Thursday, May 21, 2026
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संपादकीय – क्या कविता से इलाज संभव है ?

पुरवाई के पाठकों को बताना चाहूंगा कि ‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ जो ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट, सेंट्रल लंदन में खुली है, उसमें माया रौलैंड (एक साहित्यिक व्यक्तित्व एवं पुस्तक विक्रेता), गोदेलीव दी ब्री (एक आलोचक), एंटोनिया अंडरवुड (नॉटिंघम से कलाकार, नाटककार जो वर्कशॉप भी करती हैं), फ़्रैंकी पैरिस (लेखक, संगीतकार और फ़िल्म निर्माता)। अब देखिये कि किताबों की दुकान यानी कि ‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ में किसी को भी नौकरी नहीं दे दी गई है। कुछ चुनिंदा लोग वहां रखे गये हैं जो दुकान के नाम के साथ न्याय कर सकें।

मुझे तीन चार मित्रों ने दैनिक भास्कर की एक कटिंग भेजी और सबने एक ही सवाल पूछा, “क्या यह सच है?” कटिंग की हेडलाइन थी – “ब्रिटेन में कविताओं से हो रहा इलाज; बुज़ुर्गों के लिये खुली ‘पोएम फ़ार्मेसी’, कविता लिखने-सुनने से दर्द दूर हो रहा है।”
ज़ाहिर है कि जिस भाषा के साहित्य में कविता को सिरदर्द देने का कारण मना लिया गया हो, वहां के लिये यह तो अद्भुत समाचार होगा कि कविता सुनने से दर्द दूर हो रहा है। यह समाचार कुछ इस तरह से प्रकाशित हुआ जैसे कोई डॉक्टर स्टेथेस्कोप लेकर बैठा है… मरीज़ का चेकअप करता है औऱ प्रेस्क्राइब कर देता है कि उसे जॉन कीट्स या टी. एस. ईलियट की कविता सुना दी जाए और मरीज़ हंसता खेलता ‘पोएट्री फ़ार्मेसी’ से बाहर निकल जाएगा।  
एक बात तो साफ़ है कि मेरे बहुत से मित्र और पुरवाई के अधिकांश पाठक मुझ से यह अपेक्षा रखते हैं कि मैं उनके लिये हर नये विषय पर शोध करूं और उन्हें तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध करवाऊं। और फिर यह तो मामला मेरे अपने शहर लन्दन का है। मैं जुट गया अपने मित्रों को फ़ोन करने। पहले तो हर ओर से निराशा हाथ लगी, फिर एक मित्र ने बताया कि ‘पोएम फ़ार्मेसी’ जैसी तो कोई दुकान उसने नहीं सुनी, मगर ‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ नाम की किताबों की एक दुकान अवश्य ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट लन्दन में खुली है। 
मैंने उससे कहा कि भाई हो सकता है कि हमारे समाचारपत्र के संवाददाता ने कुछ ग़लत सुन लिया हो; अब चाहे ‘पोयम’ हो या फिर ‘पोयट्री’, मुख्य मुद्दा तो फ़ार्मेसी का है। मित्र का जवाब मज़ेदार था, “हम लोग मूलतः व्यापारी हैं। तुम्हें तो याद ही होगी ईस्ट इंडिया कंपनी। हम प्रचार-प्रसार के नये-नये तरीके खोजते हैं। हमें चर्चा में रहना आता है। कितना रोमांटिक लगता है कविता के माध्यम से इन्सान का इलाज किया जा रहा है। मगर सच तो यह है कि दुकान वाले अपनी दुकान की बिक्री बढ़ाने के लिये ये सब हथकंडे अपना रहे हैं। मुझे लगा कि शायद, मेरा मित्र नाहक ही इस मुहिम के विरुद्ध कठोर हो रहा है। 
मगर मेरी सोच को झटका तब लगा जब मैंने अमेज़न पर चेक किया तो मुझे एक पुस्तक दिखाई दी जिसका नाम है – ‘दि पोयट्री फ़ार्मेसी’ और इसके लेखक हैं विलियम सीघार्ट।  पेपरबैक में इस पुस्तक की कीमत है £12.25 और इस पर स्टीवन फ़्राई की एक टिप्पणी भी लिखी गई है, “वास्तव में यह एक अद्भुत संग्रह है… इसमें आत्मा के लिये मरहम है; पेट के लिये आग है; बुख़ार से पीड़ित माथे के लिये ठंडक देने वाल सेक है; घायलों के लिये सांत्वना है; अकेले कंधे पर एक हाथ है – पूरा संग्रह आलिंगन का एक अतुलनीय मिश्रण है… टॉनिक और चुंबन!” किताब ना हुई लाख दुखों की एक दवा है क्यों ना आज़माये हो गई है। मगर इससे मेरे दोस्त की बात को बल अवश्य मिला कि हम कुछ बेचने के लिये किसी भी प्रकार का प्रचार प्रसार कर सकते हैं। 
ब्रिटेन में अभी भी आम लोगों में पढ़ने की परंपरा बाक़ी है। मेट्रों में यात्रा करते हुए आपको जहां लोग टेलिफ़ोन से चिपके दिखाई देंगे वहीं हाथों में उपन्यास या कोई अन्य पुस्तक लिये पाठकों के दर्शन भी हो जाएंगे। इस समाचार को वैसे भी भारत के संदर्भ में सोच पाना आसान नहीं।  भारत के हिन्दी जगत में ना तो पुस्तक ख़रीदने की संस्कृति है और ना ही पुस्तक पढ़ने की। हिन्दी में कविता सिरदर्द को पैदा कर सकती है क्योंकि आज की कविता में समाज की आलोचना, राजनीतिक भ्रष्टाचार आदि आदि शोर मचाते सुनाई देते हैं। कहीं कुछ अच्छा हो रहा है, उसकी भनक भी हिन्दी कविता में सुनाई नहीं देती। ऐसे में इस कविता से किसी का इलाज कैसे हो सकता है?

