'हिंदी का बाज़ार और बाज़ार की हिंदी' विमर्श के सहारे ही हिंदी बढ़ेगी - डॉ. विनोद कुमार मिश्र 3

विश्व हिंदी सचिवालय के महासचिव डॉ. विनोद कुमार मिश्र से हिंदी के वैश्विक परिदृश्य पर युवा लेखक-समीक्षक पीयूष द्विवेदी की बातचीत

सवाल – सर्वप्रथम परिचय स्वरूप हम आपके विषय में जानना चाहेंगे. अपनी अबतक की जीवन-यात्रा के विषय में बताइए।
डॉ. विनोद –  जन्म 11 अप्रैल 1964 को वाराणसी ज़िले के एक पिछड़े अंचल और शहर से मात्र 15 किलोमीटर दूर वृहद काशी खण्ड के पंचक्रोशी तीर्थ ‘रामेश्वर’ के पास हरिहरपुर गाँव के एक गरीब किन्तु सुशिक्षित ब्राह्मण परिवार में हुआ। हमारे परिवार का गरीबी से चोली- दामन का रिश्ता रहा। केवल गरीबी की भाषिक सम्पन्नता में जीने वाला हमारा परिवार नहीं था, वरन गरीबी हमें विरासत में मिली थी। उन दिनों गाँव गरीबी के पर्याय थे। समकालीन हिंदी कविता के बड़े हस्ताक्षर ‘धूमिल’ और हमारे गाँव को पंचक्रोशी सड़क विभाजित करती है। उन दिनों गाँव कैसे होते थे? धूमिल से पूछिये –
 “लगता है यह गाँव नरक का भोजपुरी अनुवाद है।”
उक्त पंक्तियों से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उन दिनों गाँवों की क्या स्थिति थी? मूलभूत सुविधाओं के अभाव में लगभग समूचा भारतीय गाँव अभिशप्त रहा है। प्रारंभिक शिक्षा गाँव से एक किलोमीटर दूर की प्राथमिक पाठशाला में हुई। कमरों के अभाव में वर्ष भर पेड़ के नीचे कक्षाएँ चलती थीं। वर्षा, आंधी-तूफ़ान आने पर विद्यालय बंद हो जाता था। सरकारी पाठशाला होने बावजूद शिक्षक अच्छे व समर्पित थे। शिक्षक ही हमारे अविभावक होते थे। घर के अन्य किसी सदस्य को हमारी चिन्ता नहीं होती थी। हमारे शिक्षकों ने हमें गढ़कर तैयार किया। उस विद्यालय ने और कुछ दिया हो या न दिया हो किन्तु भाषा और गणित की शिक्षा सलीके से दी गयी। आज भाषा और व्याकरण के नाम पर जो कुछ मेरे पास है उन शिक्षकों की देन है जिन्होंने कुंभकार और जौहरी की तरह मुझे गढ़ा और तराशा है। माध्यमिक शिक्षा के लिए घर से तीन किलोमीटर दूर कच्ची पंचक्रोशी सड़क पर स्थित रामेश्वर के युगल बिहारी इंटर कॉलेज में प्रवेश मिला। कक्षा छ: से बारह तक की शिक्षा उसी विद्यालय में हुई। सौभाग्य से मेरे पिता जी उसी विद्यालय में संस्कृत के अध्यापक थे। वे मेरे भी शिक्षक थे। छठी से 12वीं तक संस्कृत की शिक्षा उन्हीं के निर्देशन और कठोर अनुशासन में  मिली। पिता जी की इच्छा के विरुद्ध संस्कृत के बजाय हिंदी की पढ़ाई की। संस्कृत के