सामयिक व्यंग्य स्वयं को राजमार्ग पर चलने का दंभ पाल रहा है - प्रेम जनमेजय 5

हिंदी साहित्य के क्षेत्र में प्रेम जनमेजय का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। व्यंग्य विधा के संवर्द्धन एवं सृजन के क्षेत्र में प्रेम जनमेजय का विशिष्ट स्थान है। व्यंग्य को एक गंभीर कर्म तथा सुशिक्षित मस्तिष्क के प्रयोजन की विधा मानने वाले प्रेम जनमेजय ने हिंदी व्यंग्य को सही दिशा देने में सार्थक भूमिका निभाई है। अबतक उनकी दर्जन भर से अधिक व्यंग्य-कृतियों सहित नाटक, संस्मरण आदि विधाओं की व सम्पादित अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले डेढ़ दशक से प्रेम व्यंग्य विधा पर केन्द्रित चर्चित पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ का संपादन-प्रकाशन कर रहे हैं। आज साक्षात्कार श्रृंखला की पांचवी कड़ी में प्रस्तुत है प्रेम जनमेजय से युवा लेखक पीयूष द्विवेदी की बातचीत :

सवाल – अपनी अबतक की जीवन-यात्रा के विषय में बताइए। विशेषकर ये कि जीवन के किस दौर में साहित्य की तरफ गंभीर रुझान हुआ और कब व्यंग्य-लेखन की तरफ मुड़े?
प्रेम जनमेजय – यह प्रश्न मुझसे अनेक बार पूछा गया और अनेक बार ही जैसे सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं टरे – चन्द्र टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार, पै दृढ़ श्री हरिश्चन्द्र का टरै न सत्य विचार – वैसे ही मेरा सत्य विचार नहीं टरा कि मैं जन्मजात लेखक नहीं हूं। मेरा जन्म न तो किसी साहित्यिक परिवार में हुआ है, और न ही बचपन में, मेरे पड़ोस में कोई छोटा-बड़ा साहित्यकार रहता था। और रहता भी हो तो मुझे उससे कोई मतलब नहीं था, क्योंकि मुझे गिल्ली-डंडा, और बिल्लियों के बच्चों से खेलने से ही फुरसत नहीं मिलती थी। मेरे खानदान में भी लेखक नामक कोई जीव पैदा नहीं हुआ है। साहित्य की ओर मुड़ना एक बाई प्रोडेक्ट के रूप में था।
मेरा जन्म इलाहबाद के कमला नेहरू अस्पताल में 18 मार्च, 1949 को दोपहर ढाई बजे हुआ था। मेरा जन्म इलाहबाद में हुआ है, यह मात्र घटना है और इस घटना के आधार पर मैं अपनी श्रेष्ठता का दावा प्रस्तुत कर सकता हूं। हिंदी साहित्य के खाड़े-अखाड़े‘बाज’, उठापटकाउ और इसकी महत्वपूर्ण दिशा तय करने वाले श्रेष्ठी, दलित, वंचित सभी यह जानते हैं कि आज चाहें हिंदी साहित्य की राजधानी दिल्ली है, इससे पहले इलाहबाद थी। अगर आप साहित्यकार हैं और इलाहबाद से जुड़े हुए हैं, तो आपके साहित्यकार होने में कोई शक होने का मतलब ही नहीं होता है तथा दूसरों से दो-तीन इंच ऊंचे उठे होने का आरक्षण भी आपको मिल जाता है। अब किसने देखा और किसे पता है कि मैंने बचपन में क्या किया है?
मैं बड़े आराम से कह सकता हूं कि उन दिनों हमारे पिता हम भाईयों को सुबह समय घुमाने ले जाते और अक्सर दारागंज से होकर जाते थे। वे मुझे हर बार निराला का घर दिखाकर कहते थे कि तुम्हें ऐसा बनना है। और मुझे लगता है कि निराला की उस गली का कोई साहित्यिक कीड़ा मेरे मस्तिष्क में घुस गया और मैं साहित्यकार बन गया। निराला के साहित्य में व्यंग्य भी है, इसलिए हो सकता है कि वो कीड़ा व्यंग्य वाला हो। इसलिए कैलाश वाजपेयी जैसे अध्यापक से पढ़ने के बावजूद मैं निराला की गली के कीड़े के कारण व्यंग्यकार बन गया। मेरा एक चित्र महादेवी वर्मा के साथ भी है। वह भी तो इलाहाबाद की थीं, और फिर चित्र भी है, तो कहने में क्या हर्ज है कि जब मैंनें उन्हें अपनी व्यंग्य कविता सुनाई तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे लिए यही मार्ग श्रेष्ठ है।
वास्तव में, मेरे लेखन का आरंभ सायास नहीं, अनायास ही हुआ जैसे प्रथम दृष्टि में प्रेम अनायास होता है। जहां तक लेखन की दुनिया में आने का दिन और समय बताने जैसी जिज्ञासा है, मेरा जीवन पगडंडियों की तरह आड़ा-तिरछा बेतरतीब रहा है। ग्यारहवीं की परीक्षा देने के बाद मेर पास कुछ करने को न था। उन दिनों इंजीनियरिंग आदि की परीक्षाओं के लिए गर्मियों की छुट्टियों का बलिदान नहीं करना पड़ता था। मेरे अंदर का लेखक फिर जागा और मैंने एक प्रेम-कथा  लिखी– कल आज और कल। इसे मैंने गाजियाबाद से उन दिनों अपने शीघ्र प्रकाशन की घोषणा करने वाली पत्रिका ‘खिलते फूल’ में भेज दिया। से.रा. यात्री उसके परामर्शदाता थे। ‘कल आज और कल’ कहानी ने मेरे जीवन की दिशा बदली। 1966 में हायर सेकेंडरी के परीक्षा परिणाम आए। जासूसी उपन्यासों एवं लेखन के कीड़े ने अपना प्रभाव दिखाया। अंक इतने अच्छे नहीं थे कि इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिल सके। उन दिनो रामकृष्ण पुरम् के साथ लगती सरकारी कॉलोनी, मोतीबाग में, डिग्री कॉलेज के नाम से, जो बाद में हस्तिनापुर कॉलेज और आजकल मोतीलाल नेहरू कॉलेज के नाम से जाना जाता है, खुला था। वहां मैंने अपने प्रिय विषय मैथ्स ऑनर्स में प्रवेश ले लिया। उन्हीं दिनो मेरी कहानी, ‘कल आज और कल’, ‘खिलते फूल’ पत्रिका के प्रवेशांक में प्रकाशित होकर आई। मैं हिन्दी के ‘किसी’ अध्यापक को ढूंढ रहा था, तो किसी ने डॉ. महेन्द्र कुमार की ओर संकेत करते हुए कहा कि वे हिन्दी के अध्यापक हैं और हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट भी।
मैंने उनसे कहा– सर! देखिए ये मेरी कहानी छपी है।’
उन्होंने मेरी ओर ध्यान से देखा और कहा- तुमने क्या अभी हिंदी ऑनर्स में प्रवेश लिया है। इससे पहले तो तुम्हें क्लास में कभी देखा नहीं।
मैंने कहा – सर! मैं मैथ्स ऑनर्स का स्टूडेंट हूं।
उन्होंने अपने हाथ में ली पत्रिका को एक बार और देखा और कहा – हिंदी में कहानी लिखते हो। तुम्हारी हिंदी इतनी अच्छी है, तुम हिंदी ऑनर्स क्यों नहीं लेते?’
