19 सितम्बर, 2021 को प्रकाशित पुरवाई के सम्पादकीय ‘विश्व लोकतंत्र दिवस’ पर संदेशों के माध्यम से प्राप्त प्रतिक्रियाएं

तेजेन्द्र भाई, पुरवाई का आज (19 सितम्बर, 2021) का संपादकीय पढ़ा।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई दल देश में धार्मिक उन्माद फैला कर बहुसंख्यक वर्ग के वोटरों को अपने पक्ष करके अनंत काल तक सत्ता में बने रहने का प्रयत्न करे तो लोकतंत्र को त्रुटिपूर्ण कहने का साहस तो करना ही चाहिए।
इस्लामिक देशों के हालात हमें यह चेतावनी तो देते ही हैं कि उनसे धार्मिक कट्टरता की सीख लेकर हम अपने देश को भी वैसा ही बना लेंगे। अनुशासन और कट्टरता दो अलग बात हैं।
– अशोक रावत

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तेजेन्द्र भाई, बहुत ख़ूबसूरत सम्पादकीय पेशकश ।
तालिबान की दूसरी पारी सबको चौंका देने वाली है… ठीक वैसे ही जैसे – फ़ारसी का एक शब्द है ‘तलब’ अर्थात चाह, दूसरा शब्द है ‘इल्म’ अर्थात ज्ञान। इन दोनों शब्दों को जोड़ कर एक शब्द बना
“तलब-ए-इल्म” अर्थात जिसको ज्ञान की चाह हो यानी स्टूडेन्ट या छात्र।
इस “तलब-ए-इल्म” का बहुवचन है — “तलबे इलमा” जिसको अँग्रेज़ी में spelling लिखी TALIBAN इसका मतलब छात्रों का समूह !
क्या इस समूह में किसी में भी छात्र के कोई गुण या लक्षण नज़र आते हैं !
ठीक उस ही तरह तालिबान की दूसरी पारी में अमरीका व उनके सहयोगियों, चीन, रूस, पाकिस्तान या किसी भी अन्य देश की कूटनीति में कोई सिद्धान्त या सामंजस्य दिखाई नहीं देता ।
बस अब आगे आगे देखो होता है क्या ! कौन इस अमृत मन्थन में अमृत पायेगा और कौन विष पियेगा ये समय ही बताएगा ।
छुरी सेब पर गिरे या सेब छुरी पर गिरे – कटेगा तो सेब ही !
अमन ख़ुशी चैन और बर्बादी अफ़ग़ानिस्तान की
जंगल की इस आग की गर्मी का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा ।
– कैलाश मुंशी, भोपाल

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आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी,
लोकतंत्र पर इतना शानदार लेख मैंने पहले कभी नहीं पढ़ा। शानदार!
– डॉ. श्वेता सिन्हा
(आयोवा, अमेरिका)

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तेजेन्द्र जी,
‘पुरवाई’ का संपादकीय “विश्व लोकतंत्र दिवस” अभी कुछ समय पूर्व मैंने पढ़ा है।
‘पुरवाई’ के संपादकीय के वैचारिक, सार्थक, तथ्यात्मक आलेख ने इस ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है। इसमें विश्व के कुछ देशों की लोकतांत्रिक प्रणाली की खूबियों/ खामियों के बारे में उल्लेख है, के द्वारा अच्छी जानकारी मिली।
मगर यह बात मन में खटकती है कि भारत में त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र यानी ‘फ़्लॉड डेमोक्रेसी’ कैसे कह दिया गया जबकि भारत के पड़ोसी देश में तथाकथित मनमाना लोकतंत्र है, यहाँ अल्पसंख्यकों (हिंदू व अन्य) पर ज़ुल्म ढाया जाता है। इनका शोषण और इन पर अत्याचार चरम पर है। यहाँ मानवीय मूल्य ध्वस्त हैं।
भारत का दूसरे पड़ोसी देश चीन की तानाशाही दुनिया जानती है। दुनिया के तमाम देशों की अपेक्षा भारत में संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रणाली/व्यवस्था बेहतर माना जाना उचित प्रतीत होता है। इस आलेख में एक अप्रतिम उदाहरण का उल्लेख है सिंगापुर के तत्कालीन प्रधानमंत्री ली क्वान यू ने (जून 1959 से नवंबर 1990 तक) सिंगापुर की आर्थिक स्थिति एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए वहाँ के नागरिकों पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर प्रतिबंध लगाया था।
मेरा मानना है समय के अनुसार देश हित में, लोक-हित में शासन द्वारा नैसर्गिक, उचित, नियमानुसार कार्यवाही लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधीन मान्य है। भारत में आधिकारिक रूप से लोकतांत्रिक प्रणाली भले 1947 में शुरू हुआ है। किंतु वास्तविकता ये है कि भारतीय इतिहास के अनुसार चाणक्य के समय यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार राज काज की व्यवस्था थी। अपेक्षाकृत भारत का लोकतंत्र इस समय बेहतरी की ओर अग्रसर है।
इस सारगर्भित एवं तथ्यात्मक संपादकीय के लिए आदरणीय संपादक महोदय तेजेन्द्र शर्मा जी को साधुवाद देती हूँ।
– डा. तारा सिंह अंशुल

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