं राधास्वामी संप्रदाय, काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, बंबई हिंदी विद्यापीठ, महाराष्ट्र राष्ट्रसभा पुणे, हिंदी विद्यापीठ, देवघर; असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी ने महत्वपूर्ण कार्य किए और अधिकांश आज भी सक्रिय हैं। उन्होंने अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने हेतु हिंदी को आपका वाहक बनाया और उसे विस्तार दिया, इससे भाषा एवं लिपि में भी आवश्यक सुधार होता गया।
हिंदी को विस्तार देने में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, भारतीय सांस्कृतिक परिषद, दिल्ली, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद, साहित्य अकादेमी,दिल्ली, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,दिल्ली, प्रथम बुक्स, बंगलोर, सार्क कल्चर सेंटर,कोलंबो आदि महत्वपूर्ण नाम हैं। अन्य कई निजी प्रकाशन भी अनुवाद के माध्यम से हिंदी को विदेशों तक और विदेशी साहित्यकारों को हिंदी के प्रांगण तक लाने हेतु सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। मॉरीशस में हिंदी को विस्तार देने में आर्यसमाज, सनातन धर्म सभा एवं अनेक साधु-संतों का सक्रिय योगदान रहा है।
हिंदी के प्रति जनजागृति एक ओर बढ़ती दिखाई देती हैं तो दूसरी ओर अंग्रेज़ी के प्रति मानसिक दासता की जगह उसे करियर के उन्नयन के संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। महात्मा गाँधी ने हिंदी की अस्मिता को राष्ट्रीय स्तर पर वैभवशाली बनाने और इसके माध्यम से देश के मौलिक विकास की जो बात कही थी, कालांतर में वह सच प्रतीत होने लगी है। देर से ही सही, हिंदी ने विज्ञान, तकनीक और अनुसंधान व अन्यान्य क्षेत्रों में पग बढ़ा दिए हैं। विश्व भर में फैले भारतीय प्रवासी और भारतवंशियों का हिंदी के प्रति समर्पण और इसके विकास के प्रति कर्मनिष्ठता हमें आशान्वित करती है। वैश्विक पटल पर हिंदी के पुरोधा नज़र आने लगे हैं। लगभग तीन करोड़ भारतवंशी और प्रवासी भारतीय विश्व के चालीस देशों में रहते हैं उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक स्थितियाँ निश्चित तौर पर परस्पर भिन्न हैं। अतएव उनकी रचनाएँ जो उनकी अनुभूतियों से बहुत कुछ जुड़ी होती हैं , अपने देशकाल से प्रभावित और विशिष्ट हैं, किंतु इन सबके बावजूद देश उनके लिए माँ और हिंदी माँ के आँचल के समान है, जहाँ सभी एक समान आत्मीयता पाते हैं। हिंदी का यही विस्तार उसे विश्वभाषा बनने की दिशा में आगे बढ़ाएगा। केंब्रिज विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यापक प्रो. सत्येन्द्र श्रीवास्तव का मानना था कि “ब्रिटेन में अंग्रेज़ी के बाद जो भाषा सबसे अधिक बोली जाती है वह हिंदी या हिंदुस्तानी है।“
इसी प्रकार, हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार और बल्गेरिया और मॉरीशस में व्याख्याता रह चुके डॉ. हरीश नवल का मानना है कि “हिंदी के बल पर आप पूरे विश्व की सैर कर सकते हैं,जबकि अंग्रेज़ी के बल पर नहीं। … अंग्रेज़ी के कारण कई देशों में आपको गंभीर परेशानी हो सकती है, मगर हिंदी जानने वाले लोग मिल ही जाते हैं।“
हिंदी को न सिर्फ़ संपूर्ण भारतवर्ष, वरन् राष्ट्रसंघ में स्थान दिलाने के प्रयासस्वरूप 1975 ई. से विश्व हिंदी सम्मेलन का निरंतर आयोजन इस दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है और इसके लिए हमारे देश की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी और मॉरीशस के पूर्व प्रधानमंत्री सर शिवसागर राम गुलाम एवं काका साहेब कालेलकर, अनंत गोपाल शेवड़े, डॉ. कर्ण सिंह प्रभृत जन सराहनीय हैं।
हिंदी भाषा-साहित्य के स्वरूप का वैविध्य ही उसे विस्तार देता है। भारतवंशी /आप्रवासी हिंदी कहानीकारों की ओर दृष्टि भर डालें तो एक लंबा इतिहास हमारे सामने अपने द्वार खोलता है। मॉरीशस की कहानियों के संबंध में वहाँ के अग्रणी कथाकार अभिमन्यु अनत की उक्ति है — ‘चीत्कारों से भरा गूँगा आकाश!‘ सचमुच उस अकथ पीड़ा का मार्मिक और सजीव चित्रण वहाँ की कहानियों में मिलता है।