बहुत कम लोग हिंदी ऑनर्स अपनी रुचि से लेते थे। इस विषय को या तो लड़कियां लेती थीं या फिर वे जिनके अंक कम आते थे और उन्हें किसी अन्य ऑनर्स में प्रवेश नहीं मिलता था। डॉ. महेंद्र कुमार हिंदी ऑनर्स का पहला बैच बना रहे थे और एक अध्यक्ष के रूप में एक शिकारी की तरह अच्छे विद्यार्थियों को हिंदी ऑनर्स में प्रविष्ट कराने के लिए बाड़ा तैयार कर रहे थे, शिकार कर रहे थे।
मैंने  कहा – सर! मैंने तीन साल तक हिन्दी बिलकुल नहीं पढ़ी है।’
– तो क्या हुआ, मैंने भी बी.एस.सी. के बाद हिन्दी में एम.ए, किया है।’  उसी समय हाथ में रजिस्टर पकड़े नरेन्द्र कोहली वहां आए।  उन्होंने उनसे कहा, ‘देखो इस लड़के की कितनी अच्छी कहानी छपी है। साईंस स्टूडेंट होकर इसने कहानी लिखी है। मैथ्स ऑनर्स में है। मैं इसे कह रहा हूं कि तुम्हारी हिंदी इतनी अच्छी है, हिंदी ऑनर्स में एडमिशन ले लो। पर कहता है कि मैने हायर सेकेंडरी में हिंदी नहीं पढ़ी है। इसे समझाओ।’’ फिर मेरी ओर घूमकर डॉ. महेंद्र कुमार बोले — ये नरेंद्र है, इसने भी इंटर तक विज्ञान पढ़ा है। बाद में हिंदी में ऑनर्स और एम ए फर्स्ट क्लास में किया है। लेक्चरर बन गया है। कहानियां लिख रहा हैं। तुम इनसे बात करो।’’
नरेंद्र कोहली ने मेरे मन में हिंदी के प्रति विश्वास भरा। एक तरह से मेरा ब्रेन वाश हो चुका था। मैं मैथ्स ऑनर्स से हिंदी ऑनर्स का विद्यार्थी बन गया।
मैंने गंभीरता के साथ साहित्य अध्ययन एवं लेखन दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी आनर्स पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के बाद किया। इसे मैं अपना सौभाग्य मानूंगा कि साहित्य पढ़ाने वाले मेरे अनेक साहित्य-विरक्त अध्यापकों के अतिरिक्त नरेंद्र कोहली और कैलाश वाजपेयी जैसे साहित्यकार प्राध्यापकों के रूप में मिले। ये दोनों लेखकीय दंभ के शिकार नहीं थे, अतः मन से सहायता करने को तैयार थे। समझ लें कि सत्रह-अठारह वर्ष की आयु में साहित्य अध्ययन और लेखन की अल्प समझ पैदा हुई। अब एक ओर कैलाश वाजपेयी जैसे नई कविता के कवि और दूसरी ओर कथाकार व व्यंग्यकार नरेंद्र कोहली के साथ ने मुझे व्यंग्य की ओर क्यों और कैसे मोड़ा, इसे सरलीकृत रूप में नहीं कहा जा सकता है। लगता है, यहां आपकी जमीन काम करती है। या कहें आपका स्वभाव काम करता है। आप सार-सार गहि लेते हैं।
वैसे तो प्रत्येक रचनाकार आरंभिक अवस्था में कवि ही होता है। प्रेमप्रकाश निर्मल के नाम से आरंभ में मेरी कुछ कविताएं प्रकाशित हुईं फिर शताब्दी, खिलते फूल, कहानीकार में कुछ कहानियां भी छपीं। प्रेम जनमेजय के नाम से मेरे व्यंग्य पहले ‘माधुरी’ में और फिर ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित होने आरंभ हुए।
विधा के चुनाव में अनेक फैक्टर काम करते हैं- रचनाकार का व्यक्तित्व, उसका परिवेश, जीवन दृष्टि, रचनात्मक पसंद, लेखकीय शैली आदि। मेरे माता-पिता ने हम तीनों भाईयों को  आरम्भ से अनुचित को न सहने, सत्य पर दृढ़ रहने, सात्विक क्रोध को अभिव्यक्त करने तथा असीम विषम परिस्थितियों में भी किसी के सामने हाथ न पसारने के जो संस्कार दिये और संयोग से अपने लेखन के शैशव में वरिष्ठ रचनाकारों से जो साहित्यिक संस्कार मिले, हो सकता है उन्हीं कारणों से मेरा व्यंग्यकार व्यक्तित्व बना हो। उन दिनों हिंदी साहित्य में धर्मयुगीन और साप्ताहिकी काल चल रहा था। व्यंग्य की ओर निरंतर बढ़ती रुचि ने उस समय के व्यंग्यकारों के लेखन की ओर आकार्षित किया। इधर मैं साहित्य की किताबों में कबीर को पढ़ रहा था, व्यंग्य के संस्कार ग्रहण कर रहा था और उधर पत्रिकाओं में परसाई के व्यंग्य लेखन से रु-ब-रु हो रहा था। परसाई को पढ़ता और वैसा लिखने को प्रेरित होता। ‘धर्मयुग’ का बैठे ठाले और साप्ताहिक हिंदुस्तान का ‘ताल बेताल’ स्तंभ पहली पसंद बन गये । परसाई, जोशी और त्यागी की तिकड़ी का हास्य-व्यंग्य लेखन अपने रंग में रंगने लगा। उन दिनों टाईम्स ग्रुप की फिल्मी पत्रिका ‘माधुरी’, जिसके संपादक अरविंद कुमार थे, में मेरे व्यंग्य यदा-कदा प्रकाशित होने लगे। उनसे प्रसिद्धि मिली। धर्मयुग में प्रकाशित ‘समीक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन’ व्यंग्य को मैं अपने व्यंग्य लेखन का शुरुआती व्यंग्य कह सकता हूँ।
मेरा पहला संग्रह, ‘राजधानी में गंवार’ 1978 में गुरु कृपा से, पराग प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था। श्रीकृष्ण ने एक नए लेखक के पहले संकलन को बिना कुछ लिए दिए प्रकाशित किया, इसके पीछे गुरु नरेंद्र कोहली का बल था। उन दिनों के चर्चित युवा कवि एवं चित्रकार अवधेश ने इसका कवर बनाया था। इस संकलन ने मुझे व्यंग्य की मुख्यधरा में ला खड़ा किया। दिविक रमेश ने दिशाबोध के तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण गोष्ठी आयोजित की थी। इस गोष्ठी की अध्यक्षता रवींद्रनाथ त्यागी ने की थी। गोष्ठी में सुधीश पचैरी, शेरजंग गर्ग और नरेन्द्र कोहली ने विस्तृत आलेख पढ़े थे। हरीश नवल, डॉ. हरदयाल, डॉ. विनय, अवध नारायण मुद्गल, सुरेश कांत, रमेश बत्तरा नरेन्द्र निर्मोंही आदि ने अपने विचार रखे थे। अध्यक्ष रवींद्रनाथ त्यागी ने विस्तृत टिप्पणी की, पर उनकी इस बात ने मुझे बल दिया कि यह पुस्तक शेल्फ में रखने योग्य है। इसी पुस्तक ने मुझे व्यंग्य के टेढ़े मार्ग पर डाल दिया।

सामयिक व्यंग्य स्वयं को राजमार्ग पर चलने का दंभ पाल रहा है - प्रेम जनमेजय 6

सवाल – व्यंग्य की वर्तमान दशा और दिशा को आप कैसे देखते हैं?
