संपादकीय - अंदर की बात क्या है...! 1
तस्वीर साभार : Haribhoomi

दरअसल जिस तरह गौतम अडाणी को भारत के प्रधानमंत्री का मित्र बताया जाता है और ऐसा चित्रण किया जाता है कि 2014 से पहले गौतम अडाणी जैसे दिल्ली की सड़कों पर गोलगप्पे बेचा करता था। भाई लोग 2014 में गौतम अडाणी भारत के अमीरों की सूची में 11वें स्थान पर था। यानी कि एक अरब तीस करोड़ लोगों में से ग्यारहवां सबसे अमीर आदमी। उसे भला एन.डी.टी.वी. में क्या रुचि हो सकती है? यह सोचने का मुद्दा हो सकता है।

“स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला” … “निष्पक्ष पत्रकारिता का अंतिम किला भी ढह गया” …
कुछ इस तरह की धारणाएं भारत के मीडिया जगत में फैलाई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि अडाणी समूह एन.डी.टी.वी. पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है। प्रणय रॉय, राधिका रॉय और टीवी चैनल के प्रबंधकों की इच्छा के विरुद्ध अडाणी यह प्रयास कर रहा है।
प्रचार किया जा रहा है कि गौतम अडाणी ने एन.डी.टी.वी. का ‘होस्टाइल टेकओवर’ कर लिया है – यानी कि कोई ग़ैरकानूनी ढंग का काम कर डाला है। 
दरअसल जिस तरह गौतम अडाणी को भारत के प्रधानमंत्री का मित्र बताया जाता है और ऐसा चित्रण किया जाता है कि 2014 से पहले गौतम अडाणी जैसे दिल्ली की सड़कों पर गोलगप्पे बेचा करता था। भाई लोग 2014 में गौतम अडाणी भारत के अमीरों की सूची में 11वें स्थान पर था। यानी कि एक अरब तीस करोड़ लोगों में से ग्यारहवां सबसे अमीर आदमी। उसे भला एन.डी.टी.वी. में क्या रुचि हो सकती है? यह सोचने का मुद्दा हो सकता है। 
अब हम इस समाचार के पीछे की स्थितियों का जायज़ा लेते हैं। 2009 में एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय और राधिका रॉय ने 2009-10 में मुकेश अंबानी से जुड़ी कंपनी से कर्ज लिया था। विश्वप्रधान कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड (VCPL) ने एनडीटीवी की प्रवर्तक कंपनी आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड को 403.85 करोड़ रुपये का कर्ज दिया था। 
कर्ज़ की शर्तों में लिखा गया था कि यह कर्ज़ा ब्याज-मुक्त होगा। दस सालों में यह धनराशि वापस की जानी थी। शर्त के अनुसार ब्याज मुक्त कर्ज़ के बदले आर.आर.पी.आर. ने वी.सी.पी.एल. को वॉरंट जारी किए। इस वॉरंट के अनुसार, अगर कंपनी भुगतान नहीं कर सकी, तो ऐसी स्थिति में कर्ज़दाता को आरआरपीआर में 99.9 फीसदी हिस्सेदारी लेने का अधिकार होगा।
याद रहे कि इन शर्तों पर प्रणय राय एवं राधिका राय ने बिना किसी ज़ोर ज़बरदस्ती के हस्ताक्षर किये थे। इसमें कहीं कोई षड़यन्त्र जैसी कोई बात नहीं थी। यदि यह लोन एन.डी.टी.वी. को न मिलता तो कंपनी का दिवाला पिटने वाला था। मगर इन तमाम वर्षों में रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम कार्यक्रम में राहुल गान्धी का अडाणी-अंबानी राग अलापते रहे जबकि कंपनी उनके कर्ज़ तले दबी हुई थी। 
वीसीपीएल शुरू में अंबानी समूह से जुड़ी कंपनी थी। 2012 में अडाणी ग्रुप ने इस कंपनी को ख़रीद लिया। ज़ाहिर है कि एनडीटीवी को दिया गया कर्ज़ा भी अब अडाणी ग्रुप का हो गया। और समय अवधि बीतने के बाद इस ग्रुप ने शर्तों के अनुसार उन वारंटों को शेयर में परिवर्तित कर लिया। यह सब खुले में हुआ। कहीं कोई हेरा-फेरी वाला मामला नहीं था। इस तरह कंपनी के करीब 29 प्रतिशत शेयर अडाणी ग्रुप के पास पहुंच गये। उसके बाद बिल्कुल कानून के दायरे में काम करते हुए अडाणी ग्रुप ने देश के अधिग्रहण मानदंडों के अनुरूप जनता से अतिरिक्त 26 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए 493 करोड़ रुपये की खुली पेशकश की। इसके लिये उन्हें न तो प्रणय राय और राधिका राय से अनुमति की ज़रूरत थी और न ही उन्हें सूचित करने की। 