याद करिये, जब आपका डॉक्टर आपके लिये किसी दवा का नुस्खा लिखता है तो पहले पूछता है कि आपको किसी प्रकार की कोई एलर्जी तो नहीं है। ठीक इसी तरह इस पोयट्री फ़ार्मेसी में भी पूछा जाता होगा – क्या आपको कविता पसंद है… आपको कैसी कविता पसंद है… कविता में गीत पसंद है, छंद बद्ध कविता पसंद है या फिर गद्य नुमा कविता पसंद है। मुझे याद पड़ता है जब एम.ए. में टी. एस. ईलियट, एज़रा पाऊंड या उनके समकालीन कवियों की कविताएं पढ़ते थे तो ऐसा महसूस होता था जैसे एल्जेबरा का कोई सवाल हल कर रहे हैं। 
एक शेर मारूफ़ देहलवी का आपने भी सुन रखा होग – “दर्द-ए-सर में है किसे संदल लगाने का दिमाग़  / उस का घिसना और लगाना दर्द-ए-सर ये भी तो है।”  कुछ ऐसा ही कविता से इलाज करने के बारे में भी कहा जा सकता है कि “सिर दर्द का इलाज अब कविता से भी होगा / कविता से जो सिरदर्द मिले उसका क्या इलाज!”
फिर भी पुरवाई के पाठकों को बताना चाहूंगा कि ‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ जो ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट, सेंट्रल लंदन में खुली है, उसमें माया रौलैंड (एक साहित्यिक व्यक्तित्व एवं पुस्तक विक्रेता), गोदेलीव दी ब्री (एक आलोचक), एंटोनिया अंडरवुड (नॉटिंघम से कलाकार, नाटककार जो वर्कशॉप भी करती हैं), फ़्रैंकी पैरिस (लेखक, संगीतकार और फ़िल्म निर्माता)। अब देखिये कि किताबों की दुकान यानी कि ‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ में किसी को भी नौकरी नहीं दे दी गई है। कुछ चुनिंदा लोग वहां रखे गये हैं जो दुकान के नाम के साथ न्याय कर सकें।
‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ का कहना है कि हम ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट में ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रहे हैं जो इस इलाके की हलचल के अनुकूल हो। हम जेन फ़िरोज़ को उनके पुराने टाइपराइटर के साथ यहां आमंत्रित करने जा रहे हैं जो आपकी इच्छानुसार कविताओं की रचना आपके सामने करेंगे। हम विश्व के कुछ महत्वपूर्ण कवितों के प्रकाशकों के साथ भी कुछ रोमांचक कार्यक्रमों का आयोजन करने जारहे हैं। हम लिज़ इसन के साथ कविताओं पर काम कर रहे हैं और कुछ आगामी परियोजनाएं मैक्मिलन के साथ भी बन रही हैं। 
सच तो यह है कि पूरे विश्व में छपी हुई पुस्तकों और विशेष तौर से कविता की पुस्तकों के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है। जहां भारत के प्रकाशक या तो कवियों से पैसे लेकर कविता की किताबें छाप रहे हैं या फिर सरकारी ख़रीद द्वारा अपनी लागत निकालने का प्रयास करते हैं, वहीं ब्रिटेन में एक नया तरीका खोजा जा रहा है जहां नये-नये किस्म के आयोजनों द्वारा पाठकों को कविता की किताबों की ओर आकर्षित किय़ा जा रहा है। कभी कोई लेखक अपनी पुस्तक पर साइन करेगा तो कहीं पाठकों को कविता लिखने को प्रेरित किया जाएगा। 
वैसे एक सवाल और दिमाग़ में उठा कि भास्कर के संवाददाता ने ‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ में अपनी कोई फ़ोटो या सेल्फ़ी अपने समाचार में नहीं डाली। आजके इस भयंकर प्रतिस्पर्धा के युग में अपनी ब्रेकिंग स्टोरी में संवाददाता अपने आपको कैमरे के पीछे रखने को शायद तभी सफल हो सकता है अगर उसने केवल ऑनलाइन इस ख़बर को कहीं पढ़ लिया और उसे पाठकों के सामने पेश कर दिया। मैंने भी अपने मित्रों और ‘पोयट्री फ़ार्मेसी’ को फ़ोन करके उनसे बात करके आप लोगों के लिये सामग्री जुटाई है। जल्दी ही मैं अपनी बेटी आर्या और ज़किया जी के साथ वहां जाकर पता लगाने का प्रयास करूंगा कि हिन्दी लेखकों और पाठकों के लिये वहां किस प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा सकती हैं।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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66 टिप्पणी

  1. बहुत बढ़िया लिखा सर, कविता से इलाज पूर्णतः संभव तो नहीं मान सकती पर तकलीफ में राहत जरूर मिल सकती है किंतु सुनने वाला संवेदनशील हो और लिखने वाला भी अंतःकरण की संवेदनाओं से रचना का सृजन करें तो यह बात गलत नहीं है
    हां कुछ लोगों को कविताएं सर दर्द भी बन जाती हैं जिन्हें पसंद नहीं है अथवा जो डूबना नहीं जानते, हर वक्त हर स्थिति में भी कविता असरकारी नहीं होती।
    जब कविताओं से प्रेरणा पाकर निराश लोगों में आशाएं पल्लवित होने लगते हैं तो दर्द में राहत पाना भी असंभव नहीं है