विकल्प के रूप में हिंदी पढ़ने पर वे बड़ी मुश्किल से राज़ी हुए थे। यद्यपि हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी पर उनका असाधारण अधिकार था। उन दिनों संस्कृत को लेकर मेरे मन में एक भ्रांति थी कि संस्कृत पढ़कर मुझे पारिवारिक पेशा औपरोहित्य कर्म ही करना होगा। खैर, उच्च शिक्षा के लिए वाराणसी के काशी विद्यापीठ से एम.ए. एवं एम.फ़िल व काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
भारत में बेरोज़गारी का दंश हर किसी को झेलना पड़ता है। मैंने भी झेला है। गरीबी और बाल विवाह ने घर, गाँव व प्रदेश छोड़ने को बाध्य किया और भारत के सुदूर पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश के सरकारी महाविद्यालय में अध्यापक बना। लगभग 18 वर्षों तक अरुणाचल के देरा नातुंग महाविद्यालय में शिक्षण कार्य किया तत्पश्चात 2009 में त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय अगरतला में प्राध्यापक होकर चला गया। वहाँ भी हिंदी विभाग के संवर्धन की महती ज़िम्मेदारी मिली। सात वर्षों के भीतर धीरे-धीरे विपन्न हिंदी विभाग को अध्यापकों और विद्यार्थियों से सुसम्पन्न बना दिया गया। भारत का दुर्भाग्य रहा है कि हिंदी सहित भारतीय भाषाओं का सम्वर्धन सरकारों की अंतिम प्राथमिकता रही है। संवैधानिक मजबूरी न होती तो भारत में हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण की दशा और दिशा बड़े प्रश्न चिन्हों के घेरे रहती। लगभग तीन दशक के कटु अनुभवों के आधार पर मैं बड़ी ही साफ़गोई से यह कहना चाहता हूँ कि शिक्षा का दायित्व सरकारों के बजाय समाज को ले लेना चाहिए। सरकारों के सहारे शिक्षा व्यवस्था को छोड़ना बड़े खतरे मोल लेने के बराबर है।
सही मायने में यदि शिक्षित समाज बनाना है तो साक्षरता दर बढ़ाने की बजाय सही अर्थों में पढ़े लिखे एवं ज्ञानियों की संख्या बढ़ानी चाहिए। 70 साल की आज़ादी के बाद अभी भी भारत की स्पष्ट शिक्षा नीति का न होना चिंता का विषय है। आज तक भारतीय भाषाओं को कम से कम माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का माध्यम बनाने का निर्णय न लिया जाना बड़े खतरे का संकेत नहीं तो क्या है? वर्ष 2016 में विश्व हिंदी सचिवालय के महासचिव का दायित्व मिला। कार्य क्षेत्र की सीमा भारतेतर हुई। तब से सचिवालय के लक्ष्यों और उद्देश्यों को पूरा करने की दिशा में  ‘चरैवेति -चरैवेति’………।
सवाल – विश्व हिंदी सम्मेलनों के जरिये हिंदी को क्या लाभ देखते हैं आप?
