मनुष्य की अभिव्यंजना के जितने भी माध्यम हैं वे सभी तत्कालीन जीवन बोध और सरोकारों को ही व्यक्त करतें हैं | मनुष्य और समाज की संरचना का ताना-बाना जिस भी व्यवस्था के द्वारा निर्मित होता है वह उस युग की रचनाओं में या कलात्मकताओं में अवश्य परिलक्षित होता है | साहित्य भी इंसान के दिल का आईना बन कर दरअसल इसी ज़िन्दगी को साकार करता रहता है | दुनिया भर के साहित्य में एक बात समान रूप से दिखायी देती है और वह यह कि साहित्यकार या रचनाकार या कलाकार युगीन परिस्थितियों और भाव-विचारधाराओं से प्रभावित अवश्य होता है | जहां से भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का सुदृढ़ माध्यम बनती है वही से उसके विविधआयामी सृजनात्मक रूप गढ़ते गए | यह सभी रूप संरचनात्मक आधार पर भले ही अलग अलग हों पर सम्वेदना के धरातल पर हमेशा तद्युगीन भाव-बोध को ही रूपायित करते हैं | हिंदुस्तान में भी हम साहित्य के विविध पड़ावों को और प्रवृत्तियों को इसी सन्दर्भ में रख कर ही अध्ययन-मनन करते हैं और तब यह खास तौर पर स्पष्ट होता है कि ये विविधताएं उस समय की परिस्थितियों के कारण निर्मित होतीं हैं और इन परिस्थितियों का निर्माण उस समय की राजनीतिक-व्यवस्था और शासन-सत्ता के कारण होता है | रचनाकार के संवेग सहज ही उनसे प्रभावित होती हैं हैं और उसके अनेक आयाम कृतियों में प्रस्तुत होते हैं | 

डॉ. अनुपमा श्रीवास्तव का लेख : ज़फ़र याद आता है 5

हमारे देश की 18वी शती में साहित्य की विशेष परम्परा दिखयी देती है | उस समय हिन्दी से मिलती जुलती संरचना वाली उर्दू भाषा के अन्दर बेह्तरीन रचनाकार हुए | हिन्दुस्तान के साहित्य के सन्दर्भ में उर्दू साहित्य भी हिदी भाषा के साहित्य की तरह अपने मुखरित विकसित रूप में समझने और जानने की ज़रूरत है क्योंकि यह समानांतर रूप से साहित्य सृजन में संलग्न रही है | इस समय के कई उम्दा शायरों में मुगलों के अंतिम बादशाह बहादुर शाह ज़फर का नाम भी आता है | साहित्य में सत्ता के विविध रूपों की पड़ताल करते हुए इनकी शायरी में कई ऎसी बातें पता चलती हैं जो न केवल उस समय को परिभाषित करती हैं अपितु आज के भी भाव और विचार में तर्क संगत न्याय दृष्टि का निर्माण करती है | हिन्दुस्तान के आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र का ज़िक्र उनकी उर्दू शायरी और इस देश से उनकी बेइंतहा मोहब्बत के बिना पूरा नहीं होता है | 21 सितम्बर को अंग्रेजी शासकों के हाथों गिरफ्तार होने के बाद उन्हें रंगून भेज दिया गया |
रंगून में अंग्रेजों की कैद में रहते हुए भी उन्होंने ढेरों गजलें लिखीं | रंगून में क़ैद किये जाने के बाद भी उनकी यही ख्वाहिश बनी रही कि कम से कम आखिरी समय में उन्हें अपनी जान से भी अधिक प्रिय मातृभूमि में ही दफनाया जाये पर ऐसा भी उस समय की ज़ालिम सत्ता ब्रिटिश हुकूमत के चलते न हो सका | वे जानते थे कि यदि भारत की अवाम अपने बादशाह की ऎसी दुर्दशा देखेगी तो फिर उनसे विद्रोह करने का साहस न कर सकेगी | सत्ता का एक संवेदन शील शायर के दिल पर क्या असर हुआ था इसका सबूत ज़फ़र की अनेक ग़ज़लों में मुक़म्मल और में देखा जा सकता है,
“लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में |

बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार मे |

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में |

एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में |”
भारत में मुगलकाल के अंतिम बादशाह कहे जाने वाले जफर को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली का बादशाह बनाया गया था | बादशाह बनते ही उन्होंने जो चंद आदेश दिए, उनमें से एक था गोहत्या पर रोक लगाना | इस आदेश से पता चलता है कि वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के कितने बड़े पक्षधर थे | 1857 के समय बहादुर शाह जफर एक ऐसी बड़ी हस्ती थे, जिनका बादशाह के तौर पर ही नहीं एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में भी सभी सम्मान करते थे | इसीलिए बेहद स्वाभाविक था कि मेरठ से विद्रोह कर जो सैनिक दिल्ली पहुंचे उन्होंने सबसे पहले बहादुर शाह ज़फर को अपना बादशाह बनाया | जफर को बादशाह बनाना सांकेतिक रूप से ब्रिटिश शासकों को एक संदेश था। इसके तहत भारतीय सैनिक यह संदेश देना चाहते थे कि भारत के केन्द्र दिल्ली में विदेशी नहीं बल्कि भारतीय शासक की सत्ता चलेगी | बादशाह बनने के बाद बहादुर शाह जफर ने गोहत्या पर पाबंदी का जो आदेश दिया था वह कोई नया आदेश नहीं था। बल्कि अकबर ने अपने शासनकाल में इसी तरह का आदेश दे रखा था | जफर ने महज़ इस आदेश का पालन फिर से करवाना शुरू कर दिया था | उनके लिए इंसान का पहला मज़हब इंसानियत है |

डॉ. अनुपमा श्रीवास्तव का लेख : ज़फ़र याद आता है 6

वे 1837 में बादशाह बने पर तब तक देश के अधिकतर इलाकों में अंग्रेजों का कब्जा हो चुका था | 1857 में हिन्दुस्तान के सभी राजा और शासकों ने उन्हें अपना बादशाह मान लिया था , लेकिन 82 बरस के बहादुर शाह जफ़र के नेतृत्त्व में लड़ी गई यह लड़ाई कुछ ही दिन चली और 21 सितम्बर को अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन पर मुक़दमा चलाया गया और उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली | उनके पिता उन्हें मुगल शासन देने के हक में नहीं थे क्योंकि वे अत्यधिक कलाप्रेमी और सौन्दर्यनुरागी थे | उनके पास शासन करने के लिए केवल शाहजहाँबाद यानि आज की दिल्ली आई और वे नाममात्र के बादशाह रह गए थे | बावजूद इसके उनकी इस देश के प्रति प्रेम को भुलाया नही जा सकता है | जो गहरी संवेदना उनके लेखन में शायरी के माध्यम से महसूस होती है वही जज़्बा उनका अपने वतन हिंदुस्तान के लिए भी था | उनके लिए उनका देश और उससे मोहब्बत वैसी ही थी जो कि माशूका के लिए होती है | अपने अंतिम दिनों में उनके जज़्बात कुछ इस प्रकार के थे ,
“एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में |

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में |

दिन ज़िन्दगी खत्म हुए शाम हो गई,
फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मज़ार में |

कितना है बदनसीब ज़फरदफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में |”
1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी | अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला | भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी |
शुरुआती परिणाम हिंदुस्तानी योद्धाओं के पक्ष में रहे, लेकिन बाद में अंग्रेजों के छल-कपट के चलते प्रथम स्वाधीनता संग्राम का रुख बदल गया और अंग्रेज बगावत को दबाने में कामयाब हो गए | बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडसन ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया |
 भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर उर्दू के एक बड़े शायर के रूप में भी विख्यात हैं। उनकी शायरी भावुक कवि की बजाय देशभक्ति के जोश से भरी रहती थी और यही कारण था कि उन्होंने अंग्रेज शासकों को तख्ते-लंदन तक हिन्दुस्तान की शमशीर (तलवार) चलने की चेतावनी दी थी। जनश्रुतियों के अनुसार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब बादशाह जफर को गिरफ्तार किया गया तो उर्दू जानने वाले एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी ने उन पर कटाक्ष करते हुए यह शेर कहा ,
 “दम में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की ए जफर अब म्यान हो चुकी है, शमशीर (तलवार) हिन्दुस्तान की..” 
इस पर ज़फर ने बेतकल्लुफी से करारा जवाब दिया था “हिंदीओ में बू रहेगी जब तलक इमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग (तलवार) हिन्दुस्तान की..” 
बहादुर शाह जफर सिर्फ एक देशभक्त मुगल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के मशहूर कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई | 
देश से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा | वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फिक्र रही | उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया ,
“लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में |

बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में |

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में |

कितना है बदनसीब ज़फर दफ्न के लिए ,
दो गज़ ज़मीं भी न मिली कूए यार में |”
बहादुर शाह ज़फर जैसे कम ही शासक होते हैं जो अपने देश को महबूबा की तरह मोहब्बत करते हैं और कू-ए-यार ( जिससे प्यार करते हैं उसके घर की गली) में जगह न मिल पाने की कसक और पीड़ा के साथ  परदेस में दम तोड़ देते हैं | यहाँ यह भी सपष्ट होता है की किस प्रकार एक शायर की संवेदना सत्ता की अन्यायपूर्ण षड्यंत्रों का शिकार हो उसी पीड़ा को व्यक्त करती है | इस एक ग़ज़ल के जानिब से हम उस समय की रचनाशीलता में सता की अन्यायपूर्ण दखलअंदाजी को महसूसते हैं |
देशप्रेम के साथ-साथ जफर के व्यक्तित्व का एक अन्य पहलू शायरी थी | उन्होंने न केवल ग़ालिब, दाग, मोमिन और जौक जैसे उर्दू के बड़े शायरों को तमाम तरह से प्रोत्साहन दिया बल्कि उर्दू भाषा और लेखन पर पूरा अख्तियार रखते हुए बड़ी खूबसूरत रचनाएँ दुनिया को दी | तबीयत से कवि हृदय बहादुर शाह जफर शेरो-शायरी के मुरीद थे और उनके दरबार के दो शीर्ष शायर मिर्ज़ा ग़ालिब और जौक आज भी शायरों के लिए आदर्श हैं | यह इस बात को दर्शाता है कि यदि राजा और बादशाह या शासक चाहे तो साहित्य और रचनात्मकता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकता है जिससे कला और संस्कृति को प्रश्रय तो मिलता ही है साथ ही साथ शायर या कवि की अभिव्यंजनाओं में उस समय की व्यवस्था का हाल भी मिल जाता है | ज़फ़र खुद बेहतरीन शायर थे | दर्द में डूबे उनके शेरों में मानव जीवन की गहरी सच्चाइयां और भावनाओं की दुनिया बसती थी | रंगून में अंग्रेजों की कैद में रहते हुए भी उन्होंने ढेरों गजलें लिखीं | बतौर कैदी उन्हें कलम तक नहीं दी गई थी, लेकिन सूफी संत की उपाधि वाले बादशाह जफर ने जली हुई तीलियों से दीवार पर ग़ज़लें लिखीं |
“जा कहियो नसीमसहर मेरा चैन गया, मेरी नींद गयी
तुम्हे मेरी न मुझको तुम्हारी खबर मेरा चैन गया मेरी नींद गयी “
विद्वानों के अनुसार ज़फर के समय में जहाँ मुगलकालीन सत्ता चरमरा रही थी वहीं उर्दू साहित्य खासकर उर्दू शायरी अपनी बुलंदियों पर थी | जफर की मौत के बाद उनकी शायरी “कुल्लियात ए जफर” के नाम से संकलित की गयी |
अंग्रेजों ने अपनी सता का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हुए जुल्म की सभी हदें पार कर दीं | जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए | उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं | वे 1837 में बादशाह बने पर तब तक देश के अधिकतर इलाकों में अंग्रेजों का कब्जा हो चुका था | 1857 में क्रांति की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उन्होंने भी अंग्रेजों को खदेड़ने का आह्वान किया, लेकिन 82 बरस के बहादुर शाह जफर की नेतृत्त्व में लड़ी गई यह लड़ाई कुछ ही दिन चली अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया | . उन पर मुक़दमा चलाया गया और उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली | यही नहीं अपने देश को अपनी महबूबा की तरह मानते हुए वे अपनी भी मौत से नही डरते और लिखते हैं ,
मुझे दफ़्न करना तू जिस घड़ी, तो ये उससे कहना कि ऐ परी,
वो जो तेरा आशिकज़ार था उसे तहख़ाक उसे दबा दिया गया”
ज़फर की अपने वतन के प्रति मुहब्बत और उसकी तरक्की की आरजुओं को हम उनके लेखन में बार बार देख पाते हैं | इन अशआरों में शायर की बैचैनी और विवशता को देखा जा सकता है ,