ये कहानियाँ अस्तित्व के लिए जूझते, पसीना बहाते उन आम लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिन्होंने दासता, अमानवीय व्यवहार और गरीबी झेली, जबकि पाश्चात्य देशों में अरसे से या कि हाल के कुछ वर्षों से रह रहे प्रवासी भारतीय की रचनाएँ आधुनिक सभ्यता से अभिशप्त जीवन की गाथा सुनाती हैं। मॉरीशस का हिंदी साहित्य अभिमन्यु अनत, सोमदत्त बखोरी, नेम नारायण गुप्त, धर्मवीर घूरा, रामदेव धुरंधर, बीवी साहेबा, महेश रामजियावन ,हेमराज सुंदर प्रभृत साहित्यकारों की कलम से उतरकर विशिष्ट जगह बनाए हुए है।
ब्रिटेन के तेजेन्द्र शर्मा, पद्मेश गुप्त, कीर्ति चौधरी, उषा राजे सक्सेना, दिव्या माथुर, इरा सक्सेना, महेंद्र दवेसर, तोषी अमृता, नीना पॉल, गौतम सचदेव, ज़किया ज़ुबैरी, आदि अनेक कथाकारों ने अपने-अपने क्षेत्र में हिंदी को कहानी सहित अन्य साहित्यिक विधाओं के माध्यम से निस्संदेह तीव्र गति प्रदान की है।
अमेरिका में हिंदी कहानी लगभग 5 दशक से अधिक का सफ़र तय कर चुकी है। गुलाब खंडेलवाल, सोमावीरा, डॉ. वेदप्रकाश बटुक ,सुनीता जैन, उषा प्रियंवदा आदि वरिष्ठ साहित्यकारों ने जहाँ अमेरिका की ज़मीन पर हिंदी बोने का काम किया , समकालीन लेखकों ने खाद-पानी देकर उसे विकसित करने का। अंजना संधीर के नाम लिखे गए उषा प्रियंवदा के खत का अंश वहाँ के हिंदी साहित्यकारों के संघर्ष और विजय का बहुत कुछ खुलासा कर देता है।
सन् सत्तर से अभी तक के कहानीकारों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। इनमें उमेश अग्निहोत्री, ललित अहलूवालिया, कुमार चंदर, नरेंद्र शुक्ल, सुषम बेदी, विशाखा ठाकर, वेद प्रकाश सिंह ‘अरुण’, अनिल प्रभा कुमार, सुधा ओम ढींगरा,अंशु जौहरी, देवी नागरानी, कैलाशनाथ तिवारी , अमरेन्द्र कुमार आदि शामिल हैं जिन्होंने हिंदी को अपनी सांस्कृतिक संपदा का वाहक माना है और निरंतर कर्मरत हैं। इनके अतिरिक्त अर्जेंटीना में प्रेमलता वर्मा, डेनमार्क में अर्चना पेन्यूलि, जापान में लक्ष्मीधर मालवीय, नॉर्वे में अमित जोशी ,न्यूजीलैंड में महेंद्र चंद्र विनोद, यूएस में शशि पाधा,रचना श्रीवास्तव, मंजु मिश्रा, शीन के गुणशेखर, नीदरलैंड में पुष्पिता अवस्थी, फ़ीजी में जोगिन्दर सिंह कंवल, प्रो. सुब्रमणि एवं आबूधाबी में जगमोहन कौर, कृष्ण बिहारी आदि लेखक निरंतर हिंदी को नित नूतन परिधान से सजाने-सँवारने में संलग्न हैं। हिंदी के निरंतर उत्कर्ष में आप्रवासी भारतीय कृतिकारों का योगदान स्पष्ट झलकता है, इनकी कहानी विधा इसका प्रमाण है कि रचना स्वयं में नया रंग, नए तेवर लेकर अवतरित होती है।
कथाकार हिमांशु जोशी ने खुले हृदय से स्वीकार किया : “अब हिंदी कथा साहित्य का अलग इतिहास लिखने की ज़रूरत है। इतना वैविध्य विश्व की संभवत: कम भाषाओं में देखने को मिलता है। ‘इंद्रधनुष‘ ही नहीं, ‘प्रिज़्म‘ की तरह झिलमिलाते अनेक आयाम! जो चौंकाते ही नहीं, आह्लादित भी करते हैं।“
अंतत: सार रूप में यह कहा जा सकता है कि हिंदी विविध संभावनाओं से भरी एक ऐसी भाषा है जो सहज, लचीली, उदार तथा मिलनसार प्रकृति की है और जिसकी ग्राह्य शक्ति एवं पाचन शक्ति अनूठी है। वह दर्प नहीं करती, विनम्रतापूर्वक सबको अपनाकर और सबके साथ घुल-मिलकर भारत के ‘अनेकता में एकता’ की विशिष्टता को प्रतिध्वनित करती है। व्याकरणिक दृष्टि से यह जितनी सक्षम भाषा है, उतनी ही शब्दों का नया रूप गढ़ने में भी कुशल है। वर्तमान में हिंदी के बिगड़ते रूपों को लेकर विद्वानों की चिंता स्वाभाविक है और इससे उसके मूल रूप-गुण के क्षय की गहरी संभावना भी बनती है किंतु यदि उसकी अब तक की पूरी यात्रा पर ध्यान दें तो बदलाव एवं बिखराव के साथ और बाद भी हिंदी अपने लिए नई पगडंडी तलाशती हुई आगे बढ़ती रही है। बढ़ती रहेगी।
डॉ. आरती स्मित
कविता, कहानी, आलोचना, नाटक, बाल साहित्य और जीवन-आधारित कृतियां, संस्मरण तथा लघुकथा लेखन, पाँच कविता संग्रह, चार कहानी संग्रह, तीन आलोचना ग्रंथ तथा महापुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यास प्रकाशित। नाटक ‘संन्यासी योद्धा : विवेकानंद’ मंचित, लगभग 40 पुस्तकों का अनुवाद तथा कई कृतियों का संपादन।
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