डॉ. विनोद –  1975 से लेकर 2018 तक 11 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं। प्रत्येक सम्मेलन में हिंदी के अतीत वर्तमान और भविष्य को लेकर चर्चा होती रही है। तमाम अनुशंसाएँ भी की जाती रही हैं। कुछ का अनुपालन हुआ और कुछ ऐसे ही रहीं। वैश्विक स्तर पर हिंदी का ऐसा महोत्सव आयोजित होना राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय महत्व का विषय रहा है। भारत की राजभाषा हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने का संकल्प पिछले 11 सम्मेलनों में लगातार लिया जाता रहा है और इसी उम्मीद के साथ हम हिंदी सेवी अभी तक अपने-अपने मन को बहलाते-फुसलाते रहे कि कभी न कभी हमारी आशा और आकांक्षा की पूर्ति अवश्य होगी। भाषा के इस उत्सव को लाभ-हानि के तराज़ू पर तौलेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। हम भारतीय पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं। अत: आशावादिता का त्याग नहीं कर पाते हैं।
विश्व हिंदी सचिवालय और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा इन्हीं सम्मेलनों के मंथन का परिणाम है। कम से कम हिंदी के इस महोत्सव के माध्यम से उत्सवधर्मी हिंदी सेवी उम्मीद से लबरेज तो रहता है। हिंदी सम्मेलनों के माध्यम से हिंदी की वैश्विक गतिविधियों का पता तो चलता है। हिंदी केवल भारत की एक भाषा नहीं है। एक संस्कृति है, सभ्यता है जो विश्व भर में फैले हुए भारतवंशियों को एक मंच पर ला खड़ा करती है और विश्व हिंदी सम्मेलन इसी प्रकार का एक मंच है। हम भारतीयों ने हिंदी को प्रतिरोध की भाषा या विश्व भाषा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की भावना को भी प्रकट करने में सर्वदा शर्म का अनुभव करते रहे हैं। हिंदी की वैश्विक उपस्थिति को प्रकट करने का इससे बेहतर मंच और क्या हो सकता है? कम से कम तीन वर्ष में एक बार विश्व भर से हिंदी सेवी एकत्र हो, कुछ चर्चा-परिचर्चा के माध्यम से हिंदी के ‘कल आज और कल’ पर सार्थक या निरर्थक जो कहें, बहस तो कर पाते हैं। अत: अनुमानित लाभ न मिल पाने के बावज़ूद नाउम्मीदी को अपने आस-पास फटकने से बचाते तो हैं अन्यथा हिंदी का व्याकरण संज्ञा, सर्वनाम और  क्रिया विशेषण से हीन होकर टूटकर बिखर गया होता।
सवाल – विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस में होने का क्या कारण है और आज मॉरीशस में हिंदी की, खासकर युवाओं के बीच, क्या स्थिति है?
डॉ. विनोद –  भारतेतर देशों में मॉरीशस ही एक मात्र ऐसा देश रहा है जहाँ हिंदी की स्थिति अच्छी रही है। लगभग 100 वर्षों से भी अधिक समय से यहाँ हिंदी की उपस्थिति किसी न किसी रूप में रही है। आज भी तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक  संस्थाएँ हिंदी को लेकर काफ़ी सजगता से कार्य कर रही हैं। रही बात सचिवालय का यहाँ होना तो मुझे लगता है कि 1975 में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के किसी सत्र में हिंदी के वैश्विक केंद्र की स्थापना का प्रस्ताव मॉरीशस से गए प्रतिनिधिमंडल ने रखा था। ध्यातव्य हो,  उस सम्मेलन में भारत और मॉरीशस के राष्ट्राध्यक्षों ने शिरकत की थी। उनके अलावा भी हिंदी की कई नामचीन हस्तियों की उपस्थिति ने हिंदी के स्वर को वैश्विक आकार दिया था।
