- सन्तोष खन्ना
डा. प्रेरणा त्रिपाठी की नई-नई पदोन्नति हुई थी। उसे विभाग में सह निदेशक बना दिया गया। उस पद के मिलते ही उस पर कई प्रकार की जिम्मेदारियां का बोझ आ गया था। हिंदी के इस विभाग में न तो कोई उप निदेशक था और न ही कोई निदेशक, यह दोनों पद लंबे समय से रिक्त पड़े थे। दिन प्रतिदिन दिन के कार्य में उत्पन्न होने वाली उलझनों में वह किसी से मार्गदर्शन या सलाह भी नहीं ले सकती थी। हिंदी दिवस की तैयारी भी सिर पर थी। इसके लिए उसे ही सभी प्रकार की व्यवस्था करनी थी। हालांकि उसका मन इस बात से प्रफुल्लित भी कम नहीं था कि हिंदी दिवस आयोजन की पूरी व्यवस्था उसे ही करनी है परन्तु फिर भी उसके अंतर में एक अजीब- से तनाव का ताना-बाना भी उसे घेर रहा था कि क्या वह इतना बड़ा दायित्व निभा पायेगी?
आज सुबह सवेरे जब वह पार्क में टहलने गई तो वहां उसकी मुलाकात भारत सरकार के किसी विभाग से शायद हिंदी अधिकारी के रूप में वर्षों पहले सेवानिवृत हुए वयोवृद्ध परमानंद जी से हो गई। उसने उनके चरण स्पर्श करते हुए पूछा, ‘आप कैसे हैं दद्दा?’
परमानंद ने जेब से अपना चश्मा निकाला और पहनते हुए उसे ध्यान से देखा और उसे पहचान लिया कि वह तो उनके मित्र की पुत्रवधू है। उन्होंने उसे आशीष देते हुए पूछा, ‘ तुम कैसी हो बिटिया? सुना है तुम हिंदी अधिकारी बन गई हो।’
‘हां दद्दा जी, आप बड़ों का आशीर्वाद है। आप भी तो शायद हिंदी अधिकारी थे।’
‘उस बात को अब चालीस वर्ष बीत गए। तब हिंदी अधिकारी के रूप में कार्य करना बड़ा कठिन होता था। अब तो हमारे प्रधानमंत्री हिंदी हितैषी हैं। अब तक तो केंद्र सरकार के सब अधिकारी/ कर्मचारी हिंदी में काम करने लगे होंगे। कहते हैं सत्ताधारियों की भाषा स्वत: ही शासन के कामकाज की भाषा बन जाती है।’
उनकी आंखों में जिज्ञासा तैर गई।
डा. प्रेरणा त्रिपाठी के पास इस बात का कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। उसे तो बस इतना ही पता था कि उसके अपने विभाग में अधिकांश कार्य अब भी अंग्रेज़ी में होता है और उसके पास अंग्रेज़ी के कुछ दस्तावेज़ हिंदी में अनुवाद के लिए आते रहते हैं।
एक बार उसने भी अपनी इसी प्रकार की जिज्ञासा को शांत करने के लिए गूगल पर लिख कर जानना चाहा कि वर्तमान में भारत सरकार के कितने प्रतिशत अधिकारी/कर्मचारी शासन का काम काज हिंदी में करते हैं? इस पर गूगल से जो उसे उतर मिला उस से उसे आश्चर्य अवश्य हुआ था। जवाब था कि इस संबंध में कोई एक केंद्रीय और समेकित आंकड़ा भारत सरकार द्वारा जारी नहीं किया गया है।
डा. प्रेरणा ने परमानंद जी की बात का सीधा जवाब न देकर उनसे एक नया विषय छेड़ दिया, थोड़े दिन बाद हिंदी दिवस मनाया जाना है।’
परमानंद जी ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी और आश्चर्यचकित हो कर कहा:-
‘क्या कहा हिंदी दिवस? क्या अभी भी हिंदी दिवस मनाया जाता है? संविधान लागू हुए लगभग आठ दशक होने को हैं। क्या अभी भी हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है?’