    • कविता फ़ार्मेसी का प्रयोग तो हमारे यहाँ काफ़ी चलन है जिस तरह हम बच्चों को लोरी सुनकर सुलाते हैं, कोई गाना सुनाकर उनका दुख कम करते हैं, बड़े-बड़े दुख में अवसाद कम करने के लिए गीता-रामायण का पढ़ा करते हैं या कि मन भटकने पर भी स्तुति करते हैं, मंत्रों को उच्चारित करते हैं।
      हमारे गाँवों के संदर्भ में देखें तो वहाँ झाड़-फूँक में जो मंत्र पढ़ते थे या अभी भी पढ़ा जाता है, उसमें एक कविता होती है, जोकि स्थानीय भाषा में रचित होती है, एक बार झाड़ने वाले से मैंने पूछा तो उसने मुझे जो पंक्तियाँ सुनाईं वे कवित्त टाइप एक छोटी कविता ही थी, गाँवों में साँप का विष कम करने के लिए वे मरीज़ के कानों में प्रचलित पंक्तियों की बाँग देते थे, बहुत ही रोचक और विचारणीय बात है, मैंने इस संदर्भ को एक लघुकथा में भी डाला है।
      कविता गंभीर रोगों का तात्कालिक इलाज न सही परंतु धीरे-धीरे अपना असर तो छोड़ती ही है।
      बहुत सारगर्भित और आवश्यक संपादकीय है। बधाई और शुभकामनाएँ!

  2. संभव है अगर व्यक्ति भावुक और संवेदनशील हो पर अगर कविता से ही अलर्जी हो तो मर्ज़ी बढ़ता जायेगा।

  3. ढर्रे से हटकर लिखना बेहद दुश्वारी भरा कार्य कार्य है।अगर सच में पाठकों के मन आया तो गुरु छा गए और गर बात या सर्जंना नहीं गले नहीं उतरी तो बस कुछ नहीं।
    कविता से इलाज़ एक ऐसा विषय है जिसे कोई आसानी से सोच भी नहीं सकता है।तब मेहनत ,पारखी नजर और संपर्कों का मधुपर्क यदि सच्चाई का नवनीत यानी मक्खन ले आए तो क्या कहने?!
    ऐसा ही महसूस हुआ ,इस संपादकीय को पढ़कर।साथ ही साथ आत्मनिर्भरता का खम ठोकते भारत में पुस्तक पठन और पढ़ने की प्रवृत्ति को भी पूछा और बतलाया गया है।कविता में जब तक सामाजिक सांस्कृतिक और आम जन के सरोकार ना हों तो वह आम जन को आकर्षित नहीं करती है और हमारे देश में ऐसा ही हो रहा है। सियासत और प्रशासन का साहित्य या कविता से दूर दूर तक रिश्ता भी नहीं रह गया है गोया के अनकहा सा अलगाव तलाक़ की हद तक।
    सुंदर और सार्थक संपादकीय
    काश कि कोई हज़ूम ए सियासत
    ऐसी भी आए
    जो किताब और कविता से
    भी बतियाये।

    • बेहतरीन प्रतिक्रिया भाई सूर्य कांत जी। आपकी टिप्पणी ने संपादकीय का औचित्य सिद्ध कर दिया।

  4. हमेशा की तरह संपादकीय का विषय अलग है। कविताएं सुनना या सुनाकर इलाज करना,बीमार की व्यक्तिगत शौक पर निर्भर करता है। उसका असर भी उसी पर निर्भर है। मर्ज़ बढ़ भी सकता है घट भी सकता है।
    आप जाकर देखिए, क्या और कैसे हो रहा है। अगला संपादकीय क्रमशः के बाद का होगा।

    • प्रगति जी क्या सटीक बात कही है आपने… क्रमशः के बाद अवश्य हमें वापिस आना होगा।

  5. कभी वो दिन भी थे जब कविताएँ प्रेरणा देती थीं , गुदगुदाती थीं, भटके हुओं को रास्ता दिखाती थीं , तो देखा जाये यह भी एक क़िस्म का इलाज ही हुआ .
    आप सही कहते हैं ईस्ट इंडिया कंपनी के वंशजों को मार्केटिंग करनी आती है सो यह दुकान खुल गई है.
    मित्र जल्दी ही मैं भी इस फ़ार्मेसी में जा कर इसकी दवाइयों की परख करूँगा

  6. सर, यह खबर पढ़ कर जितनी जिज्ञासाएं उत्पन्न हुईं थी, उनमें से अधिकांश का समाधान हो गया। कला का कोई भी रूप हो, रोग में या तनाव में राहत देने का काम जरूर करता है लेकिन इससे कविता इलाज कितना संभव हो सकेगा यह देखना होगा। नई जानकारियों से भरे संपादकीय के लिए आभार।

    • शैली जी,आपकी टिप्पणी शायद बहुत से मित्रों का प्रतिनिधित्व कर रही है। बहुत बहुत धन्यवाद।

  7. बड़े मजेदार ढंग से आपने बात रखी.
    म्यूजिक थेरेपी का तो पता था, खुद भी संगीत से रिलैक्स होती हूँ पर पेपर में यह नई थेरेपी के बारे में पढ़कर असंभव सा लगा था.. अब जब मिलने के बाद लिखेंगे तो शायद सच सामने आए।
    प्रतीक्षा!