बाद के अन्य सम्मेलनों में सचिवालय की स्थापना को लेकर चर्चा-परिचर्चा होती रही और मॉरीशस में सचिवालय को स्थापित करने के लिए मॉरीशसवासियों ने रुचि एवं उत्साह भी दिखाया और अन्तत: 2009 से सचिवालय ने औपचारिक रूप से यहाँ काम करना प्रारंभ किया। मॉरीशस से पूर्व भारत में युवाओं की क्या स्थिति है, इस पर चर्चा करना आवश्यक है। क्योंकि मुझे दोनों देशों में भाषा को लेकर समान रूप से भ्रम की स्थिति दिखाई देती है।
हीनता-बोध भी एक कारण मुझे दिखाई देता है । भारत में ही युवा वर्ग हिंदी को लेकर गंभीर नहीं है। हिंदी क्षेत्रों में आयोजित माध्यमिक परीक्षाओं में लाखों की तादाद में हिंदी में अनुत्तीर्ण हो रहे विद्यार्थियों की दशा हिंदी की भावी दिशा तय कर रही है। कम से कम आज तो भारत में हिंदी की पक्षधर सरकार है, फिर भी अंग्रेज़ी माध्यम सरकारी प्राथमिक विद्यालय की नाम पट्टिका बड़े सवाल पैदा करती है। दुनिया के तमाम शिक्षा शास्त्रियों ने मातृ भाषा में कम से कम प्राथमिक शिक्षा की वकालत की है। लेकिन ‘ढाक के तीन पात’।
निज भाषा को लेकर प्रतिरोध का भाव भारतीय युवाओं में न के बराबर है और हाँ,  केवल युवाओं को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। हम अभिभावक क्या कर रहे हैं ? हमारी संकल्प-शक्ति क्षीण हो चुकी है। भाषायी अस्मिता का भाव खत्म हो चुका  है। व्यवहार, व्यापार, संचार और रोज़गार के लिए जब तक हिंदी को वैकल्पिक भाषा के रूप में विकसित नहीं किया जायेगा, साथ ही अन्य समृद्ध भारतीय भाषाओं को साथ लेकर हिंदी के संवर्धन की बात नहीं की जायेगी, मुझे नहीं लगता, हम भारत या मॉरीशस के युवा वर्ग को हिंदी से जोड़कर रख पायेंगे। केवल सरकारों के भरोसे भाषा विकास की कल्पना करना बेमानी होगी। समाज को आगे आना होगा।
भाषा के प्रति संस्कार पैदा करना और भाषा के प्रति गौरव-बोध पैदा करने का दायित्व समाज का होता है। और समाज स्वयं दिग्भ्रमित है। तथाकथित विश्‍व भाषा के व्यामोह से मुक्त हुए बिना समाज स्वभाषा/निजभाषा के प्रति गर्व व गौरव का भाव पैदा नहीं कर सकता। अत: सामाजिक प्रतिबद्धता के बिना युवाओं को स्वभाषा प्रेम के बंधन से कैसे बाँध सकते है? मॉरीशस में भोजपुरी कभी स्वभाषा/जनभाषा थी, किन्तु समय के थपेड़े ने उसे किनारे कर दिया है। स्थानीय स्तर पर एक विकसित भाषा यहाँ स्वभाषा/ निजभाषा या यों कहें कि मातृ भाषा का स्थान ले चुकी है। अत: अब मॉरीशस में हिंदी जनसरोकारों की भाषा नहीं प्रतीत होती है।
यद्यपि यहाँ हिन्दी विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाई जाती है, उसी तरह जैसे अन्य देशों में। भारत की तरह हिन्दी को यहाँ राजभाषा जैसा दर्जा प्राप्त नहीं है। किसी स्तर पर हिंदी अनिवार्य नहीं है। सभी भाषाओं को सामान रूप से एक जैसा स्थान प्राप्त है। पुरानी पीढ़ी और कुछ हद तक वर्तमान की प्रौढ़ पीढ़ी में हिंदी की एक क्षीण संभावना दिखती है। आज की युवा पीढ़ी को तर्कपूर्ण ढंग से जब तक हिंदी के औचित्य से परिचित न करा लिया जाय, उसके लिए महत्वपूर्ण कारण एवं कारकों पर विचार किये बिना युवाओं को हिंदी से जोड़ पाना या जुड़े रखना असंभव है।
सवाल – क्या मॉरीशस में सचिवालय होने के नाते हिंदी भाषा-साहित्य के लिए वहां कोई ख़ास संभावनाएं तैयार हो रही हैं?
