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अशोक रावत का लेख : ग़ज़लकार या शायर अपने पाठकों के साथ धोखा न करें

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बहुत से लोगों को शायद इस बात का पता नहीं है कि दुष्यंत कुमार एक रात में परिपक्व ग़ज़लकार नहीं हो गए थे। दुष्यंत कुमार ग़ज़लों में पूरी तैयारी के साथ आए थे, यानी उन्हों ने ग़ज़ल के व्याकरण और शिल्प की लंबी साधना की थी। इस बात का संकेत ‘साये में धूप’ ग़ज़ल संग्रह के प्रकाशन के बाद, उनसे पूछे गए सवालों के जवाब में ‘कल्पना’ पत्रिका में ‘मेरी ग़ज़लें’ शीर्षक से प्रकाशित एक लेख के माध्यम से उन्होंने बड़ी स्पष्टता से दिया है। यही आलेख दुष्यंत कुमार के निधन के बाद सारिका के मई 1976 अंक, जिसे दुष्यंत स्मृति विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया  था, में भी प्रकाशित हुआ था।
बाद में वर्ष 2013 में,सारिका के इस अंक को पुस्तक के रूप में ‘दुष्यंत के जाने के बाद,दोस्तों की यादें’ शीर्षक से कमलेश्वर जी के सम्पादन में ‘किताब घर प्रकाशन’ ने प्रकाशित किया है। दुष्यंत लिखते है –यहाँ मैं साफ कर दूँ कि ग़ज़ल मुझ पर नाज़िल नहीं हुई। मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आया हूँ और मैं ने कभी कभी चोरी छुपे इसमें हाथ भी आज़माए हैं। लेकिन ग़ज़ल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तंग करती रही है। वे आगे लिखते हैं- ग़ज़ल का चस्का मुझे ख़ुद शमशेर बहादुर सिंह की ग़ज़लें सुन कर लगा था। हाँ, मैं ने ग़ज़ल अपने चारों ओर बुनी जा रही कविता की एक रसता को तोड़ने के लिए भी कहना शुरू किया। ग़ज़ल के व्याकरण और शिल्प को ठीक प्रकार से समझे बिना क्या किसी के लिए यह संभव है कि वह मुकम्मल और प्रभावशाली ग़ज़ल कह या लिख सके। दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें ख़ुद इस बात की गवाही देती हैं कि उनके पीछे व्याकरण और शिल्प की कितनी साधना है।
जिन्हों ने दुष्यंत का यह आलेख ‘मेरी ग़ज़लें’ पढ़ा है वे लोग समझ सकते हैं  कि ग़ज़ल को लेकर उनके भीतर जितना जुनून था, उतना ही उनके भीतर छंदमुक्त समकालीन नई कविता को लेकर असंतोष था। जितने कठोर और स्पष्ट शब्दों में दुष्यंत कुमार ने छंद मुक्त कविता की ख़ामियों पर तब लिखा, जब वर्ष 1964 में मुक्तिबोध की नई कविता के मसीहा के रूप में स्थापना हो चुकी थी, यह कोई साधारण बात नहीं थी। यद्यपि दुष्यंत कुमार स्वयं नई कविता के प्रमुख हस्ताक्षर थे लेकिन उन्हों ने इस सच्चाई को बहुत जल्दी समझ लिया था कि नई कविता पाठक से कोई रिश्ता नहीं बना पा रही है। वे ग़ज़ल विधा से लंबे समय से जुड़े थे इसलिए ग़ज़ल की ताक़त से भी परिचित थे ही और शिल्प में भी दक्ष थे। उन्हें अपनी भावनाओं को ग़ज़ल के माधायम से व्यक्त करना सहज लगा। बाक़ी सब तो इतिहास का हिस्सा है और आप जानते ही हैं।