‘जी हां, वह तो हर वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाता है। इसी दिन भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था इसलिए तो हिंदी दिवस मनाया जाता है।’ डा. प्रेरणा ने अपनी ओर से उन्हें याद दिलाते हुए बताया।
‘ जानता हूं 14 सितंबर,1953 को पहली बार हिंदी दिवस मनाया गया था। तब इसे मनाने का उद्देश्य था राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना। दूसरे शब्दों में राजभाषा के अधिकाधिक प्रयोग की प्रेरणा देने, उसके प्रगामी प्रयोग के संवर्द्धन के लिए आयोजन किया जाने लगा था।’
परमानंद जी ने अपने एक एक शब्द पर जोर देते हुए कहा।
‘जी, आप सही कह रहें हैं। इस दिन को मनाने का प्रमुख उद्देश्य हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहन देना है।’
‘यहीं तो मैं कह रहा हूं। आठ दशक होने को आये और हम अभी भी राजभाषा हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहन ही दे रहें हैं जबकि एक दशक से अधिक समय से सत्तारूढ़ पार्टी के प्रधानमंत्री सहित सभी लोग राजभाषा हिंदी का प्रयोग करते हैं। संसद में भी लगभग 80-85 प्रतिशत सांसद हिंदी में ही जनता की समस्याओं को मुखर करतें हैं। देश में अनेक समाचार पत्र और पत्रिकाएं हिंदी में प्रकाशित हो रहीं हैं। अनेक टी.वी.चेनलों पर चौबीस घंटे हिंदी गूंजती रहती है। देश की अधिकांश जनता हिंदी बोल पढ़ लिख सकती है फिर भी भारत सरकार का शासन तंत्र अंग्रेज़ी भाषा को सीने से चिपकाए है। वहां अब भी राज भाषा हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहन देने के लिए हिंदी दिवस की दरकार है।’ उन्होंने हताश होते हुए कहा।
‘दद्दा जी, मैं भी यहीं सोचती हूं कि हमें अभी भी
हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए वेतन-वृद्धि, पुरस्कार जैसे प्रलोभनों की वैसाखियों का सहारा लेना पड़ता है।’ डा. प्रेरणा ने सकुचाते हुए सच उगल ही दिया।
‘ हिंदी हितैषी यह सरकार नौकरीशाही को क्यों नथ नहीं पाई है?’ परमानंद जी के स्वर में पुनः हताशा लहरा उठी।
‘जब तक हम लोगों का अंग्रेजी के प्रति अतिरिक्त मोह कम नहीं होगा, जब तक हर कोई अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने की अभिलाषा पलता रहेगा तब तक उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती।” डा. प्रेरणा ने समस्या की नब्ज पर हाथ रखते हुए कहा।
‘तुम ने सही कहा। हम अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद से मुक्त अवश्य हुए हैं परंतु उनकी गुलामी उनकी अंग्रेज़ी की मानसिकता से नहीं उबर पायें हैं।’
‘आपको क्या लगता है दद्दा जी, हमारे संविधान और फिर हमारे राजभाषा कानून की धाराएं भी इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं। अनुच्छेद 343 की अंतिम धारा अंग्रेज़ी को हमेशा बनाए रखने की पक्षधर हैं और राजभाषा हिंदी अधिनियम की धारा 3( 1) हिंदी को राजभाषा के साथ-साथ अंग्रेज़ी के प्रयोग को भी मान्यता देती है अर्थात् भारत सरकार की इस समय दो दो राजभाषाएं हिंदी और अंग्रेज़ी हैं। अतः अधिकारी और कर्मचारी हमेशा पहले की तरह अंग्रेज़ी में ही काम करना पसंद करते हैं।’
डा. प्रेरणा ने राजभाषा हिंदी के अवरोध के क़ानूनी पक्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा। ‘ इस के अलावा, फिर एक तो करेला, दूसरा नीम चढ़ा। राजभाषा हिंदी अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) ने शासन तंत्र में हमेशा के लिये द्विभाषिकता की स्थिति बना दी है जिसका ले दे कर परिणाम यह हुआ है कि भारत सरकार के सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज दोनों भाषाओं में जारी करना अनिवार्य है जिसके कारण हिंदी तो अनुवाद की भाषा बनकर रह गई है । राजभाषा के क्षेत्र में हिंदी का विकास स्वत: नहीं अनुवाद के मार्ग से हो रहा है जिससे वैज्ञानिक दृष्टि से अच्छी खासी सशक्त हिंदी भाषा दुरुह होकर रह गई है और लोगों को कहने का अवसर मिल जाता है कि हिंदी एक क्लिष्ट भाषा है।’