    अनिता रश्मि

    • अनिता जी, अपनी पहली ज़िम्मेदारी थी कि मित्रों की उत्कंठा को कैसे शांत किया जाए। अब खोजी पत्रकारिता का अगला दौर शुरू होगा।

  8. कविता से इलाज हो सकता है; यह विचार भारतीय साहित्य में भी और यूनानी साहित्य में भी उपलब्ध है। अरस्तू का कैथार्सिस सिद्धांत संभवत: इस दृष्टिकोण को पहली बार मजबूती से स्थापित करता है।
    यह आवश्यक है कि कविता से उपचार की सीमाएं हमेशा रहेगी, पर कुछ मानसिक रोगों के लिए यह अचूक औषधि के रूप में उपयोग में लाई जा सकती है।
    जटिल बनते गए समाज में कविता हाशिए की चीज हो गई है। आपने ठीक रेखांकित किया है कि कविता को हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले लोगों ने विशुद्ध राजनीतिक कलेवर प्रदान कर उसके स्वरूप को बदल दिया है। ऐसी कविता विक्षोभ पैदा कर सकती है, विक्षिप्त कर सकती है, उपचार कतई नहीं कर पाएगी। पर यह विषय मौजू है और शोध की अपेक्षा करता है।

    • भाई जय शंकर तिवारी जी, आपकी टिप्पणी सच में बहुआयामी है और कविता को लेकर बहुत सी सच्चाइयां उजागर करती है। हार्दिक धन्यवाद।

  9. बहुत अच्छा चिंतन हैआपके प्रयास सार्थक हों, और लोगों की अभिरुचि कविताओं में जागृत हो ।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  10. बहुत ही अद्भुत विषय पर संपादकीय लिखा आपने। कविता से इलाज उसीका हो सकता है, जिन्हें इसमें रुचि होगी, शेष तो शांति चाहेंगे। लेकिन इस विषय को विस्तार से जानने की इच्छा जरूर है।

    • सुधा, यह केवल शुरूआत है। मैं अभी स्वयं पोयट्री फ़ार्मेसी में अपनी बेटी आर्या और ज़किया जी के साथ देख कर आऊंगा और इस विषय पर फिर लिखा जाएगा।

  11. पहले तो इस संपादकीय से चौंक गया मैं। कविता से इलाज संभव हो सकता है। भाई अंग्रेज बहादुर अलग ही सोचते हैं। कभी हम उन पर आंख मूंदकर विश्वास कर लेते हैं। कभी हम अपने साहित्य से उनकी इन बातों से जांचने लग जाते हैं। मेरे साथ भी वही हुआ । हम भारतीयों में एक आदत है, यदि हम साहित्यकार हैं तो कविता में क्या है, इस पर दिमाग लगाते हैं। क्या कमी कर दी साहित्यकार ने इसमें पूरी इनर्जी खपाने को उद्धत रहते हैं। तेजेन्द्र सर ने जब इसे संपादकीय का विषय बनाया है तो कुछ सोचकर तो इसे पाठकों को परोसा होगा। मुझे लगता है कि यह बात सच है कि कविता से बीमारी सही हो या न हो, यदि कोई कविता मन को भा जाए तो तन-मन को सुकून दे जाती है। हम गीत सुनते हैं तो सुकून मिलता है। जयशंकर प्रसाद की रचनाएं मुझे अच्छी लगती है। श्रीरामचरितमानस के कई प्रसंगों को पढ़कर मैं तरोताजा हो लेता हूं। और भी बहुत से साहित्यकार हैं जो मुझे सुकून दे जाते हैं। इसमें सच्चाई तभी तक है जब तक किसी व्यक्ति में उसमें रुचि हो। बिना रुचि वाले के लिए शायद ये लागू न होगा। फिलहाल विषय आपने एकदम ताजा उठाया है। उन लोगों की पहल की सराहना करनी चाहिए जिन्होंने पोयट्री संस्था खोली है। भारत में लोग साहित्य से दूर जा चुके हैं। हो सकता है इस संस्था से लोग प्रभावित होकर कविता पढ़ने लगें। अभिजात्य वर्ग शुरू कर देगा तो जरूर शुरू हो जाएगा। क्योंकि हमारे यहां पानी का बहाव हमेशा ऊपर से नीचे की ओर ही रहा है। संपादकीय के इस विषय के लिए आपको बधाई

    • भाई लखनलाल जी पहले तो आपको इस अंक में कहानी के लिये बधाई। आपकी टिप्पणी निजी और सामाजिक स्तर पर हर पहलू पर दृष्टि डालती है। आपकी साहित्यिक एवं सोशल मीडिया पर सक्रियता सलाम करने लायक है। आपका पुरवाई से जुड़ना एक दिलख़ुश स्थिति है। स्नेहाशीष।