इस बात में किसी संदेह  की गुंजाइश ही नहीं है कि हिन्दी साहित्य में दुष्यंत कुमार की स्थापना उनकी ग़ज़लों ने की। ग़ज़लों के स्तर ने ही उन्हें हिन्दी ग़ज़ल के मसीहा के रूप में स्थापित किया। अपने जुनून के कारण ही वे बेहतरीन ग़ज़लें लिख पाए और हिन्दी साहित्य में अमर हो गए।
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें किसी आलोचक की क़लम की मुहताज नहीं है। उनकी  ग़ज़लें सीधे पाठकों से संवाद करती हैं और उनके दिलो दिमाग़ पर छा जाती हैं। उनकी ग़ज़लों में इतनी ताक़त थी कि प्रकाशित होते ही वे गंभीर साहित्यिक चर्चा का विषय बन गईं। दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों की पहुँच सिर्फ हिन्दी पाठकों, शायरों  तक ही सीमित नहीं थीं, उनकी ग़ज़लें उर्दू के पाठको और विद्वान शायरों तक भी पहुँचीं। दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों के कथ्य और कहन से उर्दूवाले भी चमत्कृत थे। किसी हिन्दी वाले ने समझा हो या न समझा हो लेकिन उर्दूवाले तो समझ रहे थे कि दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का स्तर क्या है।
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों की  लोकप्रियता ने हिन्दी के तमाम कवियों को ग़ज़ल लिखने के लिए प्रेरित किया। मुश्किल ये थी कि हिन्दी के कवियों को ग़ज़ल के व्याकरण और और शिल्प के बारे में कुछ पता नहीं था। ग़ज़ल की बह्र के साथ क़ाफ़िया मिलाने का नियम भी ग़ज़ल लिखने का एक महत्वपूर्ण भाग है। हिन्दी भाषा में ग़ज़ल लिख रहे तमाम लोग आज भी ठीक से क़ाफ़िया मिलाना नहीं जानते। उस समय क्या हाल रहा होगा आप समझ सकते हैं। सोशल मीडिया पर अपने पिछले 10 वर्ष के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि हिन्दी में ग़ज़ल के शिल्प को सीखने की ललक तो लोगों में है लेकिन उसे सीखने का ऐसा कोई सरल रास्ता नहीं है जहां आसानी से उसे सीखा जा सके। हिन्दी के कवियों के पास जितना भी ज्ञान था वह मात्रिक छंदों के बारे में था और उसी के आधार पर उन्हों ने ग़ज़लों में हाथ आज़माने की कोशिश की। उनको इस बात का भी एहसास नहीं था कि मात्रिक छंदों में ग़ज़लें नहीं लिखी जा सकतीं। मात्रिक छंदों में जो लिखा जाता है वही उच्चारित होता है लेकिन ग़ज़ल की बहरों के साथ  ऐसा नहीं है। ग़ज़ल में क्रियाओं और शब्दों के पहले और अंतिम वर्ण के स्वर को ग़ज़ल की बह्र के अरकान के हिसाब से गिरा के पढ़ा जाता सकता है। कौन सा स्वर कहाँ गिरेगा यह बह्र के अरकान तय करते हैं। जो मात्रिक छंदों में लिखने का अभ्यस्त है उसकी समझ में यह बात तभी आएगी  जब वह बह्र की लय को उसके अरकान के अनुसार अनुसार समझने में समर्थ होगा। ग़ज़ल के व्याकरण को जानने का ऐसा कोई शॉर्टकट नहीं है जिसके सहारे ग़ज़ल लिखना सीखा जा सके।
