संपादकीय - ब्रिटेन में बढ़ती महंगाई और हड़तालों का दौर 9

हड़ताल का मतलब होता है कि हमें अपनी बात अपनी मैनेजमेंट तक पहुंचानी है। कंपनी को नुक्सान पहुंचाना या देश की संपत्ति को जलाना हमारा उद्देश्य बिल्कुल नहीं होता। यात्री भी मुस्कुराते हुए आते हैं, पिकेट लाइन पर आकर अपना समर्थन जताते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। यही समय होता है जांचने का कि कौन आम आदमी का समर्थक है और कौन मैनेजमेंट का पिट्ठु। अगस्त का महीना हड़तालों से भरा होगा… सितम्बर में ब्रिटेन को नया प्रधानमंत्री मिलेगा। उम्मीद करता हूं कि आम आदमी का दर्द हमारे नये प्रधानमंत्री तक अवश्य पहुंचेगा। 

कोरोना काल के चलते-चलते रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू हो गया। यूरोप अमरीका के साथ रूस के विरुद्ध खड़ा हो गया और रूस पर प्रतिबंध लगा दिये। रूस ने तेल और गैस के सप्लाई पाइपों पर ताले लगा दिये। और यूरोप का बुरा हाल हो गया।
ब्रिटेन में गैस के दाम 95.7 प्रतिशत बढ़ गये तो बिजली के दामों में 54 प्रतिशत वृद्धि हो गयी। हवाई यात्रा की टिकट 37.1 प्रतिशत महंगी हो गई तो दूध, दही, मक्खन और चीज़ के दामों में भी भारी बढ़ोतरी हो गयी। बढ़ती गर्मी के कारण एअर-कंडीशनर भी महंगे हो गये। अमरीका अपनी ताल बजा रहा है, रूस-यूक्रेन का युद्ध छठवें महीने में दाख़िल होने वाला है और ब्रिटेन-वासी इसका ख़मियाज़ा भुगत रहे हैं।
तमाम परिवारों का मासिक बजट असंतुलित हो गया है। आज सुबह ही एल.बी.सी. (लंदन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन) के एक कार्यक्रम में एक महिला ने पूर्व वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री पद के दावेदार ऋषि सुनक की आलोचना करते हुए बताया कि वह एक समय का भोजन स्वयं नहीं खाती है ताकि अपने बच्चों को खिला सके। मुझे बहुत सी ब्लैक एण्ड व्हाइट हिंदी फ़िल्मों की माँ याद आ गयी जो हर दूसरी फ़िल्म में ऐसा ही करती थी। मगर याद रहे कि यह ब्रिटेन है – जिसके बारे में कहा जाता था कि ब्रिटिश एम्पायर में कभी सूर्य अस्त नहीं होता। 

