अपनी संस्कृति की जड़ों को बचाते हुए, लंदन की उस मिट्टी का हिस्सा बनना, जहाँ भारतीय लोगों ने अपना नया घर बनाया है – हैरो का इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर।
लंदन में रहते हुए कभी कभी कोई स्थान अचानक अपना सा लगने लगता है। उसके दरवाजे पर पहुँचते ही लगता है कि हजारों मील की दूरी जैसे कुछ क्षणों के लिए सिमट गई है। हैरो का सिद्धाश्रम प्रवासी भारतीय मन के लिए ऐसा ही एक स्थान है।
5 सितंबर 2026 की शाम जब मैं हैरो स्थित इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर पहुँचा तो मन में यह भाव नहीं था कि किसी अनजान धार्मिक संस्था में जा रहा हूँ। उसी शाम यहाँ आयोजित कवि सम्मेलन में मुझे भाई तेजेन्द्र शर्मा ने काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया था। मंदिर के सभागार में सामने भगवान के विग्रह थे, श्रोता थे, मंच था, माइक था और मेरे शब्दों के साथ कहीं बहुत भीतर भारत भी था।
कविता पढ़ते हुए लगा कि लंदन की इस शाम में गंगा, नर्मदा, हिंदी, भारतीय संस्कार और स्मृतियाँ सब किसी अदृश्य धागे से जुड़ गए हैं।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब मैंने सिद्धाश्रम को थोड़ा और समझने की कोशिश की तो लगा कि जिस स्थान को मैं उस शाम केवल एक आयोजन स्थल के रूप में देख रहा था, उसकी अपनी एक लंबी आध्यात्मिक और सामाजिक यात्रा है।
सिद्धाश्रम की स्थापना वर्ष 2000 में परम पूज्य श्री राजराजेश्वर गुरुजी ने की थी। गुरुजी 1993 में लंदन आए थे। उनका जन्म गुजरात के वलसाड जिले के वाघलधारा में हुआ और उनका प्रारंभिक नाम राजेश परमार था। किशोरावस्था में ही उन्हें आध्यात्मिक संस्कार मिले। 1986 में उन्होंने परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंदजी, जिन्हें डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली के नाम से भी जाना जाता है, से पहली गुरुदीक्षा प्राप्त की। आगे चलकर यही साधना उनके जीवन का मार्ग बनी और लंदन में सिद्धाश्रम की स्थापना के साथ उसका एक नया अध्याय शुरू हुआ।
आज सिद्धाश्रम राजराजेश्वर गुरुजी के नेतृत्व में एक पंजीकृत चैरिटी के रूप में कार्य करता है। इसका संसार केवल पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यहाँ आस्था के साथ सेवा है, साधना के साथ संस्कृति है और आध्यात्मिकता के साथ सामुदायिक सहभागिता है।
सुबह और शाम आरती, पारद शिवलिंग अभिषेक, गायत्री सत्संग, गुरु पादुका पूजन, हनुमान चालीसा और हीलिंग जैसी गतिविधियों के साथ नवरात्रि, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, दीपावली और होली जैसे पर्व भी यहाँ पूरे उत्साह से मनाए जाते हैं।
लेकिन सिद्धाश्रम को केवल धार्मिक गतिविधियों से समझना अधूरा होगा।
मुझे इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका सामाजिक विस्तार लगता है। 2025 में ऑक्सफोर्ड रोड, हैरो पर सिद्धाश्रम कम्युनिटी हब की शुरुआत की गई। यहाँ बच्चों की शैक्षणिक सहायता, युवाओं का मार्गदर्शन, बुजुर्गों के लिए सामुदायिक सहभागिता, महिलाओं के सशक्तीकरण, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सहयोग, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों तथा वेलनेस से जुड़े कार्यक्रमों की परिकल्पना की गई है। यानी मंदिर की परिधि से बाहर निकलकर समाज तक पहुँचने का यह एक स्वागतयोग्य प्रयास है।

राज राजेश्वर गुरुजी की भूमिका इस संस्था को और विशिष्ट बनाती है। वे केवल आध्यात्मिक गुरु के रूप में नहीं, बल्कि ब्रिटिश समाज और भारतीय समुदाय के बीच संवाद के एक सेतु के रूप में भी सक्रिय रहे हैं। सिद्धाश्रम की जानकारी के अनुसार वे 2012 से 2020 तक मेट्रोपॉलिटन पुलिस के पहले हिंदू पुलिस चैपलिन रहे। हैरो में वे मेयर के चैपलिन के रूप में भी अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। अंतरधार्मिक संवाद में उनकी सक्रियता भी दिखाई देती है।
यह उस भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का आधुनिक रूप है जिसमें साधना का अर्थ केवल स्वयं की शांति नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी है।
लंदन में भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की दुनिया वैसे भी बहुत विस्तृत है। नेस्डन का बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर अपनी स्थापत्य भव्यता और विशाल सामुदायिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। विल्सडन और हैरो के स्वामीनारायण मंदिर, लंदन के इस्कॉन केंद्र, आर्य समाज, जैन संस्थाएँ, अनेक सनातन मंदिर और सिख गुरुद्वारे अपनी अपनी परंपराओं के साथ प्रवासी जीवन को सांस्कृतिक आधार देते हैं। इनके बीच अनेक संस्थाएँ पूजा के साथ भाषा, संगीत, योग, शिक्षा, युवा गतिविधियों, सेवा और सामाजिक सहभागिता को भी महत्व देती हैं।

