संपादकीय - न ड्राइवर न लारी पेट्रोल की मारामारी 3

आजकल वह्टसएप पर एक मज़ाकिया पोस्ट वायरल हो रही है जिसमें प्रधान मंत्री बॉरिस जॉन्सन पत्रकार लॉरा से बात करते हुए कह रहे हैं, “मोटापे का इलाज तो मैं कर रहा हूं कि सुपर मार्केट तक खाद्य सामग्री नहीं पहुंचने दे रहा। न खाने का सामान होगा, न लोग खाएंगे।… जलवायु परिवर्तन समस्या का हल पेट्रोल और डीज़ल की कमी से हल हो जाएगा। पेंशन में घाटे की समस्या के इलाज के लिये वरिष्ठ नागरिकों को मरने दे रहा हूं। अब तुम ही बताओ लॉरा मैं देश के लिये और क्या कर सकता हूं?”

ब्रिटेन में अचानक ऐसे हालात खड़े हो गये हैं जैसे किसी युद्ध के समय होते हैं। पेट्रोल और डीज़ल की भारी किल्लत; बहुत से पेट्रोल स्टेशन बंद पड़े हैं; ट्रक एवं लारी ड्राइवरों की कमी के चलते दवाइयां भी फ़ार्मेसी की दुकानों से ग़ायब हैं; कसाइयों की कमी के कारण सुअरों को काटने का काम नहीं हो पा रहा; फिर भी मंत्रियों का दावा है कि इस स्थिति का कारण ब्रेक्सिट नहीं है।
पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो गयी है। आज यानि कि 01 अक्तूबर 2021 को लंदन में पेट्रोल की कीमत 1.479 पाउण्ड प्रति लिटर है तो डीज़ल की कीमत 1.569 पाउण्ड। यदि भारतीय रुपये में कहा जाए तो पेट्रोल  ₹148/- प्रति लिटर और डीज़ल ₹157/- प्रति लिटर। 
यही नहीं जिस-जिस पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल और डीज़ल उपलब्ध होता है वहां इतनी लंबी कतार लगती है कि आसानी से दो या तीन घंटे कार में बैठे इंतज़ार करना पड़ता है।
अपना निजी अनुभव साझा करना चाहूंगा। कथा यू.के. की संरक्षक आदरणीय ज़किया ज़ुबैरी जी की कार में पेट्रोल भरवाना था। हम ने पेट्रोल पम्प ढूंढना शुरू किया मगर हमें तीन पेट्रोल स्टेशन ऐसे मिले जहां “नौ फ़्यूल” की तख़्तियां हमारा मज़ाक उड़ा रही थीं। फिर हमें याद आया  कि एक पेट्रोल पम्प ‘क्वीनस्बरी’ में ‘मॉरीसन सुपर-मार्किट’ में भी है। हम दोनों कार लेकर वहां पहुंच गये। पहली ख़ुशख़बरी थी कि वहां पेट्रोल और डीज़ल मिल रहा है क्योंकि वहां एक लंबी कतार दिखाई दे रही थी। हम भी उस कतार में जुड़ गये।
अब शुरू हुआ इंतज़ार। हमारे पास दो ही विकल्प थे… या तो दुखी मन मेरे का राग अलापते रहें या फिर इस इंतज़ार को पिकनिक में बदल लें। हम दोनों ने तय किया कि दूसरा विकल्प बेहतर है। वैसे भी ब्रेकफ़ास्ट का समय था। सामने कोस्टा कॉफ़ी का आउटलेट दिखाई दिया। कमाल की बात हुई कि दोनों में से किसी ने एक भी शब्द नहीं बोला और बस बात हो भी गयी। 
मैं कार से उतरा और कोस्टा से काफ़ी लाते और सैण्डविच लेकर कार में वापिस आ गया। तब तक कार शायद 50 गज़ आगे ही बढ़ी होगी। अब हमने इस तनाव भरे माहौल का सामना बढ़िया कॉफ़ी और सैण्डविच के ज़रिये बितानी शुरू कर दी। एक अनूठी स्थिति यह थी कि पेट्रोल पम्प में प्रवेश करने से पहले एक गोल चक्कर था यानि कि ‘राउण्ड अबाउट’। वहां तीन दिशाओं से कारें पेट्रोल भरवाने के लिये भीतर आने का प्रयास कर रही थीं।
मेरा प्रयास रहता है कि मैं लंदन और दिल्ली या अन्य किसी भारतीय शहर का मुक़ाबला न करूं… मगर हालात मुझे मजबूर कर देते हैं। हम लगभग दो घंटा पचास मिनट कतार में खड़े रहे – न तो किसी ने कतार तोड़ने का प्रयास किया और न ही किसी ने हॉर्न बजाया। मैं सोच रहा था कि यह सब भारत में किस सदी में देखने को मिलेगा।
मगर सवाल यह उठता है कि आख़िर ब्रिटेन जैसे देश में ये हालात हुए कैसे? क्या ब्रिटेन द्वारा युरोपियन यूनियन से अलग होने का ख़मियाज़ा भुगता जा रहा है? सबसे बुरा हाल टैक्सी ड्राइवरों का है। यदि उन्हें पेट्रोल भरवाने में तीन-तीन घंटे खड़ा होना पड़ेगा तो वे टैक्सी कब चलाएंगे और कमाएंगे कब?