प्रेम जनमेजय – र्जाज बर्नाड शा ने कहा है- “बिना किसी बदलाव के प्रगति असंभव है, और जो लोग अपना दिमाग नहीं बदल सकते, वे कुछ भी नहीं बदल सकते।’’ हर समय का परिदृश्य बदलता है। ऐसे अतीत जीवियों की कमी नहीं है जो आज भी सोने की चिड़िया टाईप अपनी अतीतकालीन मानसिकता के साथ आज को जी रहे हैं। कुछ के शरीर कपड़ो की तरह बदलते रहते हैं, पर उनकी अजर अमर वैचारिक आत्मा वही रहती है। मेरी पाठशाला रहे मेरे हर अग्रज रचनाकार ने मुझे कूपमंडूक होने से बचाया है। मुझे निरंतर सावधान किया है कि न मेरा समय मेरे पूर्ववर्तियों का था और न तुम्हारा समय मेरे समय जैसा है।
बदलते परिदृश्य में व्यक्ति को अपनी भूमिका तय करनी होती है। हमारी अग्रज पीढ़ी ने अपने समय के दबाव में, तत्कालीन चुनौतियों से मुठभेड़ करते हुए जो सृजन किया, हो सकता है कि आज के समय में वो चुनौती न हो। एक घटना पूरा परिदृश्य बदलने की क्षमता रखती है। मोबाईल, इंटरनेट, ई मेल आदि ने हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाया है। परिवर्तन हमारे रहन-सहन में आया है। पर कोई बड़ा परिवर्तन रेखांकित नहीं किया जा सकता। पर यदि यही आधुनिक संचार माध्यम की घटना त्रेता युग में घटी होती तो क्या राम वनावास का परिदृश्य वही होता जो रामकथा में वर्णित है? व्हाट्सएप या फेसबुकीय दुनिया के दखल से हमारी पौराणिक कथाएं वहीं रहती। हम कहते हैं कि प्राचीन भारत में विज्ञान प्रगति पर था। कितना भी प्रगति पर रहा हो, संजय ने दूरदर्शन जैसे माध्यम से धृतराष्ट्र को महाभारत का आंखों देखा हाल सुनाया हो, पर इस माध्यम के कारण उस समय का बदला परिदृश्य कही दृष्टिगत नहीं होता है। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह हिंदी हास्य-व्यंग्य का भी परिदृश्य बदला है। भारतेंदुकालीन परिदृश्य, परसाईकालीन नहीं था और परसाईकालीन आज नहीं है। परसाई के अपने समय भी हास्य व्यंग्य का परिदृश्य बदलता रहा है। अपितु यह कहूं कि परसाई ने अपने समय में हास्य व्यंग्य के परिदृश्य को बदलने के प्रयत्न किए हैं।
आज परसाई और जोशी के स्तंभ लेखकीय व्यक्तित्व की कार्बन कॉपी बनने की दौड़ में व्यंग्य एक अराजक स्थिति में आ गया है । व्यंग्य की बढ़ती लोकप्रियता ने इसे बहुत हानि पहुंचाई, विशेषकर अखबारों में प्रकाशित होने वाले स्तम्भों नें नई पीढ़ी को बहुत दिगभ्रमित किया है। आज सात आठ सौ शब्दों की सीमा में लिखी जानी वाली अखबारी टिप्पणियों को ही व्यंग्य रचना मानने का आग्रह किया जाता है।  क्षेत्रीय अखबारों में स्तम्भ लिखने वाले नए रचनाकार अपनी कमीज का कालर उठाए, व्यंग्यकार का तमगा लगाए घूमते हैं तथा आग्रह करतें हैं कि उनकी अखबारी टिप्पणियों के कारण उन्हें व्यंग्यकारों की जमात में शामिल कर ही लिया जाए। स्वयं को व्यंग्यकारों की जमात में जल्द से जल्द शामिल करवाने की लालसा तथा एक आध अखबारी कॉलम हथियाने की जुगाड़ दिशाहीन व्यंग्य को जन्म दे रही है।
हिंदी साहित्य में, अपनी उपस्थिति के लिए व्यंग्य-पथ के निर्माण का कार्य पर्याप्त श्रमपूर्वक किया गया है और किया जा रहा है। व्यंग्य को दोधारी तलवार पर  चलने जैसा कठिन कहा गया है। व्यंग्य-पथ के निर्माण में भी दोधारी तलवार पर चलने की यह कठिनाई निरंतर चुनौतियां उपस्थित करती रही है। अनेक उबड़-खाबड़ रास्तों पर अपनी-अपनी कुदालियों से पगडंडियां तैयार की गई हैं। अभी भी मार्ग में अनेक कांटे हैं तथा सांप बिच्छुओं जैसे जीवों की चुनौतियां हैं। हिंदी व्यंग्य को पाठकों का अपार स्नेह मिल रहा है। इस अपार स्नेह के चलते सामयिक व्यंग्य स्वयं को राजमार्ग पर चलने का दंभ पालने लगा है। अंडे से निकलने वाला चूजा विलाप कर रहा है कि मेरा कोई मूल्यांकन नहीं कर रहा है। चूजों ने गिरोह बना लिया है और एक दूसरे का आभासित मूल्यांकन कर अपनी महानता का डंका पीट रहे हैं। एक दंभकाल निर्मित हो रहा है। व्यंग्य प्रवृत्ति पर होना चाहिए, व्यक्ति पर व्यंग्य उसे सीमित और तात्कालिक कर देता है। अधिकांश व्यंग्य के प्रति यही दृष्टिकोण है। यही नहीं व्यंग्य आलोचना का भी यही दृष्टिकोण विकसित हो रहा है।
सामयिक हिंदी व्यंग्य के समक्ष दो बड़ी चुनौतियां हैं- उसे सीमित होने से बचाना और उसके गांभीर्य की रक्षा करना। पाठकों से मिले स्नेह के कारण स्वयं को विशिष्ट मानने वाले व्यंग्यकार न केवल आत्महत्या के मार्ग पर हैं अपितु सार्थक एवं सामाजिक सरोकारों से युक्त व्यंग्य के हत्यारे हैं। व्यंग्यकार साहित्यकार ही होता है और एक साहित्यकार के नाते उसके भी वही सामाजिक सरोकार हैं जो मशाल की तरह जलने और मार्ग को प्रकाशित करने वाले एक रचनाकार के होने चाहिएं। व्यंग्य के कुओं के स्थान पर कम से कम व्यंग्य की बावड़ियों का निर्माण किया जाए। व्यंग्य की स्वीकार्यता तभी बड़ेगी जब हम उसे विस्तृत हिंदी साहित्य का हिस्सा समझेंगे। स्वीकार्यता के लिए यह भी आवश्यक है कि हम व्यंग्य के हथियार को भोथरा न करें। बिकने की चाह में उसे लकड़ी की तलवार न बनाएं। वैसे तो सावधानी की आवश्यक्ता हर विधा के लेखन में रहती है, पर व्यंग्य क्योंकि हथियार है, अतः इसके प्रयोग में अधिक