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों से प्रेरित होकर उनके समकालीन हिन्दी कवियों ने जो लिखा उनमें से अधिकांश हिस्से को ग़ज़ल कह पाना अनुचित होगा। उस समय के हिंदी संसार में ग़ज़ल के शिल्पविधान की अनभिज्ञता का लाभ उन्हें ज़रूर मिला जिसके सहारे वे पत्र पत्रिकाओं में छपते रहे और चर्चा पाते रहे। संपादकों को कुछ पता ही नहीं था,उनके पास जो आया उसे छाप दिया। इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि खोटे सिक्के बाज़ार में असली सिक्कों की तुलना में जियादा चलन में रहते हैं लेकिन बड़ी जल्दी बाज़ार से बाहर भी कर दिये चाहते हैं। दुष्यंत के बाद की पीढ़ी के ग़ज़लकार ग़ज़ल के व्याकरण, शिल्प और ग़ज़ल के मुहावरे को समझने में समर्थ हैं और ग़ज़ल पर अपनी पकड़ का एहसास कराने में भी कामयाब हैं। पहले तो उर्दूवाले ही उन हिन्दी ग़ज़लों पर उंगली उठाते थे लेकिन अब हिन्दी के नई पीढ़ी के रचनाकार भी उनको ग़ज़ल मानने को तैयार नहीं है। मुझे लगता है कुछ दिनों में ऐसी ग़ज़लें अपने आप धुंध में खो जाएंगी।
हिन्दी की तमाम छोटी बड़ी पत्रिकाओं में  अपने संपर्कों के सहारे ग़ज़ल के नाम पर तमाम ऐसी अधकचरी रचनाएँ छपती रहीं जिनमें ग़ज़ल की कहन से लेकर कथ्य  तक कोई आकर्षण नहीं था। इस दौर में कुछ उर्दू जानने वाले मुस्लिम शायर भी हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में हाथ आज़माने आए और उनको लगा कि हिन्दी के तत्सम शब्दों की बहुलता के आधार पर हिन्दी ग़ज़ल का स्वरूप वे तय कर पाएंगे  और हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में महत्व  प्राप्त कर सकेंगे लेकिन भाषा  के स्तर पर इतने कमज़ोर थे कि उनमें से कोई भी हिन्दी ग़ज़ल की भाषा के निर्माण में रत्ती भर भी योगदान नहीं कर पाया।
दुष्यंत कुमार के निधन के बाद हिन्दी भाषा में ग़ज़ल लिखनेवालों की एक बड़ी  भीड़ तो सक्रिय हुई लेकिन उनमें से तमाम लोग 15 -20 वर्ष तक उर्दू ग़ज़ल के शिल्प और व्याकरण को समझने के स्थान पर  उससे बचने की  कोशिश करते रहे और  अपने मात्रिक छंदों और फेलुन फेलुन जैसे अरकान के आधार पर मात्राओं की गणना के सहारे हिन्दी ग़ज़ल के नाम पर जो कुछ लिखते लिखाते रहे उसे हिन्दी पत्रिकाओं में छापते छपवाते रहे। ज़ाहिर  है ऐसे में  उर्दू के शायर अपनी टीका टिप्पणियों के माध्यम   से इस लेखन पर उँगलियाँ उठाते रहे।
इसी बीच उर्दू जाननेवाले आगरा के एक युवक सुघोष भारद्वाज, ख़्वाब अकबराबादी नाम से इस क्षेत्र में सक्रिय हुये और  उर्दू  ग़ज़ल के व्याकरण और शिल्प को न सिर्फ जानने समझने की गंभीरता से कोशिश की  बल्कि उन्हों ने  हिन्दी में सरल भाषा में ग़ज़ल के व्याकरण की  एक पुस्तक भी लिख डाली। पत्र पत्रिकाओं में ग़ज़ल के नाम पर प्रकाशित हो रही आड़ी तिरछी  रचनाओं  के तमाम  कवियों को उन्हों ने  आड़े  हाथों लिया।  पोस्ट कार्ड लिख लिख कर  उनकी  कमियों को उजागर किया और सही रास्ता   दिखाने की कोशिश की। उन्हों ने किसी को नहीं छोड़ा और नीरज जी तक को उनकी ग़ज़लों की ख़ामियों  के बारे में लिखा। नतीजा ये हुआ कि  नीरज ने अपनी पुस्तक को गीतिका  के नाम से प्रकाशित कर वाया। ख़्वाब ने ग़ज़ल के व्याकरण की  दूसरी  पुस्तक भी हिन्दी में  प्रकाशित  की  और  हिन्दी ग़ज़ल लिखनेवालों  को  जाग्रत  करने  की  कोशिश करते  रहे। इसी बीच ऐसा कुछ हुआ कि ख़्वाब अकबराबादी  परिदृश्य से ग़ायब हो गए और उनके बारे में कुछ पता नहीं चला।
