राकेश शंकर भारती की कलम से राज कमल के उपन्यास 'बाँसुरीवाली' की समीक्षा 1
इधर अपनी ज़िंदगी की उत्थल-पुत्थल से समय निकालकर राजकमल जी का उपन्यास बाँसुरीवाली पढ़ा है। इस बार के दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में अमन प्रकाशन के स्टाल पर राज कमल जी से मिलना मेरे लिए एक सुखद अनुभव था। राज कमल जी सादगी के जीवन जीते हैं और उन्हें बिलकुल ऐसा नहीं लगा कि मेरे जैसे नये लेखक की किताब नहीं ख़रीदनी चाहिए।
अमन के स्टाल पर मेरी किताब, इस ज़िंदगी के उस पार, ख़रीदकर मुझसे ऑटोग्राफ ली और हम दोनों ने साथ में तस्वीरें भी खिंचवायीं। वहीं मैंने बाँसुरीवाली उपन्यास ख़रीदकर राजकमल की ऑटोग्राफ ली। अमन प्रकाशन ने 176 पेज का यह उपन्यास 200 रूपये की क़ीमत पर अच्छे आवरण पृष्ठ के साथ छापा है। छपाई साफ़-सुथरी है। उपन्यास का लुक भी क्लासिकल है। 
उपन्यास के आवरण पृष्ठ पर इस उपन्यास की नायिका मनिया की तस्वीर साफ़-साफ़ झलक रही है, जिसे देखकर पाठकों के मन में एकबार पढ़ने की लालसा जागृत होती है। शीर्षक बाँसुरीवाली से हम यह अंदाज़ा लगाते हैं कि नायिका मनिया बाँसुरी बजाती होगी। लेकिन यही उपन्यास का एक रहस्य है, जिसका पर्दाफ़ाश उपन्यास के अंत में ही होता है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि उपन्यास कहीं से आपको बोर नहीं करेगा। उपन्यास में बोझिल पकाऊ शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है और वाक्य भी काफ़ी सीधे-सादे हैं बिलकुल राज कमल जी की तरह ही, जिससे सभी वर्ग के पाठक बड़ी आसानी से उपन्यास के प्लाट से जुड़ जाते हैं। उपन्यास बतौर चित्रकार देश के कई प्रतिष्टित अख़बारों में काम कर चुके हैं, इसीलिए उपन्यास पढ़ते समय आपको चित्रकारी का एहसास भी होगा।
प्लाट की संरचना बड़े ही जादुई तरीक़े से की गयी है, जिससे पाठक आख़िर तक उपन्यास के पात्रों से बंधे रहते हैं। कई बेस्टसेलर मित्रों के उपन्यास पढ़कर मुझे घोर निराशा हुई थी, लेकिन इस उपन्यास ने मुझे कहीं से निराश नहीं किया। उपन्यास में कई परतों में सस्पेंस खुलते हैं और इससे पाठकों को सच्ची पठनीयता की अनुभूति होती है। इस उपन्यास का ढंग से प्रचार-प्रसार किया जाये तो कई बेस्ट सेलर मित्रों की किताबें इस उपन्यास के सामने फीकी पड़ जायेंगी। 
 उपन्यास पढ़ते समय कई पात्रों से गहरा लगाव हो जाता है और उनसे हमें हमदर्दी भी हो जाती है। इस उपन्यास में सच्चे नायक अमलेंद्र बाबू भदौरिया ही है, जिसमें मैं उपन्यासकार राजकमल जी की छवि देखता हूँ। उपन्यास के मध्य भाग से लेकर अंत तक हमें मनिया नायिका से हमदर्दी हो जाती है और वही हमदर्दी हमें उपन्यास के आख़िर तक बाँधकर रखती है।