सावधानी की आवश्यक्ता है। यह ज्ञान बहुत आवश्यक है कि इस हथियार का प्रयोग हम सैनिक की तरह कर रहे हैं या हत्यारे की तरह। किसपर पर व्यंग्य करना है और किसपर नहीं, इसका विवेक भी आवश्यक है। हिंदी व्यंग्य को शूद्र से ब्राह्मण करने वालों के संघर्ष को व्यर्थ न किया जाए। हिंदी व्यंग्य चाहे ब्राह्मण हुआ हो या क्षत्रिय, उसे जातिवाद से बचाना बहुत आवश्यक है। व्यंग्य एक जाति नहीं है, वह बहुत बड़े साहित्यिक समाज का एक हिस्सा है। बहुत आवश्यक है जानना – व्यंग्य किस दिशा में जा रहा है? व्यंग्य पर आलोचकों की दृष्टि क्या है? व्यंग्य कैसा होना चाहिए? व्यंग्य में करूणा क्यों आवश्यक है? कौन-कौन से विदेशी रचनाकार हैं जिनको पढ़ना चाहिए? लेखन के साथ-साथ अध्ययनशीलता परम् आवश्यक है। व्यंग्य सुशिक्षित मस्तिष्क की विधा है। व्यंग्य के अर्थ का पकड़ने के लिए व्यंग्योचित विवेकपूर्ण समझ की आवश्यकता है।
आज सबसे बड़ी सावधानी यह है कि व्यंग्यकार पहले स्वयं को ‘केवल और केवल’ व्यंग्यकार न समझकार साहित्यकार समझे और माने कि उसके भी वही समाजिक सरोकार हैं जो एक साहित्यकार के होते हैं। तभी वह ‘मानव मूल्य और साहित्य’ जैसे गंभीर विषय की गहराई समझ पाएगा और इस विमर्श में हिस्सेदारी निभा पाएगा। मेरे विचार से न तो कोई विधा महत्वपूर्ण होती है और न ही कोई माध्यम, महत्वपूर्ण होती है विषयवस्तु। पहले आता है कि आप कहना क्या चाहते हैं और बाद में आता है कि आप उसे कहते कैसे हैं। चाहे वो कवि हो, कहानीकार हो, नाटककार या व्यंग्यकार- सभी हैं तो मूलतः साहित्यकार। व्यंग्य-लेखन साहित्य लेखन से अलग की वस्तु नहीं है। क्या व्यंग्यकार के सामाजिक सरोकार वही नहीं हैं जो एक कथाकार, कवि या नाटककार के हैं? हां , व्यंग्य लेखन अन्य विधाओं से भिन्न प्रक्रिया की मांग करता है। व्यंग्य आपको बेचैन अधिक करता है। अधिकांशतः सामयिक घटनाएं प्रेरक बिंदु होने के कारण व्यंग्य रचना अन्य विधाओं की अपेक्षा अपने जन्म के लिए अधिक जल्दी में होती है।
सवाल – आजकल के अधिकांश व्यंग्यों में तात्कालिकता और हास्य की प्रधानता दिखती है। ‘व्यंग्य’ और ‘हास्य’ के बीच की लकीर लगभग मिट चुकी है। आपकी इस विषय में क्या राय है?
प्रेम जनमेजय – मेरी आलोचना हास्यद्रोही के रूप में होती है। रचना में हास्य और व्यंग्य को लेकर अलग-अलग सोच के स्कूल हैं।  कुछ व्यंग्य के नाम पर हास्य परासेते हैं और अधिकांशतः फूहड़ हास्य। कुछ हाथ में तराजू थामे हैं जो इस बहस में पड़े हैं कि रचना में कितने ग्राम हास्य होना चाहिए या कितने ग्राम व्यंग्य। इनका मानना है कि रचना में हास्य भी उतना ही आवश्यक है जितना व्यंग्य। ये कुनैन की गोली को लड्डू में डालकर खिलाने के पक्षधर हैं। मेरा मानना है कि व्यंग्य को हास्य की बैसाखी की आवश्यक्ता नहीं है। कुछ का मानना है कि हंसी बिक रही है, मैं साहित्य का उद्देश्य बिकाऊ होना नहीं मानता हूं। मेरा हास्य से कोई विरोध नहीं है और मेरा मानना है कि व्यंग्य की अपेक्षा श्रेष्ठ हास्य लिखना अधिक कठिन है। पर जिस तरह हमारे जीवन में निरंतर विसंगतियों का ‘विकास’ हो रहा है, ऐसे में साहित्य के माध्यम से हास्य परोसना अपने साहित्यिक दायित्व से उदासीन होना होगा। हास्य के नाम पर जिस तरह हास्यास्पद रचनाओं का उत्पादन हो रहा है, उस माहौल में व्यंग्य को  हास्य से जितना दूर रखा जाए अच्छा है। हास्य और व्यंग्य दोनों का आधार विसंगति है, ऐसे में संभव है कि किसी रचना में विसंगति का चित्रण करते समय दोनों के दर्शन हो जाएं।
हास्य और व्यंग्य में सबसे बड़ा अंतर यह है कि हास्य आदिमानव से जुड़ा है। आदिमानव हंसता और रोता था, लेकिन व्यंग्य तब सामने आया, जब मनुष्य की बौद्धिक चेतना का विकास हुआ। व्यंग्य समझने के लिए आधारभूमि जरूरी होती है, लेकिन सब्जी बेचनेवाले में भी वह हो सकती है। लोकसाहित्य को ही देख लीजिए, वहां व्यंग्य की भरमार है। उसके सर्जकों में किसी ने भी व्यंग्य पढ़कर व्यंग्य नहीं लिखे। कबीर ने मसि कागद नहीं छुआ, पर उनमें व्यंग्य की प्रखर चेतना विद्यमान थी। व्यंग्य केवल शहरी लोगों के लिए नहीं है, यह आम जनता की जरूरत है, लेकिन यह एक सायास अभिव्यक्ति है। हास्य एक सहज-स्वाभाविक मनोभाव है, जबकि व्यंग्य बौद्धिक क्रिया। हास्य में निश्छलता, मृदुता और सहजता अपेक्षित है, जबकि व्यंग्य अपने स्वभाव में ही आक्रामक, सायास एवं बौद्धिक  है।
मैं व्यंग्य के साथ हास्य के अनावश्यक प्रयोग का विरोधी हूं। व्यंग्य में हंसी भी यदि आती है तो व्यंग्यात्मक। कोई आपके पेट पर चक्कू रखे तो आपको हंसी नहीं आती है, हां आपकी चमड़ी मोटी हो, पेट थुलथुल हो तो चक्कू भी आपको गुदगुदाता है। यह कहना मूर्खतापूर्ण होगा कि बिना हास्य के व्यंग्य सशक्त नहीं हो सकता और पठनीय नहीं हो सकता। मेरा मानना तो यह है कि श्रेष्ठ व्यंग्य हास्यविहीन ही होता है। शुद्ध व्यंग्य लेखन प्रचुर मात्रा में लिखा गया है।
सवाल –  हिंदी के दो महान व्यंग्यकारों शरद जोशी और हरिशंकर परसाई के अलग-अलग विचारधाराओं के प्रति झुकाव की बात अक्सर होती है। इस बिंदु पर इन दोनों व्यंग्यकारों को आप कैसे देखते हैं?
