रमेश कुमार रिपु की कलम से - पत्रकारिता के पतन का कैनवस 3
लेखक – कृष्ण नागपाल
प्रकाशक – अमन प्रकाशन
कीमत – 195 रूपए
समीक्षक – रमेश कुमार रिपु
साहित्य में किसी भी विधा में लिखी गई सामग्री की ताकत और उसकी संभावनाओं का आकलन उसके लेखन से होती है। कृष्ण नागपाल की ‘देह के पुल पर खड़ी लड़की’ उपन्यास आज की पत्रकारिता के पतन का कैनवस है। अखबार वालों का गंभीर विवेचन किया गया है। लेखक की दृष्टि सामाजिक और वस्तुपरक है। यही वजह है कि पत्रकारिता के दम पर राजनीति करने वालों के यथार्थ को कहानी के जरिए व्यक्त किया गया है। एक तरीके से आज की पत्रकारिता और राजनीति का दस्तावेज है ‘देह के पुल पर खड़ी लड़की’। किताब में ऐसे कई अखबार के मालिक हैं, जिनके लिए पत्रकारिता के मूल्य इश्तिहार से ज्यादा कुछ नहीं है। जैसा कि ‘देश भक्त’ के स्वामी छगन छलिया कहतेेेे हैं,आज के युग में राजनीति और पत्रकारिता अगर एक हो जाएं तो कोई भी ताकत देश का कायाकल्प होने की राह में, बाधा नहीं बन सकती।  अब हर रीति और नीति बदलने का वक्त आ गया है।’’
सियासत और सहाफत (पत्रकारिता) की एक-एक परतों को संतरे की तरह छील दिया गया है। उपन्यास में उन चेहरों पर फोकस किया गया है,पत्रकारिता की आड़ में गलत काम करना जिनका एक सूत्रीय काम है। संतोष सन्यासी जैसे लोगों का राज्य सभा पहुंचना जाना हैरत होती है। दूसरी ओर नैतिक मूल्यों को जीने वाले किरदार भी हैं। आज पत्रकारिता और राजनीतिक पार्टियांँ बगैर शराब और शबाब के चलती नहीं। यह किताब इस सच्चाई को रेखांकित करती है कि, जब तक देह के पुल पर लड़की खड़ी रहेगी, सियासत और सहाफत वाले उसके शोषण करते रहेंगे। वहीं पत्रकारिता के मूल्यों पर चलने वाले ईमानदार पत्रकारों की हर जगह दुर्गती है। दरअसल बदलती अवधारणा के चलते राजनीति और अखबार में गठजोड़ की वजह से पत्रकारिता को रतौधी हो गई है।
पत्रकार सूरज प्रकाश के साथ बहुत जुल्म होेता है। ‘दैनिक तिरंगा’ के प्रधान संपादक लक्ष्मीचंद भिखारी नक्सलियों के हितैषी हैं। श्रम और श्रमिकों पर खूब लिखते हैं। लेकिन इसके उलट अपने अखबार के पत्रकारों का शोषण करते हैं। सूरज उनकी पत्रकारिता का विरोध करता है, तो उसे पिटवा कर कचरे में फेकवा देते हैं। अपने अखबार में उसकी तस्वीर सहित झूठी अनर्गल बातें लिखकर उसे बदनाम करते हैं। उनकी पत्नी रजनी को सूरज से घिन हो जाती है। घर बेचकर दूसरे के साथ भाग जाती है।
जैसा कि उपन्यास का स्वर ही देह है। इसलिए इसमें बार डाॅंसर रागिनी और काॅलगर्ल अग्नि के इर्द गिर्द घूमती कथा पत्रकारिता का नकाब लगाकर अपने आप को सच्ची खबरें देने का दावा करने वालों के काले कारनामें को उघारती है। बार डाॅंसर पर उपन्यास लिखने की बात पत्रकार और लेखक ज्ञानवर्धन,रागिनी से करता है। वह कहती है पहले हमारे जिस्म पर कुछ लिख लो फिर पन्नो पर लिखना। इसी को कहते हैं भोगा हुआ यथार्थ। ज्ञानवर्धन शब्दों का जाल फेककर रागिनी को प्रभावित करता है। रागिनी उससे प्रभावित होकर अपनी जिन्दगी के उस पन्ने को खोलती है,जिसमें वह मुहब्बत के नाम पर किस तरह छली गई। उसका दैहिक शोषण के साथ आर्थिक शोषण उसका प्रेमी करता है। उसी के पैसे से अय्याशी करने वाले प्रेमी की सच्चाई जानने पर उसके पैरों के तले की जमीन खिसक जाती है। हमारा वतन’ ने डाँस बार में पकड़ी गई लड़कियांे के साथ ‘देश भक्त’ अखबार के मालिक सन्यासी के बारे में खूब लिखा। सन्यासी ने ‘हमारा वतन‘ के संपादक नयन को देख लेने की धमकी दी।
‘अंगद का पैर’ में विज्ञापन का काम देखने से पहले अग्नि काॅल गर्ल थी। अपनी देह के दम पर विज्ञापन लाने वाली अग्नि गुप्त रोग का शिकार हो जाती है। अखबार मालिक उसके गुप्त रोग के जरिए अपने दुश्मनों को निपटाने में इस्तेमाल करता है। पूरी कहानी औरत की देह पर टिकी हुई है। एक और काॅल गर्ल रागिनी जो आगे चलकर बड़ी लेखिका बन जाती है। अग्नि की मौत के बाद उसकी बहन छोटी अपने कोठी में अपनी बहन के नाम पर स्कूल खोल देती है। जबकि वो सी.ए.है। ‘हमारा वतन’ के संपादक नयन को दूसरे अखबार का मालिक पिटवा देता है। नयन का अस्पताल में छोटी बड़ा ध्यान देती है। उसे उम्मीद है नयन ठीक होने पर उसका हो जाएगा।
दरअसल आज पत्रकारिता का ग्लैमर आम अदमी की जिन्दगी और उसकी संस्कृति को बदल रहा है। सूरज,अग्नि,छोटी और रागिनी जैसे लोगों के सामने जीवन मूल्यों के संकट,सामाजिक आर्थिक परिवेश के साथ बेहतर जीवन जीने की चाह को ‘देह के पुल पर खड़ी लड़की’ गहराई से हमारे सामने रखती है। आम आदमी के बदहाली से जुड़े सवालों को भी रखती है। यथार्थवादी लेखन को पसंद करने वाले पाठकों को यह किताब पसंद आएगी।

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