परमानंद भी हिंदी संबंधी संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों से अनभिज्ञ नहीं थे। उन्होंने कहना जारी रखा:-
‘अभी तो जनता को न्याय भी उसकी भाषा में नहीं मिल पाता। संविधान की धारा 348 उसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। क्या कभी इस धारा में बदलाव किया जाएगा जिसमें कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी होगी और देश के सभी कानून अंग्रेजी भाषा में ही बनाये जाएंगे।’ उन्होंने न्याय और विधि के क्षेत्र में संवैधानिक प्रावधान का उल्लेख किया।
तभी डॉ. प्रेरणा ने अपनी घड़ी पर नज़र डालते हुए कहा। मुझे बहुत देर हो रही है दद्दा जी। फिर कभी इन पर बात करेंगे। अपना ध्यान रखिएगा। चलती हूं।
परमानंद जी जब अकेले हो गए तो वह अपने कांटों भरे उस अतीत में खो गए जब उन्होंने भी हिंदी अधिकारी होने के नाते हिंदी दिवस का आयोजन किया था। उस समय उनकी युवावस्था थी और उनके दिमाग में नित नये नये विचार चहलकदमी करते रहते थे। वह जानते थे कि हिंदी दिवस के समय कार्यालय के लोगों को एकत्रित करना आसान नहीं था। इसके लिए उन्होंने एक सुगम- से विषय पर एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन कर डाला जिसमें उन्होंने उस प्रतियोगिता में पहले तीन प्रतिभागियों को प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार तथा कुछ के लिये सांत्वना पुरस्कार और शेष को सहभागिता सम्मान दिए जाने की घोषणा कर दी ताकि हिंदी दिवस के अवसर पर अधिकाधिक अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रह सकें।
उस अवसर पर मुख्य अतिथि विभागाध्यक्ष थे और मंचासीन कुछ कवि साहित्यकार और भाषाविद् थे। कुल मिलाकर उन्होंने सभी प्रकार की अच्छा व्यवस्था कर ली थी। कार्यक्रम का उद्घाटन करने के लिए मुख्य अतिथि विभागाध्यक्ष समय पर पधार गए और उन्होंने उसे एक तरफ ले जाकर कहा कि उनकी एक और मीटिंग है अतः वह उद्घाटन करते समय अपनी ओर से अपने विचार व्यक्त कर अगली मीटिंग के लिए चले जाएंगे।
परिवर्तित कार्यक्रम के अनुसार उन्होंने हिंदी दिवस के कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए अपने विचार व्यक्त करना आरंभ किया। ‘अरे, यह क्या? हिंदी दिवस के सुअवसर पर उन्होंने अपने विचार अंग्रेजी़ में व्यक्त करना आरंभ कर दिया। परमानंद भौंचक्का -से रह गये। उन्होंने हिम्मत कर एक छोटी-सी पर्ची पर लिखा, ‘ मान्यवर, आज हिंदी दिवस है।’ और उसे उनके आगे रख दिया। पता नहीं क्या हुआ विभागाध्यक्ष ने उनकी ओर लाल पीली आंखें कर उन को घूरा और उसी पर्ची पर कुछ घसीटा और उसे वापस कर दिया।
परमानंद ने उस अंग्रेजीदां की वह घसीट वाली पर्ची पढ़ी जिसपर अंग्रेज़ी में लिखा था, ‘ How dare you interrupt and offend me?’
परमानंद को उन पर बेहद गुस्सा आया। उस समय जवानी के जोश में उन्होंने भी परिणाम की परवाह किए बिना उसी पर्ची पर अंग्रेजी में लिखा , Sir, how dare you offend our audience on this Hindi Day?’ और उस पर्ची को उनकी ओर सरका दिया। स्वाभाविक था पर्ची पढ़कर वह बिदक गये। वह भाषण अधूरा छोड़ दनदनाते हुए वहां से निकल गये। जाने से पहले उन्होंने एक नज़र सभागार में बैठे श्रोताओं पर डाली और कहा,’ Excuse me, I have an urgent meeting in my room.’