प्रेम जनमेजय – जहां एक ओर मैं परसाई के लेखन, उनकी वैचारिक दृष्टि और हिंदी व्यंग्य के प्रति उनके आंरभिक ‘प्यार’ से प्रभावित रहा, वहीं परसाई के प्रति एक मोहभंग का शिकार भी हुआ। मैंने अपने आराध्य को हिंदी व्यंग्य की एक अलग विधागत मूर्ति बनाते ही नहीं, उसे सही तरह से तराशते भी देखा। परंतु उन्हीं परसाई को, उस मूर्ति को, एक विचारधारा की प्रतिबद्धता के कारण तोड़ते भी देखा। मुझे नहीं लगा कि इस मूर्ति को तोड़ने की आवश्यकता है। व्यंग्य की वकालत करने वाला ही व्यंग्य को कटघरे में खड़ा कर रहा है। न्याय व्यवस्था से जैसे विश्वास उठ गया। रचनाकार के रूप में परसाई मेरे आदर्श हैं, मेरे आराध्य हैं, परंतु उसके स्वरूप के व्याख्याकार के रूप में मैं उनके विरुद्ध खड़ा हुआ हूं। मैं व्यंग्य के संबंध में उनकी ‘प्रगतिशील’ मान्यताओं से सहमत नहीं हो पाता हूं।
हरिशंकर परसाई प्रगतिशील चेतना के नैसर्गिक रचनाकार हैं। वे किसी के प्रभाव या लालच में ‘प्रगतिशील विचारधारा संपन्न’ नहीं हुए। प्रारंभ से ही उनका लेखन प्रगतिशील सोच, चिंतन और चेतना से युक्त रहा है। किसी व्यक्ति के अनुकरण और प्रभाव में न तो वे प्रगतिशील विचारधारा से ‘संपन्न’ हुए और न ही उन्होंने किसी के अनुकरण और प्रभाव में ‘तय’ करके व्यंग्य लेखन किया। यह उनके सहज-स्वाभाविक नैसर्गिक चिंतनशील व्यक्तित्व एवं उनके जीवन में घटित संघर्षशील दुर्घटनाओं का प्रतिफल है।
यदि किसी लेखक के गर्दिश के दिनों का सही अनुभव करने की तीव्र इच्छा साहित्य के पाठकों में हो तो वह परसाई के जीवन से बहुत कुछ जान सकता है। संघर्षशील एवं अभावग्रस्त जीवन ही रचनाकार में आक्रोश का संचार करता है तथा सत्य आधारित विरोध के लिए प्रेरित करता है। ऐसे रचनाकार के विचारतंतु विसंगतियों को लक्षित कर आक्रामक हो जाते हैं। उसकी दृष्टि परिवेशगत विसंगतियों के निरंतर उद्घाटन की रहती है। उसके हाथ में मुराड़ा रहता है जिसके द्वारा वह अपनी सुख-समृद्धि की सोच को जला चुका होता है और आपको भी प्रेरित करता है कि आप उस सोच को जला दें तथा प्राथमिकता की दृष्टि से मानव समाज की बेहतरी को प्राथमिकता दें। प्रेमचंद की तरह अभावों में जीने वाले परसाई एवं कबीर को अपना आदर्श मानने वाले परसाई के लेखकीय व्यक्तित्व में यदि व्यंग्य-चेतना ने प्रवेश किया तो इसमें आश्चर्य कैसा? सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध लेखकीय आक्रोश का मूल कारण परसाई का संघर्षशील जीवन एवं व्यक्तित्व रहा है।
शरद जोशी इस अर्थ में मेरे नायक हैं कि उन्होंने अनेक विरोधों को झेला, पर टूटे नहीं अपितु उसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया और एकला चलो की शैली में उनसे संघर्ष किया। उन्होंने अपने ‘स्थापित’ भोपाल का त्याग किया एवं एक विस्थापित के रूप में मुंबई की सभी चुनौतियों से निपटे। यह उनकी शरदीय ऊष्मा की ताकत है। उनकी यही ऊष्मा लोगों के दृष्टि में उन्हें दंभी बनाती है। उनकी यह ऊष्मा उन्हें स्पष्टवादी बनाती है। उनकी यही ऊष्मा कर्म एवं फल, दोनों को तराजू में बराबर तोलती है, संत बनने का ढोंग नहीं रचती है। अपनी इसी ऊष्मा के कारण वे बहुत कम लोगों के आत्मीय हो पाए। मेरी जैसी आत्मीयता अपने व्यंग्य साहित्य के अग्रजों- परसाई, त्यागी, शुक्ल, नरेंद्र कोहली अथवा गोपाल चतुर्वेदी से रही, वैसी शरद जोशी के साथ नहीं रह पाई। ऐसा भी नहीं रहा कि शरद जी से मिलने पर मैंने स्वयं को उपेक्षित अनुभव किया। जैसे मैंने अपने अग्रज व्यंग्यकारों के व्यवहार एवं साहित्य से स्वयं को शिक्षित किया है, वैसा ही शरद साहित्य एवं व्यक्तित्व से स्वयं को शिक्षित किया है।
हमारे यहां वाचिक परंपरा बहुत पुरानी है। मंच पर श्रोताओं के समक्ष काव्य पाठ की परंपरा तो बहुत ही पुरानी है और इसमें गुणवत्ता की दृष्टि से उतार चढ़ाव भी आते रहे हैं। मंच पर गद्य व्यंग्य पाठ के महत्व को स्थापित करने में शरद जोशी का महत्वपूर्ण योगदान है। मंच पर गद्य व्यंग्य पाठ के जो मानदण्ड शरद जोशी ने स्थापित किए वो आज एक चुनौती के रूप में हमारे समक्ष विद्यमान हैं और इस चुनौती को सही उत्तर अभी तक नहीं मिला है। मंच पर जिस गरिमा और संप्रेषणीयता के साथ शरद जोशी अपनी रचना का पाठ करते थे, वह एक आदर्श है। उनके समय के अन्य श्रेष्ठ रचनाकार जहां इस प्रयोग में असफल रहे, वहीं शरद जोशी निरंतर सपफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए। चुटकुले रहित व्यंग्य रचना को मंच पर सफलतापूर्वक पढ़कर शरद जोशी ने सार्थक एवं गंभीर व्यंग्य के पाठकों को रचनात्मक सुकून दिया। व्यंग्य को सार्थक लोकप्रियता प्रदान करने में शरद जी जैसा योगदान और किसी व्यंग्यकार का नही है।
वैसे तो शरद जोशी होने के अनेक अर्थ  हैं, पर सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यह है कि वे जीवन भर अनर्थ के विरुद्ध लड़ते रहे।  गलत के विरुद्ध लड़ने के लिए उनके हथियार अपने थे और इन हथियारों के प्रयोग के लिए उन्हें किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं थी और न ही इस बात की चिंता थी कि उनका आका इस बात पर उनकी पीठ थपथपाएगा कि नहीं क्योंकि उनका कोई आका था ही नहीं। और यदि कोई आका था भी तो वो उनका पाठक वर्ग था, जिसने उनकी सदा ही पीठ थपथपाई। यही कारण है कि शरद जोशी ने अपने समय के यथार्थ का यथार्थ के धरातल पर ही निरीक्षण-परीक्षण किया है।
सवाल –  यूँ तो इन दिनों व्यंग्य उपन्यास बहुत कम लिखे जा रहे, लेकिन जो लिखे जा रहे, उनमें भी अधिकांश ‘राग दरबारी’ होने की कोशिश नजर आते हैं। आखिर क्या कारण है कि दशकों गुजर जाने के बाद भी हम ‘राग दरबारी’ से आगे नहीं बढ़ पा रहे?