डॉ. विनोद –  मॉरीशस में सचिवालय का होना भाषा और साहित्य के लिए निश्चित रूप से स्वाभिमान  और शौर्य की बात है। रही बात संभावना की तो सचिवालय में होनेवाली गतिविधियाँ यहाँ हिंदी भाषा और साहित्य के सम्वर्धन के लिए अनुकूल वातावरण का सृजन अवश्य करती है। वर्ष भर होने वाले कार्यक्रम जैसे – विचार मंच, सृजनात्मक लेखन कार्यशालाएँ, रेडियो परिचर्चा, व्याख्यान-माला, हिंदी दिवस के अवसर पर सचिवालय द्वारा प्रायोजित हिंदी के कार्यक्रम तथा विश्‍व हिंदी दिवस तथा कार्यारंभ दिवस के अवसर पर होने वाले कार्यक्रमों से सीधे-सीधे मॉरीशस लाभान्वित होता है। इस तरह के कार्यक्रमों से भविष्य की हिंदी और इसकी सृजनात्मकता की सम्भावनाएँ बलवती हो सकती है।
सवाल – क्या ऐसी कोई उम्मीद है कि भविष्य में मॉरीशस में युवा पीढ़ी के बीच से हिंदी के कुछ अच्छे साहित्यकार हमें मिल सकते हैं?
डॉ. विनोद –  उम्मीद पर दुनिया कायम है। मॉरीशस की रचनात्मक ज़मीन अभी बंजर नहीं हुई है। ऊर्वरक शक्ति से संपन्न सृजन के बीज मौजूद हैं। और बीज का नाश नहीं होता है। समयानुसार अंकुर फूटता ही है। अत: संभावना तो बनी रहेगी। हाँ, पिछली पीढ़ी की तुलना में कम पैदावार की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
सवाल – विश्व हिंदी सम्मेलनों पर आरोप भी लगते रहे हैं. कहा जाता है कि ये हिंदी का मेला भर बनकर रह जाते हैं, इनसे हिंदी को कोई लाभ नहीं होता। इसपर कुछ कहना चाहेंगे?
डॉ. विनोद –  मेरे विचार से विश्व हिंदी सम्मेलन केवल मेला बनकर नहीं रह जाते हैं। हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार के अलावा समसामयिक विषयों और हिन्दी की विधाओं पर गहन विचार-विमर्श भी होते हैं ।प्रचार -प्रसार का माहौल तो बनाता ही है। विश्‍व भर से हिंदी के लोग इकट्ठा होते हैं, छनकर बहुत कुछ सार्थक चीज़ें बाहर निकलती हैं। समुद्र मंथन से अमृत और विष दोनों निकलते हैं। अब हमें तय करना है कि दोनों का कैसे उपयोग करें। और हाँ, विश्‍व हिंदी सम्मेलन हिंदी का ही अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है। अन्य विषयों में क्या इस तरह के सम्मेलन नहीं होते? अवश्य होते हैं। सरकारी सहयोग से राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस/संगोष्ठियों और सम्मेलनों की पूरे वर्ष बाढ़ सी रहती है। उस की भी तो समीक्षा होनी चाहिए। लाभ और हानि दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। लाभ के बाद हानि और हानि के बाद प्राप्त लाभ महत्वपूर्ण हो जाता है। यह एक सतत प्रक्रिया है।
सवाल – विश्व हिंदी सम्मेलनों में जाने वालों में अधिकतर हिंदी के लेखक, प्राध्यापक आदि ही होते हैं, जिन्हें हिंदी अच्छे से आती है। इससे हिंदी का क्या लाभ होता है?
डॉ. विनोद –  ऐसा नहीं है कि उक्त सम्मेलन में अधिकतम हिंदी के लेखक और प्राध्यापक ही होते हैं। हिंदी सेवी संस्थाओं में काम करने वाले हिंदी सेवी, विद्यार्थी, शोधार्थी और पत्रकार, मीडिया कर्मी सहित अन्य क्षेत्रों से सम्बद्ध समाज सेवी भी शामिल होते हैं और जिस विषय का सम्मेलन है उससे जुड़े या उसके जानकार लोग ही प्रतिभागी होंगे। हिंदी अध्यापक और हिंदी लेखकों के शामिल होने पर मुझे कुछ अटपटा नहीं लगता। आप का इशारा यदि कुछ और है तो उस पर टिप्पणी करने की इजाज़त मेरी मजबूरी, मेरे संस्कार, पद और तहज़ीब नहीं देते हैं।
सवाल – प्रवासी साहित्य के लिए पुरवाई के संपादक तेजेंद्र शर्मा जी ने एक शब्द दिया है – भारतेतर हिंदी साहित्य। उनका मानना है कि प्रवासी साहित्य में भारत से बाहर होने वाला हर तरह का लेखन समाहित नहीं होता, जबकि भारतेतर में हो जाता है। आपकी इस विषय में क्या राय है?