पिछले 45 वर्षों में दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ निर्विवाद रूपसे सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला काव्य संग्रह है ।अगस्त 2020  तक ‘राधा कृष्ण’ प्रकाशन से ‘साये में धूप’के 70  संस्कारण प्रकाशित हो चुके हैं। सार्वजनिक रूप से दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों के शेरों को जितना अधिक कोट किया गया है यह अपने आप में एक चमत्कार ही है। उनके समकालीन उर्दू के लोकप्रिय शायरों में से भी कोई इस मुकाम को हासिल नहीं कर सका। कुल मिला कर उनकी केवल 52 ग़ज़लें हैं जिनमें 336 शेर हैं। लेकिन लगता ऐसे है जैसे उन्हों ने एक एक शेर में एक एक महाकाव्य रच दिया हो। मुक्तिबोध को पाठ्य पुस्तकों में होने के कारण ही जाना जाता है जब कि दुष्यंत कुमार उनकी ग़ज़लों की लोकप्रियता के कारण जाने जाते हैं।।
ग़ज़ल के शिल्प विधान से अपरिचित बहुत से रचनाकारों ने साहित्य में स्थापित होने के लिए हिन्दी ग़ज़ल को शॉर्टकट के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की है लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई कामयाब हो पाएगा। साथ ही ऐसे रचनाकार जो ग़ज़ल के शिल्प में दक्ष है और पाठकों के साथ  रिश्ता बनाने में कामयाब हुए हैं  लेकिन ‘ग़ज़ल तो ग़ज़ल है’, नारे के साथ खड़े हो कर उन्हों ने अपनी स्थिति को संदेहास्पद बना लिया है । ग़ज़ल या तो उर्दू ग़ज़ल है या हिन्दी ग़ज़ल। आप जिस भाषा को जानते नहीं उसके रचनाकर कैसे हो सकते हैं,यह सोचना चाहिए।
दुष्यंत कुमार के बड़े कवि के रूप में स्थापित होने के बाद उनकी लोकप्रियता से फायदा उठाने का सिलसिला भी शुरू होना ही था। इसमें वे लेखक आलोचक भी शामिल हैं जिनका ग़ज़ल से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है और जो नई कविता अर्थात छंद मुक्त कविता को ही हिन्दी साहित्य की मुख्य धारा की कविता के रूप में स्थापित करने की लगातार कोशिश करते रहे हैं।
उस काल में जहां उर्दू के तमाम  शायर जिनमें बशीर बद्र से लेकर मुनव्वर राना तक सभी शामिल हैं, भी हिन्दी भाषा की ताक़त को पहचान कर अपनी ग़ज़लों की भाषा को वहाँ ले जा रहे हैं जहां हिन्दी का पाठक भी उनकी ग़ज़लों का आनद ले सके।  सभी हिन्दी भाषा में अपने ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित करवा रहे हैं, ऐसे में अगर हिन्दी के ग़ज़लकार जो उर्दू भाषा का अलिफ़ भी नहीं जानते, देवनागरी लिपि में फ़ारसी –अरबी बहुल शब्दों में ग़ज़ल लिखने की कोशिश कर रहे हैं तो  मेरी समझ में नहीं आता कि वे किस भाषा के पाठक के लिए लिखने की  कोशिश कर रहे हैं और आख़िर  किसकी स्वीकृति चाहते हैं जो उनको शायर माने। अगर वे समझते हैं कि उनको उर्दू भाषा का शायर मान के उर्दू साहित्य का हिस्सा मान लिया जाएगा तो निश्चित ही भ्रम में जी रहे हैं। आप तो उर्दू लिखना पढ़ना भी नहीं जानते। किसी भाषा का साहित्यकार होने के लिए उसका सिर्फ जानना सम्झना ही पर्याप्त नहीं होता, उसके लिए आपको उस भाषा के साहित्य का ज्ञान होना भी जरूरी है।