प्रेम जनमेजय – श्रीलाल शुक्ल के साथ एक बातचीत में मैं, गोपाल चतुर्वेदी, शेरजंग गर्ग साथ थे। ये बातचीत बाद में ‘व्यंग्य यात्रा’ के श्रीलाल शुक्ल विशेषांक में भी प्रकाशित हुई। इस बातचीत में गोपाल चतुर्वेदी ने कहा – राग दरबारी के बाद वैसा क्लासिक फिर नहीं लिखा गया।
इस पर मैंने कहा – कोई भी क्लासिक दोहराया नहीं जा सकता। हां राग दरबारी के बाद व्यंग्य उपन्यास लिखे गए, पर वे उंचाई न छू पाए।
1969 में ‘राग दरबारी’ के लिए श्रीलाल शुक्ल जी को साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत करने की घोषणा, हिंदी व्यंग्य की स्वीकार्यता के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी। हिंदी व्यंग्य के ‘हर’ शुभचिंतक को लगा कि जैसे यह पुरस्कार उसे मिला है और व्यंग्य का सीना छत्तीस इंची हो गया था। संसद में पेश किए ध्यानाकषर्ण प्रस्ताव की तरह इसने भी आलोचकों का ध्यानाकर्षित किया। कुछ आलोचकों के लिए साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कार आई एस आई का ठप्पा होते हैं और झकमार कर उन्हें किंतु-परंतु के साथ अपनी मान्यता बदलनी पड़ती है। यही कालजयी कृति की ताकत होती है। यह वही ‘व्यंग्य’ उपन्यास है, जिसे महज चुटकुलेबाजी और नायकविहीन रचना कहकर ‘अलंकृत’ किया गया था। ‘राग दरबारी’ के 2007 के संस्करण में श्रीलाल जी ने प्रस्तावना में लिखा है- ‘राग दरबारी’ की प्रासंगिकता पर साक्षात्कारों में मुझसे बार-बार पूछा गया है। यह सही है कि गांवों की राजनीति का जो स्वरूप यहां चित्रित हुआ है, वह आज के राष्ट्रव्यापी और मुख्यतः मध्यम और उच्च वर्गों के भ्रष्टाचार और तिकड़म को देखते हुए बहुत अदना जान पड़ता है और लगता है कि लेखक अपनी शक्ति कुछ गंवारों के उपर जाया कर रहा है। पर जैसे-जैसे उच्चस्तरीय वर्ग में गबन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़ें मजबूत करता जाता है, वैसे-वैसे आज से चालीस वर्ष पहले का यह उपन्यास और ज्यादा प्रासंगिक होता जा रहा है।’ यह वही रचना है जिसे प्रख्यात आलोचक डॉ. नित्यांनद तिवारी ने ‘घटनाओं का मात्र जंजाल’ कहा था।  पर 2011 में ‘व्यंग्य यात्रा’ के श्रीलाल शुक्ल विशेषांक के लिए मैंने उनसे ‘राग दरबारी’ के पुर्नपाठ के अंतर्गत लिखने का आग्रह किया तो उन्होंने लिखा कि प्रेम जी आपके उकसाने से मैंने ‘राग दरबारी’ के बारे में यह बात सोची, वरना तो मैंने छोड़ ही दिया था’ तथा अपने परिवर्तित दृष्टिकोण को स्वीकार करते हुए उन्होंने लिखा– लगभग तीस वर्ष पहले मैंने ‘राग दरबारी’ का एक विश्लेषण किया था। मेरे विश्लेषण का तौर-तरीका यथार्थवादी ढांचे के भीतर था। उसमें भाषा और वास्तविकता के बीच संबंध होता है। व्यंग्य वास्तविकता के विद्रूप को उभारने वाली एक शैलीगत विशेषता है। तब मैंने पाया था कि ‘व्यंग्य’ का अतिरंजित उपयोग इस उपन्यास को वास्तविकता से अलग एक स्वाद-रुचि देता है। लेकिन अब मैं ‘राग दरबारी’ के साक्ष्य पर ही कह सकता हूं कि ये जो व्यंग्य है, वह विद्रूप से अधिक ‘रियलिटी’ और ‘वर्चुअल रियलिटी’ का फर्क सामने ले आता है।… व्यंग्य में अतिरंजनाएं तो होती ही हैं, पर ‘राग दरबारी’ की जो भाषिक अतिरंजनाएं हैं, वे एक कहानी कहती हैं और उसमें न जाने कितनी असंबद्ध चीजें किसी कनैक्शन से जुड़ी हुई हैं।’’
‘राग दरबारी के पुर्नपाठ’ कें अंतर्गत प्रख्यात आलोचिका डॉ. निर्मला जैन ने लिखा था-‘राग दरबारी’ के प्रकाशन का इकतालीसवां वर्ष चल रहा है। प्रकाशन के अगले ही वर्ष इस पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। तब से अब तक इसके दर्जनों संस्करण और पुनर्मुद्रण हो  जाना, उपन्यास की पठनीयता का प्रमाण है। प्रकाशन होते ही जिन सुविज्ञात समीक्षक ने ‘अपठित रह जाने को ही इसकी नियति’ घोषित कर दिया था, उनकी भविष्यवाणी को झुठलाते हुए यह नयी सज-धज के साथ सिर उठाए फिर खड़ा हो गया।’’ आज पचास वर्ष से अधिक हो गए हैं इसके प्रकाशन को और इसकी ताकत आज भी वही है जिसकी ओर डॉ. निर्मला जैन ने महत्वपूर्ण संकेत किया था।
हिंदी में व्यंग्य उपन्यासों की एक लम्बी सूची है, हां उतनी विशालकाय नहीं है जितना कि उपन्यास-साहित्य। व्यंग्य लिखना ही एक बड़ी चुनौती है। हिंदी का पहला व्यंग्य उपन्यास कौन सा है और कौन नहीं है, इस बहस में मैं नहीं जाना चाहता हूं। इस तरह की बहसात्मक तलवारे चलाने के लिए कुछ विद्वान आलोचक सदा कमर कसे तैयार रहते हैं, अतः यह चिंतन वो ही करें तो बेहतर। सन् 1905 ई0 में एक उपन्यास ‘उर्दू बेगम’ शीर्षक से मिलता है, जिसके लेखक के नाम के स्थान पर ‘बी0ए0’ लिखा हुआ है। इस उपन्यास की कथा में व्यंग्य प्रसंगवश आया है, इसकी शैली में व्यंग्य उपन्यास की परिपक्वता नहीं है। सन् 1943 में प्रकाशित निराला का उपन्यास ‘ कुल्लीभाट ’ वस्तु ओर शिल्प की दृष्टि से व्यंग्य-उपन्यास की श्रेणी में माना जा सकता है। 1952 में रांगेय राघव का उपन्यास ‘हुजूर’ प्रकाशित हुआ था जिसमें चापलूस चरित्रों पर व्यंग्य किया गया था। इसके पश्चात् प्रकाशित व्यंग्यात्मक उपन्यासों की सूची इस प्रकार है — राधाकृष्ण का ‘सनसनाते सपने’ हरिशंकर परसाई का ‘रानी नागफनी की कहानी’ हिमांशु श्रीवास्तव का ‘कथा सूर्य की नई यात्रा’   नागार्जुन का ‘हीरक जयन्ती’ श्रीलाल शुक्ल का ‘ रागदरबारी’ मनहर चौहान का ‘आखिरी सफा’ बदीउज्जमा का ‘एक चूहे की मौत ’ हंसराज रहबर का ‘ किस्सा तोता पढाने  का ’ श्यामसुंदर घोष का ‘ एक उलूक कथा ’ नरेंद्र कोहली के ‘ आश्रितों का विद्रोह ’ तथा पांच एब्सर्ड उपन्यास ’ श्रीकांत चैधरी का ‘ सब कुछ गलत हाथों में ’ आबिछ सुरती का ’ काली किताब ’ सुरेश कांत का ‘ ब से बैंक ’ अशोक शुक्ल का ‘हड़ताल हरिकथा’  और ‘प्रोफेसर पुराण ’ ज्ञान चतुर्वेदी का ‘नरक यात्रा’ ‘बारामासी’ ‘मरीचिका’ ‘हम न मरब’ ‘पागलखाना’ आशा रावत का ‘ गुरू दक्षिणा ’ विनोद साॅव का ‘ चुनाव ’ तथा यशवंत व्यास का ‘ चिंता घर ’ । इन व्यंग्य उपन्यासों में से कुछ को छोड़कर, जिनके बारे में कहा जा सकता है कि इस उपन्यास में व्यंग्य आ गया,  अन्य सभी उपन्यास व्यंग्य-उपन्यास की श्रेणी में आते हैं। इन व्यंग्य उपन्यासों की आलोचना के लिए नए मानदंडों की आवश्यकता है। उपन्यास की परम्परागत कसौटी पर यदि इन्हें परखा जाएगा तो एक निराशा आलोचक और लेखक के हाथ लगेगी। व्यंग्य-उपन्यास सरंचना की दृष्टि से अपना अलग अस्तित्व रखते हैं । राग दरबारी के संदर्भ में कथानक के वैशिष्टय की जो चर्चा मैंने अभी की है, वह इन व्यंग्य उपन्यासों में उपलब्ध है । कथा बीच-बीच में टुकड़ों में विभाजित लगती है, पर उद्देश्य की एकरूपता और विसंगति चित्रण का लक्ष्य उसे एकसूत्रता में बांधे रखता है । ‘हुजूर‘, आखिरी सफा’, ‘पांच एब्सर्ड उपन्यास’ ’नरक यात्रा’ ‘प्रोफेसर पुराण’ जैसे व्यंग्य उपन्यासों को कथानक और चरित्र की पूर्व निर्धारित मान्यताओं के आधार पर कसना उचित नहीं होगा।
सवाल – आजकल व्यंग्य लेखन में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ी है। इससे रचनात्मक स्तर पर भी क्या आप कोई बदलाव देखते हैं?