चारों तरफ़ गुस्से की लहर दौड़ रही है। सब की आँखों में वर्तमान सरकार को लेकर एक ही भावना दिखाई दे रही है कि अगले चुनाव में तुम को वोट नहीं देंगे। 
मगर एक परिपक्व लोकतंत्र कैसा होता है इसका अनुभव लंदन में रह कर हो रहा है। विपक्षी दल लेबर पार्टी संसद में तो सत्ता पक्ष और प्रधानमंत्री बॉरिस जॉन्सन की क्लास ले रही है, मगर ट्वीट या नारेबाज़ी कर राजनीति के स्तर को गिरा नहीं रही। कीयर स्टामर (लेबर पार्टी के मुखिया) बहुत सभ्य ढंग से बॉरिस जॉन्सन पर दबाव बना रहे हैं।
मैंने जानने का प्रयास किया कि आख़िर ब्रिटेन में अचानक लॉरी ड्राइवरों की इतनी भयंकर कमी कैसे हो गयी कि सुपर मार्केट के शेल्फ़ों से पानी और खाद्य सामग्री क्योंकर ग़ायब होने लगी। पता चला कि जब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था और ब्रिटेन युरोपियन यूनियन का हिस्सा था, तो उस समय भी ब्रिटेन में करीब 76,000 लॉरी ड्राइवरों की कमी थी। मगर युरोप की हिस्सा होने के कारण इस कमी का अहसास नहीं हो रहा था।
2016 में सांसदों ने इस ओर ध्यान भी दिलाया था कि हमें युरोप पर निर्भर न रह कर अपनी इस समस्या की ओर ध्यान देना चाहिये। मगर सरकार शुतरमुर्ग की तरह समस्या से आँखें चुराती रही। उस पर कोरोना की मार ने हालात और बिगाड़ दिये। आंकड़े बताते हैं कि बहुत से ड्राइवर ब्रिटेन छोड़ कर युरोप के अन्य देशों की ओर निकल दिये।
2020 की पहली तिमाही में 3,04,000 से कम हो कर 2021 की दूसरी तिमाही में केवल 2,35,000 ड्राइवर ही रह गये। यानी कि कुल 69,000 ड्राइवर कम हो गये। इस समय ब्रिटेन में करीब 90,000 लॉरी ड्राइवरों की कमी बताई जा रही है। इनमें वो ड्राइवर भी शामिल हैं जिन्हें ब्रेक्सिट के कारण ब्रिटेन छोड़ कर जाना पड़ा।
युरोप के बहुत से ड्राइवरों का कहना है कि अब वे कभी भी ब्रिटेन में काम नहीं करना चाहेंगे। उनका कहना है कि ब्रिटेन बहुत बढ़िया मुल्क है मगर वहां इन्सान को इन्सान नहीं समझा जाता। कामगरों के साथ बहुत घटिया व्यवहार किया जाता है। 
ब्रिटेन में सरकार ने सेना की सहायता लेने का निर्णय ले लिया है। आगामी सोमवार से सेना के जवान पेट्रोल पम्पों पर पेट्रोल और डीज़ल पहुंचाने में सहायता करना शुरू कर देंगे। मगर संदेह जताया जा रहा है कि सेना के दो सौ पाँच सौ जवान इतनी बड़ी कमी की भरपाई करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे। 
एक और समस्या मुंह बाए खड़ी है। अभी जो ड्राइवर कचरा उठाने वाली गाड़ी चला रहे हैं उनमें भी भारी कमी होने की संभावनाएं बन रही हैं। यदि ऐसा होता है तो हर गली मुहल्ले में कचरा इकट्ठा होना शुरू हो सकता है। कोरोना काल में जबकि तीसरी लहर आने की संभावनाएं जताई जा रही हैं, हर शहर में कचरा इकट्ठा होने से समस्याएं पेचीदा हो सकती हैं।
आजकल वह्टसएप पर एक मज़ाकिया पोस्ट वायरल हो रही है जिसमें प्रधान मंत्री बॉरिस जॉन्सन पत्रकार लॉरा से बात करते हुए कह रहे हैं, “मोटापे का इलाज तो मैं कर रहा हूं कि सुपर मार्केट तक खाद्य सामग्री नहीं पहुंचने दे रहा। न खाने का सामान होगा, न लोग खाएंगे।… जलवायु परिवर्तन समस्या का हल पेट्रोल और डीज़ल की कमी से हल हो जाएगा। पेंशन में घाटे की समस्या के इलाज के लिये वरिष्ठ नागरिकों को मरने दे रहा हूं। अब तुम ही बताओ लॉरा मैं देश के लिये और क्या कर सकता हूं?”
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