  12. आज की सम्पादकीय अपने आप में एक प्रयोग हम समझ रहे हैं लेकिन व्यक्तिगत अनुभव के साथ कह रही हूँ कि हमारी संगीत साधना और रागों में दीपक जलाने, वर्षा कराने की शक्ति तो सभी जानते हैं लेकिन आज जिसे सब कलयुग कहते है , कविता न सही मंत्र, रामायण की चौपाइयाँ भी ये काम कर रहीं हैं।
    सिर्फ चिकित्सा की दृष्टि से कहूँ – मेरे ससुरजी की कैंसर की अंतिम अवस्था चल रही थ, उनके कष्ट का हम अनुभव भी नही कर सकते थे। मेरे गुरु थे, जो मेरे फूफाजी भी थे , मैंने उनसे पूछा कि बाबूजी की मृत्यु निश्चित है फिर मैं चाहती हूँ कि उनका कष्ट कम हो जाय। मैं क्या कर सकती हूँ? उन्होंने बताया कि तुम उनके पास बैठकर उनको स्पर्श करते हुए ‘ऊँ शांति शांति शांति’ का जप करना , इससे उनकी तकलीफ कम होगी। मैंने इसको किया और उनको शांति से सोते देखा। तकलीफ बढ़ने पर मुझसे कहते कि मेरे पास ही रहो। तब मैंने अनुभव किया कि ये एक सफल चिकित्सा पद्धति है।
    अगर ऐसा है तो पोयट्री फार्मेसी भी संभव है।

    • रेखा जी आपने अपने निजी अनुभव से पोयट्री फ़ार्मेसी का औचित्य सिद्ध कर दिया। आपकी टिप्पणी कई बार पढ़ने योग्य है।

  13. हिंदी के अखबार इस तरह की खबरें खोजते रहते हैं। मिल जाए तो बिना ठीक से समझे उस पर कैप्शन लगा देते हैं, ऐसा ही यहां हुआ है।
    हिंदी में तो उन्हीं को बड़ा कवि माना जाता है जिनकी कविताएं पारदर्शी न हों, कुछ भी लिखें जिसे abstract की श्रेणी में रख दिया जाए, उनकी लॉबी वाह वाह करे और सभी प्रगतिशील नतमस्तक हो जाएं।
    कविता यदि अपने सौम्य रूप में हो तो मनुष्य को शांति और जीवन के प्रति आशा दे सकती है। सादर।

  14. वाह, अद्भुत संपादकीय है भाई तेजेंद्र जी। खासा दिलचस्प और अविस्मरणीय। आश्चर्य, आप ढूंढ़ ही लेते हैं ऐसे नायाब और अनूठे विषय, जिन पर किसी और की नजर नहीं जाती। पर जिस पर किसी की नजर न जाए, उस पर तेजेंद्र भाई की नजर पड़े, यही तो ‘पुरवाई’ को सही मायने में हम सबकी, बल्कि साहित्य जगत की ‘पुरवाई’ बनाता है।

    अलबत्ता, इससे हिंदी कविता का अकारण वनवास खत्म हो, और हिंदी वालों, खासकर प्रकाशकों में कविता के प्रति थोड़ा अनुराग जागे, तो‌ कितना अच्छा-अच्छा सा होगा।

    इस दिलचस्प संपादकीय के लिए एक बार फिर से आपको बधाई और साधुवाद भाई तेजेंद्र जी!

    मेरा स्नेह,
    प्रकाश मनु

  15. कविता फ़ार्मेसी का प्रयोग तो हमारे यहाँ काफ़ी चलन है जिस तरह हम बच्चों को लोरी सुनकर सुलाते हैं, कोई गाना सुनाकर उनका दुख कम करते हैं, बड़े-बड़े दुख में अवसाद कम करने के लिए गीता-रामायण का पढ़ा करते हैं या कि मन भटकने पर भी स्तुति करते हैं, मंत्रों को उच्चारित करते हैं।
    हमारे गाँवों के संदर्भ में देखें तो वहाँ झाड़-फूँक में जो मंत्र पढ़ते थे या अभी भी पढ़ा जाता है, उसमें एक कविता होती है, जोकि स्थानीय भाषा में रचित होती है, एक बार झाड़ने वाले से मैंने पूछा तो उसने मुझे जो पंक्तियाँ सुनाईं वे कवित्त टाइप एक छोटी कविता ही थी, गाँवों में साँप का विष कम करने के लिए वे मरीज़ के कानों में प्रचलित पंक्तियों की बाँग देते थे, बहुत ही रोचक और विचारणीय बात है, मैंने इस संदर्भ को एक लघुकथा में भी डाला है।
    कविता गंभीर रोगों का तात्कालिक इलाज न सही परंतु धीरे-धीरे अपना असर तो छोड़ती ही है।
    बहुत सारगर्भित और आवश्यक संपादकीय है। बधाई और शुभकामनाएँ!

  16. तेजेन्द्र सर जी, पुरवाई जैसी अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका में कहानी का प्रकाशित होना मेरे लिए लिए गर्व की बात है। आपको और संपादक मंडल को बहुत बहुत धन्यवाद

    • भाई लखनलाल जी आपने शब्दों की फ़िज़ूलखर्ची किये बिना, एक संवेदनशील कहानी का सृजन किया है। स्थितियां और पात्र जीवंत हैं। एक अच्छी कहानी के लिये आपको बधाई।

  17. Your Editorial of today speaks of an interesting proposition/ project where poetry will prove to be a therapy/ medicine.
    Till now we had been hearing:
    ‘Laughter is the best medicine’
    Which has not proved to be wholly true in care of chronic patients.
    Let us see how this proposition works.
    Please accept our thanks for introducing this aspect of poetry which this Pharmacy is putting forth.
    Warm regards
    Deepak Sharma

  18. अत्यंत सुंदर एवं रोचक संपादकीय हेतु हार्दिक बधाई सर… गीत गाने से या सुनने से यदि मानसिक अशांति से मुक्ति मिलती है तो यह भी संभव है कि कविता से स्वस्थ हो सकते हैं, परंतु यह भी सत्य है कि कविता अपने मन की स्तिथि अनुकूल हो। यह एक सराहनीय पदक्षेप है।
    इस समय लोगों को भी अशांतिपूर्ण वातावरण से दूर इस प्रकार की आयोजन में संपृक्त होना आवश्यक है।