इन सबको देखते हुए लगता है कि विदेश में मंदिर केवल मंदिर नहीं रहता। वह स्वदेशी स्मृतियों का घर बन जाता है।
यह बात मुझे 5 सितंबर की उस शाम और अधिक समझ आई।
मंच पर कविता पढ़ते हुए सामने बैठे लोगों में कई ऐसे चेहरे थे जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी अंग्रेजी परिवेश में गुजरती है। उनके बच्चे ब्रिटिश स्कूलों में पढ़ते हैं, उनकी दिनचर्या ब्रिटिश समय के अनुसार चलती है, लेकिन हिंदी कविता की एक पंक्ति सुनते ही आँखों में अपने देश की कोई गली, कोई त्योहार, कोई नदी, माँ, पिता, गाँव या खेत दिखाई देने लगता है।
शायद यही प्रवासी भारतीय संस्थाओं का सबसे बड़ा योगदान है। वे केवल धर्म को नहीं बचातीं, वे स्मृति को बचाती हैं। भाषा को जगह देती हैं, त्योहारों को नया घर देती हैं और अगली पीढ़ी को यह एहसास कराती हैं कि आधुनिक दुनिया का नागरिक होना अपनी जड़ों से कट जाना नहीं है।
और शायद इसी भाव की एक सुंदर अगली कड़ी अब थेम्स के किनारे लिखी जा रही है।
13 सितंबर 2026 को ग्रीनविच स्थित ऐतिहासिक Old Royal Naval College में Chinmaya Mission UK द्वारा Thames के किनारे Ganga Aarti का आयोजन किया जा रहा है। इसे Totally Thames 2026 के साथ मिलकर आयोजित किया जा रहा है। शाम ढलते समय Royal Steps पर गंगा आरती होगी। आयोजकों ने इसे दो प्राचीन नदियों, गंगा और थेम्स, के बीच एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संवाद की तरह देखा है।
यह दृश्य अपने आप में कितना अद्भुत होगा।
जिस गंगा के किनारे आरती देखते हुए भारत में पीढ़ियाँ बड़ी हुई हैं, उसी आरती की लौ जब थेम्स के किनारे जलेगी तो वह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होगी। वह प्रवासी भारतीय जीवन की एक प्रतीकात्मक तस्वीर होगी। गंगा की स्मृति लेकर आए लोग थेम्स के किनारे खड़े होंगे और शायद पहली बार उन्हें लगेगा कि जिस नदी के किनारे उन्होंने अपना नया जीवन बनाया है, उसमें भी अपनी पुरानी नदी की कोई धुन सुनी जा सकती है।
और इस आयोजन की एक सुंदर बात यह भी है कि आयोजकों ने पर्यावरण के प्रति सम्मान रखते हुए स्पष्ट किया है कि फूल, मूर्तियाँ या अन्य सामग्री थेम्स में प्रवाहित नहीं की जाएगी। यानी परंपरा अपनी आत्मा के साथ आएगी, लेकिन नए परिवेश और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के साथ।
यह उस भारत की यात्रा है जो सात समंदर पार करके भी अपने भीतर बचा रहता है, लेकिन जहाँ पहुँचता है वहाँ की मिट्टी, भाषा और समाज को भी अपना लेता है।
सिद्धाश्रम के सभागार में उस शाम कविता और प्रार्थना एक दूसरे से अलग नहीं लगे। मुझे लगा, भारत जहाँ भी जाता है, वह अपने साथ केवल मंदिर नहीं ले जाता। वह अपने साथ भाषा, संगीत, कविता, संस्कार, स्मृतियाँ और रिश्तों की पूरी एक दुनिया लेकर जाता है।
यह गिरमिटिया संस्कृति का आधुनिक प्रवासी स्वरूप है, जिसमें विस्थापन की पीड़ा से अधिक अपनी जड़ों को नए भूगोल में रोप देने की जीवटता दिखाई देती है।
यहाँ आरती में आस्था है, गुरुजी में साधना है, कम्युनिटी हब में सेवा है और कवि सम्मेलन जैसे आयोजनों में शब्दों के माध्यम से धड़कता हुआ भारत।
और मैं उस भारत का केवल दर्शक नहीं था।मैं उसी शाम उसका एक छोटा सा हिस्सा था। 5 सितंबर की उस आत्मीय शाम के लिए सिद्धाश्रम परिवार और कवि सम्मेलन के आयोजकों का आभार।
कल फिर मिलता हूं किसी सबके देखे पर अनदेखे किए किसी नए रोचक विषय के साथ…

विवेक रंजन श्रीवास्तव
भोपाल, मध्य प्रदेश (भारत)
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