25 टिप्पणी

  1. Congratulations Tejendra ji for this objective view of the present state of affairs in London.
    Very impressed by the discipline shown by people waiting in the queue for getting petrol without breaking the line.
    Also the open minded criticism of the Prime Minister through that audacious question in the form of a cartoon.
    The difficulties being borne by the public due to shortage of drivers is another pointer.

  2. देश की स्थिति समय के अनुसार कैसी है, इस पर कोई निश्चित वादा कोई सरकार नहीं कर सकती लेकिन प्रतिकूल स्थिति में भी विपक्ष और आम जन नागरिक की भागीदारी कैसी होनी चाहिए, इसका एक सकारत्मक दृश्य आपके सम्पादकीय में स्पष्ट झलकता है। राजनीतिक संदर्भ में तो टिप्पणी करना संभव नहीं लेकिन सामाजिक तौर पर ब्रिटेनवासियों के व्यवहार से सहज सीख और समझा जा सकता है।
    एक सहज और स्पष्ट भाषा में ब्रिटेन में उत्पन्न स्थिति का अच्छा चित्रण किया आपने। साधुवाद सर।

  3. आज की सम्पादकीय ने दुनिया का ध्यान ब्रिटेन की मूल समस्याओं की ओर आकृष्ट किया है ,अर्थात आने वाले समय की कठिनाइयों का संकेत भी है ।विकसित और विकासशील देशों के लोकतांत्रिक स्वरूप में भिन्नता पर बारीकी से बात कह दी है।
    ब्याजस्तुति और ब्याजनिन्दा दोनों की अभिव्यक्ति से सम्पादकीय
    परिपूर्ण है
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

    • प्रभा जी आप नियमित रूप से संपादकीय पढ़ती हैं और सार्थक टिप्पणी भी देती हैं। आपका धन्यवाद।

  4. ब्रिटेन की यह हालत जानकर हैरानी और अफसोस दोनो हो रहे हैं पर ऐसे में भी जिस तरह विपक्षी पार्टियां बिना शोर शराबे और नारेबाजी के दबाव बना रही हैं तो पेट्रोल डीजल की किल्लत में कई घंटे की प्रतीक्षा में भी कोई लाइन नहीं तोड़ता ….यह जानना सुखद है, लेकिन ड्राइवर जैसे छोटे तबके के साथ बुरा व्यवहार होता है यह तकलीफ़ देह है, जो भी हो बस ये कि सब जल्द दुरुस्त हो यही कामना है

  5. नमस्कार माननीय।
    यूके को पता है कि वहां कितने लॉरी ड्राइवर हैं। हमारे भारत में इस तरह का हिसाब रखने की कोई रवायत नहीं है। और हॉर्न बजाए बिना तो कोई वाहन खिसकता ही नहीं। कारण यह कि यहां की गाड़ियों का एक्सीलरेटर हॉर्न ‌में होता है।
    ब्रिटेन में डीजल पेट्रोल के दाम जानकर हमें बहुत ही अधिक सैडिस्टिक प्लेज़र मिला। अंग्रेज़ों ‌को कष्ट हो तो हम हिन्दी वाले ऐसे ही खुशी मनाते हैं। बस आपके लिए अफसोस है। लेकिन करें क्या! आपकी हालत गेहूं के साथ घुन वाली है।
    भारतीय प्रजातंत्र में काम कम है, चिल्ला चोट अधिक। विपक्ष का काम है चिल्लाना। इसे देखते हुए हमारा सुझाव है कि भारत की इस प्रणाली को प्रजातंत्र के बजाय ‘चिल्ला तंत्र’ कहना चाहिए।
    बहरहाल, आपके इस बहुत ही प्रासंगिक संपादकीय के लिए आपको हार्दिक बधाई और साधुवाद।