वीसीपीएल ने अडाणी मीडिया नेटवर्क्स लिमिटेड और अडाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के साथ मिलकर एनडीटीवी के 1.67 करोड़ तक के पूर्ण चुकता इक्विटी शेयरों के अधिग्रहण के लिये 294 रुपये प्रति शेयर के भाव पर खुली पेशकश की। इससे पेशकश का कुल मूल्य करीब 493 करोड़ रुपये बैठता है।
याद रहे कि 2014 में मुकेश अंबानी के रिलायेन्स ग्रुप ने भी नेटवर्क18 राघव बहल से ख़रीद लिया था। अब हम सब जानते हैं कि मुकेश अंबानी एक बिज़नेस टाइकून हैं जो प्रोफ़ेशनल रवैया रखते हैं। उन्होंने राघव बहल को नेटवर्क18 का सीईओ बने रहने की पेशकश की थी। मगर राघव बहल को लगा कि यह उसके लिये मुश्किल होगा और उसने अपने आपको नेटवर्क18 से अलग कर लिया। 
उस वक्त भी तथाकथित सेक्युलर मीडियाकर्मियों ने शोर मचाया था कि क्या यह स्वतंत्र पत्रकारिता की मौत है?” याद रहे कि नेटवर्क18 के तहत CNBC TV18, CNN-IBN, CNN Awaz, Colors, MTV जैसे कुछ चैनल आते हैं। मगर तब यह शोर नहीं मचा कि होस्टाइल टेकओवर हो रहा है।
सच तो यह है कि भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इस बात की इजाज़त नहीं देता, इसलिए यहां होस्टाइल टेकओवर मुश्किल होता है। होस्टाइल टेकओवर को लेकर राजनीति गलियारों में भी हलचल मच जाती है और आर्थिक संस्थाएं भी इसे पसंद नहीं करती हैं। 
बात कुछ पुरानी है जब ब्रिटेन के एनआरआई बिजनेसमैन स्वराज पॉल ने एस्कॉर्ट्स और डीसीएम श्रीराम को जबरन खरीदने की कोशिश की थी। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने लार्सन एण्ड टूबरो की बागडोर अपने हाथ लेने की कोशिश की थी। ग्लोबल टोबैको कंपनी बीएटी ने आईटीसी को हथियाने की कोशिश की थी। ग्रेट ऑफशोर के लिए एबीजी शिपयार्ड और भारती शिपयार्ड की बोली भी होस्टाइल टेकओवर की मिसाल है। नए टेकओवर गाइडलाइंस से तो होस्टाइल टेकओवर और भी मुश्किल हो गया है।
एनडीटीवी के अधिग्रहण के साथ ही अडाणी जेफ बेजोस और मर्डोक परिवार की सूची में शामिल हो जाएंगे, जो क्रमश: वॉशिंगटन पोस्ट और फॉक्स कॉरपोरेशन के मालिक हैं। एनडीटीवी तीन राष्ट्रीय समाचार चैनल संचालित करता है – अंग्रेजी समाचार चैनल एनडीटीवी 24×7, हिंदी समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया और बिजनेस चैनल एनडीटीवी प्रॉफिट। कंपनी की ऑनलाइन उपस्थिति भी बेहद मजबूत है।
दिलीप मंडल ने अपने ट्वीट में कहा है कि, “एन.डी.टी.वी. की बरबादी और कर्ज़ में डूबने की कहानी मीडिया शहंशाह रुपर्ट मर्डॉक, बदनाम इंडियाबुल्स और भगोड़े विजय मालया से जुड़ी है। एन.डी.टी.वी. हमेशा कॉर्पोरेट की गोदी में बैठता रहा। अब अंबानी की गोदी से उतारकर अडानी उसे ख़रीद रहे हैं।”
यानी कि एन.डी.टी.वी. की शुरूआत में भी प्रणय राय या राधिका राय का अपना पैसा नहीं लगा था। उसमें निवेश किया था रुपर्ट मर्डॉक ने। हमेशा ही इस टीवी चैनल का झुकाव कांग्रेस या फिर वामपंथी दलों की ओर रहा। भारत में मीडिया समाचार नहीं देता… अपना विचार परोसता है। विचार भी नहीं अपना एजेन्डा। वो दिन हवा हुए जब एक समाचार-वाचक आकर निरपेक्ष भाव से समाचार पढ़ कर सुनाता था और श्रोताओं को उन पर विश्वास भी होता था। देवकीनंदन पांडेय, अशोक वाजपेयी, विनोद कश्यप, प्रतिमा पुरी, सलमा सुलतान, शम्मी नारंग, सरला माहेश्वरी, आदि समाचार सुनाते थे। 
एस.पी. सिंह शायद पहले एंकर थे और राहुल देव दूसरे। मगर उनके ज़माने में भी शालीनता बरकरार थी। आज जबकि पूरा मीडिया पहले से ही राजनीति का शिकार हौ और चीख़ना चिल्लाना ही हर शाम के मीनूकार्ड में रहता है, तो भला एन.डी.टी.वी. के बिकने पर किस बात का शोर।  
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