जब संस्कृत और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी भाषा  ही इस देश में नहीं चल पाईं तो कोई कैसे सोच सकता है कि अरबी-फ़ारसी से लबरेज़ हिन्दी इस देश में चल पाएगी। लोगों को इस तथ्य को समझ लेना चाहिए कि फ़ारसी लिपि में लिखी उर्दू देश की भाषा है लेकिन फ़ारसी इस देश की भाषा नहीं है। मेरा ख़याल है बार बार पीछे मुड़ के देखते रहने से बेहतर है हम आगे देखें और आज की जरूरतों के अनुसार तय करें कि हमें क्या करना चाहिए। आज हम किसी क़बीले में नहीं एक ग्लोबल वर्ल्ड में जी रहे हैं।
ग़ज़ल में जिसे अपने आप को साबित करना है वह अपने आप को उस भाषा में साबित करे जिसे वह बेहतर बोलता समझता है। अगर साबित करना है तो ग़ज़ल की कहन और दमदार कथ्य से साबित करे। ग़ज़ल सिर्फ किसी भाषा के शब्दों की ग़ुलाम नहीं है। अगर ऐसा ही होता तो ग़ज़ल फ़ारसी से उर्दू,  हिन्दी, पंजाबी,सिंधी, गुजराती और मराठी जैसी भाषाओं तक कैसे पहुँचती। भाषा वह जो लोगों की समझ में आए,जिसे कोई समझेगा ही नहीं उसमें लिखे को कौन पढ़ेगा ? परम्पराओं को रूढ़ि बनाने से आदमी खुद ही अकेला हो जाता है, दुनिया किसी रूढ़ि पर नहीं ठहरती। दुनिया अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ती जाती है।
एक रचनाकार के लिए यह ज़रूरी है कि वह जिस विधा में लिख रहा है उसकी तकनीकी और शिल्पगत बारीक़ियों के बारे में पूरा ज्ञान हो,साथ ही उसने विधा के महत्वपूर्ण साहित्य को भी आत्मसात किया हो। कच्चेपन के साथ जो रचनाकर लेखन के क्षेत्र में उतरता है वह पाठक के साथ धोखा ही करता है। हिन्दी साहित्य से सम्बद्ध जितनी संस्थाएं हैं उनकी प्राथमिकता में साहित्य लेखन की विधाओं के ज्ञान को प्रशिक्षण के  माध्यम  से जिज्ञासू नए रचनाकारों तक पहुंचाने के बारे में कोई योजना नहीं है। प्रशिक्षण के लिए न सिर्फ आवश्यक पुस्तकें हों, योग्य प्रशिक्षक भी हों। अभी सीखना सीखना जो कुछ होता है वह नितांत व्यक्तिगत स्तर पर है। हिन्दी भाषा में ग़ज़ल के व्याकरण और शिल्प को गहनता से जानने वाले विद्वान बहुत कम हैं। जो जानते भी हैं उनकी रुचि नए लोगों को सिखाने में कितनी होगी यह समझा जा सकता है। हिन्दी में ग़ज़ल लिखने में रुचि लेनेवाले नए लोगों और उर्दू ग़ज़ल के उस्तादों  में भी आश्वस्त करनेवाला कोई नज़दीक का रिश्ता दिखता नहीं। यह एक बड़ा कारण है जिससे हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में बहुत सारी गड़बड़ियाँ नज़र आती हैं। मुझे उम्मीद है आने वाले समय में साहित्य लेखन से जुड़े लोग अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से  एहसास करेंगे और पाठक के साथ कोई धोखा नहीं करेंगे।
(फेसबुक से साभार)

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