प्रेम जनमेजय – कभी सूर्यबाला पर लिखते हुए मैंने लिखा था- यदि सूर्यबाला हिंदी व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में नहीं आतीं तो व्यंग्य को पुरुषोचित विधा मान लिया जाता। व्यंग्य लेखन में ही नहीं साहित्य की हर विधा में और जीवन के हर क्षेत्र में नारी दखल बढ़ा है। हिंदी व्यंग्य में इस दखल का मैं स्वागत करता हूं। इससे पूर्व ही नहीं, आज भी नारी को आलम्बन बना उसे उपहास का पात्र बनाया गया है। मैं उस मानसिकता का विरोधी हूं जो वंचित और दुर्बल को न केवल उपहास का पात्र बनाती है, अपितु उसपर व्यंग्यात्मक प्रहार करती है। मैं तो अक्सर कहता हूं कि वंचित पर व्यंग्य नहीं करना चाहिए।
नारी की तब और आज की स्थिति और उससे जुड़ी विसंगतियों पर प्रहार करती मेरी एक व्यंग्य रचना पिछलो दिनों ‘हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुबई की पत्रिका में प्रकाशित हुई है, जिसमें मैंने एक स्थान पर लिखा है- वैसे तो पुरुष-स्त्री में अनंतकाल तक संवादहीनता की स्थिति रही है। पुरुष ने एकालाप किया है और स्त्री को विलाप करना पड़ा है। ‘यदा यदा धर्मस्य ग्लानि..’ की शैली में वो यदा-कदा स्त्री से प्रकृति हुई है। यदा-कदा ही उसने विलाप को हुंकार में बदला है। पर आज का बदलता समय यदा-कदा का नहीं है। संवादहीनता के युग में स्त्री संवाद की निरंतर चुनौती दे रही है।‘‘ कुछ और सवाल मैंने अपनी व्यंग्य रचना ‘हव्वा या हौवा’ में उठाए हैं।
अब हिंदी व्यंग्य साहित्य में इक्का दुक्का नारी हस्तक्षेप नहीं है, एक पूरी फौज है जो इसे अपनी रचनाओं से समृद्ध कर रही है। हिंदी व्यंग्य उपन्यास का क्षेत्र भी अब पुरुषोचित नहीं रहा है, इस विधा की चुनौतियां भी महिला व्यंग्यकार उठा रही हैं। यह देखकर अच्छा लगता है कि इनके तेवर रचना में ही नहीं बहस में भी बने हुए हैं। सबसे उत्तम परिवर्तन यह है कि अब कोई नारी को उपहास का पात्र बनाने का साहस नहीं करता है।
सवाल –  आप लम्बे समय से ‘व्यंग्य यात्रा’ का प्रकाशन कर रहे हैं। इसमें किस प्रकार की चुनौतियाँ आपके समक्ष आती हैं? और ये पत्रिका व्यंग्य के मौजूदा परिदृश्य में बदलाव लाने की दिशा में क्या कोई सकारात्मक भूमिका निभा पा रही है?
प्रेम जनमेजय – ‘व्यंग्य यात्रा’ एक मिशन है जिसको हिंदी व्यंग्य को गंभीरता से लेने वाले रचनाकारों का सहयोग मिल रहा है। ‘व्यंग्य यात्रा’ ने हिंदी व्यंग्य के आलोचनात्मक पक्ष को सशक्त करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है और निभा रही है। बहस का एक माहौल बना है। हिंदी व्यंग्य लेखन और उसके रचनाकारों पर केंद्रित चर्चा हो रही है। एक रचनात्मक आंदोलन की भूमिका तैयार हो रही है। व्यंग्य यात्रा का लक्ष्य उसे कूप मंडूक होने से बचाना है। यह पिछले पंद्रह वर्षों से निंरतंर प्रकाशित होने वाली ‘व्यंग्य यात्रा’ के प्रयत्नों का फल है कि आज व्यंग्य को साहित्य की विविध विधाओं के साथ पंगत में बैठाया जा रहा है। आज के समय में नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, नित्यानंद तिवारी, निर्मला जैन, प्रभाकर श्रोत्रिय, कमलकिशोर गोयनका जैसे अनेक आलोचक व्यंग्य और केवल व्यंग्य पर अपनी बात कह रहे हैं। ममता कालिया, राहुल देव, नरेंद्र मोहन, दिविक रमेश, हरीश पाठक, प्रताप सहगल, तेजेंद्र शर्मा, धीरेंद्र अस्थाना, अजय नावरिया, विवेक मिश्र, पंकज सुबीर, प्रज्ञा, अनंत विजय आदि विभिन्न विधाओं के रचनाकार व्यंग्य के मंच पर दृष्टिगत हो रहे हैं।
‘व्यंग्य यात्रा’ का आरंभ हिंदी व्यंग्य में सार्थक विमर्श एवं रचनाओं के प्रकाशन के लिए एक सामूहिक सोच के अंतर्गत किया गया था। ‘व्यंग्य यात्रा’ निकालने का मेरा यह भी एक लक्ष्य था कि व्यंग्य पर विमर्श का मंच तैयार हो। प्रयोगात्मक रूप में इसके केवल पांच अंक निकालने की मैंने घोषणा की थी। तेरह वर्ष से निंरतर चल रही इस पत्रिका के मैंने कभी आजीवन सदस्य नहीं बनाए क्योंकि मुझे स्वयं ही इसके जीवन के बारे में निश्चितता नहीं थी। अब यह एक मिशन के रूप में चल रही है, जिसके लिए मैं आवश्यकतानुसार भिक्षा मांग लेता हूं। जिन रचनाकारों को उनकी रचना हेतु मुझे पारिश्रमिक देना चाहिए, वे भिक्षा के रूप में मुझे पारिश्रमिक दे देते हैं। उनका यह लगाव ही इसे निरंतर किए हुए है। ‘व्यंग्य यात्रा’ में केवल रचनाएं नहीं जातीं। यह एक सोच के साथ, एक मिशन के साथ निकल रही है। इसका उद्देश्य निरंतर निखर रहा है। ‘व्यंग्य यात्रा’ एक मंच बन चुका है जो देश के विभिन्न राज्यों में स्थानीय रचनाकारों के सहयोग से संगोष्ठियां आयोजित करता है। कहानी मंच जबलपुर, मुबई विश्वविद्यालय एवं परसाई मंच, गुजराती साहित्य परिषद्, हिमाचल, साहित्य अकादमी, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, हिंदी भवन, हिंदुस्तानी साहित्य सभा, नेशनल बुक ट्रस्ट, हरियाण साहित्य अकादमी, ‘मधुबन’ कोटा, बिलासपुर आदि में व्यंग्य विमर्श से जुड़े मुद्दों पर अनेक कार्यक्रम हो चुके हैं। इसका उद्देश्य व्यापक ही हुआ है।
सवाल – भारत से बाहर रचे जाने वाले साहित्य को लेकर आपकी क्या राय है?