  6. कररेन्ट अफ़ेयर पर बनाय गए व्यंग सदैव गम्भीर समस्या का अध्धयन व निवारण बड़ी दूर दृष्टि के साथ करते हैं, किन्तु उनके द्वारा दिये दिशा निर्देश समझना आवश्यक होता है। आमतौर से अधिकाँशतः एक मज़ाक की तरह देख कर भूल जाते हैं। पेट्रोल की समस्या विशव व्यापी है जो अलग रूप में समय समय पर प्रकट होती है। और उसके आवश्यकतानुसार निवारण होते हैं। फ़्रांस में कैसे लोग सड़कों पर वाहन छोड़ कर चले गए थे। हमेशा शासन की ग़लत नीतियों का नुक़सान जनता को भुगतना पड़ता है। 90000 ड्राइवर की आवश्यकता का एक इश्तेहार अगर हमारे देश मे दे दिया तो उन्हें 90 लाख ड्राइवर मिल जाएंगे ! यहाँ पेट्रोल की बढ़ती कीमते दोहरे मापदण्ड का नतीजा हैं। GST लागू करते समय एक देश एक tax का झुनझुना पकड़ाया था जिसे सब पूरी तरह भूल चुके हैं, पेट्रोल को GST से जानबूझ कर बाहर रख कर राज करने वाले, जनता को दिल खोल कर लूट रहे हैं। इसका मुख्य कारण जनता की अज्ञानता, शासन से डर और शासन की पारदर्शिता की कमी। और सम्विधान के चौथे स्तम्भ का झूठ परोस कर गुमराह करना । आवश्यकता जारूकता की है ।

  7. सराहनीय सम्पादकीय के लिए साधुवाद। बर्तानिया सरकार हो या मार्किन राष्ट्र, या फिर हिंदुस्तान। सभी इस समस्या से जूझ रहे हैं। कोई छाती पीट रहे हैं कोई माथा। चुटकियों में हल नही होते ऐसी बड़ी समस्याएं। बहरहाल, प्रतिकूल परिस्थितियों में आपको समय पर शानदार नाश्ता करने का अवसर मिला, ये भी कोई मामूली बात नहीं। अंग्रेज़ सरकार की बात हो रही है तो इस शानदार नाश्ते पर कहूँगी
    Blessing in disguise

  8. तेजेंद्र जी आपके धारदार लेखन ने पेट्रोल डीज़ल जैसी समस्या को जिस तरह से उठाया है , वाक़ई सोचने की आवश्यकता है ।

  9. ब्रिटेन की ताज़ा समस्या पर कोस्टा कॉफ़ी की भाप सा गर्मागरम संपादकीय अच्छा लगा। जैसे ऊपर श्री सिंह ने लिखा है कि ब्रिटिश की परेशानियों से हम भारतीयों को खुशी सी मिलती है, मैं सहमत हूँ। ऐसी समस्या भारत में तो आगे कई शताब्दियों तक आनी नहीं है, यहाँ की जनसंख्या जिंदाबाद।ये कोरोना जैसी छूत की बीमारी है नहीं, तो ब्रिटेन की चिंता उन्हें मुबारक, भारत निश्चिंत है।
    यूँ ड्राईवर की समस्या कोई समस्या नहीं है, मात्र भारतीय उपमहाद्वीप को थोड़ा सा हिला दीजिए, ब्रिटेन नहीं पूरे यूरोप के लिए, ड्राईवर टपक पड़ेंगे। अब वायु सेवा भी सामान्य हो गई है, समस्या जल्द ख़त्म हो जाएगी। तब तक धैर्य से बॉरिस जॉन्सन जे आदर्शों पर चलकर सेहतमंद होइये, शुभकामनाएं. ☺️

  10. आदरणीय संपादक महोदय नमस्कार।
    आपने अपने संपादकीय में ब्रिटिश सामाजिक एवं आर्थिक विषम परिस्थिति का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियां कहीं भी आ सकती हैं लेकिन हर परिस्थिति में वहां की जनता की तरह धैर्य एवं अनुशासन बनाए रखना श्रेष्ठ नागरिक का गुण है यह किसी भी देश की नैतिकता को भी दर्शाती है इसलिए हमें भी यह अनुकरण करना चाहिए। निष्पक्ष एवं मूल्यपरक संपादकीय हेतु आपका धन्यवाद

  11. आदरणीय तेजेन्द्र जी ! विश्वव्यापी समस्या से जूझते समय कैसे हर ख़ासोआम को अनुशासित व धीरजयुक्त बने रहना चाहिए, यह आपका सम्पादकीय बहुत प्रभावशाली ढंग से सिखा रहा है, बशर्ते कि कोई सीखे तो।
    विषम परिस्थिति को भी कैसे आनन्दित होते हुए अनुकूल और रोचक बनाया जा सकता है, यह आप बख़ूबी जानते हैं। हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकारें।

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