चूंकि पर्चियों का आदान-प्रदान परमानंद और उनके बीच हुआ था किसी को उसके बारे में विशेष कुछ पता नहीं चला। किसी अनहोनी होने की आशंका से उनका रोम रोम सिहर उठा। मेज पर रखा पानी का गिलास मैं एक ही सांस में गटक गया। सभी मेरे चेहरे पर बदलते हाव-भाव को कौतुहल से देख रहे थे। परंतु शीतल जल का असर भी कमाल का हुआ था। उन्होंने माइक हाथ में लेकर यथासंभव शांत स्वर में कहा, ‘ हमारे विभागाध्यक्ष बहुत व्यस्त थे। वह आये, उन्होंने आज के कार्यक्रम का उद्घाटन किया, उनके प्रति हम आभार व्यक्त करतें हैं। आज हमारे बीच हास्य सम्राट माननीय उमेश सक्सेना जी उपस्थित हैं। कृपया वे मंच संभालें और अपनी उपस्थिति का सबको भान करायें।’
इसके बाद, हास्य कवि उमेश जी ने ऐसा समय बांधा कि सभागार ठहाकों से गूंज उठा। परमानंद का सारा तनाव उन ठहाकों की गूंज में तिरोहित हो गया। शेष मंचासीन महानुभावों ने हिंदी दिवस के अनुकूल अपने विचार व्यक्त किए । सभी को सम्मान पुरस्कार बांटे गए और अंत में सभी प्रीति भोज में शामिल हुए और सभी खुशी-खुशी विदा हुए।
परमानंद को उसी दिन शाम को विभागाध्यक्ष का बुलावा आ गया। उन्होंने वह खरी खोटी सुनाई कि आंसुओं को पीते हुए उन्हें उनसे क्षमा याचना करना ही उचित लगा। उसके बाद परमानंद को हर महीने किसी न किसी बात को लेकर ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी हो जाता। वे उसके जवाब देने में ही उलझ जाते । ऐसे में गोपनीय रिपोर्ट सही मिलने की आशा नदारद हो चुकी थी। विभागाध्यक्ष मुझे पदावनत करने पर उतारु थे। किंतु वह तो उनका भाग्य अच्छा था कि कुछ समय बाद विभागाध्यक्ष का ऐसे स्थान पर स्थानांतरण हो गया जहां स्थानांतरण होना दंड से कुछ कम नहीं समझा जाता था। इस तरह वे उस दुष्ट के शिकंजे से मुक्त हो सके।
उसके बाद अगले वर्ष की मेरी अगली गोपनीय रिपोर्ट ठीक ठाक आ गई। उसके बाद परमानंद की दो बार पदोन्नति भी हुई, पहले उन्हें उप निदेशक बनाया गया और बाद में अपर निदेशक बना दिया गया। उन्होंने अपनी ओर से राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए यथासंभव निष्ठा और परिश्रम से कार्य किया।
कुछ दिन बाद परमानंद को डॉ. प्रेरणा का फोन आया कि वह उन्हें हिंदी दिवस के अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रुप में आमंत्रित कर रहीं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनका एक सहयोगी लिवाने आयेगा और फिर कार्यक्रम के बाद वापस छोड़ भी जायेगा। वे हिंदी दिवस के कार्यक्रम में उपस्थित रहे । डा. प्रेरणा का हिंदी दिवस का आयोजन बहुत उत्तम रहा। मंच पर उनके जैसा वयोवृद्ध था तो वहां परिपक्व आयु और युवा आयु के विद्वान मंचासीन थे। उन्हें यह अच्छा लगा कि डॉ. प्रेरणा अपने अग्रजों को भूली नहीं है। सब ने समयानुकूल अपने विचार व्यक्त किए। परमानंद को कार्यालय की ओर से विशेष रूप से सम्मानित किया गया। उन्होंने भी उस समय राज भाषा हिन्दी पर विचार व्यक्त किये:
ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री न केवल संसद में और देश में हर कार्यक्रम में देशवासियों को हिंदी भाषा में संबोधित करते हैं बल्कि अपनी हर विदेश यात्रा में हिंदी में भाषण देकर भारत की मर्यादा और शान बढ़ाते हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में भी हमेशा हिंदी में ही भाषण दिया है। उन्होंने वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी में ही संबोधित किया था जब उन्होंने भारत की अनमोल सम्पदा योग को विश्व के देशों से अपनाने की अपील की थी। आज हम सब जानते हैं कि विश्व के लगभग सभी देशों में हर वर्ष 21जून को योग दिवस मनाया जाता है। हम सब भारतीय को प्रधानमंत्री का अनुसरण करते हुए हिंदी भाषा को पूरी आन बान शान से अपना कर उसका गौरव बढ़ाना चाहिए। मैं अधिक समय न लेते हुए कविता की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत कर अपनी वाणी को विराम दूंगा :-
‘हिंदी भाषा हमारी अस्मिता
हिंदी सब की पहचान है।
भारत देश की यह शान है
यह हमारा स्वाभिमान है।
राष्ट्र की एकता का सेतु
भारतीय भाषाओं की सहचर
आओ, सभी इसे अपनायें
हिंदी जन जन की रहबर।।’
- सन्तोष खन्ना
मो. 9899651272