    साधुवाद सर

  19. *कविता फार्मेंसी : नया ज्ञानोदय*

    आदरणीय तेजेंद्र शर्मा ने *पुरवाई* में कविता फार्मेंसी को लेकर बहुत ही मौलिक संपादकीय लिखा है। हम भारतीय जिन कलाओं, विधाओं और विद्याओं को विस्मृति कर चुके हैं उन्हीं विद्याओं और कलाओं के महत्व को विदेशी विद्वान प्रमाणित कर रहे हैं। कविता फार्मेंसी इसी तरह का एक मौलिक प्रयोग है।
    मुझे याद है, हमारे गाँव में एक श्रोत्रिय पंडित जी हुआ करते थे। हम लोग उन्हें बापू सोती कहते थे। उनके पास अक्सर वात रोग से पीड़ित रोगी झाड़ा लगवाने आते थे। वह पीड़ित व्यक्ति के कच्चे सूत के धागे से हरे बाँस के पतले-पतले टुकड़े प्रभावित स्थान पर बांध देते थे और जैसे ही वह वात नाशक मंत्र का सस्वर पाठ करते, थोड़ी ही देर में बाँस की टुकड़े हिलने लगते थे। इस प्रक्रिया से पीड़ित को कुछ समय बाद आराम मिल जाता था। यह तंत्र भी था, मंत्र भी था और शब्द-औषधि का प्रयोग भी था। सात्विक साधना के माध्यम से तंत्र विज्ञान के इस तरह के प्रयोग अत्यंत प्राचीन हैं। हमारे यहाँ प्राचीनकाल से ही संगीत चिकित्सा भी विद्यमान रही है। आज म्यूजिक थैरेपी का प्रयोग भी दुनियाभर प्रचलित है। मुझे लगता है कविता फार्मेसी उसी का नवीन संस्करण है।
    आदरणीय तेजेंद्र शर्मा ने इस संदर्भ में अनेक शोधों का हवाला देते हुए अपने विज्ञान सम्मत संपादकीय को हम लोगों के लिए ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत किया है। उनके संपादकीय दृष्टि की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। इस तरह के संपादकीय लेख लिखने से प्रायः संपादक बचते हैं। दाद देने होगी भाई तेजेन्द्र शर्मा की कविता फार्मेसी जैसे मौलिक विषय पर विस्तार में संपादकीय लिखकर पाठकों का नया ज्ञानोदय किया है।

    डॉ० रामशंकर भारती

    • भाई रामशंकर जी, आपका नाम आज पहली बार ठीक से टाइप हुआ है… आदतन रमाशंकर ही लिखा जाता रहा है… क्षमा। आपने अपने गाँव का उदाहरण दे कर गीत, संगीत और मंत्र का उपयोग बीमारी को ठीक करने की घटना साझी की है। बचपन में दादी-नानी कहानी सुनाती थीं तो नींद आ जाती थी यानी कि स्लीप-थिरेपी… ऐसे ही शायद सही किस्म की कविता मरीज़ों पर अपना असर दिखा सकती है।

  20. कहीं कुछ अच्छा हो रहा है, उसकी भनक हिन्दी कविता में तो क्या किसी भी प्लेटफॉर्म पर नहीं सुनाई देती, यहाँ तक 24 घंटे चलने वाले मिडिया में भी।
    ऐसे में कविता से किसी का इलाज कैसे हो सकता है, बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। आजकल म्यूजिक थेरेपी से ठीक होने की बात की जाती है। मेरी एक मित्र हैं, वह कहती हैं कि चाहे मैं कितनी भी बीमार क्यों न हूँ, अगर कोई मिलने आ जाये तो मुझे लगता है कि मैं बीमार हूँ ही नहीं। लेखक बिरादरी के लोग भी कहते हैं जो बात हम किसी से कह नहीं पाते, उसे अपनी रचनाओं में उड़ेल देते हैं, यानि दिल हल्का कर लेते हैं।
    इसी तरह किसी को पढ़ने का शौक होता है तो किसी को म्यूजिक या चित्रकला कला का। किसी को घूमने का शौक होता है तो किसी को शॉपिंग का। मेरे विचार से अगर व्यक्ति अपने शौक में रमा रहेगा तो उसकी आधी बीमारी तो स्वमेव ही दूर हो जायेगी।

    व्यक्ति हमेशा नवाचार में लगा रहता है। ‘पोएट्री फार्मेसी’ भी नवाचार का एक रूप है। उसका भविष्य तो भविष्य ही बताएगा। आपकी खोजी पत्रकारिता ने इस ओर पाठकों का ध्यान केंद्रित किया ही है, आगे भी करेंगे, इस कामना के साथ आपको साधुवाद।

    • सुधा आपकी टिप्पणी संपादकीय को समझने के लिए नये दृष्टिकोण प्रदान करती है। हार्दिक आभार।

  21. संपादक महोदय,
    बहुत रोचक और कविता के संदर्भ में नया बिंदु!

    जेन फिरोज़ किसी AI कवि का तो नाम नहीं? जो मेड टू ऑर्डर कविता लिखेंगे?