“या मुझे अफसरशाहा न बनाया होता 
या मेरा ताज गदाया न बनाया होता ,
रोज़ ममूरा-ए- दुनिया में ख़राबी है ‘ज़फर’
ऎसी बस्ती को तो वीराना बनाया होता”
“बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऎसी तो न थी 
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऎसी तो न थी “ इस ग़ज़ल के जानिब से वे तत्कालीन शासकों की क्रूरता और अनैतिक व्यवहार पर करुण  अभिव्यक्ति करते हैं ,
“क्या सबब तु जो बिगड़ता है ‘ज़फर’ से हर बार 
खून तेरी नूर-ए-शिमाईल कभी ऎसी तो न थी |”
न किसी की आँख का नूर हूँ ण किसी के दिल का करार हूँ, जो किसी के काम न आ सकेमैं  वो मुश्ते गुबार हूँ” इस ग़ज़ल में उन्होंने दिल्ली के उजड़ने के ग़म को बताया है और उर्दू के शायराना अंदाज़ में अपनी खराब हालत का ज़िक्र किया है नहीं हाल ए दिल सुनाने के क़ाबिल, ये किस्सा है रोने रुलाने के क़ाबिल, न घर है न दर है, रहा एक ज़फ़र है…. “1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम को आज 150 साल हो गए लेकिन ये वह दौर था जब दिल्ली की तहज़ीब ख़त्म होने  की आहट सुनाई देती है ऐसे में  शायराना  मिज़ाज वाले बादशाह के दिल पर क्या गुज़रती होगी यह उनकी शायरी से पता चलता है l
उनके अशआर आज भी संवेदना को उद्वेलित करने की क्षमता रखते हैं और उसी माहौल में ले जाते हैं जहा ज़फर जैसा उम्दा शायर और इंसान सत्ता में मनमानेपन का शिकार हो रहा था | 
आद्ध्यात्मिक उद्गार और सूफियाना अंदाज़ :-
ज़फर के संघर्षपूर्ण जीवन में भी हमेशा इन्सानियत और रूहानियत का रंग हमेशा रहा | दिल्ली में स्थित उनके ज़फर महल के स्थान से इस बात का पता बखूबी चलता है क्योंकि वह उनके प्रिय सूफ़ी पीर क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास स्थित है | अपने अत्यंत कष्टपूर्ण पलों में भी वे हमेशा सकारात्मक और उस खुदा पर विश्वास बना कर कहते थे ,
“क्यों हिफाज़त हम और की ढूँढे
हर नफस जब कि है खुदा हाफ़िज़ “
व्यवहारिक समझ :-
ज़फर की शायरी से यह भी बखूबी समझ आता है कि उनके पास एक अच्छे इंसान होने के साथ साथ बहुत ही व्यवहारिक समझ भी थी | उन्हें सभी मज़हब के लोगों ने यु ही नहीं अपना बादशाह मान लिया था | जब कोई महत्त्वपूर्ण बात हो तो उसे सभी के बीच में नही कहना चाहिए क्योंकि उससे बात के अर्थ का अनर्थ होने का खतरा बना रहता है , 
“कीजे न दस में बैठ कर आपस की बातचीत
पहुँचेगी दस हज़ार जगह दस की बातचीत”
इस मुगल बादशाह की मौत 1862 में 87 साल की उम्र में बर्मा (अब म्यांमार) की तत्कालीन राजधानी रंगून ( वर्तमान में यांगून) की एक जेल में हुई थी, लेकिन उनकी दरगाह 132 साल बाद 1994 में बनी | इस दरगाह की एक-एक ईंट में आखिरी बादशाह की जिंदगी के इतिहास की महक आती है जो हर पल उनके ज़िंदगी के उन लम्हों को याद करती है जिसमें एक बादशाह का अपने वतन से बेइंतिहा मोहब्बत की ताबीर अंकित हैं | आज भी उनके उजाड़ पड़े ज़फर महल में इस उम्दा शायर की बैचेनी, परेशानियों और दुःख के स्वर गूँजा करते हैं जिन्हें साथ ही स्थित कुतुबख्तियार काकी की दरगाह से आती हुई रूहानी उजालों से शायद सुकून मिलता हो |
सन्दर्भ : 1.कविता कोश 
  1. रेख्ता 
  2. आजतक 
  3. सरगुज़िश्तदेहली : 1857 के आंदोलन की कहानी, जीवन लाल की ज़ुबानी /सम्पादक एवं अनुवादक / दरख़शां ताजवर 
5.बहादुर शाह ज़फ़र, रोज़ानमचा  : ख़्वाजा निज़ामी 
6. BBC न्यूज़

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