25 टिप्पणी

  1. The detailed account of the changing hands of NDTV shares with the passage of years is very interesting indeed.
    This has been a subject of a good many articles in Indian newspapers too.
    All the same, some of the facts were not known to many people,including me.
    We always stand more informed when we read your Editorials.
    Please accept our thanks n regards.
    Deepak Sharma

  2. बहुत ही स्पष्ट शब्दों में इस मुद्दे पर छाई बेतर्क बातों का विश्लेषण किया है आपने। आजकल हर बात को बिना वास्तविकता जाने राजनीति के दृष्टिकोण से जोड़ दिया जाता है। एक सटीक और गहन समीक्षा के लिए साधुवाद सर।

    • धन्यवाद विरेन्द्र भाई। पुरवाई का उद्देश्य रहता है कि अपने पाठकों तक सही फ़ैक्ट्स पहुंचा सके।

  3. बहुत बढ़िया विश्लेषण। बात को बड़े ही स्पष्ट शब्दों में आप ने व्यक्त किया साधुवाद।

  4. बातें हैं बातों का क्या
    बातें बहुत तरह की होती हैं इसकी सूची लम्बी है जैसे
    मन की बात, काम की बात, बेकार बात, फालतू बात, सच बात, झूठी बात, कड़वी बात, मीठी बात, दुखद बात, हँसी मज़ाक की बात, बाहर की बात, अंदर की बात और ऐसे बहुत सी बातें होती हैं। मनुष्य समयानुसार अपनी विचार धारा बदलता रहता है। अब तो मीडिया के भी प्रकार होने लगे जो सेकुलर, देशद्रोही और नॉन सेकुलर जैसे …
    सत्ता के ध्रुवीकरण के खेल में लोग चापलूसी कर अपनी शान समझते हैं और मानवता को ताक पर रख देते हैं! ये तो होता ही रहेगा …
    बातें हैं बातों का क्या ….

  5. सच में अंदर की बात कुछ और है।
    साफ-साफ शब्दों में कहना/लिखना बहुत अच्छा लगा। संपादकीय का बेबाक होना बहुत जरूरी है। आज के संपादक भी मीडिया की तरह है, जो समाचार नहीं, विचार परोसता है, अपना एजेंडा सुनाता है;, उससे बिलकुल विलग है पुरवाई के संपादकीय ।
    बधाई!