बाँसुरी की कहानी ही उपन्यास में सबसे बड़ा रहस्य है और यह रहस्य आख़िर में टूट ही जाता है। काश! मनिया को खोयी हुई बाँसुरी जीते जी मिल जाती तो मुझे इस उपन्यास के आख़िर में अफ़सोस नहीं होता। अमलेंद्र बाबू के दिल में भी यही मलाल है कि काश मैं समय से यह बाँसुरी मनिया तक पहुँचा देता तो शायद मनिया को जीवन में इतनी ज़्यादा तकलीफ़ नहीं झेलनी पड़ती।
अगर स्त्री विमर्श की दृष्टि से भी देखा जाये तो यह एक बेहतरीन उपन्यास है। यूरोप के समाज से बिलकुल अलग अपने देश में स्त्री जब बाज़ार में अकेली पड़ जाती है तो मर्द के रूप में भेड़िया, शैतान वगैरह किस तरह से स्त्री की गोश्त नोचते हैं, इस उपन्यास में राज कमल जी ने बड़े ही मार्मिक ढंग से वर्णन किया है। अमलेंद्र (अमोल) की बचपन की कहानी और रानीकोट की किवदंती, भूतही कहानी भी शुरू में उपन्यास में रोचकता पैदा करती है। अमोल और कुसुम के बाल मन को भी टटोलने का मौक़ा मिलता है।
अमलू के बचपन की जटिलता और पेचीदगी ही आगे की कहानी को रहस्यमय बना देती है। और फिर ट्रेन में अपने मम्मी-पापा के साथ उस बूढ़े और बाँसुरीवाली लड़की से मिलना, जो कि इस उपन्यास की अगली कड़ी है, उपन्यास में एक नयी जान का संचार करता है। लाजवंती और निहालचंद का अपने बच्चों के साथ ठाकुर मामा के जाल में फँसना, उपन्यास की पहली कड़ी है, जहाँ आप उपन्यास की गहराई में पहुँचने के लिए बेचैन हो जाते हैं और मन में एक जिज्ञासा रहती है कि जल्दी से जल्दी उपन्यास पूरा पढ़ लूँ। यही जिज्ञासा एक उपन्यास की सबसे बड़ी कामयाबी है, जो मुझे कई नामी उपन्यास में नहीं मिले। कहावत भी है न- खोदा पहाड़, निकली चुहिया। 
मनिया को मूलचंद, भंवर लाल, हरपाल सिंह, धनीराम, बन्ने खान, थाने के दरोगा वगैरह जो मर्द के रूप में भेड़िये हैं, से मिलकर शारीरिक शोषण झेलकर अंदर से टूट जाती है, लेकिन अंत में पति के रूप में राममूरत जैसे अच्छे मर्द से मिलकर यह साबित हो जाता है कि इस समाज में स्त्री को इज़्ज़त देने के लिए अच्छे मर्द भी हाज़िर हैं। रामरती जैसी अच्छी सास को पाकर यह साबित हो जाता है कि कोई दूसरी औरत भी किसी परायी दिन-दुखिया को बेटी के रूप में अपना सकती है। 
 अगर उपन्यास की फ़िज़ा की बात की जाये तो फ़तेहपुर, सीकरी, राजस्थान के भरतपुर यानी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती इलाक़े की क़ुदरत और पुरुष प्रधान समाज की रूपरेखा देखने को मिलती है, जहाँ आज भी महिला की दशा में कुछ ख़ास तब्दीली नहीं आयी है। भाषा-शैली के एतबार से भी उपन्यास अपने मानक पर खड़ा उतरता है। 
उपन्यास- बाँसुरीवाली  
लेखक- राज कमल 
प्रकाशक- अमन प्रकाशन, कानपुर  
समीक्षक- राकेश शंकर भारती, यूक्रेन 
पृष्ठ- 176 
क़ीमत- 200 रूपये
राकेश शंकर भारती
कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त आदि विधाओं पर लेखन। अबतक तीन किताबें प्रकाशित। संपर्क - rsbharti.jnu@gmail.com

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