संपादकीय - ब्रिटेन में बढ़ती महंगाई और हड़तालों का दौर 10

ज़ाहिर है कि इन हालात में हर ब्रिटेन वासी अपनी सरकार से यह आस लगाएगा कि “तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना / ग़रीब जान के हम को न तुम मिटा देना।” लगता है जैसे गीतकार जान निसार अख़्तर ने आज के ब्रिटेन वासियों के दिल के दर्द की बात फ़िल्म ‘छू-मंतर’ में बहुत पहले कह दी थी।
ज़ाहिर है कि इस महंगाई की मार ब्रिटेन के हर तबके पर समान रूप से पड़ी है। एक बात याद रखने लायक होती है कि जितनी जिसकी पगार होती है उसी हिसाब से वह अपने परिवार का बजट बनाता है। जैसे ग़रीब आदमी लिडल, ऑल्दी, और आज़दा सुपर-मार्केट से सामान ख़रीदता है। मध्यम वर्ग का इन्सान सेन्सबरी, टेस्को औऱ मॉरीसन से। वहीं ऊंचे तबके के लोग जाते हैं वेटरोज़ और मार्क्स एण्ड स्पेन्सर। चाहे सामान वो एक सा ख़रीदते हों मगर सुपर-मार्केट के हिसाब से उनके घर का ख़र्चा तय होता है। इसलिये यह सोचना कि जिनकी पगार ऊंची है उन पर महंगाई का असर बिल्कुल नहीं पड़ता… ग़लत होगा। 
हर विभाग में रोष है… रॉयल मेल, पोस्ट ऑफ़िस, ब्रिटिश टेलिकॉम आदि सभी हड़ताल पर जाने की तैयारियां कर रहे हैं। इन विभागों ने अगस्त महीने में चार दिन हड़ताल के लिये पहले ही घोषित कर रखे हैं।
यहां तक कि नेशनल हेल्थ स्कीम की नर्सें भी सरकार से बहुत नाराज़ हैं। उन्होंने भी हड़ताल पर जाने की घोषणा कर दी है। दरअसल नर्सों एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों में यह धारणा बनी हुई थी कि एन.एच.एस. के नियम उन्हें हड़ताल और धरने जैसी गतिविधियों में भाग लेने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है। जिस तरह भारत में एक आवश्यक सेवा अधिनियम लागू है… कुछ इसी तरह की सोच नर्सों की भी रही। 
याद रखने लायक बात यह है कि कोई भी कर्मचारी यदि अपनी मैनेजमेंट से असंतुष्ट है तो अपनी प्रतिक्रिया दो तरह से व्यक्त कर सकता है – पहला पूरी हड़ताल और दूसरा हड़ताल से कुछ कम कार्यवाही। यानी कि तयशुदा नियमों के अनुसार काम करना। इसके तहत कर्मचारी ओवरटाइम करने से इन्कार कर सकता है। हर काम केवल अपने अनुबंध में लिखी शर्तों के अनुसार ही करेगा। 
नर्सिंग एण्ड मिडवाइफ़री काउंसिल (एन.एम.सी.) ने पुष्टि कर दी है कि नर्सों, दाइयों और नर्सिंग सहयोगियों को हड़ताल की कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है।
ब्रिटेन की सरकार ने जब रेलवे और बसों का निजीकरण किया तो वही नीति अपनाई जो भारत में राज करते हुए अपनाई थी – फूट डालो और राज करो। ब्रिटिश रेल को बहुत सी निजी कंपनियों में बांट दिया गया और ठीक उसी तर्ज़ पर बसों को भी। 
आज ब्रिटेन में रेल चलाने वाली कंपनियों के नाम कुछ इस प्रकार हैं – अरीवा, अवंती वेस्ट कोस्ट, सी-2-सी, कैलेडोनियन स्लीपर, चिलटर्न रेलवे, क्रॉस कंट्री, ईस्ट मिडलैण्ड्स रेलवे, एलिज़ाबेथ लाइन, यूरोस्टार, टेम्स लिंक रेलवे, ग्राण्ड सेन्ट्रल, ग्रेटर एंग्लिया, ग्रेट वेस्टर्न रेलवे, हीथ्रो एक्सप्रेस, हल ट्रेन्स, लंदन नॉर्थ इस्टर्न रेलवे, लूमो, नॉर्दर्न ट्रेन्स, स्कॉट रेल, साउथ ईस्टर्न, साउथ वेस्टर्न रेलवे, वेस्ट मिडलैण्ड ट्रेन्स। इनके अतिरिक्त कुछ छोटी छोटी और भी कंपनियां हैं। यानी कि पूरी ब्रिटिश रेल में कभी भी हड़ताल हो ही नहीं सकती क्योंकि हर कंपनी की अपनी मैनेजमेंट है और अपनी यूनियन। 
कुछ यही हालात बसों के भी हैं। लंदन में बस चलाने वाली कंपनियों के नाम हैं – अरीवा, मेट्रोनेट, गो-अहेड, एचसीटी ग्रुप, लंदन युनाइटिड, मेट्रो बस, स्टेज कोच आदी। यानी कि कभी भी पूरे लंदन की बस सेवा ठप्प नहीं की जा सकती क्योंकि सभी कंपनियां स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। अपनी-अपनी यूनियन से अपने-अपने कर्मचारियों के साथ बातचीत करती हैं। कभी भी तमाम रेलवे या तमाम बसों के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता। 