    सबसे बढ़कर भारतीय पत्रकारिता को नमन।

  22. आपका यह संपादकीय पाठक को चौंकाता भी है और प्रसन्नता के साथ-साथ , चिंतन-मनन के लिए प्रेरित भी करता है। आधुनिक समाज में, कविता विधा ! कुछ अपवादों को छोड़कर, जबकि धीरे-धीरे समाज में अपना पहले जैसे मान-सम्मान नहीं पा रही, तब कोई पोएट्री फार्मेसी की बात करे ? एक नया विचार । सचमुच यह समयोचित एक स्वागत योग्य पहल है। यह है खोजी पत्रकारिता का कमाल !! मेरी हार्दिक बधाई !!

    • हरनेक जी, आप इतने खुले दिल से तारीफ़ करते हैं कि पढ़ने वाले का मन ख़ुशी से भर जाता है। Thanks a tonne.

  23. विचारणीय , अच्छे संपादक का अच्छा संपादकीय। भारत के कुछ अखबारों में बिना प्रामाणिक जानकारी प्राप्त किए विदेशी समाचार नमक- मिर्च लगाकर प्शा किया जाता है।
    आपने एक सजग संपादक की तरह तहक़ीक़ात की और विचार के लिए मुद्दा प्रदान किया । बधाई एवं धन्यवाद ।

  24. जितेन्द्र भाई: मुझे तो यह Poetry Pharmacy का concept अपने किबाबों के बिज़नैस को बढ़ाने देने का अनूठा साधन लगता है। यहाँ टोरन्टो में भी World’s Biggest Bookstore के नाम से कितबों की एक दुकान खुली थी। शुरू शुरू में तो ख़ूब शोर शराबा रहा लेकिन २०१४ में उसको बन्द करना पड़ा। ख़बरों में तो बहुत कुछ लिखा होता है। जब तक आप स्वयं वहाँ जाकर नहीं देख आते तब तक तो अपनी यही सोच है। हो सकता है आप वहाँ पर आपको कुछ अजीब करिश्मा देखने को मिले जिस से हर बीमारी का इलाज एक बुक स्टोर में बैठे लोग कर सकते हैं। आपकी रिपोर्ट का बहुत बेसबरी से इन्तज़ार रहेगा।

  25. आदरणीय आपके संपादकीय से और कविता या संगीत से इलाज हो सकता है इस बात से मैं सहमत हूँ । क्योंकि यह मैंने करके देखा है। 2013 में मेरी छोटी बेटी का अपेंडिस फट गया था और उसे इंफ़ेक्शन हो गया था । तब वह केवल पाँच साल की थी । पहले सप्ताह में उसके दो बड़े ऑपरेशन हुए । दूसरे सप्ताह में उसे दूसरे शहर के मेडीकल यूनिवर्सिटी के हॉस्पिटल में भेजा गया क्योंकि उसका जीवित रहने की उम्मीद पाँच प्रतिशत से भी कम थी । दूसरे हॉस्पिटल में जाते ही पहले दिन से मैंने बच्ची के कमरे में हमारे मंत्रों को उसे पढ़ कर सुनाना शुरू किया । डच डॉ जब कभी कमरे में आते तो कहते अच्छा संगीत है । पर उस संगीत की सच्चाई उन्हें तब पता लगी जब मेरी बच्ची तीन माह अस्पताल में 6 ऑपरेशन के बाद सही सलामत घर आई । इस बीच डच डाक्टर ने कह दिया था की बच्ची को यहाँ रोकनेवाला कोली फ़ायदा नहीं है आप इसे घर ले जा सकते हैं । अगर इसका खून इकोली बैक्टीरिया से साफ़ नहीं हुआ तो हम कुछ नहीं कर सकते बच्ची बहुत छोटी है और 6 बड़े ऑपरेशन हो चुके हैं जो आमतौर पर हम किसी बजे के भी नहीं करते । तब डॉ की दवाई बंद कर दी गई । मैंने हल्दी के दूध और किताबो , कहानी, कविताओं को सुना कर अपनी बेटी को सही सलामत वापिस ले आई । आज मेरी वहीं बेटी ईश्वर की कृपा से सोलह वर्ष की स्वस्थ बच्ची है।

    • ऋतु आपने अपने निजी जीवन से जो अनुभव साझा किए हैं, उन्होंने भीतर तक इमोशनल कर दिया। आपका हार्दिक आभार।

  26. धन्यवाद सर जी, आपके संपादकीय ने मन में उपज रहे समस्त प्रश्नों पर विराम चिन्ह लगा दिया। बाजारवाद और पत्रकारिता का भी स्पष्ट रूप मुखर हो गया।