  6. इतनी जानकारी- इतने सरल शब्दों में अड़ानी को भी रुचिकर लगी होगी! और बात प्रणव राय व रविश कुमार को भी समझ आ रही होगी!
    पुरवाई को शुभ कामनाएँ!

  7. भारत के वर्तमान निवेशकर्ता विकसित देशों से शिक्षा प्राप्त हैं ,विश्व के साथ प्रतियोगिता का सामना आज की आवश्यकता है ,लेकिन मीडिया की सोच के साथ संघर्ष भी विकास की राह में बाधक है ,समाधान कुछ भी नहीं
    हेस्टाइल टेकओवर पर सम्पादकीय में किया गया संकेत उम्दा लगा यही तो केंद्र बिंदु विचारणीय है ।
    Dr prabha mishra

  8. संपादकीय – अंदर की बात क्या है…! –
    मुझ जैसी राजनीति के दांव पेचों और उलझनों से दूरी बनाए रखने वाली साधारण नागरिक को भी आपके संपादकीय पर्याप्त सामयिक जानकारियां देने में सफल रहते हैं, कभी अडाणी, राहुल, मीडिया और उनके उलझाते बिखरते जा रहे रिश्तों में पूरा देश बौखला रहा था, सच्चाई से कोई परिचित नहीं था फिर भी शोर था, बहसें थीं, संसद से लेकर सड़कों तक की हवा गर्म थीं,, बहुत कुछ जाना मैंने और शायद आम आदमी ने भी, हृदय से अशेष आभार व्यक्त करती हूं भाई, बहुत ही सुन्दर सार्थक और सारगर्भित संपादकीय के लिए,जो सत्य बयां करता है मीलों दूर रहकर भी, और इसी धरती पर हो रहें हंगामे को हम ही नहीं समझ पाते,, बहुत बहुत धन्यवाद आपका

  9. इस संपादकीय को NDTV पर प्रसारित किया जाना चाहिए ताकि अपने को ठगा हुआ Left सा महसूस करने वाले लोगों की सोच Right हो जाए

  10. यह एक प्रचलन ही हो गया है कि झूठ को इतना दोहराओ कि लोग उसे सच मानने लगें । वर्तमान सरकार को हर मंच से चिल्ला चिल्ला कर अंबानी अड़ानी का मित्र और हितैषी बताकर हर वह व्यक्ति अपनी भड़ास निकालता है जिसके पास कहने के लिए सार्थक कुछ भी नहीं ।
    आज के संपादकीय में जिस बात का खुलासा किया गया है, उससे देश की अधिकांश जनता वाक़िफ भी नहीं होगी , ऐसे में विपक्षियों की बात को कोई भी सच मान सकता है ।
    आवश्यकता है कि यह सब जानकारियां आम जनता तक पहुंचे ताकि वह भी सच की रौशनी में अपने विवेक से राय बनायें।

    इस बात से हम भी शत प्रतिशत सहमत हैं ” भारत में मीडिया समाचार नहीं देता… अपना विचार परोसता है। विचार भी नहीं अपना एजेन्डा। ” …और उन विचारों/एजेंडे का परोसा जाना न केवल उबाऊ होता है बल्कि चैनल की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है । प्रस्तुति में अति नाटकीयता हास्यास्पद भी लगती है ।
    दूरदर्शन वाली गरिमापूर्ण निष्पक्षता नदारद है । चैनल्स का इस और ध्यान देना ज़रूरी है ।

    आज का संपादकीय हमें बहुत अच्छा लगा…इसे आमजन तक पहुंचना ही चाहिए ।

  11. गूढ़ विषय पर तथ्यपूर्ण, स्पष्ट व सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत कर सत्य को उद्घाटित करता, आपका यह संपादकीय आपके लेखन व पत्रिका की उत्तम गुणवत्ता का प्रमाण है आदरणीय।

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