प्रेम जनमेजय – मैं बाहर रहा हूं, मेरे अनेक मित्र ‘देश बाहर’ हैं, मेरे बाहर और वहां रहने वालो के व्यापक अनुभव हैं। कुछ मुद्दों पर मेरी मुठभेड़ भी हुई है। तेजेंद्र शर्मा, सुधा ओम ढींगरा, हरिशंकर आदेश आदि को मैंने गहरे पढ़ा है, इन पर मैंने आलोचनात्मक लिखा है। मैंने ‘जहाजी चालीसा’ नामक रचना रची है जिसका लोकार्पण त्रिनिदाद और टुबैगो में हुआ था। मैंने ‘पश्चिम की पुरवाई’ नामक संकलन का सम्पादन किया है। बहुत कुछ ऐसा कर्म है जिसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि मैं इस विषय पर अपनी राय रखता रहा हूं और रख सकता हूं। जैसे हिंदी व्यंग्य विधा का सवाल कोई सवाल नहीं रह गया है, वैसे ही प्रवासी साहित्य के निजत्व एवं स्वतंत्र व्यक्तित्व पर सवाल खड़ा करना बेमानी है। आज एक बड़ी फौज है जो हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रही है। आज केवल विदेशों में नहीं, देश में भी इसपर बहस होती है। पर इसके आलोचकों का यह कहना भी सत्य है कि बाहर साहित्य रचने वाले कुछ रचनाकार विदेश मोहग्रस्त  मंडराने वाले लेखकों, प्रकाशकों को उल्लू बनाते हैं, सुबुक सुबक रचनाओं एव अपनी माटी से दूरी की पीड़ा के वर्णन द्वारा साहित्य में आरक्षण पाना चाहते हैं।
सवाल – ऐसे कुछ युवा व्यंग्यकार जिनमें आपको संभावना नज़र आती हैं और उनके लिए कोई सन्देश?
प्रेम जनमेजय – मैं जब युवा था तो मुझे अपने में अपार संभावनाए दृष्टिगत होती थीं तो आज के युवा ने क्या कसूर किया है कि उसमें न हों। बुजुर्ग रचनाकार की तुलना में युवा रचनाकार में संभावनाएं अधिक होती हैं। उसमें परिवर्तन को जल्दी लक्षित करने की दृष्टि होती है। वह बदलते हुए परिवेश को जल्दी आत्मसात करता है। वह तकनीक से घबराता नहीं है, उससे मुठभेड़ करता है। उसके युवामन को चुनौतियां स्वीकार करने में रचनात्मक सुख मिलता है। बुजुर्ग रचनाकार हारे को हरिनाम हो सकता है, युवा नहीं। आज का युवा अभिव्यक्ति के अनेक नए माध्यमों से लैस है। श्रेष्ठ व्यक्ति का सबकुछ श्रेष्ठ नहीं होता है। कच्चापन हर लेखक में होता है, ये दीगर बात है कि वो उसकी महानता के आलोक में दिखता नहीं।
मैंने ‘व्यंग्य यात्रा’ के 2013 में युवा व्यंग्यकारों पर केन्द्रित दो अंक निकाले थे और इसमें 21 युवा व्यंग्यकारों की तीन-तीन रचनाएं प्रकाशित की थीं। बाद में युवा लेखन पर बुजुर्ग रचनाकरों से आलेख भी लिखवाए थे। इस विशेषांक में- पकंज सुबीर,अनुराग वाजपेयी, अशीष दशोत्तर, अजय अनुरागी, अनुज खरे,अर्चना चतुर्वेदी,ललित शर्मा,राम नारायण मीणा हलधर कृष्ण कुमार आशु,लालित्य ललित, अरुण कुमार जैमिनी, टीकाराम साहू आजाद, अकबर महफूज आलम रिजवी,अनूप मणि त्रिपाठी,ओम नागर, संतोष त्रिवेदी,अलंकार रस्तोगी,गौरव त्रिपाठी, विवेक मिश्र, पंकज प्रसून, सुनीता शानू, सुचिता श्रीवास्तव, सुमित प्रताप सिंह, संजीव ठाकुर आदि थे। इसके संपादकीय में मैंने लिखा था– पुरानी होती पीढ़ी द्वारा, अपने समय के युवाओं को एक ऋणात्मक दृष्टि से देखने की भेड़चाल रहती है। पुरानी होती पीढ़ी, नई पीढ़ी के साथ कदम न मिलाकर चल पाने की अपनी असमर्थता का दोष युवा के सर ही मड़ती आई है और सदा शिकायती लहजे में उससे बात करती रही है। अपने ‘स्वर्णिम’ अतीत के बोझ तले दबी पुरानी होती झुकी पीढ़ी को भविष्य का तीव्र आलोक न केवल चुंधियाता है, अपितु दुर्गम पर्वत की चुनौतियां हतोत्साह की झल्लहाट को जन्म देती हैं और यह झल्लाहट युवा पीढ़ी पर उतरती है। जैसे बुजुर्ग पीढ़ी को युवा पीढ़ी से शिकायत रहती है वैसे ही युवा पीढ़ी को भी बुजुर्ग पीढ़ी से शिकायत रहती है। युवा पीढ़ी की सबसे बड़ी शिकायत होती है कि उसे कोई समझता  ही नहीं है। साहित्य में या फिर कला की दुनिया में ये शिकायतें कुछ अधिक बढ़ जाती हैं और इन सब में प्रमुख रहती है- उपेक्षा की शिकायत। संपादक की उपेक्षा, प्रकाशक की उपेक्षा, पुरस्कार समिति की उपेक्षा, आलोचक की उपेक्षा आदि आदि। युवा पीढ़ी एक चांस को तरसती हुई दृष्टिगत होती है।… जो अग्रज पीढ़ी अपने समय के युवा स्वर को नहीं पहचानती है, उसे स्पेस नहीं देती है, वह अपने समय के साथ न्याय नहीं करती है। समाज की प्रगति तभी सही मार्ग पर गतिशील हो पाती है, जब उसमें अतीत और वर्तमान का संतुलन होता है। यही संतुलन एक सकारात्मक, उन्नत एवं गतिशील समाज का निर्माण करता है। इसलिए बहुत आवश्यक है कि हम अपने समय के युवा स्वर को पहचाने और पहचान कर उस स्वर में अपने अनुभव का रचनात्मक योगदान दें।’’
पीयूष –  अच्छा लगा आपसे संवाद कर, सवाल और भी हैं…
प्रेम जनमेजय – सवालों से मुठभेड़ होती रहनी चाहिए और बढ़िया सवाल करने वालों से बार-बार। अब इतना कर, मिलते हैं फिर कभी…

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