  27. आदरणीय तेजेन्द्र जी!
    संपादकीय हर बार कुछ नये आश्चर्य के साथ सामने आता है।यहीआश्चर्य संपादकीय की प्रतीक्षा इंतज़ार और उत्सुकता को बनाए रखता है और उसके इंतजार में सहायक होता है।
    हमने पहली बार जब इसकी पेपर कटिंग पढ़ी थी तब एक पल तो ऐसा लगा कि कुछ नया शगूफा छूटा पर जब बाद में विचार किया तब दिमाग में एक बात आई कि संगीत में बहुत ताकत है। तानसेन के संगीत में इतना जादू था कि उसने मेघ मल्हार राग से पानी गिराया और दीपक राग से दीपक जलाकर बताए थे तो कविता भी पूर्ण स्वस्थ न करे किंतु मानसिक राहत देने की ताकत संभव है।
    सारे मंत्र जो संस्कृत में है वह काव्य रूप ही है संस्कृत में।भले ही उसे श्लोक कहते हैं। उसमें प्रेरणा है, नीति है, हौसला है।कविता में अगर लय, तुक, राग का माधुर्य, साथ ही भावनात्मक दृष्टि से संवेदनशीलता, मर्मस्पर्शिता और अभिव्यक्ति की तीव्रता है तो कविता भी इलाज का नहीं पता पर दर्द भुलाने में तो सक्षम हो सकती है। गीत भी कविता का ही एक रूप है। जो फिल्मी गाने हम सुनते हैं, प्रभावशाली वह भी होते हैं। काव्य साहित्य पढ़ने पर भी प्रभावित करता है। रामचरितमानस इसका बेहतर उदाहरण है। सूरदास के पद भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बेहद शांति मिलती है पढ़ने से। ‌तो हम तो इस थैरेपी को संभव मानते हैं। निर्भर इस पर करता है कि पहले मरीज की प्रॉब्लम को समझा जाए और उसके अनुरूप उसके लिए चयन किया जाये। इसके लिए बहुत तैयारी करनी होगी मानसिकता को समझने के लिये,साहित्य चयन के लिये और फिर उसके प्रयोग के लिये।
    हमें एक बहुत पुरानी घटना याद आ रही है। हमें याद है एक बार हमारी छोटी बहन को छिपकली उदल गई थी दोनों हाथों में,गले पर,पीठ और छाती पर छोटे बड़े छाले जैसे हो गए थे, वह दिन रात सोती नहीं थी तब हम उसे कहानी और गाने सुनाया करते थे। कुछ गाने हमें आज भी याद हैं ,”आज कल में ढल गया,दिन हुआ तमाम।” “नन्ही परी सोने चली हवा धीरे आना। “चंदा को ढूंढने सभी तारे निकल पड़े। इसके अलावा जो गाने उसे पसंद थे, वह सब। जितनी देर हम लोग कोई गाने सुनाते रहते थे उतनी देर वह बराबर शांत रहती थी।ऐसा नहीं था कि दर्द कम हो जाता होगा। लेकिन यह तो निश्चित था कि ध्यान वहाँ से हट जाता है।वे 4-5 दिन बड़े कष्टदायक थे। तो हमें लगता है कि संभावना तो है लेकिन सभी संभावनाएँ प्रयास पर निर्भर हैं। कब तक और कितनी ?यह तो वक्त बताएगा।
    वैसे तो लोग आजकल कविताओं को पढ़ने और सुनने में ज्यादा रुचि नहीं रखते अतः यह कितनी कारगर होगी और किस तरह काम करेगी यह भविष्य में छुपा है
    अब इंतजार इस बात का भी रहेगा कि आप कब जाकर ज़किया जी व बेटीआर्या के साथ सच्ची जानकारी हासिल करके लाएँगे।
    हर बार एक नए संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ। पुरवाई का बहुत-बहुत आभार।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आप हर संपादकीय के साथ अपने निजी अनुभव जोड़ कर नये आयाम पैदा कर देती हैं। हार्दिक धन्यवाद।

  28. सादर अभिवादन
    आपका हर संपादकीय बहुत विश्लेषणात्मक और खूब ज्ञानवर्धक भी होता है । हर तथ्य की पूरी जांच पङताल के बाद इतने प्रभावपूर्ण तरीके से लिखा जाने वाला संपादकीय लाजवाब होता है । बहुत आभार आपका एक नई जानकारी के लिए ।

  29. आ. तेजेन्द्र जी
    इस प्यारे से विषय पर बात करने के लिए बहुत बहुत बधाई व अभिनंदन!
    बचपन से लोरी, अंत में गीता पाठ, इस बात का प्रमाण तो हैं ही कि हम जन्म के साथ ही संवेदना से जुड़े होते हैं। अवश्य ही उसके प्रकार बदलते रहते हैं।
    जब संगीत से हमारे मन की तंत्रियां जुड़ जाती हैं तब शब्दों की ताक़त महसूस होती है। शब्द को नाद माना गया है, शैली अवश्य अलग होती है इसलिए मस्तिष्क कहता है कि यह असंभव नहीं। संगीत, कविता,कोई भी कला सब जुड़े हुए तो हैं ही। अतः कविता से उपचार असंभव तो नहीं लगता। अब उसका प्रचार किसलिए व किस रूप में किया जा रहा हो, यह अलग मुद्दा हो सकता है।
    संपादकीय का विषय रुचिकर भी है और जिज्ञासा से भरा भी!
    वास्तविकता का पता लगाने तो आपको वहाँ एक बार विज़िट करना ही होगा संपादक श्री
    सदा की भाँति नवीन, रुचिकर विषय के लिए आपका हार्दिक साधुवाद।

    • आदरणीय, आपने जो ज़िम्मेदारी सौंपी है, मैं उसे जल्दी ही पूरा करने का प्रयास करूंगा। आपका बहुत शुक्रिया।

  30. सचमुच अकल्पनीय सी खबर और रिपोर्ट। भारत में तो यह एक स्टेरियोटाईप है कि कवि नामके प्राणी से लोग कतरा के निकल जाते हैं कि कहीं वह पकड़ कर बैठा न लें और दो चार सुना डाले।

    आपकी रिपोर्ट से भी लग यही रहा है कि मामला बेंचने के हथकंडे जैसा है मगर अवधारणा दुरुस्त है। जब संगीत से उपचार संभव है तो कविता से क्यों नहीं? मगर सभी पर यह फार्मूला नहीं चलेगा। जिन्हें साहित्य संगीत और कविता से जन्मजात एलर्जी है उनका मर्ज तो और भी गंभीर हो जायेगा। ☺️

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