संपादकीय - ब्रिटेन में बढ़ती महंगाई और हड़तालों का दौर 11

मैं स्वयं भी रेलवे में 1999 से काम कर रहा हूं। यानी कि 23 साल पूरे हो चुके और 24वां चल रहा है। इस बीच ट्रेन ड्राइवर का काम भी किया और अब स्टेशन संभालता हूं। रेलवे की तमाम स्थितियों से अवगत हूं। एक बात याद रखने लायक है कि दुनिया की कोई भी मैनेजमेंट कभी भी कर्मचारियों के हित को सामने रख कर कोई पॉलिसी निर्णय नहीं लेती। उसके दिमाग़ में डायरेक्टर और निवेशक होते हैं। ख़मियाज़ा भुगतते हैं फ़्रंटलाइन कर्मचारी।
हमारी यूनियन का नाम है आर.एम.टी. (National Union of Rail, Maritime and Transport Workers)। हमने तमाम सवालों का जवाब अपने पोस्टर में दिया है। हमने कहा है कि जीवन यापन के ख़र्चे में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। हमारी मांग है कि जैसे-जैसे महंगाई बढ़ी है वैसे ही हमारी पगार में भी बढ़ोतरी हो। 
जबकि ट्रांस्पोर्ट फ़ॉर लंदन ने मार्च 2022 में हमारी कंपनी अरीवा को 9 प्रतिशत पैसा कर्मचारियों की पगार बढ़ाने के लिये दिया। मगर इस साल मार्च में हमारी मैनेजमेंट ने घोषित कर दिया कि 2022 में कोई वेतन वृद्धि नहीं की जाएगी।
हमारी मैनेजमेंट ने वादा किया कि वे निवेशकों को किसी प्रकार का डिविडेंड नहीं देंगे। मगर 2021 में हमारे निवेशकों को साठ लाख पाउंड डिविडेंड के तौर पर दिये गये। स्टेशनों पर काम करने वाले कर्मचारियों को ‘फ़्रंटलाइन स्टाफ़’ कहा जाता है क्योंकि यात्रियों के सीधे संपर्क में हम ही आते हैं। कोरोना के दौरान भी हम ही यात्रियों के साथ सीधे संपर्क में आए। हमारे बहुत से कर्मचारी कोरोनाग्रस्त भी हुए। बहुत से स्टेशनों पर काम करने वाले कर्मचारियों की मृत्यु भी हुई। मगर हमारी पगार बढ़ाने के लिये मैनेजमेंट ने केवल 4 प्रतिशत बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा और उसके साथ भी बहुत सी शर्तें लगा दीं। यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि अपने मैनेजरों की पगार दस प्रतिशत के हिसाब से बढ़ा दी। 
परिवहन मंत्री ग्रांट शैप्स ने शुक्रवार को स्काई न्यूज़ से बातचीत करते हुए कहा कि वह सेक्शन 188 के तहत वर्तमान हड़ताल को तोड़ने के लिये कुछ नये कदम उठा सकता है। उसकी सोच यह है कि ‘हायर एण्ड फ़ायर’ की नीति लागू कर दी जाए। 
मंत्री ने आगे धमकी देते हुए कहा है कि, “यदि रेलवे यूनियन ने हमारी बात नहीं मानी तो धारा 188 के तहत हम अपनी बात को ज़बरदस्ती भी मनवा सकते हैं।”

संपादकीय - ब्रिटेन में बढ़ती महंगाई और हड़तालों का दौर 12

इसीलिये हमें 19 अगस्त को हड़ताल करनी पड़ी। लंदन में हड़ताल का मतलब तोड़फोड़, आगज़नी या पथराव नहीं होता। हम महत्वपूर्ण स्थलों पर 6 से 10 कर्मचारी पिकेट लाइन बना कर खड़े हो जाते हैं और यह माना जाता है कि कर्मचारी पिकेट लाइन को लांघ कर काम पर नहीं जाएंगे। 
हमारे यहां भी ऐसे कर्मचारी हैं जो कि अपनी छुट्टी कैंसिल कर के अपने अफ़सरों को ख़ुश करने के लिये ख़ास तौर पर काम पर लौट आए। ऐसी हरकतें दिल को दुखाती हैं। मगर हम सब जानते हैं कि ऐसे लोग हर समाज में पाए जाते हैं। 
हड़ताल का मतलब होता है कि हमें अपनी बात अपनी मैनेजमेंट तक पहुंचानी है। कंपनी को नुक्सान पहुंचाना या देश की संपत्ति को जलाना हमारा उद्देश्य बिल्कुल नहीं होता। यात्री भी मुस्कुराते हुए आते हैं, पिकेट लाइन पर आकर अपना समर्थन जताते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। यही समय होता है जांचने का कि कौन आम आदमी का समर्थक है और कौन मैनेजमेंट का पिट्ठु। अगस्त का महीना हड़तालों से भरा होगा… सितम्बर में ब्रिटेन को नया प्रधानमंत्री मिलेगा। उम्मीद करता हूं कि आम आदमी का दर्द हमारे नये प्रधानमंत्री तक अवश्य पहुंचेगा। 
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

4 टिप्पणी

  1. The grave situation caused by sky- rocketing and unprecedented inflation in your UK in present times is worrisome indeed.
    Another unfortunate fact about your transport systems is that these are run under different managements and the strikes are limited to singular units.
    Regards and best wishes
    Deepak Sharma

  2. Time now (particularly in U.K.) is not difficult. It is just that we have enjoyed ourselves for far too long. Free food, free travel, free NHS… मौजा ही मौजा! Now it is payback time! That is all…

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