डॉ. विनोद –  प्रवासी साहित्य से मैं भी सहमत नहीं हूँ और श्री तेजेंद्र शर्मा जी से शतप्रतिशत सहमत होते हुए भारतेतर साहित्य की पक्षधरता के साथ खड़ा हूँ। प्रवासी साहित्य कहकर दोयम दर्जे का साहित्य कहने वालों की मानसिकता का मैं घोर विरोधी हूँ। हिंदी की मुख्य धारा और गौण धारा के निर्माता विश्वकर्माओं से भी मैं दो चार करने के लिए हमेशा तैयार रहता हूँ। इससे हिंदी का लेखन कमज़ोर होगा और खेमेबाज़ी भी बढ़ेगी। मैं साहित्य के दलित, महिला, आदिवासी विमर्श से भी असहमति व्यक्त करता हूँ। साहित्य साहित्य होता है। दलित आदिवासी व महिला के खांचे में बाँध कर देखना मैं निजी तौर पर उचित नहीं मानता और  वाल्मीकि रामायण को दलित और तुलसी के मानस को सवर्ण विमर्श का नाम देना दोनों महान भारतीय कवियों का उपहास करना है। 
सवाल – वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा-साहित्य का क्या भविष्य और चुनौतियाँ देखते हैं आप?
डॉ. विनोद –  आधुनिक तकनीक के विस्तार, भूमण्डलीकरण, औद्योगिकरण आदि के परिप्रेक्ष्य में हिंदी का भविष्य दिखाई तो देता है। आने वाले दिनों में बाज़ार ही भाषा के अस्तित्व की गारंटी देंगे :
अब हवाएँ ही करेंगी रोशनी का फ़ैसला।
जिस दिये में जान होगी वो दिया रह जायगा ।
‘हिंदी का बाज़ार और बाज़ार की हिंदी’ विमर्श के सहारे ही हिंदी बढ़ेगी, फलेगी, फूलेगी ऐसा विश्वास है। रही बात साहित्य की तो जब तक पढ़ने लायक लिखा जाता रहेगा, लिखा हुआ पढ़ा जाता रहेगा, हिंदी ज़िन्दा  रहेगी। रही बात चुनौती की तो हिंदी के लिए चुनौती थी, है और हमेशा रहेगी। चुनौती को अवसर में बदलने में यदि हिंदी सक्षम है तो चुनौती अच्छी है।
सवाल – हिंदी के लिए अंग्रेजी कितनी बड़ी चुनौती है?
डॉ. विनोद –  हिंदी के लिए अंग्रेज़ी कोई चुनौती नहीं है। अंग्रेज़ियत चुनौती है। हीनता बनाम श्रेष्ठता की घातक प्रवृत्ति चुनौती है। हिंदी की प्रतिरोधी क्षमता जैसे-जैसे विकसित होगी तो वह स्वत: चुनौती बनकर खड़ी होगी और जब वैकल्पिक भाषा के रूप में अपनी वैश्विक दावेदारी पेश करेगी, अपने आप आगे निकल जायेगी। आवश्यकता है कि वह क्षमता विकसित की जाय, जिससे श्रेष्ठताबोध आये और सर्वोत्तम विकल्प प्रस्तुत किया जाय। शेष स्वत: हो जायेगा।

2 टिप्पणी

  1. डॉ विनोद कुमार मिश्र जी के साक्षात्कार में हिंदी की स्थिति और विश्व हिंदी सम्मेलन पर बहुत सार्थक विश्लेषण।
    डॉ आशा रानी

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